22 Sep चार राज्यों में विधान परिषद चुनाव: निर्वाचन आयोग ने जारी की तिथियां, कब होगा मतदान?

✎ विधान परिषद राज्य विधानमंडल का उच्च सदन है, जिसके सदस्यों का चुनाव विभिन्न श्रेणियों के प्रतिनिधियों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से किया जाता है, और इसका सृजन या उत्सादन संसद द्वारा किया जा सकता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान – ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और मूल संरचना | GS Paper II — संसद और राज्य विधानमंडल – संरचना, कार्यप्रणाली, कार्य संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय
- Prelims: विधान परिषद, अनुच्छेद 169, अनुच्छेद 171, निर्वाचन आयोग, आदर्श आचार संहिता, स्नातक निर्वाचन क्षेत्र, शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र
- Essay: भारत में द्विसदनीय विधायिका की प्रासंगिकता और चुनौतियाँ, लोकतंत्र में निर्वाचन आयोग की भूमिका और महत्त्व
त्वरित पुनरावृत्ति: विधान परिषद राज्य विधानमंडल का उच्च सदन है, जिसके सदस्यों का चुनाव विभिन्न श्रेणियों के प्रतिनिधियों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से किया जाता है, और इसका सृजन या उत्सादन संसद द्वारा किया जा सकता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) ने बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश राज्यों में विधान परिषद की शिक्षक और स्नातक सीटों के लिए द्विवार्षिक चुनावों की तारीखों की घोषणा की है। इन चुनावों के लिए मतदान 23 अक्टूबर को होगा और मतगणना 27 अक्टूबर को की जाएगी। इसके साथ ही, संबंधित चुनाव क्षेत्रों में आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) तत्काल प्रभाव से लागू हो गई है।
पृष्ठभूमि
- भारत के संविधान के अनुच्छेद 169 के तहत संसद को किसी राज्य में विधान परिषद (Legislative Council) का सृजन या उत्सादन (abolition) करने का अधिकार है, यदि उस राज्य की विधानसभा इस संबंध में एक विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित करती है।
- वर्तमान में, भारत के छह राज्यों – आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक में विधान परिषदें मौजूद हैं।
- विधान परिषद एक स्थायी सदन है और इसके सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं। इसके एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक दो वर्ष में सेवानिवृत्त होते हैं।
- विधान परिषद के सदस्यों का कार्यकाल छह वर्ष का होता है।
- विधान परिषद के सदस्यों की कुल संख्या संबंधित राज्य की विधानसभा के सदस्यों की कुल संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं हो सकती है, और किसी भी स्थिति में 40 से कम नहीं हो सकती है (जम्मू और कश्मीर के अपवाद को छोड़कर)।
- विधान परिषद के चुनाव निर्वाचन आयोग द्वारा कराए जाते हैं, और इन चुनावों के लिए आदर्श आचार संहिता लागू होती है।
विधान परिषद क्या है?
