केरल में जल जीवन मिशन के शेष कार्यों के लिए ₹26,074.17 करोड़ की आवश्यकता: राज्य विधानसभा में जानकारी

केरल में जल जीवन मिशन के शेष कार्यों के लिए ₹26,074.17 करोड़ की आवश्यकता: राज्य विधानसभा में जानकारी

केरल में जल जीवन मिशन के शेष कार्यों के लिए ₹26,074.17 करोड़ की आवश्यकता: राज्य विधानसभा में जानकारी

जल जीवन मिशन पूरा करने के चरणघोषणा2019कार्य प्रारंभNRDWP सेनिधि आवंटन₹26,074.17 करोड़कार्य पूर्णता55.24%नया लक्ष्यदिसंबर 2028
जल जीवन मिशन पूरा करने के चरण

✎ जल जीवन मिशन ग्रामीण हर घर को कार्यात्मक नल कनेक्शन देने का केंद्र प्रायोजित कार्यक्रम है, जिसमें पेयजल राज्य सूची का विषय होने के कारण केंद्र-राज्य वित्तीय साझेदारी (सामान्यतः 50:50, विशेष राज्यों में 90:10) इसकी प्रगति की मूल…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — शासन, संघवाद और केंद्र-राज्य संबंध (केंद्र प्रायोजित योजनाएँ, वित्तीय साझेदारी, जल राज्य का विषय)  |  GS Paper II — सामाजिक न्याय और कल्याणकारी योजनाएँ (ग्रामीण क्षेत्र में पेयजल, सार्वजनिक स्वास्थ्य)  |  GS Paper III — अर्थव्यवस्था (बुनियादी ढाँचा, सार्वजनिक व्यय, विकास वित्त संस्थान की भूमिका)  |  GS Paper III — पर्यावरण और जल संसाधन (जल सुरक्षा, भूजल और जल गुणवत्ता)
  • Prelims: जल जीवन मिशन (Jal Jeevan Mission) का लक्ष्य और कार्यान्वयन मंत्रालय (जल शक्ति मंत्रालय), कार्यात्मक घरेलू नल कनेक्शन (Functional Household Tap Connection – FHTC) की अवधारणा, ग्रामीण पेयजल हेतु प्रति व्यक्ति प्रति दिन 55 लीटर (lpcd) का मानक, संविधान की ग्यारहवीं अनुसूची — पेयजल (प्रविष्टि 11), जो पंचायतों के कार्यक्षेत्र में है, सातवीं अनुसूची की राज्य सूची — जल (प्रविष्टि 17) राज्य का विषय है, नाबार्ड (NABARD) — स्थापना वर्ष 1982, नाबार्ड अधिनियम 1981 के अंतर्गत, ग्रामीण ऋण का शीर्ष विकास वित्त संस्थान, राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम (NRDWP) और जल जीवन मिशन के बीच संबंध, आर्सेनिक और फ्लोराइड प्रभावित बस्तियों में जल गुणवत्ता की प्राथमिकता
  • Essay: सहकारी संघवाद में केंद्र-राज्य वित्तीय साझेदारी: उपलब्धि, बाधाएँ और सुधार, सार्वजनिक सेवाओं का सार्वभौमिक लक्ष्य बनाम वित्तीय उपलब्धता: समय-सीमा का व्यावहारिक प्रश्न

त्वरित पुनरावृत्ति: जल जीवन मिशन ग्रामीण हर घर को कार्यात्मक नल कनेक्शन देने का केंद्र प्रायोजित कार्यक्रम है, जिसमें पेयजल राज्य सूची का विषय होने के कारण केंद्र-राज्य वित्तीय साझेदारी (सामान्यतः 50:50, विशेष राज्यों में 90:10) इसकी प्रगति की मूल कुंजी है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

