15 Sep किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना: 6 राज्यों के बीच ऐतिहासिक समझौता, जानें पूरा विवरण
✎ किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर टोंस नदी पर निर्मित होने वाली एक राष्ट्रीय परियोजना है, जो छह राज्यों को पेयजल, सिंचाई और जलविद्युत प्रदान करके अंतर-राज्यीय सहयोग और जल सुरक्षा को बढ़ावा देगी।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान – संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध, अंतर-राज्यीय जल विवाद | GS Paper III — अर्थव्यवस्था – आधारभूत संरचना (ऊर्जा, जल संसाधन), पर्यावरण – संरक्षण
- Prelims: किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना, टोंस नदी, यमुना बेसिन, अंतर-राज्यीय जल विवाद, राष्ट्रीय परियोजना, जलविद्युत, सिंचाई, पेयजल आपूर्ति
- Essay: सहकारी संघवाद और अंतर-राज्यीय सहयोग के माध्यम से राष्ट्रीय विकास, भारत में जल सुरक्षा: चुनौतियाँ और समाधान
त्वरित पुनरावृत्ति: किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर टोंस नदी पर निर्मित होने वाली एक राष्ट्रीय परियोजना है, जो छह राज्यों को पेयजल, सिंचाई और जलविद्युत प्रदान करके अंतर-राज्यीय सहयोग और जल सुरक्षा को बढ़ावा देगी।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों ने केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री तथा केन्द्रीय जल शक्ति मंत्री की उपस्थिति में किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह समझौता चार दशकों से लंबित इस परियोजना को आगे बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण कदम है और यह विभिन्न राज्यों के बीच जल-साझाकरण से संबंधित विवादों को हल करने की दिशा में एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करता है।
पृष्ठभूमि
- किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर टोंस नदी पर प्रस्तावित है, जो यमुना नदी की एक सहायक नदी है।
- यह परियोजना कई दशकों से अंतर-राज्यीय जल-साझाकरण मुद्दों के कारण लंबित थी, जिसमें भागीदार राज्यों के बीच जल आवंटन और वित्तीय भार को लेकर मतभेद थे।
- भारत सरकार ने ‘संवाद से समाधान’ के मंत्र के तहत विभिन्न राज्यों के बीच जल विवादों को सुलझाने पर जोर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप पिछले कुछ वर्षों में कई लंबित परियोजनाओं पर समझौते हुए हैं।
- यह समझौता मोदी सरकार के कार्यकाल में दसवाँ जल विवाद समाधान है, जो अंतर-राज्यीय सहयोग को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
- परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया गया है, जिसका अर्थ है कि इसका लगभग 90% वित्तीय भार भारत सरकार द्वारा वहन किया जाएगा, जबकि शेष 10% भागीदार राज्य वहन करेंगे।
- इस परियोजना का उद्देश्य दिल्ली सहित छह भागीदार राज्यों को पेयजल, सिंचाई और जलविद्युत के माध्यम से लाभान्वित करना है।
किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना क्या है?
- किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर टोंस नदी पर एक विशाल कंक्रीट ग्रेविटी बांध के निर्माण की परिकल्पना करती है।
- इस बांध की प्रस्तावित ऊँचाई 232.6 मीटर होगी और इसमें 1,562 मिलियन क्यूबिक मीटर जल संग्रहण की क्षमता होगी।
- परियोजना का मुख्य उद्देश्य भागीदार राज्यों, विशेष रूप से दिल्ली को पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित करना है, जहाँ जल संकट एक गंभीर समस्या है।
- यह परियोजना लगभग 97 हजार हेक्टेयर भूमि की सिंचाई में सहायता करेगी, जिससे कृषि उत्पादकता बढ़ेगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लाभ होगा।
- किशाऊ परियोजना से 1,476 मिलियन यूनिट स्वच्छ जलविद्युत का उत्पादन भी होगा, जो नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देगा और ऊर्जा सुरक्षा में योगदान देगा।
- इसे राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया गया है, जिसका अर्थ है कि इसके विकास और कार्यान्वयन में केंद्र सरकार की महत्वपूर्ण वित्तीय और तकनीकी सहायता शामिल होगी।
- यह समझौता यमुना बेसिन के छह राज्यों – उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा – के बीच जल संसाधनों के न्यायसंगत बंटवारे और उपयोग को सुनिश्चित करेगा।
- परियोजना से पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है, क्योंकि यह जल संसाधनों का कुशल प्रबंधन करेगी और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करेगी।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| छह राज्यों द्वारा समझौता | उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा के बीच जल बंटवारे पर सहमति। |
| टोंस नदी पर बांध | उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर 232.6 मीटर ऊँचा कंक्रीट ग्रेविटी बांध का निर्माण। |
| जल संग्रहण क्षमता | 1,562 मिलियन क्यूबिक मीटर जल का संग्रहण, जिससे कई राज्यों को लाभ होगा। |
| राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा | परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया गया है, जिसमें भारत सरकार 90% वित्तीय भार वहन करेगी। |
| सिंचाई और जलविद्युत | 97 हजार हेक्टेयर भूमि की सिंचाई और 1,476 मिलियन यूनिट स्वच्छ जलविद्युत का उत्पादन। |
| दिल्ली को प्राथमिकता | परियोजना से सबसे बड़ा लाभ दिल्ली को होगा, जिससे राजधानी की जल आवश्यकताएं पूरी होंगी। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- परियोजना से 97 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई मिलेगी, जिससे कृषि उत्पादन और ग्रामीण आय में वृद्धि होगी।
- 1,476 मिलियन यूनिट स्वच्छ जलविद्युत का उत्पादन होगा, जो ऊर्जा सुरक्षा में योगदान देगा और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करेगा।
- बुनियादी ढाँचे के निर्माण से स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर सृजित होंगे।
पर्यावरणीय महत्व
- जल संग्रहण से भूजल स्तर में सुधार होगा और सूखे की स्थिति से निपटने में मदद मिलेगी।
- स्वच्छ जलविद्युत उत्पादन से कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी, जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहायक होगा।
- पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा, विशेषकर यमुना नदी बेसिन में।
सामाजिक महत्व
- दिल्ली जैसे बड़े शहरी क्षेत्रों को पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित होगी, जिससे लाखों लोगों के जीवन स्तर में सुधार आएगा।
- जल विवादों का समाधान राज्यों के बीच सहयोग और सद्भाव को बढ़ावा देता है, जिससे क्षेत्रीय विकास को गति मिलती है।
- सिंचाई सुविधाओं से खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होगी और किसानों की आजीविका में स्थिरता आएगी।
शासन और संघीय महत्व
- यह समझौता अंतर-राज्यीय जल विवादों (Inter-State Water Disputes) को सुलझाने में केंद्र सरकार की भूमिका को दर्शाता है।
- छह राज्यों की सहमति ‘सहकारी संघवाद’ (Cooperative Federalism) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ राज्य और केंद्र मिलकर राष्ट्रीय हित में कार्य करते हैं।
- लंबे समय से लंबित परियोजनाओं को पूरा करने की प्रतिबद्धता सुशासन (Good Governance) का प्रतीक है।
चुनौतियाँ
1. अंतर-राज्यीय जल विवाद
- भारत में कई नदियाँ एक से अधिक राज्यों से होकर गुजरती हैं, जिससे उनके जल के बंटवारे को लेकर अक्सर विवाद उत्पन्न होते हैं।
- इन विवादों में जल की उपलब्धता, उपयोग के अधिकार और परियोजना लागत साझा करने जैसे मुद्दे शामिल होते हैं।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान और संघीय ढाँचा
2. परियोजना कार्यान्वयन में देरी
- बड़ी बहुउद्देशीय परियोजनाओं को पूरा करने में अक्सर भूमि अधिग्रहण, पर्यावरणीय मंजूरी और वित्तीय बाधाओं के कारण देरी होती है।