- विधान परिषद राज्य विधानमंडल का उच्च सदन है, जिसे राज्य विधानमंडल के द्वितीय सदन के रूप में भी जाना जाता है।
- संविधान के अनुच्छेद 171 के अनुसार, विधान परिषद के सदस्यों का चुनाव विभिन्न श्रेणियों के प्रतिनिधियों द्वारा किया जाता है।
- लगभग एक-तिहाई सदस्य राज्य की स्थानीय निकायों (जैसे नगरपालिकाएँ, जिला बोर्ड) के सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं।
- लगभग एक-तिहाई सदस्य राज्य विधानसभा के सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं, जो विधानसभा के सदस्य नहीं होते हैं।
- लगभग 1/12 सदस्य उन स्नातकों द्वारा चुने जाते हैं जिन्होंने भारत में किसी विश्वविद्यालय से कम से कम तीन वर्ष पहले स्नातक की उपाधि प्राप्त की हो।
- लगभग 1/12 सदस्य उन शिक्षकों द्वारा चुने जाते हैं जो कम से कम तीन वर्षों से माध्यमिक विद्यालयों या उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ा रहे हों।
- शेष सदस्य राज्यपाल द्वारा मनोनीत किए जाते हैं, जो कला, साहित्य, विज्ञान, सहकारिता आंदोलन और समाज सेवा के क्षेत्र में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखते हों।
- विधान परिषद की शक्तियाँ विधानसभा की तुलना में सीमित होती हैं, विशेषकर धन विधेयक (Money Bill) के संबंध में, जहाँ इसकी भूमिका केवल विलंबकारी होती है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| विधान परिषद चुनाव | राज्य विधानमंडल के उच्च सदन के सदस्यों का चुनाव। यह राज्यों में द्विसदनीय व्यवस्था का हिस्सा है। |
| शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्र | विधान परिषद की कुछ सीटें विशिष्ट वर्गों (शिक्षक और स्नातक) के प्रतिनिधियों के लिए आरक्षित होती हैं, जो उनके हितों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करती हैं। |
| निर्वाचन आयोग की भूमिका | भारत का निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए चुनाव कार्यक्रम की घोषणा करता है और आचार संहिता लागू करता है। |
| आदर्श आचार संहिता | चुनाव की घोषणा के साथ ही लागू होती है, जो निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के आचरण को नियंत्रित करती है। |
| अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली | विधान परिषद के सदस्य सीधे जनता द्वारा नहीं चुने जाते, बल्कि विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों (जैसे शिक्षक, स्नातक, स्थानीय निकाय) और राज्यपाल द्वारा मनोनीत सदस्यों के माध्यम से चुने जाते हैं। |
महत्व
लोकतांत्रिक महत्व
- विधान परिषद राज्यों में द्विसदनीय व्यवस्था को मजबूत करती है, जिससे कानून निर्माण प्रक्रिया में अधिक विचार-विमर्श और विशेषज्ञता लाई जा सके।
- शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्र समाज के विशिष्ट वर्गों को प्रतिनिधित्व प्रदान करते हैं, जिससे उनके मुद्दों को विधायी मंच पर उठाया जा सके।
शासन और नीति निर्माण
- विधान परिषद के सदस्य राज्य की नीतियों और कानूनों की समीक्षा और सुधार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिससे बेहतर शासन सुनिश्चित होता है।
- यह निचले सदन (विधानसभा) द्वारा पारित विधेयकों पर पुनर्विचार का अवसर प्रदान करता है, जिससे त्रुटियों या कमियों को दूर किया जा सके।
संघवाद और राज्य स्वायत्तता
- राज्यों को अपनी विधायी संरचना चुनने की अनुमति देकर, यह भारतीय संघवाद की भावना को दर्शाता है।
- यह राज्य स्तर पर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को मजबूत करता है और स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में लाने में मदद करता है।
चुनौतियाँ
1. प्रतिनिधित्व की प्रकृति
- विधान परिषद के सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से होता है, जिससे कभी-कभी यह प्रश्न उठता है कि वे सीधे जनता के प्रति कितने जवाबदेह हैं।
- शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या सीमित होती है, जिससे व्यापक प्रतिनिधित्व पर सवाल उठ सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान: संघ और राज्यों के कार्य और उत्तरदायित्व
2. विधान परिषद की उपयोगिता
- कुछ आलोचकों का तर्क है कि विधान परिषदें अनावश्यक व्यय और कानून निर्माण प्रक्रिया में देरी का कारण बनती हैं, खासकर जब उनके पास विधानसभा के समान शक्तियां न हों।
- यह आरोप लगाया जाता है कि कभी-कभी विधान परिषद का उपयोग राजनीतिक नियुक्तियों के लिए किया जाता है, जिससे इसकी गरिमा प्रभावित होती है।
यूपीएससी लिंक: संसद और राज्य विधानमंडल – संरचना, कार्य-संचालन, शक्तियों और विशेषाधिकार एवं इनसे उत्पन्न होने वाले विषय
