केरल में मानव-वन्यजीव संघर्ष मुआवज़े के लिए दिशा-निर्देश तैयार करेगा विशेषज्ञ पैनल

Expert panel to frame guidelines for compensation in human-wildlife conflict cases in Keralam — diagram

केरल में मानव-वन्यजीव संघर्ष मुआवज़े के लिए दिशा-निर्देश तैयार करेगा विशेषज्ञ पैनल

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Human-Wildlife Conflict Compensation Process

✎ केरल में मानव-वन्यजीव संघर्ष में क्षतिपूर्ति के लिए विशेषज्ञ पैनल का गठन एक समान और त्वरित सहायता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव-विविधता  |  GS Paper II — शासन, सामाजिक न्याय और कल्याणकारी योजनाएँ
  • Prelims: मानव-वन्यजीव संघर्ष, क्षतिपूर्ति दिशानिर्देश, केरल राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972, पर्यावरण संरक्षण
  • Essay: मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व: चुनौतियाँ और समाधान, सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन

त्वरित पुनरावृत्ति: केरल में मानव-वन्यजीव संघर्ष में क्षतिपूर्ति के लिए विशेषज्ञ पैनल का गठन एक समान और त्वरित सहायता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

केरल सरकार ने मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) की घटनाओं में मारे गए या घायल हुए लोगों को क्षतिपूर्ति (Compensation) निर्धारित करने और प्रदान करने के लिए दिशानिर्देश तैयार करने हेतु एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। इस कदम का उद्देश्य क्षतिपूर्ति के मूल्यांकन के लिए स्पष्ट मानदंड स्थापित करने और प्रशासनिक देरी को कम करने के लिए एक समान दिशानिर्देश तैयार करना है, जिससे समय पर सहायता सुनिश्चित हो सके।

पृष्ठभूमि

  • मानव-वन्यजीव संघर्ष तब होता है जब मानव और वन्यजीव एक ही क्षेत्र में रहते हैं और संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, जिससे मनुष्यों, वन्यजीवों या दोनों को नुकसान होता है।
  • भारत में, विशेष रूप से वन क्षेत्रों के निकट रहने वाले समुदायों के लिए, यह एक बढ़ती हुई समस्या है, जिसके परिणामस्वरूप फसलों को नुकसान, पशुधन की हानि, चोटें और कभी-कभी मौतें भी होती हैं।
  • वर्तमान में, क्षतिपूर्ति प्रक्रिया अक्सर जटिल, असंगत और विलंबित होती है, जिसमें प्रत्येक मामले के लिए अलग-अलग प्रशासनिक विचार-विमर्श की आवश्यकता होती है।
  • विभागों के क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) और घटना की प्रकृति से संबंधित तकनीकी और कानूनी प्रश्न अक्सर क्षतिपूर्ति के निर्धारण और भुगतान में देरी का कारण बनते हैं।
  • मानकीकृत तंत्र की अनुपस्थिति से प्रभावित क्षेत्रों में विरोध प्रदर्शन और असहमति हुई है, जिससे सामाजिक अशांति बढ़ी है।
  • केरल में गठित विशेषज्ञ समिति का नेतृत्व मुख्य वन्यजीव वार्डन करेंगे और इसमें केरल राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (Kerala State Disaster Management Authority) के सदस्य सचिव, भूमि राजस्व आयुक्त, पशुपालन निदेशक और कृषि निदेशक शामिल होंगे।

