06 Sep गृह मंत्री अमित शाह ने गोवा में कानून व्यवस्था और तटीय सुरक्षा पर समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की
✎ गोवा में नवीन न्याय संहिताओं और ICJS के प्रभावी कार्यान्वयन से दोषसिद्धि दर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो केंद्र-राज्य समन्वय के माध्यम से आंतरिक सुरक्षा और न्याय वितरण में सुधार का एक उदाहरण है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: केंद्र एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघवाद से संबंधित मुद्दे एवं चुनौतियाँ, स्थानीय स्तर पर शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा उसकी चुनौतियाँ। | GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा: कानून-व्यवस्था, तटीय सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, संगठित अपराध और आतंकवाद।
- Prelims: नवीन न्याय संहिताएँ, भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली (ICJS), तटीय सुरक्षा, नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (NDPS) अधिनियम, आपदा प्रबंधन, पुलिस आधुनिकीकरण, दुश्मन संपत्ति, संघवाद
- Essay: भारत में आंतरिक सुरक्षा चुनौतियाँ और उनके समाधान में केंद्र-राज्य समन्वय की भूमिका।, एक विकसित और सुरक्षित भारत के निर्माण में छोटे राज्यों की क्षमता और चुनौतियाँ।
त्वरित पुनरावृत्ति: गोवा में नवीन न्याय संहिताओं और ICJS के प्रभावी कार्यान्वयन से दोषसिद्धि दर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो केंद्र-राज्य समन्वय के माध्यम से आंतरिक सुरक्षा और न्याय वितरण में सुधार का एक उदाहरण है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने हाल ही में गोवा में मुख्यमंत्री डॉ. प्रमोद सावंत और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ राज्य से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर एक समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की। इस बैठक में कानून-व्यवस्था, तटीय सुरक्षा, नवीन न्याय संहिताओं का कार्यान्वयन, NDPS से जुड़े मामले, साइबर अपराध और अवैध प्रवासियों जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर गहन चर्चा हुई। गृह मंत्री ने गोवा सरकार और राज्य पुलिस द्वारा कानून-व्यवस्था और तटीय सुरक्षा बनाए रखने के प्रयासों की सराहना की, विशेष रूप से नवीन न्याय संहिताओं और भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली (ICJS) के प्रभावी कार्यान्वयन के बाद दोषसिद्धि दर में हुई वृद्धि को रेखांकित किया।
पृष्ठभूमि
- भारत में आंतरिक सुरक्षा एक महत्वपूर्ण विषय है, जिसके लिए केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय आवश्यक है, क्योंकि ‘पुलिस’ और ‘लोक व्यवस्था’ राज्य सूची के विषय हैं।
- तटीय सुरक्षा भारत जैसे विशाल तटरेखा वाले देश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो समुद्री घुसपैठ, तस्करी और आतंकवाद जैसी चुनौतियों का सामना करता है।
- नवीन न्याय संहिताएँ (भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, भारतीय साक्ष्य अधिनियम) आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार और उसे अधिक कुशल बनाने के उद्देश्य से लाई गई हैं।
- भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली (ICJS) एक अंतर-संचालनीय आपराधिक न्याय प्रणाली है जो पुलिस, अदालतों, जेलों और फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशालाओं के बीच डेटा साझाकरण को सक्षम बनाती है।
- गोवा जैसे छोटे राज्यों को ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रशासनिक क्षमता निर्माण और विकास से जुड़े मुद्दों में केंद्र सरकार के सहयोग की आवश्यकता होती है।
