07 Nov ब्रिक्स सतत जीवन शैली सप्ताह: पर्यावरण संरक्षण और मिशन LiFE
✎ मिशन लाइफ का सार है: सचेत उपभोग द्वारा व्यक्तिगत आचरण को पर्यावरण-संरक्षण का सामूहिक आंदोलन बनाना, जिसका संवैधानिक आधार अनुच्छेद 48A और अनुच्छेद 51A(छ) में निहित है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी (संरक्षण, अपशिष्ट प्रबंधन, जलवायु परिवर्तन शमन) | GS Paper II — शासन (सरकारी योजनाएँ, नागरिक-केंद्रित नीतियाँ, संवैधानिक दायित्व) | GS Paper II — अंतरराष्ट्रीय संबंध (BRICS और बहुपक्षीय मंच)
- Prelims: मिशन लाइफ (Mission LiFE) और इसका उद्देश्य, प्रो-प्लैनेट पीपल (Pro-Planet People / P3), अनुच्छेद 48A और अनुच्छेद 51A(छ) (वर्तमान में मूल कर्तव्य का खंड), ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016, प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 और एकल-उपयोग प्लास्टिक पर प्रतिबंध, विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (Extended Producer Responsibility / EPR), BRICS (ब्रिक्स) का सदस्य-राष्ट्र समूह और इसकी अध्यक्षता का रोटेशन, COP26 (ग्लासगो) और पंचामृत की प्रतिबद्धताएँ
- Essay: जीवनशैली में परिवर्तन: सतत विकास की कुंजी, पर्यावरण संरक्षण एक जन-आंदोलन के रूप में: व्यक्ति, उद्योग और समाज की भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: मिशन लाइफ का सार है: सचेत उपभोग द्वारा व्यक्तिगत आचरण को पर्यावरण-संरक्षण का सामूहिक आंदोलन बनाना, जिसका संवैधानिक आधार अनुच्छेद 48A और अनुच्छेद 51A(छ) में निहित है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
कुरनूल (आंध्र प्रदेश) में आयोजित एक सप्ताह-व्यापी BRICS सतत जीवनशैली सप्ताह का समापन 7 नवंबर 2026 को ‘अपशिष्ट में कमी’ (Reduce Waste) विषय पर हुआ। इस आयोजन का केंद्र मिशन लाइफ (Mission LiFE) था, जिसे आंध्र प्रदेश औद्योगिक अवसंरचना निगम (APIIC) के सत्या साई जिला क्षेत्र द्वारा हिंदूपुर औद्योगिक एस्टेट में भी आयोजित किया गया। कुरनूल में नर्सिंग छात्रों की जागरूकता रैली, चित्रकला प्रतियोगिता और अस्पताल कर्मचारियों तथा आम जनता के लिए जागरूकता कार्यक्रम हुए, जबकि हिंदूपुर में जल-संरक्षण, ऊर्जा-संरक्षण और अपशिष्ट प्रबंधन पर केंद्रित कार्यक्रम आयोजित किए गए। यह समाचार इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह दर्शाता है कि किस प्रकार एक राष्ट्रीय नीतिगत पहल का स्थानीय स्तर पर क्रियान्वयन, संस्थागत सहभागिता और सामुदायिक जागरूकता के माध्यम से होता है।
पृष्ठभूमि
- मिशन लाइफ की घोषणा प्रधानमंत्री द्वारा वर्ष 2021 में ग्लासगो में आयोजित COP26 सम्मेलन में की गई थी। इसका मूल विचार ‘सचेत उपभोग’ (mindful and deliberate utilisation) को बढ़ावा देना है, न कि ‘अंधाधुंध और अपव्ययी उपभोग’ को।
- इस मिशन का नोडल मंत्रालय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय है। इसकी अवधारणा में व्यक्ति को ‘प्रो-प्लैनेट पीपल’ के रूप में देखा गया है, यानी ऐसे लोग जो अपने दैनिक व्यवहार से पृथ्वी के संरक्षण में योगदान दें।
- भारत की ओर से COP26 में प्रस्तुत पंचामृत (Panchamrit) की प्रतिबद्धताओं में जीवनशैली में परिवर्तन को जलवायु कार्रवाई का एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ माना गया, जो मिशन लाइफ के दर्शन से सीधे जुड़ा है।
- भारत की सरकार ने एकल-उपयोग प्लास्टिक से निपटने के लिए प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 के अंतर्गत समय-समय पर संशोधन किए हैं, और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 स्रोत-पृथक्करण तथा विकेंद्रीकृत प्रबंधन पर बल देते हैं।
- BRICS एक बहुपक्षीय मंच है, जिसमें भारत की सदस्यता के अंतर्गत पर्यावरण और सतत विकास से जुड़े विषय विभिन्न स्तरों पर उठाए जाते हैं। इस सप्ताह का आयोजन BRICS के सांस्कृतिक एवं जन-सहभागिता पहलू को स्थानीय स्तर पर सक्रिय करने का उदाहरण है।
मिशन लाइफ (Mission LiFE) क्या है?