जल शक्ति मंत्रालय के आँकड़ों और केरल जल संसाधन विभाग की जानकारी के अनुसार, केरल में जल जीवन मिशन के शेष कार्यों को पूरा करने के लिए केंद्र और राज्य की साझा निधि से ₹26,074.17 करोड़ की और आवश्यकता है। अब तक राज्य ने ₹18,640.62 करोड़ व्यय किए हैं। राज्य विधानसभा में जल संसाधन मंत्री द्वारा दिए गए लिखित उत्तर में कहा गया कि सभी कार्य दिसंबर 2028 तक पूरे होने की संभावना है, बशर्ते निधि उपलब्ध रहे। राष्ट्रीय स्तर पर केरल की प्रगति का स्तर 55.24% कार्य पूर्णता के साथ निचले स्थान पर है। कासरगोड, इडुक्की, वायनाड, कोझिकोड, कोट्टायम, मलप्पुरम और पथनमथिट्टा जिलों में अभी आधे कार्य भी पूरे नहीं हुए हैं। कार्यान्वयन एजेंसी केरल जल प्राधिकरण (Kerala Water Authority – KWA) को नाबार्ड से ₹9,000 करोड़ के ऋण की स्वीकृति मिली है, जिसमें से अब तक ₹7,000 करोड़ प्राप्त हुए हैं और इसका उपयोग राज्य के हिस्से के भुगतान में हुआ है। विभाग ने शेष कार्यों के लिए ऐसी प्राथमिकता तय की है, जिसमें पूर्ण हो चुकी परियोजनाओं से अधिकतम कनेक्शन दिए जाएँ और अधिक कनेक्शन तथा अधिक राजस्व-क्षमता वाले कार्यों को पहले लिया जाए।

पृष्ठभूमि

  • जल जीवन मिशन की घोषणा 2019 में की गई। इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्र के प्रत्येक घर तक कार्यात्मक नल कनेक्शन पहुँचाना है। इससे पहले ग्रामीण पेयजल का कार्य राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम (NRDWP) के अंतर्गत चल रहा था।
  • मूल समय-सीमा 2024 थी, जिसे बाद में दिसंबर 2028 तक बढ़ाया गया। समय-सीमा बढ़ने का अर्थ है कि मिशन की वित्तीय और प्रशासनिक योजना को पुनः निर्धारित करना आवश्यक है।
  • संविधान में जल राज्य सूची का विषय है (सातवीं अनुसूची, प्रविष्टि 17), जबकि पेयजल पंचायती राज संस्थाओं के कार्यक्षेत्र में ग्यारहवीं अनुसूची (प्रविष्टि 11) के अंतर्गत आता है। इसी कारण यह केंद्र और राज्य तथा स्थानीय निकायों के साझा उत्तरदायित्व का विषय है।
  • जीवन के अधिकार की व्याख्या में सर्वोच्च न्यायालय ने स्वच्छ पेयजल को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार का हिस्सा माना है। राज्य-नीति के निदेशक तत्त्वों का अनुच्छेद 47 पोषण स्तर और लोक स्वास्थ्य में सुधार को राज्य का कर्तव्य बताता है।
  • मिशन की वित्तीय व्यवस्था केंद्र प्रायोजित योजना के रूप में चलती है। अधिकांश राज्यों में केंद्र और राज्य का हिस्सा 50:50 है, जबकि हिमालयी और पूर्वोत्तर राज्यों के लिए यह अनुपात 90:10 है। केरल पर 50:50 का अनुपात लागू होता है।

जल जीवन मिशन क्या है?