- नशीले पदार्थों से जुड़े अपराध (NDPS मामले) और साइबर अपराध आधुनिक समय की प्रमुख चुनौतियाँ हैं जिनके लिए विशेष रणनीति और अंतर-एजेंसी समन्वय की आवश्यकता होती है।
नवीन न्याय संहिताएँ और भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली (ICJS)
- नवीन न्याय संहिताएँ तीन नए कानून हैं: भारतीय न्याय संहिता, 2023 (IPC की जगह), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (CrPC की जगह), और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की जगह)।
- इन संहिताओं का उद्देश्य भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली को आधुनिक बनाना, उसे अधिक कुशल बनाना और नागरिकों को त्वरित न्याय प्रदान करना है।
- इनमें कई नए प्रावधान शामिल हैं, जैसे मॉब लिंचिंग (Mob Lynching) के लिए कठोर दंड, आतंकवाद की नई परिभाषा, छोटे अपराधों के लिए सामुदायिक सेवा, और फोरेंसिक विज्ञान के उपयोग पर अधिक जोर।
- भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली (ICJS) एक राष्ट्रीय मंच है जिसका उद्देश्य आपराधिक न्याय प्रणाली के विभिन्न स्तंभों (पुलिस, अदालतें, जेलें, फोरेंसिक प्रयोगशालाएँ) को एकीकृत करना है।
- ICJS का मुख्य लक्ष्य सूचना के निर्बाध प्रवाह को सुनिश्चित करना है, जिससे जांच, अभियोजन और न्याय वितरण प्रक्रिया में तेजी लाई जा सके।
- यह प्रणाली डेटा के डिजिटलीकरण और साझाकरण के माध्यम से आपराधिक मामलों के प्रबंधन को बेहतर बनाती है, जिससे दोषसिद्धि दर में सुधार हो सकता है।
- ICJS के प्रभावी कार्यान्वयन से आपराधिक मामलों के निपटारे में लगने वाले समय में कमी आती है, जैसा कि गोवा में 6-8 महीने के भीतर मामलों के निपटारे में देखा गया है।
- यह प्रणाली आपराधिक रिकॉर्ड, फिंगरप्रिंट डेटाबेस और अन्य महत्वपूर्ण जानकारी तक त्वरित पहुंच प्रदान करके पुलिस जांच की गुणवत्ता को भी बढ़ाती है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| तीन नवीन न्याय संहिताएँ | अपराध न्याय प्रणाली में सुधार, दोषसिद्धि दर में वृद्धि और मामलों के त्वरित निपटान में सहायक। |
| ICJS (एकीकृत आपराधिक न्याय प्रणाली) | पुलिस, अदालत, जेल और फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशालाओं के बीच सूचना के निर्बाध प्रवाह को सुनिश्चित कर न्यायिक प्रक्रिया को गति प्रदान करता है। |
| दोषसिद्धि दर में वृद्धि (22% से 53%) | न्याय प्रणाली की प्रभावशीलता और कानून के शासन को मजबूत करने का संकेत। |
| आपराधिक मामलों का त्वरित निपटान (6-8 महीने) | न्याय में देरी को कम करता है, जिससे नागरिकों का न्यायपालिका में विश्वास बढ़ता है। |
| तटीय सुरक्षा पर ध्यान | देश की सुरक्षा और समुद्री सीमाओं की निगरानी के लिए महत्वपूर्ण, विशेषकर नशीले पदार्थों की तस्करी और अवैध घुसपैठ को रोकने हेतु। |
| पुलिस आधुनिकीकरण | आधुनिक चुनौतियों जैसे साइबर अपराध और नशीले पदार्थों से संबंधित अपराधों से निपटने के लिए पुलिस बल की क्षमता को बढ़ाता है। |
महत्व
शासन और प्रशासन
- न्याय वितरण प्रणाली में सुधार: नवीन न्याय संहिताओं और ICJS के प्रभावी कार्यान्वयन से गोवा में दोषसिद्धि दर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और आपराधिक मामलों का निपटान तेजी से हो रहा है, जो पूरे देश के लिए एक मॉडल प्रस्तुत करता है।
- कानून-व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण: गोवा सरकार और पुलिस द्वारा उठाए गए कदमों से राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति में सुधार हुआ है, जिससे ‘नशामुक्त’ गोवा और साइबर अपराधों से निपटने में सफलता मिली है।
