यूपीएससी तैयारी: आरबीआई ने 91, 182 और 364 दिन के टी-बिल की नीलामी में कट-ऑफ दरें घोषित कीं

यूपीएससी तैयारी: आरबीआई ने 91, 182 और 364 दिन के टी-बिल की नीलामी में कट-ऑफ दरें घोषित कीं — 91-Day, 182-Day and 364-Day T-Bill Auction Cut-off Yields

यूपीएससी तैयारी: आरबीआई ने 91, 182 और 364 दिन के टी-बिल की नीलामी में कट-ऑफ दरें घोषित कीं

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय। सरकारी बजट के मुख्य घटक।
  • Prelims: ट्रेजरी बिल (T-Bills), भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI), राजकोषीय घाटा, खुला बाज़ार परिचालन (OMO), मुद्रा बाज़ार, सरकारी प्रतिभूतियाँ, अल्पकालिक ऋण साधन, उपज (Yield)
  • Essay: भारत में राजकोषीय स्थिरता और मौद्रिक नीति के उपकरण।, सरकारी ऋण प्रबंधन और आर्थिक विकास।

त्वरित पुनरावृत्ति: ट्रेजरी बिल (T-Bills) भारत सरकार द्वारा जारी किए गए अल्पकालिक, शून्य-कूपन ऋण साधन हैं जो सरकार की अल्पकालिक वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने और मुद्रा बाज़ार में तरलता को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

यह खबर चर्चा में क्यों?

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने हाल ही में 91-दिवसीय, 182-दिवसीय और 364-दिवसीय ट्रेजरी बिलों (T-Bills) की नीलामी के परिणाम घोषित किए हैं। इस नीलामी में सरकार द्वारा अधिसूचित कुल ₹24,000 करोड़ के ट्रेजरी बिलों को स्वीकार किया गया, जिसमें 91-दिवसीय T-Bill के लिए ₹9,000 करोड़, 182-दिवसीय T-Bill के लिए ₹8,000 करोड़ और 364-दिवसीय T-Bill के लिए ₹7,000 करोड़ शामिल थे। इन नीलामियों के माध्यम से सरकार अपनी अल्पकालिक वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करती है, जो अर्थव्यवस्था में तरलता (Liquidity) और ब्याज दरों को भी प्रभावित करती हैं।

पृष्ठभूमि

  • भारत सरकार को अपने खर्चों को पूरा करने और राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) का प्रबंधन करने के लिए लगातार धन की आवश्यकता होती है।
  • इस धन को जुटाने के लिए सरकार विभिन्न साधनों का उपयोग करती है, जिनमें ट्रेजरी बिल और सरकारी बॉन्ड (Government Bonds) प्रमुख हैं।
  • ट्रेजरी बिल अल्पकालिक ऋण साधन हैं, जिनकी परिपक्वता अवधि (Maturity Period) एक वर्ष से कम होती है।
  • ये बिल भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा सरकार की ओर से नीलाम किए जाते हैं और इन्हें ‘शून्य-कूपन प्रतिभूतियाँ’ (Zero-Coupon Securities) कहा जाता है क्योंकि इन पर कोई ब्याज नहीं दिया जाता।
  • निवेशक इन्हें अंकित मूल्य (Face Value) से कम मूल्य पर खरीदते हैं और परिपक्वता पर अंकित मूल्य प्राप्त करते हैं, जिससे उन्हें लाभ होता है।
  • T-Bills मुद्रा बाज़ार (Money Market) का एक महत्वपूर्ण घटक हैं और ये अर्थव्यवस्था में अल्पकालिक ब्याज दरों के लिए एक बेंचमार्क के रूप में कार्य करते हैं।

ट्रेजरी बिल (T-Bills) क्या हैं?