मानव-वन्यजीव संघर्ष और क्षतिपूर्ति

  • मानव-वन्यजीव संघर्ष से तात्पर्य वन्यजीवों और मनुष्यों के बीच किसी भी नकारात्मक संपर्क से है, जिसमें फसल क्षति, पशुधन का शिकार, मानव चोटें या मौतें और वन्यजीवों को नुकसान शामिल है।
  • भारत में इस संघर्ष के प्रमुख कारणों में वनों की कटाई, आवास का विखंडन (Habitat Fragmentation), कृषि विस्तार, शहरीकरण और वन्यजीव गलियारों का अतिक्रमण शामिल हैं।
  • संघर्ष के परिणामस्वरूप न केवल मानव जीवन और संपत्ति का नुकसान होता है, बल्कि वन्यजीवों के संरक्षण प्रयासों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिससे प्रतिशोध में हत्याएँ होती हैं।
  • भारत सरकार और विभिन्न राज्य सरकारें मानव-वन्यजीव संघर्ष से निपटने के लिए कई योजनाएँ और नीतियाँ लागू करती हैं, जिनमें वन्यजीवों के आवासों का संरक्षण, जागरूकता कार्यक्रम और क्षतिपूर्ति योजनाएँ शामिल हैं।
  • वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (Wildlife Protection Act, 1972) वन्यजीवों के संरक्षण के लिए कानूनी ढाँचा प्रदान करता है और इसमें संघर्ष से संबंधित प्रावधान भी शामिल हैं।
  • क्षतिपूर्ति योजनाएँ प्रभावित व्यक्तियों को वित्तीय सहायता प्रदान करने का प्रयास करती हैं, लेकिन अक्सर इन योजनाओं में मूल्यांकन मानदंडों की कमी, प्रक्रियात्मक जटिलताएँ और भुगतान में देरी जैसी समस्याएँ होती हैं।
  • एक समान दिशानिर्देशों का उद्देश्य क्षतिपूर्ति प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करना, पारदर्शिता बढ़ाना और पीड़ितों को समय पर और न्यायसंगत सहायता सुनिश्चित करना है।
  • यह पहल न केवल प्रभावित समुदायों के लिए सामाजिक न्याय सुनिश्चित करेगी, बल्कि वन्यजीव संरक्षण के प्रति जनभागीदारी को भी बढ़ावा देगी।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
मानव-वन्यजीव संघर्ष में मुआवज़े के लिए विशेषज्ञ समिति केरल सरकार द्वारा गठित; मुख्य वन्यजीव वार्डन की अध्यक्षता में, इसका उद्देश्य संघर्षों में मारे गए या घायल हुए लोगों के लिए मुआवज़े के निर्धारण और वितरण हेतु दिशानिर्देश तैयार करना है।
समान दिशानिर्देशों का निर्माण यह मुआवज़े का आकलन करने के लिए स्पष्ट मानदंड स्थापित करने में मदद करेगा, जिससे प्रशासनिक विचार-विमर्श की आवश्यकता कम होगी और भुगतान में देरी को रोका जा सकेगा।
समय पर सहायता मानकीकृत तंत्र के अभाव में पीड़ितों के परिवारों को अक्सर समय पर सहायता प्राप्त करने में कठिनाई होती है; यह समिति इस समस्या का समाधान करेगी।
विभिन्न विभागों के बीच समन्वय वन और राजस्व विभागों के बीच भूमि के क्षेत्राधिकार को लेकर विवादों के कारण मुआवज़े के आकलन में देरी होती है; समिति के दिशानिर्देश इन मुद्दों को सुलझाने में मदद करेंगे।
कैबिनेट निर्णयों पर निर्भरता में कमी वर्तमान में, व्यक्तिगत मामलों में मुआवज़े के लिए अक्सर विशिष्ट कैबिनेट निर्णयों की आवश्यकता होती है; एक समान तंत्र इस लंबी प्रक्रिया को समाप्त कर देगा।

महत्व

शासन और नीति निर्माण

  • यह कदम एक सुसंगत और पारदर्शी नीतिगत ढाँचा स्थापित करेगा, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष के मामलों में मुआवज़े के वितरण में दक्षता और निष्पक्षता आएगी।
  • यह अंतर-विभागीय समन्वय को बढ़ाएगा, विशेष रूप से वन और राजस्व विभागों के बीच, जिससे निर्णय लेने की प्रक्रिया में तेज़ी आएगी और नौकरशाही बाधाएँ कम होंगी।

सामाजिक न्याय और कल्याण

  • यह पीड़ितों और उनके परिवारों को समय पर और पर्याप्त मुआवज़ा सुनिश्चित करके सामाजिक न्याय प्रदान करेगा, जो अक्सर ऐसी घटनाओं के कारण गंभीर आर्थिक और भावनात्मक कठिनाइयों का सामना करते हैं।
  • मानकीकृत प्रक्रिया विरोधों और स्थानीय असहमति को कम करने में मदद करेगी, जिससे प्रभावित समुदायों में विश्वास और शांति को बढ़ावा मिलेगा।

