11 Sep संयुक्त राष्ट्र जलवायु प्रमुख ने चेताया: राजनीतिक विभाजन जलवायु संकट को बढ़ा रहा है
✎ जलवायु परिवर्तन अब एक गंभीर आर्थिक सुरक्षा चुनौती है, जिसके लिए राजनीतिक विभाजन से ऊपर उठकर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण में निवेश की आवश्यकता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी, आपदा प्रबंधन, अर्थव्यवस्था | GS Paper II — अंतर्राष्ट्रीय संबंध, सरकारी नीतियाँ एवं हस्तक्षेप
- Prelims: जलवायु परिवर्तन, UNFCCC, COP31, नवीकरणीय ऊर्जा, आर्थिक सुरक्षा, वैश्विक तापन, मीथेन उत्सर्जन, खाद्य सुरक्षा
- Essay: जलवायु परिवर्तन: एक वैश्विक आर्थिक और सुरक्षा चुनौती, सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: जलवायु परिवर्तन अब एक गंभीर आर्थिक सुरक्षा चुनौती है, जिसके लिए राजनीतिक विभाजन से ऊपर उठकर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण में निवेश की आवश्यकता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
संयुक्त राष्ट्र (UN) के जलवायु प्रमुख ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन को एक पक्षपातपूर्ण मुद्दे के रूप में देखना वास्तविकता से परे है और यह वैश्विक आर्थिक सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा बन गया है। उन्होंने यूरोप में अत्यधिक गर्मी, बाढ़ और अन्य जलवायु प्रभावों के कारण हुए व्यापक आर्थिक नुकसान का हवाला दिया, जिसमें उत्पादकता में कमी और खाद्य, ऊर्जा तथा परिवहन में व्यवधान शामिल हैं। इस चेतावनी ने जलवायु कार्रवाई में राजनीतिक विभाजन को दूर करने और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया है।
पृष्ठभूमि
- जलवायु परिवर्तन (Climate Change) एक दीर्घकालिक वैश्विक चुनौती है जो पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि, मौसम के पैटर्न में बदलाव और समुद्र के स्तर में वृद्धि जैसे प्रभावों से चिह्नित है।
- संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) एक अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण संधि है जिसका उद्देश्य वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता को स्थिर करना है ताकि जलवायु प्रणाली के साथ खतरनाक मानवजनित हस्तक्षेप को रोका जा सके।
- पेरिस समझौता (Paris Agreement), UNFCCC के तहत एक कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतर्राष्ट्रीय संधि है, जिसका मुख्य लक्ष्य वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 2 डिग्री सेल्सियस से काफी नीचे रखना और 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के प्रयासों को जारी रखना है।
- जलवायु परिवर्तन के आर्थिक प्रभावों में कृषि उत्पादकता में कमी, बुनियादी ढांचे को नुकसान, स्वास्थ्य लागत में वृद्धि और प्राकृतिक आपदाओं के कारण होने वाले वित्तीय नुकसान शामिल हैं।
- नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) स्रोतों जैसे सौर और पवन ऊर्जा को जलवायु परिवर्तन से निपटने और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
- COP (Conference of the Parties) UNFCCC के तहत सर्वोच्च निर्णय लेने वाला निकाय है, जो जलवायु कार्रवाई की प्रगति की समीक्षा करने और भविष्य की रणनीतियों पर निर्णय लेने के लिए नियमित रूप से बैठक करता है।
जलवायु परिवर्तन और आर्थिक सुरक्षा
- जलवायु परिवर्तन को अब केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि एक ‘महाद्वीप-व्यापी आर्थिक सुरक्षा आपातकाल’ के रूप में देखा जा रहा है, जैसा कि संयुक्त राष्ट्र के जलवायु प्रमुख ने रेखांकित किया है।
- अत्यधिक मौसमी घटनाएँ जैसे भीषण गर्मी, बाढ़ और सूखा सीधे तौर पर आर्थिक गतिविधियों को बाधित करती हैं, जिससे कृषि उत्पादन, परिवहन, ऊर्जा आपूर्ति और औद्योगिक उत्पादकता प्रभावित होती है।
- इन घटनाओं से बड़े पैमाने पर विस्थापन (Forced Migration) होता है, जो सामाजिक और आर्थिक स्थिरता पर अतिरिक्त दबाव डालता है।
- जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) पर अत्यधिक निर्भरता ऊर्जा सुरक्षा को कमजोर करती है और वैश्विक ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता के प्रति अर्थव्यवस्थाओं को संवेदनशील बनाती है।
- स्वच्छ ऊर्जा (Clean Energy) में संक्रमण न केवल जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करता है, बल्कि नई आर्थिक अवसर पैदा करता है, ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम करता है और मुद्रास्फीति (Inflation) तथा जीवन-यापन की लागत को नियंत्रित करने में सहायक होता है।
- अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और राजनीतिक एकजुटता जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और एक लचीली, टिकाऊ वैश्विक अर्थव्यवस्था का निर्माण करने के लिए आवश्यक है।
- मीथेन उत्सर्जन (Methane Emissions) को कम करना, खाद्य सुरक्षा (Food Security) सुनिश्चित करना और शहरी लचीलापन (Urban Resilience) बढ़ाना जलवायु कार्रवाई के महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं जो आर्थिक सुरक्षा को सीधे प्रभावित करते हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| जलवायु परिवर्तन एक आर्थिक सुरक्षा आपातकाल | वैश्विक तापमान वृद्धि को केवल पर्यावरणीय मुद्दा मानने के बजाय इसे व्यापक आर्थिक और सुरक्षा चुनौती के रूप में देखना आवश्यक है। |
| राजनीतिक विभाजन | जलवायु कार्रवाई को पक्षपातपूर्ण मुद्दा बनाने से प्रभावी नीतियों के निर्माण और कार्यान्वयन में बाधा आती है, जिससे वैश्विक सहयोग कमजोर होता है। |
| जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता | यह मुद्रास्फीति, जीवन-यापन की लागत में वृद्धि और आर्थिक विकास में बाधा का प्रमुख कारण है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा भी प्रभावित होती है। |
| स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण | यह आर्थिक विकास, रोजगार सृजन और ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ावा देने का एक अवसर है, साथ ही जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने में भी सहायक है। |
| 1.5 डिग्री सेल्सियस का लक्ष्य | पेरिस समझौते के तहत निर्धारित यह लक्ष्य वैश्विक तापमान वृद्धि को सीमित करने के लिए महत्वपूर्ण है, जिसके उल्लंघन से गंभीर परिणाम होंगे। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- जलवायु परिवर्तन से उत्पादकता में कमी, व्यापार मार्गों में व्यवधान और फसल की पैदावार में गिरावट आती है, जिससे खाद्य कीमतें बढ़ती हैं और मुद्रास्फीति (Inflation) पर दबाव पड़ता है।
- चरम मौसमी घटनाओं के कारण बुनियादी ढांचे को नुकसान होता है और आर्थिक गतिविधियों में व्यवधान आता है, जिससे सकल घरेलू उत्पाद (GDP) को भारी नुकसान होता है।
- स्वच्छ ऊर्जा में निवेश से नए रोजगार के अवसर पैदा होते हैं और आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलता है, जबकि जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम होने से ऊर्जा आयात बिल घटता है।
सामरिक महत्व
- जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न खाद्य और जल संकट के कारण आंतरिक और सीमा पार प्रवासन में वृद्धि होती है, जिससे सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो सकती है।
- ऊर्जा सुरक्षा एक महत्वपूर्ण सामरिक चिंता है; जीवाश्म ईंधन पर अत्यधिक निर्भरता से भू-राजनीतिक जोखिम बढ़ते हैं, जबकि नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) घरेलू ऊर्जा आपूर्ति को मजबूत करती है।
- अंतर्राष्ट्रीय जलवायु सहयोग की कमी वैश्विक सुरक्षा को कमजोर करती है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव किसी एक देश तक सीमित नहीं रहते।
पर्यावरणीय महत्व
- वैश्विक तापमान वृद्धि से अत्यधिक गर्मी, बाढ़, सूखा और अन्य चरम मौसमी घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ती है, जिससे पारिस्थितिक तंत्र और जैव विविधता को नुकसान होता है।
- 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को प्राप्त करने में विफलता से अपरिवर्तनीय पर्यावरणीय क्षति हो सकती है, जिसमें समुद्र के स्तर में वृद्धि और प्रजातियों का विलुप्त होना शामिल है।
- मीथेन उत्सर्जन में कमी और खाद्य सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में कार्रवाई से जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में मदद मिलती है।
चुनौतियाँ
1. राजनीतिक ध्रुवीकरण और जलवायु कार्रवाई
- जलवायु परिवर्तन को एक पक्षपातपूर्ण या ‘संस्कृति युद्ध’ का मुद्दा मानना प्रभावी नीतियों के निर्माण और कार्यान्वयन में बाधा उत्पन्न करता है।
- दीर्घकालिक जलवायु लक्ष्यों के बजाय अल्पकालिक राजनीतिक लाभों पर ध्यान केंद्रित करने से आवश्यक निवेश और सुधारों में देरी होती है।
यूपीएससी लिंक: शासन, नीतियां और हस्तक्षेप