  • ट्रेजरी बिल (T-Bills) भारत सरकार द्वारा जारी किए गए अल्पकालिक ऋण साधन हैं, जिनकी परिपक्वता अवधि एक वर्ष से कम होती है।
  • ये भारत में मुद्रा बाज़ार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और सरकार के अल्पकालिक वित्तपोषण की आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद करते हैं।
  • भारत में T-Bills तीन परिपक्वता अवधियों में जारी किए जाते हैं: 91-दिवसीय, 182-दिवसीय और 364-दिवसीय।
  • T-Bills ‘शून्य-कूपन प्रतिभूतियाँ’ होती हैं, जिसका अर्थ है कि इन पर कोई अलग से ब्याज भुगतान नहीं किया जाता है। इसके बजाय, इन्हें अंकित मूल्य से छूट पर (Discount) जारी किया जाता है और परिपक्वता पर अंकित मूल्य पर भुनाया जाता है।
  • इनकी नीलामी भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा सरकार की ओर से की जाती है, और ये अत्यधिक तरल (Highly Liquid) और जोखिम-मुक्त (Risk-Free) निवेश माने जाते हैं क्योंकि ये सरकार द्वारा समर्थित होते हैं।
  • T-Bills विभिन्न वित्तीय संस्थानों, बैंकों, प्राथमिक डीलरों और व्यक्तियों द्वारा खरीदे जा सकते हैं।
  • इनकी उपज (Yield) अर्थव्यवस्था में अल्पकालिक ब्याज दरों का संकेत देती है और मौद्रिक नीति के संचरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
ट्रेजरी बिल (T-Bills) ये भारत सरकार द्वारा जारी किए गए अल्पकालिक ऋण साधन हैं, जिनकी परिपक्वता अवधि एक वर्ष से कम होती है।
91-दिवसीय T-बिल अत्यंत अल्पकालिक तरलता प्रबंधन के लिए उपयोग किए जाते हैं, जो निवेशकों को कम जोखिम वाला निवेश विकल्प प्रदान करते हैं।
182-दिवसीय T-बिल मध्यम-अल्पकालिक तरलता आवश्यकताओं को पूरा करते हैं और 91-दिवसीय T-बिल की तुलना में थोड़ी अधिक उपज प्रदान करते हैं।
364-दिवसीय T-बिल एक वर्ष के करीब की परिपक्वता अवधि के साथ, ये सरकार के लिए दीर्घकालिक वित्तपोषण की दिशा में एक कदम होते हैं और निवेशकों के लिए बेहतर रिटर्न प्रदान करते हैं।
कट-ऑफ मूल्य यह वह न्यूनतम मूल्य है जिस पर T-बिल की नीलामी में स्वीकार किया जाता है, जो प्रभावी रूप से अधिकतम स्वीकार्य प्रतिफल (Yield) निर्धारित करता है।
निहित प्रतिफल (Implicit Yield) यह कट-ऑफ मूल्य पर निवेशक को मिलने वाला प्रभावी रिटर्न है, जो ब्याज दर के रुझानों का संकेतक है।

महत्व

आर्थिक महत्व

  • सरकारी उधारी: T-बिल सरकार के लिए अपने अल्पकालिक राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को वित्तपोषित करने और अपने व्यय को पूरा करने का एक महत्वपूर्ण साधन हैं।
  • मौद्रिक नीति का संकेत: T-बिल पर प्रतिफल दरें अर्थव्यवस्था में प्रचलित ब्याज दर के रुझानों को दर्शाती हैं, जो भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति (Monetary Policy) के रुख का संकेत देती हैं।
  • तरलता प्रबंधन: ये वित्तीय प्रणाली में अल्पकालिक तरलता (Liquidity) को अवशोषित करने या इंजेक्ट करने में मदद करते हैं, जिससे मुद्रा बाजार (Money Market) में स्थिरता आती है।
  • निवेश विकल्प: T-बिल बैंकों, वित्तीय संस्थानों और अन्य निवेशकों के लिए कम जोखिम वाले निवेश विकल्प प्रदान करते हैं, जिससे उन्हें अपनी अल्पकालिक अधिशेष निधियों का प्रबंधन करने में मदद मिलती है।

राजकोषीय महत्व

  • ऋण प्रबंधन: सरकार T-बिल का उपयोग अपने ऋण पोर्टफोलियो का प्रबंधन करने और अपने अल्पकालिक वित्तपोषण आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए करती है।
  • बाजार अनुशासन: T-बिल नीलामी प्रक्रिया सरकार की उधारी लागत पर बाजार अनुशासन लागू करती है, क्योंकि प्रतिफल बाजार की अपेक्षाओं को दर्शाता है।
  • राजकोषीय स्थिरता: कुशल T-बिल प्रबंधन सरकार को अप्रत्याशित व्यय या राजस्व की कमी की स्थिति में धन तक त्वरित पहुंच सुनिश्चित करके राजकोषीय स्थिरता बनाए रखने में मदद करता है।