पर्यावरण संरक्षण और वन्यजीव प्रबंधन

  • संघर्षों के प्रभावी प्रबंधन से स्थानीय समुदायों और वन्यजीवों के बीच सह-अस्तित्व को बढ़ावा मिलेगा, जिससे वन्यजीव संरक्षण प्रयासों के लिए सामुदायिक समर्थन बढ़ सकता है।
  • यह वन्यजीव प्रबंधन रणनीतियों में सुधार के लिए आधार प्रदान कर सकता है, क्योंकि संघर्ष के पैटर्न और कारणों की बेहतर समझ विकसित होगी।

चुनौतियाँ

1. मुआवज़े का सटीक आकलन

  • घटना की प्रकृति, चोट की सीमा और संपत्ति के नुकसान का सटीक आकलन करना जटिल हो सकता है, जिसके लिए स्पष्ट और वस्तुनिष्ठ मानदंडों की आवश्यकता होती है।
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष में होने वाले भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक आघात का मौद्रिक मूल्यांकन करना चुनौतीपूर्ण है।

2. विभागीय क्षेत्राधिकार विवाद

  • वन भूमि और राजस्व भूमि पर हुई घटनाओं के बीच अंतर करने में अक्सर विवाद उत्पन्न होते हैं, जिससे मुआवज़े के निर्धारण में देरी होती है।
  • विभिन्न विभागों के बीच समन्वय की कमी प्रक्रिया को और जटिल बना सकती है।

3. निधियों की उपलब्धता और वितरण

  • मुआवज़े के लिए पर्याप्त निधियों की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करना एक चुनौती हो सकती है, खासकर उच्च संघर्ष वाले क्षेत्रों में।
  • वितरण प्रणाली को भ्रष्टाचार-मुक्त और कुशल बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है।

4. सामुदायिक भागीदारी और जागरूकता

  • दिशानिर्देशों को प्रभावी बनाने के लिए प्रभावित समुदायों के बीच जागरूकता और भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक है।
  • स्थानीय लोगों की अपेक्षाओं और सरकारी नीतियों के बीच संतुलन बनाना महत्वपूर्ण है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
मुआवज़े के आकलन में देरी मानकीकृत तंत्र की कमी और प्रशासनिक विचार-विमर्श के कारण पीड़ितों को समय पर सहायता नहीं मिल पाती।
विभागीय क्षेत्राधिकार विवाद वन और राजस्व विभागों के बीच भूमि के प्रकार को लेकर विवाद से आकलन प्रक्रिया जटिल हो जाती है।
कैबिनेट निर्णयों पर निर्भरता व्यक्तिगत मामलों में मुआवज़े के लिए विशिष्ट कैबिनेट निर्णयों की आवश्यकता से प्रक्रिया लंबी हो जाती है।
अस्पष्ट मानदंड घटना की प्रकृति, चोट की सीमा और मुआवज़े के निर्धारण के लिए स्पष्ट मानदंडों का अभाव।
स्थानीय असहमति और विरोध मानकीकृत तंत्र की कमी के कारण प्रभावित इलाकों में अक्सर विरोध और असहमति होती है।

आगे की राह

  • मुआवज़े के आकलन के लिए स्पष्ट, वस्तुनिष्ठ और समय-सीमा-आधारित मानदंड विकसित किए जाएँ, जिसमें चोट की गंभीरता, संपत्ति का नुकसान और आय के नुकसान जैसे कारकों को शामिल किया जाए।
  • वन, राजस्व, पशुपालन और कृषि जैसे संबंधित विभागों के बीच एक प्रभावी समन्वय तंत्र स्थापित किया जाए, ताकि क्षेत्राधिकार संबंधी विवादों को हल किया जा सके।
  • मुआवज़े के लिए एक समर्पित कोष (फंड) बनाया जाए और उसके कुशल प्रबंधन तथा समय पर वितरण के लिए एक पारदर्शी प्रणाली विकसित की जाए।
  • स्थानीय समुदायों को मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने और मुआवज़े की प्रक्रिया के बारे में शिक्षित करने के लिए जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएँ।
  • तकनीकी समाधानों, जैसे कि जीपीएस मैपिंग और ड्रोन सर्वेक्षण का उपयोग, घटना स्थलों के सटीक निर्धारण और क्षति के आकलन के लिए किया जा सकता है।
  • मुआवज़े की प्रक्रिया को सरल बनाने और कैबिनेट निर्णयों पर निर्भरता कम करने के लिए एक विधायी या नीतिगत ढाँचा तैयार किया जाए।
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष के हॉटस्पॉट की पहचान की जाए और उन क्षेत्रों में निवारक उपायों (जैसे बाड़ लगाना, चेतावनी प्रणाली) को लागू किया जाए।
  • मुआवज़े के दावों के त्वरित निपटान के लिए एक शिकायत निवारण तंत्र और समय-सीमा निर्धारित की जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