3. चुनाव प्रक्रिया की जटिलता
- शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के लिए मतदाता सूची तैयार करना और अद्यतन करना एक जटिल प्रक्रिया है, जिससे पात्र मतदाताओं के पंजीकरण में चुनौतियां आ सकती हैं।
- इन चुनावों में कम मतदान प्रतिशत देखा जा सकता है, जो इसके प्रतिनिधित्व के दायरे को सीमित करता है।
यूपीएससी लिंक: लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| अप्रत्यक्ष चुनाव | जनता के प्रति सीधे जवाबदेही की कमी और सीमित मतदाता आधार। |
| राजनीतिक उपयोग | कभी-कभी राजनीतिक नियुक्तियों के लिए एक ‘बैकडोर’ के रूप में उपयोग होने की आशंका। |
| वित्तीय बोझ | राज्य के खजाने पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ, खासकर जब इसकी प्रभावशीलता पर सवाल उठते हों। |
| कानून निर्माण में देरी | विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों को रोकने या विलंबित करने की क्षमता, जिससे शासन में बाधा आ सकती है। |
| सीमित शक्तियां | विधानसभा की तुलना में विधान परिषद की शक्तियां सीमित होती हैं, जिससे इसकी वास्तविक प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगता है। |
आगे की राह
- विधान परिषद की भूमिका और शक्तियों का स्पष्ट निर्धारण किया जाए ताकि इसकी प्रभावशीलता बढ़ाई जा सके।
- शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के लिए मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया को सरल और सुलभ बनाया जाए।
- विधान परिषद के सदस्यों के लिए योग्यता मानदंडों को और अधिक कठोर बनाया जाए ताकि विशेषज्ञता और अनुभव को प्राथमिकता दी जा सके।
- विधान परिषद के चुनावों में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए निर्वाचन आयोग को और अधिकार दिए जाएं।
- विधान परिषद के गठन और उन्मूलन से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों पर व्यापक बहस और आम सहमति बनाई जाए।
- विधान परिषद को केवल एक ‘पुनर्विचार सदन’ के रूप में कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए, न कि विधानसभा के निर्णयों को अनावश्यक रूप से बाधित करने के लिए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
विधान परिषद · राज्य विधानमंडल · अनुच्छेद 169 · द्विसदनीय विधायिका · स्नातक निर्वाचन क्षेत्र · शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र · निर्वाचन आयोग · आदर्श आचार संहिता · अप्रत्यक्ष चुनाव · संसदीय लोकतंत्र
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 169’, ‘note’: ‘राज्यों में विधान परिषदों का उत्सादन या सृजन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 171’, ‘note’: ‘विधान परिषदों की संरचना’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 324’, ‘note’: ‘निर्वाचन आयोग के कार्य’}
अवधारणा प्रवाह
राज्य विधान परिषद की सीटें रिक्त होती हैं। → निर्वाचन आयोग चुनाव कार्यक्रम की घोषणा करता है। → आदर्श आचार संहिता तत्काल प्रभाव से लागू होती है। → उम्मीदवार नामांकन दाखिल करते हैं। → निर्धारित तिथि पर मतदान होता है। → मतगणना के बाद परिणाम घोषित किए जाते हैं।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान के अनुसार, किसी राज्य की विधान परिषद में सदस्यों की कुल संख्या उस राज्य की विधानसभा के सदस्यों की कुल संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं होगी।
2. विधान परिषद के सदस्यों का चुनाव सीधे मतदाताओं द्वारा किया जाता है।
3. विधान परिषद के एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक दो वर्ष में सेवानिवृत्त होते हैं।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल एक — कथन 1 सही है। संविधान के अनुच्छेद 171(1) के अनुसार, किसी राज्य की विधान परिषद में सदस्यों की कुल संख्या उस राज्य की विधानसभा के सदस्यों की कुल संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं होगी और किसी भी स्थिति में 40 से कम नहीं होगी। कथन 2 गलत है। विधान परिषद के सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से होता है, जिसमें स्थानीय निकायों, शिक्षकों, स्नातकों और विधानसभा सदस्यों द्वारा चुने गए सदस्य शामिल होते हैं। राज्यपाल कुछ सदस्यों को मनोनीत भी करते हैं। कथन 3 गलत है। विधान परिषद एक स्थायी सदन है, लेकिन इसके एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक दो वर्ष में सेवानिवृत्त होते हैं, जैसे राज्यसभा में होता है।
Q2. विधान परिषद के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा युग्म सही सुमेलित नहीं है?