  • जल जीवन मिशन (Jal Jeevan Mission) जल शक्ति मंत्रालय के अंतर्गत चलने वाला ग्रामीण पेयजल का बड़ा राष्ट्रीय कार्यक्रम है, जिसका लक्ष्य हर ग्रामीण परिवार को कार्यात्मक घरेलू नल कनेक्शन (FHTC) उपलब्ध कराना है।
  • मिशन का मानक प्रति व्यक्ति प्रति दिन 55 लीटर (lpcd) पेयजल की आपूर्ति है। केवल कनेक्शन देना पर्याप्त नहीं माना जाता, बल्कि जल की नियमित और गुणवत्तापूर्ण आपूर्ति भी आवश्यक है।
  • मिशन का क्रियान्वयन ग्राम पंचायत और ग्राम सभा की भागीदारी से होता है। गाँव स्तर पर जल एवं स्वच्छता समिति (Village Water and Sanitation Committee) जैसी संस्थाएँ परियोजना की निगरानी और रखरखाव में सहायता करती हैं।
  • वित्तीय ढाँचा केंद्र और राज्य की साझेदारी पर आधारित है। अधिकांश राज्यों में 50:50 का अनुपात है, जबकि विशेष श्रेणी के राज्यों में केंद्र का हिस्सा 90% तक होता है। इसलिए राज्य की वित्तीय क्षमता सीधे प्रगति को प्रभावित करती है।
  • राज्य स्तर पर कार्यान्वयन प्रायः राज्य की जल आपूर्ति एजेंसी के माध्यम से होता है। केरल में यह कार्य केरल जल प्राधिकरण (KWA) द्वारा किया जा रहा है।
  • नाबार्ड जैसे विकास वित्त संस्थान राज्य की एजेंसियों को ग्रामीण बुनियादी ढाँचे के लिए दीर्घकालिक ऋण उपलब्ध कराते हैं। ऋण की शर्तें और पुनर्भुगतान क्षमता राज्य के बजट से जुड़ी होती हैं।
  • मिशन में जल स्रोत की विश्वसनीयता, आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसे संदूषकों की जाँच तथा जल-गुणवत्ता निगरानी को भी महत्त्व दिया गया है।
  • मिशन की सफलता के लिए बने ढाँचे का सही उपयोग आवश्यक है। पूरे हुए जल स्रोतों और पाइपलाइन नेटवर्क का अधिकतम उपयोग कर कनेक्शन बढ़ाना, संसाधनों का दक्षता से उपयोग माना जाता है।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
लक्ष्य ग्रामीण प्रत्येक परिवार को नल से पेयजल आपूर्ति उपलब्ध कराना। राष्ट्रीय स्तर पर समय-सीमा बढ़ाकर दिसंबर 2028 की गई है।
कुल परिव्यय केरल (Keralam) में जल जीवन मिशन का कुल परिव्यय ₹44,714.79 करोड़ है, जिसकी लागत केंद्र और राज्य सरकार 50:50 के अनुपात में साझा करती हैं।
अब तक का व्यय और शेष आवश्यकता राज्य ने अब तक ₹18,640.62 करोड़ खर्च किए हैं। शेष कार्यों के लिए ₹26,074.17 करोड़ की अतिरिक्त आवश्यकता बताई गई है।
कार्य की प्रगति केरल में अब तक 55.24% कार्य पूरे हुए हैं। राष्ट्रीय स्तर की सूची में राज्य निचले क्रम में है, और सात जिले अभी आधी प्रगति भी पूरी नहीं कर सके हैं।
वित्तीय व्यवस्था केरल जल प्राधिकरण (Kerala Water Authority) को NABARD से ₹9,000 करोड़ के ऋण की स्वीकृति मिली है। अब तक ₹7,000 करोड़ प्राप्त हुए हैं, जिन्हें राज्य के हिस्से के भुगतान में उपयोग किया गया है।
कार्य-प्राथमिकता का सिद्धांत पूर्ण परियोजनाओं से अधिकतम कनेक्शन देना, अधिक कनेक्शन वाले कार्यों को पहले लेना और अधिक राजस्व-क्षमता वाले कार्यों को प्राथमिकता देना।

महत्व

आर्थिक

  • केंद्र और राज्य के बीच 50:50 साझेदारी से संघीय वित्तीय सहभागिता का स्पष्ट उदाहरण मिलता है।
  • शेष कार्यों के लिए ₹26,074.17 करोड़ की आवश्यकता राज्य के राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) और सार्वजनिक ऋण के प्रबंधन पर दबाव को दिखाती है।
  • ऋण-आधारित वित्तपोषण (NABARD से ऋण) से परिसंपत्ति निर्माण तो होता है, पर भविष्य में ब्याज और पुनर्भुगतान का दायित्व भी बनता है।

सामाजिक एवं स्वास्थ्य

  • सुरक्षित और नियमित पेयजल से जलजनित रोगों में कमी लाने की दिशा में सीधा योगदान मिलता है।
  • विशेषकर महिलाओं और बच्चों पर पानी ढोने का बोझ घटता है, जिससे उनके शिक्षा और आय-अर्जन के अवसर बढ़ सकते हैं।