मानव-वन्यजीव संघर्ष · मुआवजा नीति · आपदा प्रबंधन · वन्यजीव संरक्षण · राजस्व भूमि · वन भूमि · अंतर-विभागीय समन्वय · नीति निर्माण · क्षतिपूर्ति तंत्र · सतत विकास · पर्यावरण शासन · सामुदायिक भागीदारी

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 48A’, ‘note’: ‘पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 243G’, ‘note’: ‘पंचायतों की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तरदायित्व’}

अवधारणा प्रवाह

केरल में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएँ  →  मुआवज़े के आकलन और वितरण में देरी व जटिलताएँ  →  विशेषज्ञ समिति का गठन (मुख्य वन्यजीव वार्डन की अध्यक्षता में)  →  मुआवज़े के लिए समान दिशानिर्देशों का निर्माण  →  समय पर और निष्पक्ष मुआवज़े का वितरण  →  संघर्ष प्रभावित समुदायों के लिए बेहतर सहायता और कल्याण

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. मानव-वन्यजीव संघर्ष के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारत में मानव-वन्यजीव संघर्ष से होने वाली मौतों या चोटों के लिए मुआवजे का प्रावधान वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत किया गया है।
2. केरल सरकार द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति का उद्देश्य मुआवजे के आकलन और वितरण के लिए एक समान दिशानिर्देश तैयार करना है।
3. ऐसे संघर्षों के मामलों में अक्सर वन विभाग और राजस्व विभाग के बीच भूमि के क्षेत्राधिकार को लेकर विवाद उत्पन्न होते हैं।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 गलत है। वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 मुख्य रूप से वन्यजीवों के संरक्षण से संबंधित है, न कि सीधे मानव-वन्यजीव संघर्ष में मुआवजे के प्रावधान से। मुआवजे के प्रावधान राज्य सरकारों की नीतियों और योजनाओं के माध्यम से किए जाते हैं। कथन 2 सही है। केरल सरकार ने मुआवजे के आकलन और वितरण के लिए एक समान दिशानिर्देश तैयार करने हेतु एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। कथन 3 सही है। समाचार के अनुसार, वन और राजस्व विभागों के बीच भूमि के क्षेत्राधिकार को लेकर विवाद अक्सर मुआवजे की प्रक्रिया को जटिल बनाते हैं।

Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा/से कारक मानव-वन्यजीव संघर्ष को बढ़ा सकता/सकते है/हैं?
1. वनों की कटाई और आवास का विखंडन
2. वन्यजीव गलियारों का अतिक्रमण
3. कृषि पद्धतियों में बदलाव
4. संरक्षित क्षेत्रों के पास मानव बस्तियों का विस्तार
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 2, 3 और 4
  3. केवल 1, 3 और 4
  4. 1, 2, 3 और 4