- मिशन लाइफ (Lifestyle for Environment) एक वैश्विक जन-आंदोलन है, जिसका उद्देश्य व्यक्तियों और समुदायों को पर्यावरण-हितैषी आदतें अपनाने के लिए प्रेरित करना है।
- इसका मूल सिद्धांत है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए केवल सरकारी नीतियाँ पर्याप्त नहीं हैं; उपभोग के व्यवहार में परिवर्तन भी आवश्यक है।
- प्रो-प्लैनेट पीपल (P3) की अवधारणा के अनुसार नागरिक, उद्योग और संस्थाएँ सामूहिक रूप से पर्यावरण-संरक्षण में सहभागी बनती हैं।
- इसके प्रमुख व्यावहारिक आयाम हैं: जल-संरक्षण और वर्षा जल संचयन, ऊर्जा-संरक्षण और नवीकरणीय ऊर्जा का प्रयोग, ‘कम करो, पुन: उपयोग करो, पुनर्चक्रण करो’ (Reduce, Reuse, Recycle) का सिद्धांत, एकल-उपयोग प्लास्टिक से परहेज़, वृक्षारोपण तथा जैव-विविधता संरक्षण।
- संवैधानिक आधार के रूप में अनुच्छेद 48A राज्य को पर्यावरण की रक्षा और सुधार का निर्देश देता है, जबकि अनुच्छेद 51A(छ) नागरिकों के मूल कर्तव्य के रूप में प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार की अपेक्षा करता है।
- अनुच्छेद 21 के अंतर्गत स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार को न्यायिक व्याख्या द्वारा जीवन के अधिकार का अंग माना गया है, जो इस प्रकार की जन-जागरूकता पहलों को संवैधानिक औचित्य प्रदान करता है।
- मिशन लाइफ किसी कानूनी दायित्व के रूप में लागू नहीं होता; यह स्वैच्छिक आचरण और जन-सहभागिता पर आधारित नीतिगत दृष्टिकोण है, जबकि प्लास्टिक और अपशिष्ट से संबंधित नियम बाध्यकारी हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| आयोजन का स्वरूप | BRICS सतत जीवनशैली सप्ताह 2026 एक सप्ताह तक चला, जिसका समापन 7 नवंबर 2026 को कुरनूल और हिंदूपुर में हुआ। यह आयोजन BRICS ढाँचे के अंतर्गत पर्यावरण-सचेत जीवनशैली को बढ़ावा देने का प्रयास है। |
| केंद्रीय विषय | समापन दिवस का विषय ‘अपशिष्ट में कमी’ (Reduce Waste) था। इससे स्पष्ट होता है कि आयोजन का ध्यान स्रोत पर अपशिष्ट कम करने पर था, केवल सफ़ाई पर नहीं। |
| मूल प्रेरणा | आयोजन का आधार मिशन लाइफ (Mission LiFE – Lifestyle for Environment) है, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यक्तियों और समुदायों द्वारा पर्यावरण-हितैषी आदतें अपनाने के लिए एक वैश्विक जन-आंदोलन के रूप में प्रस्तावित किया। |
| आयोजक और भागीदार | आंध्र प्रदेश औद्योगिक अवसंरचना निगम (APIIC) के सत्य साई ज़िला क्षेत्र ने यह आयोजन किया। कुरनूल में सरकारी सामान्य अस्पताल परिसर में नर्सिंग छात्रों की जागरूकता रैली निकाली गई, जबकि हिंदूपुर में औद्योगिक एस्टेट में जल संरक्षण, ऊर्जा संरक्षण और अपशिष्ट प्रबंधन पर रैली हुई। |
| प्रमुख संदेश | वर्षा जल संचयन, जल-अपव्यय की रोकथाम, ऊर्जा संरक्षण, नवीकरणीय ऊर्जा, कमी-पुनरुपयोग-पुनर्चक्रण के सिद्धांत, एकल-उपयोग प्लास्टिक से बचाव, वृक्षारोपण और जैव विविधता संरक्षण पर बल दिया गया। |
महत्व
पर्यावरणीय महत्व
- व्यक्तिगत उपभोग-आदतों में बदलाव से अपशिष्ट, जल और ऊर्जा की माँग में कमी आती है, जो संसाधन-दक्षता का सीधा मार्ग है।
- ‘कमी, पुनरुपयोग, पुनर्चक्रण’ के सिद्धांत को स्रोत पर लागू करने से भूमि-भराव (landfill) और प्रदूषण का भार घटता है।
- वृक्षारोपण और जैव विविधता संरक्षण की चर्चा पारिस्थितिक तंत्र की सेवाओं को बनाए रखने से जुड़ी है।
सामाजिक और शैक्षणिक महत्व