संघीय शासन एवं प्रशासन

  • जल आपूर्ति राज्य का विषय है, फिर भी केंद्र प्रायोजित योजना के माध्यम से राष्ट्रीय लक्ष्य निर्धारित होते हैं। इससे सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) की व्यावहारिक परीक्षा होती है।
  • जिला-स्तरीय प्रगति के आँकड़े सार्वजनिक होने से नीति-निर्माण में निगरानी और उत्तरदायित्व (Accountability) का पहलू मजबूत होता है।

पर्यावरणीय एवं संसाधन

  • सतही और भूजल स्रोतों का टिकाऊ उपयोग जल जीवन मिशन की दीर्घकालिक सफलता के लिए आवश्यक है, क्योंकि नल-कनेक्शन तभी सार्थक होते हैं जब स्रोत सुरक्षित हों।

चुनौतियाँ

1. वित्तीय अंतराल और ऋण-निर्भरता

  • शेष कार्यों के लिए ₹26,074.17 करोड़ की आवश्यकता है, जबकि अब तक का व्यय ₹18,640.62 करोड़ है। इससे स्पष्ट है कि कुल परिव्यय का बड़ा भाग अभी भी अनिश्चित है।
  • NABARD ऋण की स्वीकृति के बावजूद राज्य के हिस्से की समय पर उपलब्धता राज्य के बजटीय संसाधनों पर निर्भर करती है।
  • वित्तीय उपलब्धता पर निर्भर होने के कारण समय-सीमा (दिसंबर 2028) के साथ राज्य ने शर्त जोड़ी है कि कार्य ‘धन की उपलब्धता के अधीन’ होंगे।

2. कार्य-प्रगति में असमानता

  • राज्य में 55.24% कार्य ही पूरे हुए हैं, जो राष्ट्रीय स्तर पर निचले क्रम में होने का संकेत है।
  • कसरगोड, इडुक्की, वायनाड, कोझिकोड, कोट्टायम, मलप्पुरम और पथनमथिट्टा जिले अभी आधी प्रगति भी पार नहीं कर सके हैं।
  • राजस्व-क्षमता और कनेक्शन-संख्या को प्राथमिकता देने से दूरस्थ और पहाड़ी क्षेत्र पीछे छूट सकते हैं, जहाँ लागत अधिक और कनेक्शन कम होते हैं।

3. परिसंपत्तियों का संचालन और रख-रखाव

  • नल-जल परियोजनाओं की दीर्घकालिक सफलता पाइपलाइन, जल-शोधन और पंप-संयंत्र के नियमित रख-रखाव पर टिकी है।
  • स्थानीय निकायों की वित्तीय और तकनीकी क्षमता सीमित होने से परिसंपत्तियाँ समय से पहले खराब हो सकती हैं।
  • निर्मित परिसंपत्तियों का पूर्ण उपयोग न होने पर निवेश का प्रतिफल घटता है।

4. जल स्रोतों की स्थिरता और गुणवत्ता

  • नल-कनेक्शन देने के साथ स्रोत की पर्याप्तता और जल की गुणवत्ता सुनिश्चित करना आवश्यक है।
  • भूजल पर अत्यधिक निर्भरता और मौसमी वर्षा में परिवर्तन आपूर्ति को प्रभावित कर सकते हैं।
  • जल की गुणवत्ता की नियमित जाँच की व्यवस्था न होने पर जनस्वास्थ्य जोखिम बना रहता है।

