08 Aug बदरीनाथ हाईवे: पहली बरसात में ढह गई ऑल वेदर रोड की सुरक्षा दीवार
✎ ऑल वेदर रोड परियोजना का उद्देश्य उत्तराखंड के चारधाम को सभी मौसमों में कनेक्टिविटी प्रदान करना है, लेकिन इसकी निर्माण गुणवत्ता और पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भूगोल (भौतिक भूगोल, भू-आकृति विज्ञान, आपदाएँ) | GS Paper III — आपदा प्रबंधन, आधारभूत संरचना (सड़कें), पर्यावरण
- Prelims: ऑल वेदर रोड परियोजना, बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग, भूस्खलन, उत्तराखंड, राष्ट्रीय राजमार्ग अवसंरचना विकास निगम लिमिटेड (NHIDCL), पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क निर्माण
- Essay: पहाड़ी क्षेत्रों में विकास बनाम पर्यावरण: एक सतत बहस, भारत में आधारभूत संरचना परियोजनाओं की गुणवत्ता और जवाबदेही
त्वरित पुनरावृत्ति: ऑल वेदर रोड परियोजना का उद्देश्य उत्तराखंड के चारधाम को सभी मौसमों में कनेक्टिविटी प्रदान करना है, लेकिन इसकी निर्माण गुणवत्ता और पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर चल रही ऑल वेदर रोड परियोजना (All Weather Road Project) के तहत निर्मित सुधारीकरण कार्य पहली ही बरसात में विफल साबित हुए हैं। कमेड़ा और बेलाकूची जैसे संवेदनशील भूस्खलन (Landslide) क्षेत्रों में नवनिर्मित सुरक्षा दीवारें धंस गई हैं और उनमें दरारें पड़ गई हैं, जिससे निर्माण गुणवत्ता और कार्यों की स्थायित्व पर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं। कार्यदायी संस्था NHIDCL अब इन स्थलों का तकनीकी परीक्षण कराने की बात कह रही है।
पृष्ठभूमि
- उत्तराखंड हिमालयी क्षेत्र में स्थित है, जो भूगर्भीय रूप से अस्थिर है और भूस्खलन, भू-धंसाव (Land Subsidence) तथा बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है।
- पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क निर्माण के दौरान ढलानों को काटने और विस्फोटकों के उपयोग से भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है, जिससे पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ता है।
- परियोजना के तहत सड़कों को चौड़ा करने, पुलों और सुरंगों का निर्माण करने तथा भूस्खलन संभावित क्षेत्रों में सुरक्षा दीवारें बनाने का कार्य शामिल है।
- इस परियोजना को रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह भारत-चीन सीमा के निकट स्थित है और सैन्य आवाजाही के लिए भी आवश्यक है।
ऑल वेदर रोड परियोजना क्या है?
- ऑल वेदर रोड परियोजना भारत सरकार की एक महत्वाकांक्षी पहल है, जिसका उद्देश्य उत्तराखंड के चारधाम तीर्थस्थलों को जोड़ने वाली सड़कों को सभी मौसमों के लिए उपयुक्त बनाना है।
- इसका मुख्य लक्ष्य सड़कों को चौड़ा करना, उनकी गुणवत्ता में सुधार करना और भूस्खलन-संभावित क्षेत्रों में सुरक्षा उपाय करना है ताकि भारी बारिश या बर्फबारी के दौरान भी कनेक्टिविटी बनी रहे।
- इस परियोजना का क्रियान्वयन मुख्य रूप से राष्ट्रीय राजमार्ग अवसंरचना विकास निगम लिमिटेड (National Highways and Infrastructure Development Corporation Limited – NHIDCL) द्वारा किया जा रहा है।
- परियोजना का उद्देश्य तीर्थयात्रा को सुरक्षित और सुगम बनाना, पर्यटन को बढ़ावा देना और सीमावर्ती क्षेत्रों में सैन्य आवाजाही को सुविधाजनक बनाना है।
- हालांकि, इस परियोजना को पर्यावरणीय प्रभाव, विशेषकर हिमालय के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र पर इसके प्रभावों को लेकर आलोचना का सामना करना पड़ा है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| ऑल वेदर रोड परियोजना | चारधाम यात्रा मार्गों को सभी मौसमों में सुगम बनाना, कनेक्टिविटी में सुधार। |
| बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग | प्रमुख तीर्थस्थल बदरीनाथ धाम तक पहुँच का मुख्य मार्ग, सामरिक महत्व भी। |