- दीर्घकालिक परियोजनाओं में लागत में वृद्धि और समय-सीमा का उल्लंघन एक आम समस्या है।
यूपीएससी लिंक: बुनियादी ढाँचा और विकास
3. पर्यावरणीय प्रभाव आकलन
- बड़े बांधों के निर्माण से पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव पड़ सकता है, जैसे जैव विविधता का नुकसान और विस्थापन।
- पर्यावरणीय मंजूरी प्राप्त करना और क्षतिपूर्ति उपायों को लागू करना एक जटिल प्रक्रिया है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण संरक्षण और संधारणीय विकास
4. पुनर्वास और पुनर्स्थापन
- बांध निर्माण से प्रभावित स्थानीय समुदायों का उचित पुनर्वास और पुनर्स्थापन सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है।
- विस्थापित लोगों के अधिकारों की रक्षा और उनकी आजीविका सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय और विकास
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| जल बंटवारा | राज्यों के बीच जल की उपलब्धता और उपयोग के अधिकारों पर असहमति। |
| परियोजना की लागत | बढ़ती लागत और राज्यों के बीच वित्तीय भार के बंटवारे पर मतभेद। |
| पर्यावरणीय मंजूरी | पर्यावरणीय प्रभाव आकलन और विभिन्न नियामक निकायों से अनुमोदन प्राप्त करने में देरी। |
| भूमि अधिग्रहण | परियोजना के लिए आवश्यक भूमि के अधिग्रहण में कानूनी और सामाजिक मुद्दे। |
| पुनर्वास | परियोजना से विस्थापित लोगों का उचित पुनर्वास और क्षतिपूर्ति सुनिश्चित करना। |
| तकनीकी और इंजीनियरिंग | बड़े पैमाने पर निर्माण परियोजनाओं में जटिल तकनीकी चुनौतियाँ और कार्यान्वयन संबंधी मुद्दे। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (National Green Hydrogen Mission)
आगे की राह
- अंतर-राज्यीय जल विवादों के समाधान के लिए एक स्थायी और प्रभावी तंत्र विकसित करना, जिसमें सभी हितधारकों की भागीदारी हो।
- परियोजनाओं के कार्यान्वयन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना, जिससे समय पर और लागत प्रभावी ढंग से कार्य पूरा हो सके।
- पर्यावरणीय प्रभाव आकलन प्रक्रियाओं को सुदृढ़ करना और संधारणीय विकास सिद्धांतों का पालन सुनिश्चित करना।
- परियोजना प्रभावित व्यक्तियों के लिए व्यापक पुनर्वास और पुनर्स्थापन पैकेज तैयार करना और उनके अधिकारों की रक्षा करना।
- जल संसाधनों के कुशल प्रबंधन और संरक्षण के लिए आधुनिक तकनीकों और सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाना।
- राज्यों के बीच जल सहयोग को बढ़ावा देने के लिए नियमित संवाद और समन्वय मंच स्थापित करना।
- जलविद्युत परियोजनाओं में स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को अधिकतम करना और पर्यावरणीय प्रभावों को कम करना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना · अंतर-राज्यीय जल विवाद · टोंस नदी · राष्ट्रीय परियोजना · जल शक्ति मंत्रालय · संघवाद · जल संसाधन प्रबंधन · सतत विकास · जलविद्युत · सिंचाई क्षमता
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 262’, ‘note’: ‘अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का न्यायनिर्णयन’}
- {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची (सूची II, प्रविष्टि 17)’, ‘note’: ‘राज्यों के भीतर जल आपूर्ति, सिंचाई’}
- {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची (सूची I, प्रविष्टि 56)’, ‘note’: ‘अंतर-राज्यीय नदियों का विनियमन’}
अवधारणा प्रवाह
किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना पर समझौता → छह राज्यों के बीच जल बंटवारे पर सहमति → टोंस नदी पर बांध का निर्माण → जल संग्रहण, सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन → क्षेत्रीय जल सुरक्षा और आर्थिक विकास
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह परियोजना टोंस नदी पर एक कंक्रीट ग्रेविटी डैम के निर्माण से संबंधित है।
2. इसे राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया गया है, जिसका 90% वित्तीय भार केंद्र सरकार वहन करेगी।
3. इस परियोजना से केवल दिल्ली और हरियाणा जैसे मैदानी राज्यों को ही लाभ होगा।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर बहने वाली टोंस नदी पर 232.6 मीटर ऊँचा कंक्रीट ग्रेविटी डैम बनाने का प्रस्ताव करती है। कथन 2 सही है। इसे राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया गया है, जिसके तहत लगभग 90% वित्तीय भार भारत सरकार और शेष 10% भागीदार राज्यों द्वारा वहन किया जाएगा। कथन 3 गलत है। इस परियोजना से हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली सहित छह राज्यों को लाभ होगा।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा/से अंतर-राज्यीय जल विवादों को सुलझाने में केंद्र सरकार की भूमिका का सबसे अच्छा वर्णन करता है?
