रिफाइनरी क्षेत्र के लिए ऊर्जा सुरक्षा और नेट-ज़ीरो लक्ष्य में संतुलन जरूरी: विशेषज्ञ

Refinery sector must balance energy security with net-zero push: industry experts at The Hindu Sustainability Summit — diagram

रिफाइनरी क्षेत्र के लिए ऊर्जा सुरक्षा और नेट-ज़ीरो लक्ष्य में संतुलन जरूरी: विशेषज्ञ

Refinery sector balanceEnergy demandRisingEconomic growthFossil fuelsCurrent majoritySupply risksRefinery sectorKey roleEnergy securityNet-zero targetClimate goalParis AgreementCarbon creditsPolicy toolTrading schemeGreen solutionsHydrogenEfficiency
Refinery sector balance

✎ भारत के शोधन क्षेत्र को बढ़ती ऊर्जा मांग और ऊर्जा सुरक्षा के साथ-साथ नेट-शून्य उत्सर्जन लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों और प्रौद्योगिकियों की ओर संक्रमण को संतुलित करना होगा।

💬 Doubt on this topic? Ask Aanya, your free AI study-buddy, for an instant explanation. Ask Aanya →

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — पर्यावरण और पारिस्थितिकी, अर्थव्यवस्था  |  GS Paper I — भूगोल (संसाधन)
  • Prelims: ऊर्जा सुरक्षा, नेट-शून्य उत्सर्जन, हरित हाइड्रोजन, कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना, शोधन क्षेत्र, नवीकरणीय ऊर्जा
  • Essay: भारत का ऊर्जा संक्रमण: चुनौतियाँ और अवसर, सतत विकास और आर्थिक संवृद्धि: एक सामंजस्यपूर्ण दृष्टिकोण

त्वरित पुनरावृत्ति: भारत के शोधन क्षेत्र को बढ़ती ऊर्जा मांग और ऊर्जा सुरक्षा के साथ-साथ नेट-शून्य उत्सर्जन लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों और प्रौद्योगिकियों की ओर संक्रमण को संतुलित करना होगा।

💬 Doubt on this topic? Ask Aanya, your free AI study-buddy, for an instant explanation. Ask Aanya →

यह खबर चर्चा में क्यों?

हाल ही में ‘द हिंदू सस्टेनेबिलिटी समिट 2026’ में उद्योग विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि भारत के शोधन (Refinery) और ऊर्जा क्षेत्र को बढ़ती ऊर्जा मांग और ऊर्जा सुरक्षा को नेट-शून्य उत्सर्जन (Net-zero emissions) की ओर संक्रमण के साथ संतुलित करना होगा। विशेषज्ञों ने जीवाश्म ईंधन से नेट-शून्य की ओर परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, कच्चे तेल की आपूर्ति पर भू-राजनीतिक व्यवधानों और कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना (Carbon Credit Trading Scheme) जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की।

पृष्ठभूमि

  • भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता और चौथा सबसे बड़ा शोधन केंद्र है।
  • देश की ऊर्जा मांग लगातार बढ़ रही है, जो आर्थिक संवृद्धि (Economic growth) और बढ़ती जनसंख्या से प्रेरित है।
  • जीवाश्म ईंधन (Fossil fuels) वर्तमान में भारत की ऊर्जा टोकरी का एक बड़ा हिस्सा हैं, और इनका तत्काल प्रतिस्थापन संभव नहीं है।
  • भू-राजनीतिक घटनाएँ कच्चे तेल की आपूर्ति और कीमतों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती हैं, जिससे ऊर्जा सुरक्षा एक प्रमुख चिंता का विषय बन जाती है।

नेट-शून्य उत्सर्जन और ऊर्जा सुरक्षा क्या है?