| भूस्खलन-संवेदनशील क्षेत्र (कमेड़ा, बेलाकूची) | पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क निर्माण की चुनौतियाँ, भूवैज्ञानिक अस्थिरता। |
| सुरक्षा दीवार और एंकरिंग | भूस्खलन रोकने और सड़क की स्थिरता बनाए रखने के लिए इंजीनियरिंग उपाय। |
| निर्माण गुणवत्ता पर प्रश्न | परियोजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता और जवाबदेही का मुद्दा। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- यह परियोजना उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पर्यटन, विशेषकर चारधाम यात्रा को बढ़ावा देती है।
- स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर सृजित होते हैं और क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि होती है।
सामरिक महत्व
- भारत-चीन सीमा के निकट होने के कारण, यह सड़क सैन्य आवाजाही और सीमावर्ती क्षेत्रों तक त्वरित पहुँच के लिए महत्वपूर्ण है।
- बेहतर कनेक्टिविटी से सीमा सुरक्षा और प्रबंधन में सुधार होता है।
सामाजिक महत्व
- तीर्थयात्रियों और स्थानीय निवासियों के लिए यात्रा को सुरक्षित और सुविधाजनक बनाती है, जिससे जीवन की गुणवत्ता में सुधार होता है।
- आपदा राहत और बचाव कार्यों में तेजी आती है, जिससे दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुँच आसान होती है।
पर्यावरणीय महत्व
- पहाड़ी क्षेत्रों में निर्माण कार्य का पर्यावरण पर गहरा प्रभाव पड़ता है, जिसमें वनों की कटाई और भूस्खलन का खतरा शामिल है।
- सतत विकास (Sustainable Development) और पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment) का महत्व उजागर होता है।
चुनौतियाँ
1. भूवैज्ञानिक अस्थिरता
- हिमालयी क्षेत्र भूगर्भीय रूप से युवा और अस्थिर है, जिससे भूस्खलन और भूधंसाव की घटनाएँ आम हैं।
- बारिश और भूकंप जैसी प्राकृतिक घटनाएँ इन क्षेत्रों को और अधिक संवेदनशील बनाती हैं।
यूपीएससी लिंक: भूभौतिकीय घटनाएँ, आपदा प्रबंधन
2. निर्माण गुणवत्ता और सामग्री
- परियोजनाओं में उपयोग की जाने वाली निर्माण सामग्री की गुणवत्ता और इंजीनियरिंग मानकों का पालन सुनिश्चित करना एक चुनौती है।
- कमजोर निर्माण सामग्री या दोषपूर्ण डिजाइन से संरचनाओं की स्थिरता प्रभावित होती है।
यूपीएससी लिंक: बुनियादी ढाँचा विकास, शासन
3. निगरानी और जवाबदेही
- परियोजनाओं के क्रियान्वयन के दौरान प्रभावी निगरानी तंत्र की कमी से गुणवत्ता से समझौता हो सकता है।
- कार्यदायी संस्थाओं और ठेकेदारों की जवाबदेही तय करना और पारदर्शिता बनाए रखना आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: शासन, सार्वजनिक जवाबदेही
4. पर्यावरणीय प्रभाव
- सड़क निर्माण से वनों की कटाई, मिट्टी का कटाव और जल निकायों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
- पर्यावरणीय नियमों का पालन और सतत निर्माण पद्धतियों को अपनाना एक चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण संरक्षण, आपदा प्रबंधन
5. जलवायु परिवर्तन के प्रभाव
- बदलते मौसम पैटर्न, अत्यधिक वर्षा और बादल फटने की घटनाएँ पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन के जोखिम को बढ़ाती हैं।
- जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बुनियादी ढाँचे का निर्माण करना आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: जलवायु परिवर्तन, आपदा प्रबंधन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| भूस्खलन जोन का सक्रिय होना | सड़क सुरक्षा और यात्रियों के लिए खतरा, यात्रा में बाधा। |
| निर्माण कार्यों की गुणवत्ता | करोड़ों रुपये के निवेश का अपव्यय, परियोजनाओं की दीर्घकालिक स्थिरता पर संदेह। |
| सुरक्षा दीवारों का धँसना | इंजीनियरिंग डिजाइन और क्रियान्वयन में संभावित खामियाँ। |