- छोटे राज्यों को सहयोग: ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए छोटे राज्यों को प्रशासनिक मामलों, क्षमता निर्माण और विकास से जुड़े मुद्दों में केंद्र सरकार का पूर्ण सहयोग मिलेगा।
आंतरिक सुरक्षा
- तटीय सुरक्षा का महत्व: तटीय सुरक्षा बनाए रखने के लिए निरंतर निगरानी और अंतर-एजेंसी समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया गया है, जो नशीले पदार्थों की तस्करी, अवैध प्रवासियों और अन्य सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए महत्वपूर्ण है।
- अपराधों का विश्लेषण: महत्वपूर्ण ट्रेंड्स, पैटर्न, विभिन्न प्रकार के अपराधों के लिंक और अपराधियों की अंतर-राज्यीय आवाजाही की लगातार निगरानी सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया है, जिससे प्रभावी अपराध नियंत्रण में मदद मिलेगी।
सामाजिक प्रभाव
- नागरिकों का विश्वास: न्याय प्रक्रिया में तेजी और दोषसिद्धि दर में वृद्धि से नागरिकों का न्यायपालिका और कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाली एजेंसियों में विश्वास बढ़ता है।
- नशामुक्त समाज की दिशा में: नशीले पदार्थों से जुड़े अपराधों पर सख्त कार्रवाई और ‘नशामुक्त’ गोवा बनाने के प्रयासों से समाज पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
चुनौतियाँ
1. साइबर अपराधों में वृद्धि
- डिजिटल युग में साइबर अपराधों की बढ़ती संख्या एक बड़ी चुनौती है, जिसके लिए विशेष कौशल और तकनीकी बुनियादी ढांचे की आवश्यकता होती है।
- इन अपराधों से निपटने के लिए पुलिस बल के निरंतर प्रशिक्षण और आधुनिकीकरण की आवश्यकता है।
यूपीएससी लिंक: आंतरिक सुरक्षा/साइबर सुरक्षा
2. नशीले पदार्थों से जुड़े अपराध
- नशीले पदार्थों की तस्करी और सेवन से जुड़े अपराध समाज के लिए गंभीर खतरा हैं, विशेषकर युवाओं के बीच।
- इन अपराधों पर नियंत्रण के लिए अंतर-राज्यीय और अंतर्राष्ट्रीय समन्वय की आवश्यकता होती है।
यूपीएससी लिंक: आंतरिक सुरक्षा/संगठित अपराध
3. विदेशियों से जुड़े उल्लंघन
- अवैध प्रवासियों और विदेशियों द्वारा किए गए अपराधों से कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा पर असर पड़ता है।
- इन मामलों में प्रभावी ढंग से निपटने के लिए मजबूत खुफिया तंत्र और प्रवर्तन उपायों की आवश्यकता है।
यूपीएससी लिंक: आंतरिक सुरक्षा/सीमा प्रबंधन
4. तटीय सुरक्षा की चुनौतियाँ
- गोवा जैसे तटीय राज्य के लिए समुद्री सीमाओं की सुरक्षा एक निरंतर चुनौती है, जिसमें अवैध घुसपैठ, तस्करी और आतंकवाद के खतरे शामिल हैं।
- इसके लिए भारतीय तटरक्षक बल और राज्य पुलिस के बीच मजबूत समन्वय आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: आंतरिक सुरक्षा/सीमा सुरक्षा
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| साइबर अपराध | तकनीकी विशेषज्ञता और बुनियादी ढांचे की कमी, अपराधियों की पहचान और अभियोजन में जटिलता। |
| नशीले पदार्थों से जुड़े अपराध | अंतर-राज्यीय और अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क, युवाओं पर नकारात्मक प्रभाव, संगठित अपराध से संबंध। |
| विदेशियों से जुड़े उल्लंघन | अवैध प्रवासन, राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रभाव, पहचान और निर्वासन की प्रक्रिया में चुनौतियाँ। |
| तटीय सुरक्षा | समुद्री सीमाओं की विशालता, अवैध घुसपैठ, तस्करी और आतंकवाद के खतरे। |
| पुलिस आधुनिकीकरण | आधुनिक तकनीकों और उपकरणों को अपनाने में देरी, क्षमता निर्माण की आवश्यकता। |