नीतिगत निहितार्थ

  • ब्याज दर का निर्धारण: T-बिल पर प्रतिफल दरें अन्य अल्पकालिक ब्याज दरों के लिए बेंचमार्क के रूप में कार्य करती हैं, जिससे ऋण और निवेश निर्णयों को प्रभावित किया जाता है।
  • मुद्रास्फीति नियंत्रण: उच्च T-बिल प्रतिफल RBI द्वारा मुद्रास्फीति (Inflation) को नियंत्रित करने के लिए एक सख्त मौद्रिक नीति का संकेत दे सकता है, जबकि कम प्रतिफल एक उदार नीति का संकेत दे सकता है।
  • निवेशक विश्वास: स्थिर और पारदर्शी T-बिल नीलामी प्रक्रिया निवेशकों के विश्वास को बढ़ाती है, जिससे सरकारी प्रतिभूतियों (Government Securities) के लिए एक स्वस्थ बाजार बनता है।

चुनौतियाँ

1. बढ़ती उधारी लागत

  • उच्च प्रतिफल सरकार के लिए उधारी लागत को बढ़ाता है, जिससे राजकोषीय दबाव बढ़ सकता है।
  • यह भविष्य में सार्वजनिक व्यय के लिए उपलब्ध संसाधनों को कम कर सकता है।

2. बाजार में तरलता का प्रबंधन

  • T-बिल के माध्यम से अत्यधिक उधारी से बाजार में तरलता की कमी हो सकती है, जिससे अन्य क्षेत्रों के लिए ऋण महंगा हो सकता है।
  • RBI को तरलता को संतुलित करने के लिए सक्रिय रूप से हस्तक्षेप करना पड़ सकता है।

3. ब्याज दर जोखिम

  • ब्याज दरों में अप्रत्याशित वृद्धि सरकार की उधारी लागत को बढ़ा सकती है, खासकर जब पुराने T-बिल परिपक्व होते हैं और नए उच्च दरों पर जारी किए जाते हैं।
  • यह निवेशकों के लिए भी जोखिम पैदा करता है जो कम प्रतिफल पर T-बिल रखते हैं।

4. निवेशक आधार का विविधीकरण

  • T-बिल बाजार में बैंकों और वित्तीय संस्थानों पर अत्यधिक निर्भरता बाजार को कम लचीला बना सकती है।
  • खुदरा निवेशकों और अन्य संस्थागत निवेशकों को आकर्षित करना महत्वपूर्ण है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
उच्च प्रतिफल दरें यह सरकार की उधारी लागत को बढ़ाती हैं, जिससे राजकोषीय घाटे पर दबाव पड़ता है।
बाजार में तरलता का उतार-चढ़ाव T-बिल नीलामी के माध्यम से तरलता का अवशोषण या इंजेक्शन बाजार में अल्पकालिक तरलता को प्रभावित कर सकता है।
ब्याज दर संवेदनशीलता ब्याज दरों में बदलाव T-बिल के मूल्य और प्रतिफल को प्रभावित करता है, जिससे निवेशकों और सरकार दोनों के लिए जोखिम पैदा होता है।
निवेशक आधार की एकाग्रता T-बिल बाजार में कुछ प्रमुख खिलाड़ियों पर अत्यधिक निर्भरता बाजार की गहराई और लचीलेपन को कम कर सकती है।
मुद्रास्फीति का दबाव उच्च मुद्रास्फीति की उम्मीदें निवेशकों को उच्च प्रतिफल की मांग करने के लिए प्रेरित कर सकती हैं, जिससे सरकार की उधारी लागत बढ़ जाती है।

आगे की राह

  • सरकार को राजकोषीय विवेक बनाए रखना चाहिए और राजकोषीय घाटे को कम करने का प्रयास करना चाहिए ताकि उधारी की आवश्यकता कम हो सके।
  • भारतीय रिज़र्व बैंक को बाजार में तरलता का सावधानीपूर्वक प्रबंधन करना चाहिए ताकि T-बिल नीलामी के कारण होने वाले किसी भी व्यवधान को कम किया जा सके।
  • T-बिल बाजार में खुदरा निवेशकों और अन्य संस्थागत निवेशकों की भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए उपाय किए जाने चाहिए।
  • सरकार को अपने ऋण पोर्टफोलियो का सक्रिय रूप से प्रबंधन करना चाहिए, जिसमें परिपक्वता प्रोफाइल और ब्याज दर जोखिम को ध्यान में रखना शामिल है।
  • बाजार की पारदर्शिता और दक्षता में सुधार के लिए निरंतर प्रयास किए जाने चाहिए, जिससे सभी प्रतिभागियों के लिए समान अवसर सुनिश्चित हो सकें।
  • मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी मौद्रिक और राजकोषीय नीतियों को लागू करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह T-बिल प्रतिफल को सीधे प्रभावित करता है।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