- अनुच्छेद 169: विधान परिषदों का उत्सादन या सृजन
- अनुच्छेद 171: विधान परिषदों की संरचना
- अनुच्छेद 172: विधान परिषदों के सदस्यों की योग्यता
- अनुच्छेद 173: राज्य विधानमंडलों की अवधि
उत्तर: अनुच्छेद 172: विधान परिषदों के सदस्यों की योग्यता — अनुच्छेद 173 राज्य विधानमंडल के सदस्यों की योग्यता से संबंधित है, न कि विधान परिषदों की अवधि से। विधान परिषदों की अवधि का उल्लेख अनुच्छेद 172 में किया गया है, जो राज्य विधानमंडलों की अवधि से संबंधित है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ राज्य विधान परिषदों के गठन और कार्यप्रणाली का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। क्या ये राज्य प्रशासन में प्रभावी भूमिका निभाती हैं, या केवल अनावश्यक व्यय का बोझ हैं? (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** विधान परिषद (Legislative Council) की संवैधानिक स्थिति (अनुच्छेद 169, 171) और भारत में द्विसदनीय राज्य विधानमंडल की अवधारणा का संक्षिप्त परिचय।
2. **गठन:**
* संसद द्वारा विधान परिषद के सृजन या उत्सादन की प्रक्रिया।
* सदस्यों की संरचना (अनुच्छेद 171): स्थानीय निकायों, स्नातकों, शिक्षकों, विधानसभा सदस्यों द्वारा निर्वाचित और राज्यपाल द्वारा मनोनीत सदस्यों का अनुपात।
* अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली की प्रकृति।
3. **कार्यप्रणाली और भूमिका:**
* विधानसभा के साथ विधायी शक्तियों की तुलना (धन विधेयक पर सीमित शक्तियाँ)।
* पुनर्विचार और विशेषज्ञता प्रदान करने में भूमिका।
* विभिन्न वर्गों (शिक्षक, स्नातक) के प्रतिनिधित्व का महत्व।
* स्थायी सदन के रूप में निरंतरता।
4. **आलोचनात्मक विश्लेषण (चुनौतियाँ और आलोचनाएँ):**
* **अनावश्यक व्यय:** क्या यह राज्य के खजाने पर अनावश्यक बोझ है?
* **विधायी विलंब:** क्या यह कानून बनाने की प्रक्रिया में देरी करता है?
* **राजनीतिक पुनर्वास:** क्या यह हारे हुए नेताओं या राजनीतिक नियुक्तियों के लिए एक ‘बैकडोर’ प्रवेश मार्ग बन गया है?
* **सीमित शक्तियाँ:** विधानसभा की तुलना में इसकी शक्तियाँ कम क्यों हैं, विशेषकर धन विधेयकों के संबंध में?
* **प्रतिनिधित्व की प्रभावशीलता:** क्या स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र वास्तव में अपने संबंधित वर्गों का प्रभावी ढंग से प्रतिनिधित्व करते हैं?
5. **निष्कर्ष:** विधान परिषदों की प्रासंगिकता और प्रभावशीलता पर संतुलित दृष्टिकोण, सुधारों की आवश्यकता या उनके उन्मूलन पर बहस का उल्लेख।
स्रोत: amarujala.com
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