  • नेट-शून्य उत्सर्जन का अर्थ है वातावरण में उत्सर्जित ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा को अवशोषित या हटाए गए ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा के बराबर करना, जिससे शुद्ध उत्सर्जन शून्य हो जाए।
  • ऊर्जा सुरक्षा का तात्पर्य देश की ऊर्जा आवश्यकताओं को विश्वसनीय, सस्ती और पर्याप्त मात्रा में पूरा करने की क्षमता से है, बिना किसी बाहरी झटके या व्यवधान के।
  • शोधन क्षेत्र में नेट-शून्य प्राप्त करने के लिए समान मात्रा में तैयार उत्पादों के उत्पादन के लिए आवश्यक ऊर्जा को कम करना और धीरे-धीरे स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों और प्रौद्योगिकियों की ओर बढ़ना शामिल है।
  • स्कोप 1 उत्सर्जन (Scope 1 emissions) सीधे शोधन कार्यों से होने वाले उत्सर्जन को कवर करता है, जबकि स्कोप 2 उत्सर्जन खरीदी गई बिजली से जुड़े उत्सर्जन को कवर करता है। स्कोप 3 उत्सर्जन शोधन उत्पादों का उपभोग करने वाले अन्य क्षेत्रों (जैसे परिवहन) में होने वाले उत्सर्जन पर निर्भर करता है।
  • कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना एक बाजार-आधारित तंत्र है जो कंपनियों को अपने उत्सर्जन को कम करने के लिए प्रोत्साहन प्रदान करता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
ऊर्जा सुरक्षा देश की बढ़ती ऊर्जा मांगों को पूरा करने और आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक।
नेट-ज़ीरो उत्सर्जन लक्ष्य जलवायु परिवर्तन से निपटने और भारत की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए महत्वपूर्ण।
जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता अगले दो दशकों तक ऊर्जा मिश्रण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनी रहेगी, जिससे संक्रमण की जटिलता बढ़ जाती है।
हरित हाइड्रोजन दीर्घकालिक ऊर्जा संक्रमण के लिए एक प्रमुख स्वच्छ ऊर्जा स्रोत, लेकिन उच्च लागत और बुनियादी ढांचे की कमी चुनौतियाँ हैं।
कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना उद्योगों को उत्सर्जन कम करने के लिए प्रोत्साहन प्रदान करती है और कार्बन बाज़ार को बढ़ावा देती है।

महत्व

आर्थिक महत्व

  • शोधन क्षेत्र (Refinery sector) भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक संवृद्धि (Economic growth) के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह देश की बढ़ती ऊर्जा मांगों को पूरा करता है।
  • स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों में निवेश और ऊर्जा दक्षता उपायों से परिचालन लागत में कमी आ सकती है और भारतीय उद्योगों की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ सकती है।

पर्यावरण महत्व

  • नेट-ज़ीरो उत्सर्जन लक्ष्यों को प्राप्त करना भारत के लिए जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और पेरिस समझौते जैसी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए आवश्यक है।
  • शोधन प्रक्रियाओं में ऊर्जा खपत को कम करने और स्वच्छ ईंधन अपनाने से वायु प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी आएगी, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण को लाभ होगा।

रणनीतिक महत्व

  • ऊर्जा मिश्रण में विविधता लाना और हरित हाइड्रोजन जैसे वैकल्पिक ईंधनों को बढ़ावा देना भू-राजनीतिक व्यवधानों (Geopolitical disruptions) से उत्पन्न होने वाले कच्चे तेल की आपूर्ति के जोखिमों को कम करता है।
  • हरित हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था में संक्रमण से भारत को स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों में वैश्विक नेतृत्व प्राप्त करने और ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।

चुनौतियाँ

1. ऊर्जा सुरक्षा और नेट-ज़ीरो लक्ष्यों के बीच संतुलन

  • देश की बढ़ती ऊर्जा मांग को पूरा करते हुए उत्सर्जन को कम करना एक जटिल चुनौती है, क्योंकि जीवाश्म ईंधन अभी भी ऊर्जा मिश्रण का एक बड़ा हिस्सा हैं।
  • शोधन क्षेत्र को ऊर्जा दक्षता में सुधार, स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों में संक्रमण और कार्बन कैप्चर प्रौद्योगिकियों को अपनाना होगा, जबकि उत्पादन क्षमता बनाए रखनी होगी।

2. हरित हाइड्रोजन की उच्च लागत

  • हरित हाइड्रोजन के उत्पादन की वर्तमान लागत इसे व्यावसायिक रूप से अव्यवहार्य बनाती है, जिससे इसके बड़े पैमाने पर अपनाने में बाधा आती है।
  • इलेक्ट्रोलाइज़र (Electrolyser) निर्माण को बढ़ाना, नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable energy) की लागत कम करना और मांग पैदा करना इसकी लागत कम करने के लिए महत्वपूर्ण है।