- केंद्र सरकार केवल न्यायिक हस्तक्षेप के माध्यम से जल विवादों का समाधान करती है।
- केंद्र सरकार केवल उन विवादों में हस्तक्षेप करती है जहाँ एक से अधिक राज्य शामिल हों।
- केंद्र सरकार संविधान के तहत अपनी शक्तियों का उपयोग करते हुए, मध्यस्थता और समझौतों के माध्यम से विवादों को सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- केंद्र सरकार का अंतर-राज्यीय जल विवादों में कोई सीधा हस्तक्षेप नहीं होता है, यह राज्यों का आंतरिक मामला है।
उत्तर: केंद्र सरकार संविधान के तहत अपनी शक्तियों का उपयोग करते हुए, मध्यस्थता और समझौतों के माध्यम से विवादों को सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। — केंद्र सरकार संविधान के अनुच्छेद 262 के तहत अंतर-राज्यीय जल विवादों के समाधान के लिए कानून बनाने की शक्ति रखती है। इसके अतिरिक्त, यह राज्यों के बीच मध्यस्थता और समझौतों को सुविधाजनक बनाने में सक्रिय भूमिका निभाती है, जैसा कि किशाऊ परियोजना समझौते में देखा गया है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ अंतर-राज्यीय जल विवादों के समाधान में केंद्र सरकार की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना समझौते के संदर्भ में इसकी सफलता और चुनौतियों पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: अंतर-राज्यीय जल विवादों की प्रकृति और भारत में उनकी प्रासंगिकता का संक्षिप्त परिचय।
2. केंद्र सरकार की भूमिका: संविधान के अनुच्छेद 262 और अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 का उल्लेख। केंद्र सरकार की मध्यस्थता, न्यायाधिकरणों के गठन और समझौतों को सुविधाजनक बनाने की भूमिका का वर्णन।
3. किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना समझौता: इस परियोजना का संक्षिप्त विवरण (टोंस नदी, भागीदार राज्य, राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा, वित्तीय भार)। यह समझौता केंद्र सरकार की भूमिका का एक उदाहरण कैसे है, इसका विश्लेषण।
4. सफलताएँ: किशाऊ समझौते जैसी परियोजनाओं के माध्यम से जल विवादों के समाधान से प्राप्त लाभ (जैसे जल सुरक्षा, ऊर्जा उत्पादन, सिंचाई, क्षेत्रीय सहयोग)। हाल के वर्षों में केंद्र द्वारा सुलझाए गए अन्य जल विवादों (जैसे लखवार, शाहपुर कंडी, रेणुकाजी, केन-बेतवा लिंक) का उल्लेख।
5. चुनौतियाँ: अंतर-राज्यीय जल विवादों के समाधान में आने वाली चुनौतियाँ (जैसे राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी, डेटा की उपलब्धता, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, राज्यों के बीच विश्वास की कमी)।
6. निष्कर्ष: संघवाद के सिद्धांत को बनाए रखते हुए सतत जल प्रबंधन और विवाद समाधान के लिए आगे की राह पर संतुलित दृष्टिकोण।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
Himachal Pradesh PCS (HPPSC (HAS)) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा ‘सहकारिता क्षेत्र में सुधार’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में किस केंद्रीय मंत्री ने भाग लिया था?
- केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह
- केंद्रीय जल शक्ति मंत्री श्री सी आर पाटिल
- केंद्रीय कृषि मंत्री श्री नरेंद्र सिंह तोमर
- केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री श्री पीयूष गोयल
उत्तर: केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह — हिमाचल प्रदेश में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में ‘सहकारिता क्षेत्र में सुधार’ विषय पर केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह मुख्य अतिथि थे।
Mains: हिमाचल प्रदेश में सहकारिता क्षेत्र के विकास में राज्य सरकार द्वारा उठाए गए प्रमुख कदमों का वर्णन कीजिए। साथ ही, केंद्र सरकार की ‘सहकारिता से समृद्धि’ योजना के अंतर्गत राज्य में इसके प्रभाव का आकलन कीजिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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