| आपराधिक न्याय प्रणाली का प्रभावी कार्यान्वयन | नवीन संहिताओं के बारे में जागरूकता की कमी, न्यायिक बुनियादी ढांचे पर बोझ। |
आगे की राह
- नवीन न्याय संहिताओं का प्रभावी और त्वरित कार्यान्वयन सुनिश्चित करना, जिसमें पुलिस, अभियोजन और न्यायपालिका के लिए व्यापक प्रशिक्षण शामिल हो।
- ICJS (एकीकृत आपराधिक न्याय प्रणाली) का पूर्ण क्षमता से उपयोग करना ताकि विभिन्न एजेंसियों के बीच डेटा साझाकरण और समन्वय को बढ़ाया जा सके।
- साइबर अपराधों, नशीले पदार्थों से जुड़े अपराधों और विदेशियों से जुड़े उल्लंघनों से निपटने के लिए विशेष इकाइयों का गठन और उन्हें आधुनिक तकनीक से लैस करना।
- तटीय सुरक्षा को मजबूत करने के लिए भारतीय तटरक्षक बल, नौसेना और राज्य पुलिस के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना तथा निगरानी क्षमताओं को बढ़ाना।
- पुलिस बल का निरंतर आधुनिकीकरण और क्षमता निर्माण करना, जिसमें फोरेंसिक विज्ञान और डिजिटल जांच में विशेषज्ञता शामिल हो।
- अपराधों के महत्वपूर्ण ट्रेंड्स और पैटर्न, अपराधियों की अंतर-राज्यीय आवाजाही पर लगातार निगरानी और विश्लेषण सुनिश्चित करना।
- जन जागरूकता अभियान चलाकर नागरिकों को साइबर सुरक्षा, नशीले पदार्थों के खतरों और कानून-व्यवस्था बनाए रखने में उनकी भूमिका के बारे में शिक्षित करना।
- केंद्र और राज्य सरकारों के बीच सहयोग को और मजबूत करना ताकि ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए छोटे राज्यों को प्रशासनिक और विकासात्मक सहायता मिल सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
नवीन न्याय संहिताएँ · भारतीय न्याय प्रणाली · दोषसिद्धि दर · पुलिस आधुनिकीकरण · तटीय सुरक्षा · साइबर अपराध · नशीले पदार्थों से जुड़े अपराध · अंतर-राज्यीय अपराध · विकसित भारत · संघवाद · आपदा प्रबंधन · कानून-व्यवस्था
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 246’, ‘note’: ‘संघ और राज्य सूचियों में विषयों का विभाजन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 256’, ‘note’: ‘राज्यों पर संघ का नियंत्रण’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 355’, ‘note’: ‘बाह्य आक्रमण और आंतरिक अशांति से राज्य की रक्षा’}
- {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची’, ‘note’: ‘कानून-व्यवस्था और पुलिस राज्य सूची का विषय’}
अवधारणा प्रवाह
नवीन न्याय संहिताओं का अधिनियमन → ICJS का प्रभावी कार्यान्वयन → दोषसिद्धि दर में वृद्धि और त्वरित न्याय → कानून-व्यवस्था में सुधार और अपराध नियंत्रण → गोवा का ‘मॉडल राज्य’ के रूप में विकास → ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य की प्राप्ति
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. नवीन न्याय संहिताएँ भारतीय दंड संहिता (IPC) का स्थान लेती हैं।
2. ICJS (इंटर-ऑपरेबल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम) का उद्देश्य आपराधिक न्याय प्रणाली के विभिन्न स्तंभों को एकीकृत करना है।
3. गोवा में ICJS के प्रभावी कार्यान्वयन से दोषसिद्धि दर में वृद्धि हुई है।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। नवीन न्याय संहिताएँ, भारतीय दंड संहिता (IPC), दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम का स्थान लेती हैं। कथन 2 सही है। ICJS पुलिस, फोरेंसिक लैब, अभियोजन, न्यायपालिका और जेलों जैसे आपराधिक न्याय प्रणाली के विभिन्न स्तंभों को एकीकृत करता है। कथन 3 भी सही है। समाचार के अनुसार, गोवा में ICJS के प्रभावी कार्यान्वयन के बाद दोषसिद्धि दर 22% से बढ़कर 53% हो गई है।
Q2. तटीय सुरक्षा से संबंधित निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?