- नर्सिंग छात्रों, कर्मचारियों और आम नागरिकों की भागीदारी से पर्यावरण-चेतना का दायरा अस्पताल और उद्योग से आगे बढ़ा।
- चित्रकला प्रतियोगिता जैसे कार्यक्रम बच्चों में प्रारंभिक स्तर पर पर्यावरण-नैतिकता विकसित करने का माध्यम बनते हैं।
- ‘व्यक्ति से सामूहिक भागीदारी’ की अवधारणा सामुदायिक नेतृत्व और स्थानीय संगठनों की भूमिका को रेखांकित करती है।
आर्थिक और औद्योगिक महत्व
- औद्योगिक एस्टेट में आयोजन से यह संकेत मिलता है कि उद्योगों से संसाधन-कुशल और अपशिष्ट-न्यून उत्पादन की अपेक्षा की जा रही है।
- ऊर्जा संरक्षण और नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बढ़ना उत्पादन-लागत में कमी और ऊर्जा-सुरक्षा दोनों में सहायक हो सकता है।
अंतरराष्ट्रीय और रणनीतिक महत्व
- BRICS मंच पर सतत जीवनशैली को साझा विषय बनाना सदस्य देशों के बीच पर्यावरणीय नीति-समन्वय का संकेत है।
- मिशन लाइफ को वैश्विक आंदोलन के रूप में प्रस्तुत करने से भारत की जलवायु-कूटनीति में ‘व्यक्ति-केंद्रित’ दृष्टिकोण को पहचान मिलती है।
चुनौतियाँ
1. व्यवहार परिवर्तन की सीमा
- जागरूकता-कार्यक्रम अक्सर एक दिन या सप्ताह तक सीमित रहते हैं, जबकि आदतें स्थायी रूप से बदलने के लिए निरंतर प्रयास चाहिए।
- आवश्यक वस्तुओं के लिए एकल-उपयोग प्लास्टिक पर निर्भरता और सस्ती सुविधाओं की प्राथमिकता बदलाव में बाधा बनती है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: पर्यावरण संरक्षण; सामाजिक मुद्दों से संबंधित जन-जागरूकता
2. ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की संरचनात्मक कमी
- पृथक्करण (segregation) और संग्रहण की व्यवस्था हर स्तर पर समान रूप से विकसित नहीं है, जिससे पुनर्चक्रण का दायरा सीमित रहता है।
- अस्पतालों के जैव-चिकित्सा अपशिष्ट और औद्योगिक अपशिष्ट के लिए अलग तकनीकी और निगरानी ढाँचे की आवश्यकता होती है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: पर्यावरण प्रदूषण और प्रबंधन; GS-2: स्थानीय शासन की भूमिका
3. जल-संकट और वर्षा जल संचयन का क्रियान्वयन
- रायलसीमा और आंध्र प्रदेश के कई भागों में भूजल पर दबाव है, इसलिए जल-संरक्षण संदेश का स्थानीय क्रियान्वयन आवश्यक है।
- वर्षा जल संचयन की संरचनाओं का रखरखाव और उनका उपयोग प्रायः कमज़ोर रहता है।
यूपीएससी लिंक: GS-1: भारत का भूगोल (जल-संसाधन); GS-3: जल-प्रबंधन
4. उद्योग और नागरिक समाज के बीच समन्वय
- उद्योगों से अपेक्षित स्वैच्छिक पर्यावरण-अनुपालन और वास्तविक उत्सर्जन-नियंत्रण में अंतर देखा जाता है।
- सरकारी, निजी और सामुदायिक संस्थाओं के बीच जवाबदेही-तंत्र स्पष्ट न होने से पहल बिखर जाती है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: शासन में सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं की भूमिका; GS-3: औद्योगिक विकास और पर्यावरण
5. प्रतीकात्मक आयोजन बनाम वास्तविक परिणाम
- चित्रकला प्रतियोगिता और रैलियाँ दृश्यता बढ़ाती हैं, परंतु उनके मापने योग्य परिणाम (जैसे अपशिष्ट में कमी की मात्रा) प्रायः दर्ज नहीं होते।
- वैश्विक आंदोलन के रूप में मिशन लाइफ की प्रगति का मूल्यांकन स्थानीय स्तर पर सूचक-आधारित ढंग से होना चाहिए।
यूपीएससी लिंक: GS-2: सार्वजनिक नीति का मूल्यांकन; GS-2: अंतरराष्ट्रीय संगठन और भारत की भूमिका
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| समस्या | चिंता |