5. समय-सीमा और क्रियान्वयन की गति

  • राष्ट्रीय समय-सीमा दिसंबर 2028 तक बढ़ाई गई है, फिर भी शेष कार्यों का अनुपात बड़ा है और गति पर्याप्त नहीं दिखती।
  • प्रगति की निगरानी के लिए आँकड़ों की विश्वसनीयता और समय पर अद्यतन होना आवश्यक है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
वित्तीय अंतराल ₹26,074.17 करोड़ की शेष आवश्यकता और राज्य के हिस्से की समय पर उपलब्धता अनिश्चित।
ऋण का भार NABARD ऋण से भविष्य में ब्याज और पुनर्भुगतान का दायित्व बनता है, जिसका बजट पर दीर्घकालिक असर पड़ेगा।
जिलेवार असमानता सात जिलों की प्रगति 50% से कम, जिससे क्षेत्रीय समानता का प्रश्न उठता है।
प्राथमिकता-निर्धारण का जोखिम अधिक कनेक्शन और अधिक राजस्व-क्षमता वाले कार्यों पर बल से दूरस्थ और कम घनत्व वाले क्षेत्र पीछे छूट सकते हैं।
परिसंपत्तियों का रख-रखाव स्थानीय निकायों की सीमित क्षमता से परिसंपत्तियों की दीर्घकालिक उपयोगिता घट सकती है।
जल स्रोत और गुणवत्ता स्रोतों की स्थिरता और जल-गुणवत्ता की नियमित जाँच पर्याप्त न होने से जनस्वास्थ्य जोखिम बना रहता है।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • जल जीवन मिशन (Jal Jeevan Mission)

आगे की राह

  • शेष कार्यों की जिलेवार और परियोजनावार कार्य-योजना बनाई जाए, जिसमें सबसे पिछड़े सात जिलों को पहले प्राथमिकता मिले।
  • केंद्र और राज्य के हिस्से की धनराशि के लिए बहु-वर्षीय वित्तीय योजना तैयार की जाए, ताकि वार्षिक बजट की अनिश्चितता कम हो।
  • NABARD ऋण के पुनर्भुगतान का स्पष्ट प्रावधान बजट में किया जाए, ताकि भविष्य के राजकोषीय दबाव का आकलन पहले से हो सके।
  • पूर्ण हो चुकी परियोजनाओं के संचालन और रख-रखाव के लिए ग्राम पंचायतों और नगरपालिकाओं की तकनीकी व वित्तीय क्षमता बढ़ाई जाए।
  • जल स्रोतों के संरक्षण, वर्षा जल संचयन और भूजल प्रबंधन को नल-कनेक्शन के साथ जोड़ा जाए।
  • जल की गुणवत्ता की नियमित जाँच और जनस्वास्थ्य निगरानी की व्यवस्था सुदृढ़ की जाए।
  • ग्राम सभाओं की भागीदारी से परियोजना-चयन और निगरानी में जन-सहभागिता बढ़ाई जाए।
  • प्रगति के आँकड़े नियमित रूप से सार्वजनिक डैशबोर्ड पर उपलब्ध कराए जाएँ, ताकि पारदर्शिता और समयबद्ध समीक्षा सुनिश्चित हो।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

जल जीवन मिशन (Jal Jeevan Mission) · हर घर जल · ग्रामीण नल कनेक्शन · जल शक्ति मंत्रालय (Ministry of Jal Shakti) · राज्य सूची की प्रविष्टि 17 (List II, Entry 17) · अनुच्छेद 243G और ग्यारहवीं अनुसूची · केंद्र-प्रायोजित योजना (Centrally Sponsored Scheme) · राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) · राजकोषीय संघवाद (Fiscal Federalism) · अनुच्छेद 21 और जल का अधिकार · पंचायती राज संस्थाएँ · जल सुरक्षा (Water Security)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 21 – जीवन के अधिकार में स्वच्छ जल शामिल
  • अनुच्छेद 243G एवं ग्यारहवीं अनुसूची (विषय 11) – पंचायतों को पेयजल का दायित्व
  • सातवीं अनुसूची, राज्य सूची की प्रविष्टि 17 – जल आपूर्ति राज्य का विषय