- भारतीय तटरक्षक बल (Indian Coast Guard) भारत की तटीय सुरक्षा के लिए प्राथमिक एजेंसी है।
- तटीय सुरक्षा में अवैध प्रवासन और नशीले पदार्थों की तस्करी को रोकना शामिल है।
- राज्य पुलिस बल तटीय सुरक्षा में कोई भूमिका नहीं निभाते हैं।
- तटीय सुरक्षा में मछली पकड़ने वाली नौकाओं की निगरानी भी एक महत्वपूर्ण पहलू है।
उत्तर: राज्य पुलिस बल तटीय सुरक्षा में कोई भूमिका नहीं निभाते हैं। — कथन ‘राज्य पुलिस बल तटीय सुरक्षा में कोई भूमिका नहीं निभाते हैं’ सही नहीं है। राज्य पुलिस बल, विशेषकर तटीय पुलिस, तटीय सुरक्षा बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिसमें गश्त, निगरानी और खुफिया जानकारी साझा करना शामिल है। अन्य सभी कथन सही हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ नवीन न्याय संहिताओं के कार्यान्वयन और ICJS (इंटर-ऑपरेबल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम) के प्रभावी उपयोग से भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में क्या परिवर्तन अपेक्षित हैं? गोवा के अनुभव के संदर्भ में इसकी सफलता और चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** नवीन न्याय संहिताओं (भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, भारतीय साक्ष्य अधिनियम) और ICJS का संक्षिप्त परिचय, उनके उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए।
2. **अपेक्षित परिवर्तन:**
* **दोषसिद्धि दर में सुधार:** साक्ष्य संग्रह, जांच और अभियोजन में दक्षता से दोषसिद्धि दर में वृद्धि।
* **न्याय में तेजी:** डिजिटल रिकॉर्ड, समय-सीमा और प्रक्रियात्मक सुधारों के माध्यम से मामलों का त्वरित निपटान।
* **पारदर्शिता और जवाबदेही:** डिजिटल एकीकरण से प्रक्रिया में पारदर्शिता और विभिन्न एजेंसियों की जवाबदेही में वृद्धि।
* **अपराधों का बेहतर विश्लेषण:** डेटा एकीकरण से अपराध पैटर्न, अंतर-राज्यीय गतिविधियों और अपराधियों की पहचान में सहायता।
* **पुलिस आधुनिकीकरण:** प्रौद्योगिकी के उपयोग और क्षमता निर्माण पर जोर।
3. **गोवा का अनुभव:**
* **सफलता:** दोषसिद्धि दर में 22% से 53% तक की उल्लेखनीय वृद्धि का उल्लेख। आपराधिक मामलों के निपटान में लगने वाले समय में कमी (6-8 महीने)। ‘नशामुक्त गोवा’ और साइबर अपराधों से निपटने में योगदान।
* **चुनौतियाँ:** साइबर अपराधों, नशीले पदार्थों से जुड़े अपराधों और विदेशियों से जुड़े उल्लंघनों में सख्त कार्रवाई की आवश्यकता। अंतर-राज्यीय अपराधों और तटीय सुरक्षा की निरंतर निगरानी की चुनौती। क्षमता निर्माण और संसाधनों की उपलब्धता।
4. **निष्कर्ष:** नवीन संहिताओं और ICJS के माध्यम से ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य में आपराधिक न्याय प्रणाली की भूमिका, अन्य राज्यों के लिए गोवा के मॉडल की प्रासंगिकता और भविष्य की राह।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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