|---|---|
| व्यवहार-परिवर्तन की निरंतरता | जागरूकता अभियान अल्पकालिक रहते हैं, जबकि स्थायी आदत-निर्माण दीर्घकालिक प्रयास माँगता है। |
| एकल-उपयोग प्लास्टिक | सुविधा और कम लागत के कारण इसका उपयोग घटाना कठिन है, जिससे अपशिष्ट-भार बढ़ता है। |
| अपशिष्ट पृथक्करण और पुनर्चक्रण | स्रोत पर पृथक्करण की कमी से पुनर्चक्रण की दक्षता और अपशिष्ट-प्रसंस्करण दोनों प्रभावित होते हैं। |
| जल-संकट | भूजल पर दबाव वाले क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन का रखरखाव और उपयोग कमज़ोर है। |
| उद्योग-अनुपालन | स्वैच्छिक प्रतिबद्धता और वास्तविक उत्सर्जन-नियंत्रण के बीच अंतर बना हुआ है। |
| मापन और निगरानी | आयोजनों के परिणामों के लिए स्पष्ट सूचक न होने से नीति-सुधार की दिशा तय करना कठिन है। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- मिशन लाइफ (Mission LiFE – Lifestyle for Environment)
- स्वच्छ भारत मिशन (Swachh Bharat Mission)
आगे की राह
- जागरूकता कार्यक्रमों को एकल आयोजन के बजाय विद्यालयों, अस्पतालों और औद्योगिक एस्टेट में नियमित अभियानों के रूप में विकसित किया जाए।
- स्रोत पर अपशिष्ट पृथक्करण को अनिवार्य व्यवहार बनाने के लिए स्थानीय निकायों और समुदायों के बीच स्पष्ट भूमिका-विभाजन किया जाए।
- एकल-उपयोग प्लास्टिक के विकल्प और पुनर्चक्रण-सुविधाओं की उपलब्धता बढ़ाने के लिए बाज़ार और उत्पादक-दायित्व के उपाय सुदृढ़ किए जाएँ।
- वर्षा जल संचयन संरचनाओं के रखरखाव और उपयोग की नियमित निगरानी के लिए ग्राम और नगर स्तर पर जवाबदेही-तंत्र बनाया जाए।
- उद्योगों के लिए संसाधन-दक्षता और ऊर्जा-संरक्षण के सूचक सार्वजनिक रूप से प्रकाशित किए जाएँ, ताकि स्वैच्छिक प्रतिबद्धता मापी जा सके।
- मिशन लाइफ की प्रगति के लिए व्यवहार-परिवर्तन से जुड़े मात्रात्मक सूचक तय किए जाएँ, जैसे अपशिष्ट में कमी और जल-बचत का स्थानीय आँकड़ा।
- पर्यावरण-शिक्षा को विद्यालय और व्यावसायिक प्रशिक्षण (जैसे नर्सिंग) के पाठ्यक्रम में व्यवहारिक रूप से शामिल किया जाए।
- बहुपक्षीय मंचों पर अनुभव साझा करके सतत जीवनशैली की सर्वोत्तम प्रथाओं का आदान-प्रदान बढ़ाया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
मिशन लाइफ (Mission LiFE) · पृथ्वी-हितैषी नागरिक (Pro-Planet People) · पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली · सतत उपभोग और संसाधन संरक्षण · अनुच्छेद 48A (राज्य का पर्यावरण संरक्षण का दायित्व) · मौलिक कर्तव्य (अनुच्छेद 51A(छ)) · अनुच्छेद 21 और स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार · पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 (Environment Protection Act, 1986) · एकल-उपयोग प्लास्टिक (Single-use Plastic) · वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) · अपशिष्ट प्रबंधन और ‘कम करो, पुनः उपयोग, पुनर्चक्रण’ सिद्धांत · जन-आंदोलन बनाम विनियामक उपाय
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 48A: पर्यावरण संरक्षण और वन्यजीव सुरक्षा का राज्य का दायित्व
- अनुच्छेद 51A(g): प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार का मौलिक कर्तव्य
- बारहवीं अनुसूची: नगरपालिकाओं के लिए ठोस अपशिष्ट प्रबंधन का कार्य
अवधारणा प्रवाह