| बारिश के प्रति संवेदनशीलता | पहाड़ी क्षेत्रों में निर्माण की पर्यावरणीय चुनौतियों को कम आँकना। |
| कार्यदायी संस्था की प्रतिक्रिया | समस्याओं के स्थायी समाधान के बजाय अस्थायी उपाय। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- ऑल वेदर रोड परियोजना (All Weather Road Project)
आगे की राह
- भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण और जोखिम आकलन: निर्माण से पहले विस्तृत भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण और जोखिम आकलन किया जाए ताकि भूस्खलन-संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान हो सके।
- उच्च गुणवत्ता वाली इंजीनियरिंग: अत्याधुनिक इंजीनियरिंग तकनीकों और सामग्री का उपयोग किया जाए जो हिमालयी क्षेत्र की विशिष्ट भूगर्भीय और मौसमी चुनौतियों का सामना कर सकें।
- कठोर गुणवत्ता नियंत्रण और निगरानी: निर्माण के हर चरण में सख्त गुणवत्ता नियंत्रण और स्वतंत्र निगरानी तंत्र स्थापित किया जाए ताकि मानकों का पालन सुनिश्चित हो सके।
- पर्यावरणीय प्रभाव आकलन और शमन: परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव का गहन आकलन किया जाए और वनीकरण, जल निकासी प्रबंधन जैसे शमन उपायों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।
- आपदा-रोधी बुनियादी ढाँचा: जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए आपदा-रोधी बुनियादी ढाँचे का निर्माण किया जाए जो अत्यधिक वर्षा और भूस्खलन का सामना कर सके।
- जवाबदेही और पारदर्शिता: कार्यदायी संस्थाओं और ठेकेदारों की जवाबदेही तय की जाए और परियोजना के क्रियान्वयन में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए।
- स्थानीय समुदायों की भागीदारी: स्थानीय समुदायों को निर्माण और रखरखाव प्रक्रियाओं में शामिल किया जाए, जिससे उनके अनुभव का लाभ मिल सके और परियोजना की स्वीकार्यता बढ़े।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
ऑल वेदर रोड परियोजना · पहाड़ी क्षेत्रों में अवसंरचना विकास · भूस्खलन · पर्यावरण प्रभाव आकलन · गुणवत्ता नियंत्रण · आपदा प्रबंधन · सतत विकास · पर्वतीय पारिस्थितिकी
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 246’, ‘note’: ‘संघ और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का वितरण’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 282’, ‘note’: ‘संघ या राज्य द्वारा अनुदान’}
अवधारणा प्रवाह
ऑल वेदर रोड परियोजना का निर्माण → पहाड़ी, भूस्खलन-संवेदनशील क्षेत्र में कार्य → पहली ही बरसात में निर्माण का धँसना → निर्माण गुणवत्ता और स्थायित्व पर प्रश्न → यातायात बाधित, यात्रियों को असुविधा
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ऑल वेदर रोड परियोजना का उद्देश्य पहाड़ी क्षेत्रों में कनेक्टिविटी को बढ़ाना है।
2. यह परियोजना केवल उत्तराखंड राज्य में ही कार्यान्वित की जा रही है।
3. भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाएँ इन परियोजनाओं के स्थायित्व को प्रभावित कर सकती हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है, ऑल वेदर रोड परियोजना का मुख्य उद्देश्य पहाड़ी क्षेत्रों में सभी मौसमों में कनेक्टिविटी सुनिश्चित करना है। कथन 2 गलत है, ऐसी परियोजनाएँ अन्य पहाड़ी राज्यों में भी कार्यान्वित की जा सकती हैं या की जा रही हैं, यह केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं है। कथन 3 सही है, भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक आपदाएँ पहाड़ी क्षेत्रों में अवसंरचना परियोजनाओं के स्थायित्व और सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती पेश करती हैं।
Q2. ऑल वेदर रोड परियोजना के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सबसे उपयुक्त है?