राजकोषीय नीति · मौद्रिक नीति · ट्रेजरी बिल · सरकारी प्रतिभूतियाँ · राजकोषीय घाटा · सार्वजनिक ऋण · मुद्रास्फीति नियंत्रण · ब्याज दरें · खुला बाजार परिचालन · तरलता प्रबंधन

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 292’, ‘note’: ‘भारत सरकार द्वारा उधारी की शक्ति’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 293’, ‘note’: ‘राज्यों द्वारा उधारी की शक्ति’}

अवधारणा प्रवाह

सरकार को अल्पकालिक वित्त की आवश्यकता होती है।  →  भारतीय रिज़र्व बैंक T-बिल की नीलामी करता है।  →  निवेशक T-बिल के लिए बोली लगाते हैं।  →  नीलामी में कट-ऑफ मूल्य और निहित प्रतिफल निर्धारित होता है।  →  सरकार को धन प्राप्त होता है, निवेशक T-बिल खरीदते हैं।  →  T-बिल पर प्रतिफल बाजार की ब्याज दरों को प्रभावित करता है।  →  यह मौद्रिक नीति और आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करता है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ट्रेजरी बिल (T-Bills) भारत सरकार द्वारा जारी किए गए अल्पकालिक ऋण साधन हैं।
2. ट्रेजरी बिल केवल 91 दिन और 364 दिन की परिपक्वता अवधि में उपलब्ध होते हैं।
3. ट्रेजरी बिलों को भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा नीलामी के माध्यम से जारी किया जाता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। ट्रेजरी बिल भारत सरकार द्वारा जारी अल्पकालिक ऋण साधन हैं, जिनकी परिपक्वता अवधि एक वर्ष से कम होती है। कथन 2 गलत है। ट्रेजरी बिल 91 दिन, 182 दिन और 364 दिन की परिपक्वता अवधि में उपलब्ध होते हैं। कथन 3 सही है। ट्रेजरी बिलों को भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा सरकार की ओर से नीलामी के माध्यम से जारी किया जाता है।

Q2. अभिकथन (A): ट्रेजरी बिलों पर प्रतिफल (yield) सरकार के उधार लेने की लागत को दर्शाता है।
कारण (R): ट्रेजरी बिलों की नीलामी में कट-ऑफ यील्ड (cut-off yield) बाजार में प्रचलित ब्याज दरों और तरलता की स्थिति से प्रभावित होती है।
सही विकल्प चुनें:

  1. A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
  4. A असत्य है, लेकिन R सत्य है।

उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि ट्रेजरी बिलों पर प्रतिफल सीधे सरकार को उधार लेने के लिए चुकानी जाने वाली ब्याज दर को दर्शाता है। कारण (R) भी सही है क्योंकि कट-ऑफ यील्ड बाजार की स्थितियों, जैसे तरलता (liquidity) और ब्याज दर के रुझानों पर निर्भर करती है, जो अंततः सरकार की उधार लेने की लागत को प्रभावित करती है। इसलिए, R, A की सही व्याख्या है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ ट्रेजरी बिल (T-Bills) क्या हैं और ये सरकार के राजकोषीय प्रबंधन में किस प्रकार सहायक होते हैं? भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा ट्रेजरी बिलों की नीलामी के माध्यम से मौद्रिक नीति के संचालन में इसकी भूमिका का भी विश्लेषण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: परिचय: ट्रेजरी बिल की परिभाषा और उनकी अल्पकालिक प्रकृति को स्पष्ट करें।
मुख्य भाग 1: सरकार के राजकोषीय प्रबंधन में ट्रेजरी बिलों की भूमिका का वर्णन करें। इसमें शामिल होंगे:
• अल्पकालिक नकदी आवश्यकताओं को पूरा करना।
• राजकोषीय घाटे के वित्तपोषण में सहायता।
• सार्वजनिक ऋण प्रबंधन का एक साधन।
• सरकार के लिए उधार लेने की लागत का निर्धारण।
मुख्य भाग 2: RBI द्वारा ट्रेजरी बिलों की नीलामी के माध्यम से मौद्रिक नीति के संचालन में भूमिका का विश्लेषण करें। इसमें शामिल होंगे:
• तरलता प्रबंधन (liquidity management) के उपकरण के रूप में।
• ब्याज दरों को प्रभावित करने की क्षमता।
• खुले बाजार परिचालन (Open Market Operations – OMO) के संदर्भ में उपयोग।
• मुद्रास्फीति नियंत्रण और आर्थिक स्थिरता में योगदान।
निष्कर्ष: ट्रेजरी बिलों के महत्व को संक्षेप में प्रस्तुत करें, जो राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करते हैं।

स्रोत: RBI


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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