2. आर्थिक लागत और विकासशील देशों पर बोझ
- जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले आर्थिक नुकसान, विशेषकर विकासशील देशों के लिए, उनकी विकास क्षमता को बाधित करते हैं।
- स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के लिए आवश्यक बड़े पैमाने पर निवेश की वित्तपोषण व्यवस्था एक चुनौती है, खासकर वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के दौर में।
यूपीएससी लिंक: आर्थिक विकास और पर्यावरण
3. अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की कमी
- वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिए मजबूत अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और प्रतिबद्धता की आवश्यकता है, जिसमें वर्तमान में कमी दिख रही है।
- विभिन्न देशों के बीच जलवायु लक्ष्यों और जिम्मेदारियों को लेकर मतभेद प्रभावी वैश्विक समझौतों को कमजोर करते हैं।
यूपीएससी लिंक: अंतर्राष्ट्रीय संबंध और पर्यावरण
4. जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता
- कई अर्थव्यवस्थाएं अभी भी जीवाश्म ईंधन पर अत्यधिक निर्भर हैं, जिससे ऊर्जा सुरक्षा जोखिम और उत्सर्जन में वृद्धि होती है।
- जीवाश्म ईंधन उद्योग से स्वच्छ ऊर्जा में संक्रमण के लिए बड़े पैमाने पर संरचनात्मक परिवर्तन और सामाजिक-आर्थिक समायोजन की आवश्यकता है।
यूपीएससी लिंक: ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| राजनीतिक विभाजन | जलवायु कार्रवाई को पक्षपातपूर्ण मुद्दा बनाने से वैश्विक सहयोग और प्रभावी नीति निर्माण में बाधा आती है। |
| आर्थिक सुरक्षा आपातकाल | जलवायु परिवर्तन से उत्पादकता में कमी, बुनियादी ढांचे को नुकसान और खाद्य कीमतों में वृद्धि होती है, जिससे व्यापक आर्थिक अस्थिरता आती है। |
| जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता | यह मुद्रास्फीति, ऊर्जा सुरक्षा जोखिम और जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने में विफलता का कारण बनती है। |
| अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का अभाव | वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिए आवश्यक सामूहिक कार्रवाई में कमी है। |
| प्रवासन और मानवीय संकट | जलवायु प्रभावों के कारण जबरन प्रवासन में वृद्धि होती है, जिससे मानवीय और सुरक्षा चुनौतियां पैदा होती हैं। |
आगे की राह
- जलवायु परिवर्तन को एक गैर-पक्षपातपूर्ण आर्थिक सुरक्षा आपातकाल के रूप में मान्यता देना और इस पर राष्ट्रीय सहमति बनाना।
- स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण में तेजी लाना, नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों में निवेश बढ़ाना और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना।
- अंतर्राष्ट्रीय जलवायु सहयोग को मजबूत करना और COP31 जैसे सम्मेलनों में ठोस कार्यान्वयन योग्य परिणामों पर ध्यान केंद्रित करना।
- जलवायु अनुकूलन और लचीलेपन में निवेश बढ़ाना, विशेषकर चरम मौसमी घटनाओं से प्रभावित क्षेत्रों में।
- मीथेन उत्सर्जन में कमी, खाद्य सुरक्षा और शहरी लचीलेपन जैसे तात्कालिक क्षेत्रों में कार्रवाई को प्राथमिकता देना।
- जलवायु परिवर्तन के आर्थिक प्रभावों को कम करने के लिए वित्तीय तंत्र विकसित करना और विकासशील देशों को सहायता प्रदान करना।
- जलवायु शिक्षा और जागरूकता को बढ़ावा देना ताकि जनता और नीति निर्माताओं के बीच जलवायु कार्रवाई की तात्कालिकता को समझा जा सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
जलवायु परिवर्तन · आर्थिक सुरक्षा · नवीकरणीय ऊर्जा · जीवाश्म ईंधन · वैश्विक सहयोग · COP31 सम्मेलन · खाद्य सुरक्षा · शहरी लचीलापन · मुद्रास्फीति · सतत विकास
अवधारणा प्रवाह
जलवायु परिवर्तन को पक्षपातपूर्ण मुद्दा मानना → प्रभावी जलवायु नीतियों का अभाव → चरम मौसमी घटनाओं में वृद्धि → आर्थिक नुकसान (मुद्रास्फीति, जीडीपी हानि, ऊर्जा संकट) → सामाजिक अस्थिरता और प्रवासन → वैश्विक आर्थिक सुरक्षा आपातकाल
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. UNFCCC (जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन) जलवायु परिवर्तन से संबंधित एक अंतरराष्ट्रीय संधि है।
2. COP31 सम्मेलन का उद्देश्य 2015 के पेरिस समझौते में निर्धारित 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को प्राप्त करना है।
3. राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (National Green Hydrogen Mission) भारत में नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने की एक पहल है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि UNFCCC जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समझौता है। कथन 2 सही है क्योंकि COP सम्मेलन पेरिस समझौते के लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए आयोजित किए जाते हैं। कथन 3 सही है क्योंकि राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन भारत में हरित हाइड्रोजन उत्पादन और नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए एक प्रमुख सरकारी पहल है।
Q2. अभिकथन (A): जलवायु परिवर्तन को एक पक्षपातपूर्ण मुद्दा मानना आर्थिक सुरक्षा के लिए खतरनाक है।
कारण (R): जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चरम मौसमी घटनाएँ बुनियादी ढांचे, व्यवसायों और अर्थव्यवस्थाओं को गंभीर रूप से प्रभावित करती हैं, जिससे मुद्रास्फीति और जीवन-यापन की लागत बढ़ती है।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि जलवायु परिवर्तन के आर्थिक प्रभाव व्यापक हैं, जैसा कि लेख में बताया गया है। कारण (R) भी सही है क्योंकि चरम मौसम की घटनाओं से उत्पादकता का नुकसान, व्यापार मार्गों में व्यवधान और फसल की पैदावार में कमी आती है, जो सीधे मुद्रास्फीति और आर्थिक अस्थिरता से जुड़े हैं। इस प्रकार, R, A की सही व्याख्या है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ जलवायु परिवर्तन को ‘आर्थिक सुरक्षा आपातकाल’ के रूप में देखने के निहितार्थों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इस संदर्भ में, भारत में स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण की चुनौतियों और अवसरों पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर कंकाल:
1. **परिचय:** जलवायु परिवर्तन को आर्थिक सुरक्षा आपातकाल के रूप में परिभाषित करें और इसके बढ़ते वैश्विक प्रभावों का संक्षिप्त उल्लेख करें।
2. **’आर्थिक सुरक्षा आपातकाल’ के निहितार्थ:**
* **प्रत्यक्ष आर्थिक लागतें:** बुनियादी ढांचे को नुकसान, कृषि उत्पादकता में कमी, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, बीमा लागत में वृद्धि।
* **मुद्रास्फीति और जीवन-यापन की लागत:** खाद्य और ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि।
* **भू-राजनीतिक अस्थिरता:** संसाधनों पर संघर्ष, प्रवासन।
* **ऊर्जा सुरक्षा:** जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता से उत्पन्न जोखिम।
* **दीर्घकालिक विकास पर प्रभाव:** GDP वृद्धि में कमी, निवेश पर नकारात्मक प्रभाव।
3. **भारत में स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण की चुनौतियाँ:**
* **वित्तपोषण:** नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर पूंजी की आवश्यकता।
* **प्रौद्योगिकी:** उन्नत भंडारण समाधानों और ग्रिड आधुनिकीकरण की आवश्यकता।
* **बुनियादी ढाँचा:** नवीकरणीय ऊर्जा के एकीकरण के लिए ग्रिड अवसंरचना का उन्नयन।
* **नीतिगत और नियामक बाधाएँ:** अंतर-राज्यीय पारेषण, भूमि अधिग्रहण।
* **जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता:** कोयले पर अत्यधिक निर्भरता और संबंधित उद्योगों का पुनर्गठन।
* **कौशल विकास:** हरित नौकरियों के लिए कार्यबल को प्रशिक्षित करना।
4. **भारत में स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के अवसर:**
* **ऊर्जा सुरक्षा:** आयातित जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना।
* **आर्थिक संवृद्धि:** नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में निवेश, रोजगार सृजन।
* **तकनीकी नवाचार:** घरेलू विनिर्माण और अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा।
* **जलवायु परिवर्तन शमन:** उत्सर्जन लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद।
* **अंतर्राष्ट्रीय सहयोग:** वैश्विक जलवायु वित्त और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण का लाभ उठाना।
* **राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन:** जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से नेतृत्व।
5. **निष्कर्ष:** आर्थिक सुरक्षा के लिए जलवायु कार्रवाई के महत्व को रेखांकित करें और भारत के स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक अवसर के रूप में प्रस्तुत करें।
स्रोत: news.un.org
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