वैश्विक स्तर पर पर्यावरण-संकट और संसाधनों पर बढ़ता दबाव → मिशन लाइफ द्वारा व्यक्ति-केंद्रित पर्यावरण-हितैषी जीवनशैली का आह्वान → BRICS सतत जीवनशैली सप्ताह में जागरूकता, रैलियों और प्रतियोगिताओं का आयोजन → ‘कमी, पुनरुपयोग, पुनर्चक्रण’ जैसे सिद्धांतों और जल-ऊर्जा संरक्षण के व्यवहार का प्रसार → व्यक्तिगत आदतों और उद्योग-अनुपालन में बदलाव से अपशिष्ट और संसाधन-उपभोग में कमी → सामूहिक भागीदारी से स्थायी पर्यावरण-सचेत समुदाय और हरित, स्वच्छ विकसित भारत का निर्माण
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मिशन लाइफ (Mission LiFE) की घोषणा भारत के प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP26) में की थी।
2. इस मिशन की अवधारणा में ‘पृथ्वी-हितैषी नागरिक (Pro-Planet People)’ को केंद्रीय स्थान दिया गया है, जो व्यक्ति के दैनिक व्यवहार में पर्यावरण-अनुकूल परिवर्तन पर बल देती है।
3. मिशन लाइफ पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत स्थापित एक वैधानिक निकाय है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: मिशन लाइफ की घोषणा प्रधानमंत्री द्वारा COP26 (ग्लासगो, 2021) में की गई थी और इसे वर्ष 2022 में औपचारिक रूप से आरम्भ किया गया। कथन 2 सही है: ‘पृथ्वी-हितैषी नागरिक’ (Pro-Planet People) इसकी मूल अवधारणा है, जो व्यवहार-परिवर्तन पर बल देती है। कथन 3 गलत है: मिशन लाइफ कोई वैधानिक निकाय नहीं, बल्कि एक वैश्विक जन-आंदोलन है, जिसका नोडल मंत्रालय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) है। अतः सही उत्तर ‘केवल दो’ है।
Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
कथन (A): भारतीय संविधान में पर्यावरण संरक्षण को राज्य और नागरिक, दोनों का दायित्व बनाया गया है।
कारण (R): संविधान के अनुच्छेद 48A में राज्य को पर्यावरण की रक्षा और उसके सुधार का निर्देश दिया गया है, जबकि अनुच्छेद 51A(छ) में प्रत्येक नागरिक पर प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और उसके संवर्धन का मौलिक कर्तव्य डाला गया है।
नीचे दिए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (A) सही है, परंतु (R) गलत है।
- (A) गलत है, परंतु (R) सही है।
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — अनुच्छेद 48A राज्य-नीति का निदेशक तत्व है, जिसे 42वें संशोधन (1976) द्वारा जोड़ा गया। अनुच्छेद 51A(छ), जो 42वें संशोधन से ही जुड़ा, नागरिकों का मौलिक कर्तव्य है। दोनों मिलकर पर्यावरण-संरक्षण को राज्य और नागरिक, दोनों का साझा दायित्व बनाते हैं, इसलिए (R) ही (A) की सही व्याख्या है।
Q3. निम्नलिखित सुमेलों पर विचार कीजिए और सही सुमेल चुनिए:
सूची-I (संवैधानिक प्रावधान)
A. अनुच्छेद 21
B. अनुच्छेद 48A
C. अनुच्छेद 51A(छ)
सूची-II (विषय)
1. राज्य का पर्यावरण और वनों की रक्षा का निदेशक सिद्धांत
2. नागरिकों का प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा का मौलिक कर्तव्य
3. प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार, जिसकी न्यायिक व्याख्या में स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार भी सम्मिलित है
सही सुमेल कूट चुनिए:
- A-1, B-2, C-3
- A-3, B-1, C-2
- A-2, B-3, C-1
- A-3, B-2, C-1