उत्तर: 1, 2, 3 और 4 — वनों की कटाई और आवास का विखंडन वन्यजीवों को भोजन और आश्रय के लिए मानव बस्तियों की ओर धकेलता है। वन्यजीव गलियारों का अतिक्रमण वन्यजीवों के प्राकृतिक आवागमन को बाधित करता है, जिससे वे मानव क्षेत्रों में प्रवेश करते हैं। कृषि पद्धतियों में बदलाव (जैसे नई फसलें जो वन्यजीवों को आकर्षित करती हैं) भी संघर्ष बढ़ा सकता है। संरक्षित क्षेत्रों के पास मानव बस्तियों का विस्तार सीधे तौर पर मानव और वन्यजीवों के बीच संपर्क को बढ़ाता है। इसलिए, सभी चार कारक मानव-वन्यजीव संघर्ष को बढ़ा सकते हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ मानव-वन्यजीव संघर्ष भारत में एक गंभीर चुनौती है, जिसके लिए एक व्यापक और संवेदनशील दृष्टिकोण की आवश्यकता है। केरल सरकार द्वारा मुआवजे के लिए दिशानिर्देश तैयार करने हेतु विशेषज्ञ समिति के गठन के आलोक में, भारत में मानव-वन्यजीव संघर्ष के कारणों, प्रभावों और इसके समाधान के लिए आवश्यक नीतिगत उपायों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर की शुरुआत मानव-वन्यजीव संघर्ष की संक्षिप्त परिभाषा और भारत में इसकी बढ़ती गंभीरता से करें। केरल सरकार की पहल का उल्लेख करें।

**कारण:**
* **आवास का नुकसान और विखंडन:** वनों की कटाई, शहरीकरण, बुनियादी ढांचा परियोजनाएं (सड़कें, रेलवे)।
* **वन्यजीव गलियारों का अतिक्रमण:** मानव बस्तियों और कृषि का विस्तार।
* **संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा:** पानी, भोजन और चरागाहों के लिए मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा।
* **कृषि पद्धतियां:** वन्यजीवों को आकर्षित करने वाली फसलें, बाड़बंदी की कमी।
* **जलवायु परिवर्तन:** वन्यजीवों के व्यवहार और प्रवास पैटर्न में बदलाव।
* **वन्यजीवों की बढ़ती आबादी:** कुछ प्रजातियों (जैसे हाथी, तेंदुआ) की आबादी में वृद्धि।

**प्रभाव:**
* **मानव जीवन और संपत्ति का नुकसान:** मृत्यु, चोटें, फसल और पशुधन का नुकसान।
* **वन्यजीवों पर प्रभाव:** प्रतिशोध में हत्याएं, तनाव, आवास से विस्थापन।
* **सामाजिक-आर्थिक प्रभाव:** आजीविका का नुकसान, भय, ग्रामीण समुदायों में असंतोष।
* **संरक्षण प्रयासों पर प्रभाव:** स्थानीय समुदायों का वन्यजीव संरक्षण के प्रति नकारात्मक रवैया।

**समाधान के लिए नीतिगत उपाय:**
* **मुआवजा तंत्र में सुधार:** केरल की पहल के समान, त्वरित, पारदर्शी और पर्याप्त मुआवजे के लिए मानकीकृत दिशानिर्देश।
* **वैज्ञानिक प्रबंधन:** वन्यजीव आबादी का आकलन, आवास सुधार, गलियारों का संरक्षण।
* **सामुदायिक भागीदारी:** स्थानीय समुदायों को संरक्षण प्रयासों में शामिल करना, जागरूकता कार्यक्रम, वैकल्पिक आजीविका।
* **तकनीकी हस्तक्षेप:** प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, सौर बाड़, बायो-फेंसिंग।
* **अंतर-विभागीय समन्वय:** वन, राजस्व, कृषि और आपदा प्रबंधन विभागों के बीच बेहतर समन्वय (केरल समिति का उदाहरण)।
* **भूमि उपयोग नियोजन:** संरक्षित क्षेत्रों के आसपास बफर जोन का विकास, मानव बस्तियों और कृषि का व्यवस्थित विस्तार।
* **कानूनी और नीतिगत ढांचा:** वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 और अन्य संबंधित कानूनों का प्रभावी कार्यान्वयन और आवश्यकतानुसार संशोधन।

**निष्कर्ष:** मानव-वन्यजीव संघर्ष एक बहुआयामी समस्या है जिसके लिए एक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता है। केरल सरकार की तरह, अन्य राज्यों को भी मानकीकृत मुआवजा नीतियों और अंतर-विभागीय समन्वय पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, साथ ही दीर्घकालिक समाधानों के लिए सामुदायिक भागीदारी और वैज्ञानिक प्रबंधन को प्राथमिकता देनी चाहिए।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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