अवधारणा प्रवाह

ग्रामीण परिवारों को नल से पेयजल उपलब्ध कराने का राष्ट्रीय लक्ष्य (जल जीवन मिशन) निर्धारित होता है।  →  केंद्र और राज्य 50:50 अनुपात में लागत साझा करते हैं, और राज्य क्रियान्वयन एजेंसी (केरल जल प्राधिकरण) के माध्यम से कार्य करती है।  →  वित्तीय स्रोतों में NABARD ऋण जुड़ता है, पर राज्य के हिस्से की उपलब्धता पर कार्यों की गति निर्भर रहती है।  →  कार्य-प्रगति के आँकड़े (55.24%) और जिलेवार असमानता सामने आती है, जिससे प्राथमिकता-निर्धारण पर पुनर्विचार होता है।  →  शेष ₹26,074.17 करोड़ की आवश्यकता के कारण दिसंबर 2028 की समय-सीमा ‘धन की उपलब्धता के अधीन’ रखी गई है।  →  समय पर वित्त, परिसंपत्ति-रख-रखाव और स्रोत-संरक्षण मिलकर ही नल-कनेक्शन को स्थायी जल-सुरक्षा में बदल सकते हैं।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. जल जीवन मिशन की घोषणा वर्ष 2019 में की गई थी और इसका उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को कार्यात्मक नल कनेक्शन उपलब्ध कराना है।
2. संविधान की सातवीं अनुसूची की संघ सूची में ‘जल आपूर्ति’ की प्रविष्टि शामिल है।
3. उत्तर-पूर्वी और हिमालयी राज्यों को छोड़कर अन्य राज्यों में इस मिशन की लागत केंद्र और राज्य के बीच 50:50 के अनुपात में साझा की जाती है।

उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: जल जीवन मिशन 2019 में आरंभ हुआ और इसका लक्ष्य हर ग्रामीण परिवार को कार्यात्मक नल कनेक्शन देना है, जिसकी समय-सीमा अब दिसंबर 2028 तक बढ़ाई गई है। कथन 2 गलत है: जल आपूर्ति राज्य सूची (सूची II) की प्रविष्टि 17 में आती है, संघ सूची में नहीं। कथन 3 सही है: सामान्य राज्यों में लागत 50:50 और उत्तर-पूर्वी व हिमालयी राज्यों में 90:10 के अनुपात में साझा होती है।

Q2. निम्नलिखित पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): ग्रामीण पेयजल आपूर्ति का दायित्व पंचायती राज संस्थाओं को सौंपा जा सकता है।
कारण (R): संविधान का अनुच्छेद 243G राज्य विधानमंडल को पंचायतों को ग्यारहवीं अनुसूची में सूचीबद्ध विषयों, जिनमें पेयजल भी है, से संबंधित शक्तियाँ और दायित्व सौंपने का अधिकार देता है।

उपर्युक्त के संदर्भ में सही उत्तर चुनिए:

  1. (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है
  2. (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है
  3. (A) सही है, परंतु (R) गलत है
  4. (A) गलत है, परंतु (R) सही है

उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है — ग्यारहवीं अनुसूची की मद 11 ‘पेयजल’ से संबंधित है और अनुच्छेद 243G इसी अनुसूची के विषयों को पंचायतों को सौंपने का कानूनी आधार देता है। इसलिए (R), (A) की सही व्याख्या करता है। राज्य सरकारें इसी प्रावधान के आधार पर पेयजल आपूर्ति में पंचायतों की भूमिका तय करती हैं।

Q3. निम्नलिखित सुमेलित कीजिए:
सूची I (संवैधानिक प्रावधान)
1. सातवीं अनुसूची, राज्य सूची की प्रविष्टि 17
2. अनुच्छेद 243G
3. अनुच्छेद 47

सूची II (विषय)
a. पंचायतों को आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय से जुड़ी शक्तियाँ सौंपना
b. पोषण स्तर और जीवन स्तर ऊँचा करना तथा लोक स्वास्थ्य में सुधार करना
c. जल आपूर्ति, सिंचाई, जल निकास और जल भंडारण

सही सुमेलन चुनिए:

  1. 1-c, 2-a, 3-b
  2. 1-a, 2-c, 3-b
  3. 1-b, 2-a, 3-c
  4. 1-c, 2-b, 3-a

उत्तर: 1-c, 2-a, 3-b — राज्य सूची की प्रविष्टि 17 जल आपूर्ति, सिंचाई, जल निकास और जल भंडारण से संबंधित है, इसलिए 1-c। अनुच्छेद 243G पंचायतों की आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय संबंधी शक्तियों से जुड़ा है, इसलिए 2-a। अनुच्छेद 47 राज्य को पोषण, जीवन स्तर और लोक स्वास्थ्य सुधारने का नीति-निदेश देता है, इसलिए 3-b।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ केरलम (Keralam) में जल जीवन मिशन के अंतर्गत कुल ₹44,714.79 करोड़ के परिव्यय में से ₹18,640.62 करोड़ व्यय हो चुका है और शेष ₹26,074.17 करोड़ की आवश्यकता बताई गई है, जबकि राज्य में कार्य-प्रगति 55.24 प्रतिशत है। ग्रामीण पेयजल आपूर्ति में केंद्र-राज्य वित्तीय साझेदारी के संवैधानिक और प्रशासनिक आधार का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि यदि राज्य अपना हिस्सा और ऋण-सहायता समय पर उपलब्ध न करा सके, तो दिसंबर 2028 की समय-सीमा और संघवाद की व्यावहारिकता पर क्या प्रभाव पड़ेगा। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर की संरचना इस प्रकार हो:
1. भूमिका: जल जीवन मिशन का लक्ष्य (हर ग्रामीण परिवार को कार्यात्मक नल कनेक्शन), मंत्रालय (जल शक्ति मंत्रालय), समय-सीमा का 2028 तक विस्तार, और केरलम के आँकड़े (परिव्यय ₹44,714.79 करोड़; व्यय ₹18,640.62 करोड़, यानी लगभग 41.7 प्रतिशत; शेष ₹26,074.17 करोड़; कार्य-प्रगति 55.24 प्रतिशत; सात जिलों कासरगोड, इडुक्की, वायनाड, कोझिकोड, कोट्टायम, मलप्पुरम और पथनमथिट्टा में आधे से कम प्रगति)।
2. संवैधानिक आधार: जल आपूर्ति राज्य सूची की प्रविष्टि 17 में है, इसलिए राज्य मुख्य कार्यान्वयनकर्ता है; अनुच्छेद 243G और ग्यारहवीं अनुसूची की मद 11 के अंतर्गत पंचायतों की भूमिका; अनुच्छेद 47 (लोक स्वास्थ्य) और अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जल के अधिकार की न्यायिक व्याख्या (केरल उच्च न्यायालय, अत्ताकोया थंगल बनाम भारत संघ, 1989); अनुच्छेद 282 के अंतर्गत केंद्र द्वारा सार्वजनिक प्रयोजन हेतु अनुदान।
3. वित्तीय संरचना: 50:50 साझेदारी (सामान्य राज्यों के लिए) और 90:10 (हिमालयी व उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिए); केरल में राज्य हिस्से का वित्तपोषण; NABARD से ₹9,000 करोड़ ऋण की स्वीकृति, जिसमें से ₹7,000 करोड़ प्राप्त; NABARD की स्थापना NABARD अधिनियम, 1981 द्वारा और परिचालन 1982 से; ऋण-भार का राजकोषीय दबाव।
4. केंद्र-प्रायोजित योजनाओं पर बहस: सरकारिया आयोग (1988) और पुंछी आयोग (2010) की सिफारिशें; वित्त आयोग के अनुदान और राज्यों की विकास-प्राथमिकताएँ; सशर्त अनुदान बनाम राज्य की स्वायत्तता।
5. कार्यान्वयन-बाधाएँ: भौगोलिक विविधता (पहाड़ी और तटीय जिले), जल-स्रोतों की स्थिरता, संचालन और रखरखाव, जल-गुणवत्ता परीक्षण, और प्राथमिकता-क्रम (अधिक कनेक्शन और अधिक राजस्व-संभाव्यता वाले कार्य पहले) से पिछड़े क्षेत्रों पर प्रभाव।
6. संतुलित दृष्टिकोण: समता और मानव-विकास के पक्ष में तर्क बनाम राजकोषीय क्षमता और सहकारी प्रशासन के प्रश्न।
7. निष्कर्ष: सुझाव जैसे समयबद्ध वित्तीय प्रवाह, राज्य-केंद्र समन्वय, पंचायत-स्तरीय संचालन-रखरखाव क्षमता और जल-स्रोत संरक्षण को जोड़ते हुए एक तर्कसंगत स्थिति।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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