- यह परियोजना केवल पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए है।
- इसका मुख्य उद्देश्य वर्ष भर सड़क संपर्क सुनिश्चित करना है, विशेषकर सामरिक और धार्मिक महत्व के क्षेत्रों में।
- यह केवल मैदानी इलाकों में सड़क निर्माण से संबंधित है।
- इस परियोजना का पर्यावरण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
उत्तर: इसका मुख्य उद्देश्य वर्ष भर सड़क संपर्क सुनिश्चित करना है, विशेषकर सामरिक और धार्मिक महत्व के क्षेत्रों में। — ऑल वेदर रोड परियोजना का प्राथमिक लक्ष्य पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों में, विशेषकर सामरिक और धार्मिक महत्व के स्थानों पर, वर्ष भर सुगम सड़क संपर्क प्रदान करना है। यह आपदाओं के दौरान भी कनेक्टिविटी बनाए रखने में सहायक है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ पहाड़ी क्षेत्रों में अवसंरचना परियोजनाओं के निर्माण में भूस्खलन और पर्यावरणीय संवेदनशीलता से उत्पन्न चुनौतियों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इन चुनौतियों के स्थायी समाधान हेतु क्या उपाय किए जा सकते हैं? (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: पहाड़ी क्षेत्रों में अवसंरचना विकास की आवश्यकता और ‘ऑल वेदर रोड परियोजना’ जैसे उदाहरणों का उल्लेख।
2. चुनौतियाँ: भूस्खलन, भूधंसाव, भूकंपीय संवेदनशीलता, नदी कटाव, वनस्पति का विनाश, जल निकासी में बाधा, निर्माण सामग्री की गुणवत्ता और निगरानी में कमी जैसी समस्याओं का विस्तृत वर्णन। बदरीनाथ हाईवे पर हालिया घटना का संदर्भ।
3. पर्यावरणीय संवेदनशीलता: हिमालय जैसे युवा और भंगुर पर्वतीय क्षेत्रों की पारिस्थितिक नाजुकता, जलवायु परिवर्तन का प्रभाव, जैव विविधता पर असर और स्थानीय समुदायों के विस्थापन पर चर्चा।
4. स्थायी समाधान:
क. वैज्ञानिक अध्ययन और भू-तकनीकी सर्वेक्षण: विस्तृत भूवैज्ञानिक और भू-तकनीकी अध्ययन, जोखिम मूल्यांकन और ज़ोनिंग।
ख. उन्नत इंजीनियरिंग तकनीकें: एंकरिंग, रिटेनिंग वॉल, भू-संश्लेषक सामग्री (geosynthetics), ढलान स्थिरीकरण (slope stabilization) और उचित जल निकासी प्रणालियों का उपयोग।
ग. कठोर गुणवत्ता नियंत्रण और निगरानी: निर्माण सामग्री की गुणवत्ता, कार्यप्रणाली और परियोजना के विभिन्न चरणों में स्वतंत्र निगरानी।
घ. पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA): परियोजनाओं से पहले व्यापक और प्रभावी EIA, साथ ही सामाजिक प्रभाव आकलन (SIA)।
ङ. सतत विकास मॉडल: स्थानीय पारिस्थितिकी के अनुकूल विकास, वनीकरण और क्षतिपूर्ति वनीकरण (compensatory afforestation)।
च. आपदा प्रतिरोधी अवसंरचना: जलवायु परिवर्तन और आपदाओं के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए डिजाइन और निर्माण।
छ. संस्थागत क्षमता निर्माण: निर्माण एजेंसियों, ठेकेदारों और नियामक निकायों की तकनीकी क्षमता में वृद्धि।
5. निष्कर्ष: अवसंरचना विकास और पर्यावरणीय संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता पर बल, जिसमें दीर्घकालिक स्थिरता और सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए।
स्रोत: amarujala.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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