3. जीवाश्म ईंधन पर निरंतर निर्भरता

  • उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि अगले दो दशकों तक जीवाश्म ईंधन ऊर्जा मिश्रण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बने रहेंगे, जिससे त्वरित संक्रमण मुश्किल होगा।
  • यह एक उच्च-कार्बन ऊर्जा प्रणाली से कम-कार्बन प्रणाली में क्रमिक बदलाव की आवश्यकता को दर्शाता है, न कि जीवाश्म ईंधन के तत्काल प्रतिस्थापन की।

4. स्कोप 3 उत्सर्जन को कम करना

  • शोधन क्षेत्र के लिए स्कोप 1 (प्रत्यक्ष उत्सर्जन) और स्कोप 2 (खरीदी गई बिजली से उत्सर्जन) को कम करना संभव है, लेकिन स्कोप 3 उत्सर्जन (उत्पाद उपयोग से) को कम करना अन्य क्षेत्रों पर निर्भर करता है।
  • परिवहन जैसे क्षेत्रों में व्यापक संक्रमण के बिना शोधन क्षेत्र के कुल उत्सर्जन को कम करना चुनौतीपूर्ण होगा।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
ऊर्जा मांग में वृद्धि बढ़ती आबादी और आर्थिक विकास के कारण ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है, जिसे पूरा करना आवश्यक है।
भू-राजनीतिक व्यवधान कच्चे तेल की आपूर्ति में व्यवधान ऊर्जा सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करते हैं और कीमतों में अस्थिरता लाते हैं।
तकनीकी बाधाएँ हरित हाइड्रोजन जैसी नई प्रौद्योगिकियों के लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन और बुनियादी ढांचे के विकास में तकनीकी चुनौतियाँ हैं।
वित्तीय निवेश स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के लिए भारी निवेश की आवश्यकता है, जिसमें अनुसंधान और विकास, बुनियादी ढाँचा और नई प्रौद्योगिकियाँ शामिल हैं।
नीतिगत स्थिरता दीर्घकालिक ऊर्जा संक्रमण के लिए स्पष्ट और स्थिर नीतिगत ढाँचे की आवश्यकता है ताकि उद्योगों को निवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना (Carbon Credit Trading Scheme)

आगे की राह

  • शोधन क्षेत्र में ऊर्जा दक्षता उपायों को और बढ़ाना, जैसे परिचालन अनुकूलन (operational optimisation) और डिजिटलीकरण (digitalisation)।
  • हरित हाइड्रोजन उत्पादन की लागत को कम करने के लिए अनुसंधान और विकास में निवेश बढ़ाना, साथ ही इलेक्ट्रोलाइज़र निर्माण को बढ़ावा देना।
  • नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों (जैसे सौर और पवन ऊर्जा) के उपयोग को बढ़ावा देना ताकि शोधन प्रक्रियाओं के लिए स्वच्छ बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित हो सके।
  • कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन और स्टोरेज (CCUS) जैसी प्रौद्योगिकियों को अपनाना ताकि जीवाश्म ईंधन के उपयोग से होने वाले उत्सर्जन को कम किया जा सके।
  • परिवहन जैसे अन्य क्षेत्रों में स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण को बढ़ावा देने के लिए नीतिगत समर्थन और प्रोत्साहन प्रदान करना, ताकि स्कोप 3 उत्सर्जन को कम किया जा सके।
  • कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना जैसे बाज़ार-आधारित तंत्रों को मजबूत करना ताकि उद्योगों को उत्सर्जन कम करने के लिए प्रोत्साहन मिल सके।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को बढ़ावा देना ताकि नवीनतम स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों तक पहुंच सुनिश्चित हो सके।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

शुद्ध-शून्य उत्सर्जन · ऊर्जा सुरक्षा · पेट्रोलियम शोधन क्षेत्र · हरित हाइड्रोजन · कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना · नवीकरणीय ऊर्जा · ऊर्जा दक्षता · जीवाश्म ईंधन · जलवायु परिवर्तन · सतत विकास · डीकार्बोनाइजेशन · ऊर्जा संक्रमण

अवधारणा प्रवाह

भारत की बढ़ती ऊर्जा मांग  →  जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता  →  नेट-ज़ीरो उत्सर्जन लक्ष्य की आवश्यकता  →  शोधन क्षेत्र पर दबाव (ऊर्जा सुरक्षा बनाम जलवायु लक्ष्य)  →  हरित हाइड्रोजन और ऊर्जा दक्षता जैसे समाधान  →  कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना जैसे नीतिगत उपकरण