उत्तर: A-3, B-1, C-2 — अनुच्छेद 21 की न्यायिक व्याख्या (जैसे सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य, 1991) में स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार सम्मिलित किया गया है, इसलिए A-3। अनुच्छेद 48A राज्य का निदेशक तत्व है, इसलिए B-1। अनुच्छेद 51A(छ) नागरिकों का मौलिक कर्तव्य है, इसलिए C-2। अतः सही कूट ‘A-3, B-1, C-2’ है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ ‘मिशन लाइफ’ जैसे जीवनशैली-आधारित पर्यावरण अभियान नागरिकों के दैनिक व्यवहार को बदलने का दावा करते हैं, किंतु पर्यावरणीय क्षति का बड़ा भाग औद्योगिक उत्सर्जन और अपशिष्ट से आता है। इस परिप्रेक्ष्य में, क्या व्यवहार-परिवर्तन पर आधारित स्वैच्छिक दृष्टिकोण विनियामक उपायों का विकल्प हो सकता है? भारतीय संवैधानिक ढाँचे और हाल के विधिक-नीतिगत उपायों के संदर्भ में आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही यह भी बताइए कि यदि स्वैच्छिक प्रयास विनियामक ढाँचे के साथ समन्वित न हों, तो सतत विकास के लक्ष्य पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। (15 Marks)
रूपरेखा: MODEL-ANSWER SKELETON:
(1) भूमिका: मिशन लाइफ (Mission LiFE) की पृष्ठभूमि, COP26 (2021) में प्रधानमंत्री की घोषणा, पृथ्वी-हितैषी नागरिक (Pro-Planet People) की अवधारणा; ब्रिक्स सतत जीवनशैली सप्ताह (2026) में ‘कम करो, पुनः उपयोग, पुनर्चक्रण’ (Reduce, Reuse, Recycle), जल-संरक्षण, ऊर्जा-संरक्षण, एकल-उपयोग प्लास्टिक न्यूनीकरण तथा वृक्षारोपण जैसी प्राथमिकताओं का उल्लेख।
(2) संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 48A (राज्य का दायित्व, 42वाँ संशोधन, 1976); अनुच्छेद 51A(छ) (नागरिकों का मौलिक कर्तव्य); अनुच्छेद 21 की व्याख्या में स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार (सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य, 1991); एम.सी. मेहता वाद श्रृंखला द्वारा प्रदूषण-नियंत्रण में न्यायिक सक्रियता।
(3) विधिक-विनियामक ढाँचा: पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986; प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम (एकल-उपयोग प्लास्टिक पर प्रतिबंध); ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016; प्रदूषणकारी उद्योगों पर ‘प्रदूषक भुगतान सिद्धांत’ (Polluter Pays Principle) और सावधानी सिद्धांत (Precautionary Principle)।
(4) पक्ष में तर्क: व्यवहार-परिवर्तन की लागत-प्रभावशीलता; घरेलू उपभोग और अपशिष्ट में नागरिकों की सीधी भूमिका; जन-आंदोलन से नीति के प्रति सामाजिक स्वीकृति; ‘नज’ (Nudge) जैसे व्यवहारगत अर्थशास्त्र के उपकरणों की उपयोगिता।
(5) विपक्ष/सीमाएँ: उत्सर्जन का बड़ा भाग औद्योगिक और ऊर्जा क्षेत्र से; स्वैच्छिक उपाय बाध्यकारी दायित्व का स्थान नहीं ले सकते; ‘हरित धुलाई’ (Greenwashing) का जोखिम; असमान पहुँच और संसाधन-विहीन समुदायों पर बोझ।
(6) संतुलित दृष्टिकोण: विनियामक उपाय (मानक, दंड, लाइसेंसिंग) और जन-आंदोलन (मिशन लाइफ) परस्पर पूरक हैं; सतत विकास लक्ष्य (SDG) के संदर्भ में दोनों का समन्वय आवश्यक।
(7) निष्कर्ष/परिणाम-उप-प्रश्न: यदि स्वैच्छिक प्रयास विनियामक ढाँचे से असंबद्ध रहें, तो अपशिष्ट और उत्सर्जन में अपेक्षित कमी नहीं होगी, उद्योगों पर जवाबदेही कमजोर होगी और सतत विकास का लक्ष्य केवल प्रतीकात्मक रह जाएगा; अतः नीति-समन्वय और निगरानी-तंत्र पर बल दिया जाना चाहिए।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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