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ‘स्कोप 1’ उत्सर्जन में किसी रिफाइनरी के प्रत्यक्ष परिचालन से होने वाले उत्सर्जन शामिल होते हैं।
2. ‘स्कोप 2’ उत्सर्जन में खरीदी गई बिजली से जुड़े उत्सर्जन शामिल होते हैं।
3. ‘स्कोप 3’ उत्सर्जन को कम करना केवल रिफाइनरी क्षेत्र के प्रयासों पर निर्भर करता है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीनों
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 और 2 सही हैं। ‘स्कोप 1’ प्रत्यक्ष उत्सर्जन को संदर्भित करता है, जबकि ‘स्कोप 2’ खरीदी गई ऊर्जा से संबंधित अप्रत्यक्ष उत्सर्जन को संदर्भित करता है। कथन 3 गलत है क्योंकि ‘स्कोप 3’ उत्सर्जन को कम करना व्यापक रूप से उन क्षेत्रों पर निर्भर करता है जो रिफाइनरी उत्पादों का उपभोग करते हैं, विशेष रूप से परिवहन क्षेत्र।

Q2. हरित हाइड्रोजन के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?

  1. हरित हाइड्रोजन के उत्पादन में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग किया जाता है।
  2. यह जीवाश्म ईंधन का एक तत्काल प्रतिस्थापन है।
  3. इलेक्ट्रोलाइज़र विनिर्माण को बढ़ाना इसकी लागत कम करने के लिए महत्वपूर्ण है।
  4. भारत में हरित हाइड्रोजन नीतिगत चरण से कार्यान्वयन चरण में आ गया है।

उत्तर: यह जीवाश्म ईंधन का एक तत्काल प्रतिस्थापन है। — हरित हाइड्रोजन के उत्पादन में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग किया जाता है (विकल्प A सही है)। यह जीवाश्म ईंधन का तत्काल प्रतिस्थापन नहीं है, बल्कि उच्च-कार्बन ऊर्जा प्रणाली से निम्न-कार्बन प्रणाली में संक्रमण है (विकल्प B गलत है)। इलेक्ट्रोलाइज़र विनिर्माण को बढ़ाना और नवीकरणीय ऊर्जा की लागत कम करना इसकी वाणिज्यिक व्यवहार्यता के लिए महत्वपूर्ण है (विकल्प C सही है)। भारत में हरित हाइड्रोजन नीतिगत चरण से कार्यान्वयन चरण में आ गया है (विकल्प D सही है)।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत के पेट्रोलियम शोधन क्षेत्र को ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए शुद्ध-शून्य उत्सर्जन लक्ष्यों को प्राप्त करने में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है? इस संदर्भ में, हरित हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण में आने वाली बाधाओं और अवसरों का विश्लेषण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: परिचय: पेट्रोलियम शोधन क्षेत्र के महत्व और शुद्ध-शून्य उत्सर्जन लक्ष्यों के साथ इसके संबंध का संक्षिप्त उल्लेख।
मुख्य भाग:
1. ऊर्जा सुरक्षा और शुद्ध-शून्य के बीच संतुलन की चुनौतियाँ:
– बढ़ती ऊर्जा मांग और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता।
– भू-राजनीतिक व्यवधानों का कच्चे तेल की आपूर्ति पर प्रभाव।
– डीकार्बोनाइजेशन (decarbonization) के लिए आवश्यक उच्च पूंजी निवेश।
– मौजूदा बुनियादी ढांचे का अनुकूलन और नई प्रौद्योगिकियों को अपनाना।
– स्कोप 1, 2 और 3 उत्सर्जन को कम करने की जटिलताएँ।
2. हरित हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण:
– बाधाएँ: उच्च उत्पादन लागत, इलेक्ट्रोलाइज़र विनिर्माण का पैमाना, नवीकरणीय ऊर्जा की लागत, मांग का सृजन।
– अवसर: ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम करना, स्वच्छ ऊर्जा स्रोत, दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा, नए उद्योगों और रोजगार का सृजन, कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना का लाभ।
निष्कर्ष: इन चुनौतियों का समाधान करने और अवसरों का लाभ उठाने के लिए नीतिगत समर्थन, तकनीकी नवाचार और सार्वजनिक-निजी भागीदारी के महत्व पर बल देते हुए एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करना।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


Related guides on our sites

No Comments

Post A Comment