27 Sep युद्ध से दूर देशों पर पड़ रहा वैश्विक संकटों का बोझ: भारत ने संयुक्त राष्ट्र में उठाया मुद्दा
✎ भारत अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों के वैश्विक आर्थिक प्रभावों पर जोर देता है और एक बहुध्रुवीय विश्व में शांति, सुरक्षा तथा सतत विकास के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और संवाद का आह्वान करता है, विशेषकर वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — अंतर्राष्ट्रीय संबंध | GS Paper III — अर्थव्यवस्था
- Prelims: संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA), वैश्विक दक्षिण (Global South), बहुध्रुवीय विश्व (Multipolar World), आतंकवाद, समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा
- Essay: बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की भूमिका, संघर्षों का वैश्विक विकास पर प्रभाव
त्वरित पुनरावृत्ति: भारत अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों के वैश्विक आर्थिक प्रभावों पर जोर देता है और एक बहुध्रुवीय विश्व में शांति, सुरक्षा तथा सतत विकास के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और संवाद का आह्वान करता है, विशेषकर वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए।
यह खबर चर्चा में क्यों?
भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा (UN General Assembly) के 81वें सत्र में कहा कि अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों का खामियाजा उन देशों को भी भुगतना पड़ रहा है, जो इन संघर्षों से दूर हैं। उन्होंने खाड़ी क्षेत्र, पश्चिम एशिया और यूक्रेन में चल रहे संघर्षों पर चिंता व्यक्त की और आतंकवाद को वैश्विक शांति के लिए एक गंभीर खतरा बताया।
पृष्ठभूमि
- संयुक्त राष्ट्र (United Nations) की स्थापना 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने के उद्देश्य से की गई थी।
- अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों, जैसे कि यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में तनाव, ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं (Supply Chains) को बाधित किया है, जिससे खाद्य, ईंधन और उर्वरकों की कीमतें बढ़ी हैं।
- वैश्विक दक्षिण (Global South) के देश, जो अक्सर इन संघर्षों में सीधे तौर पर शामिल नहीं होते, मुद्रास्फीति (Inflation), वित्तीय अस्थिरता और विकास परियोजनाओं में देरी जैसे गंभीर आर्थिक परिणामों का सामना कर रहे हैं।
- भारत लंबे समय से एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था (Multipolar World Order) का समर्थक रहा है, जिसमें शक्ति कई केंद्रों में वितरित हो और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में अधिक संतुलन हो।
- भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UN Security Council) सहित अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों में सुधारों की वकालत की है ताकि वे समकालीन वैश्विक वास्तविकताओं को बेहतर ढंग से दर्शा सकें।
- आतंकवाद, विशेषकर सीमा पार आतंकवाद (Cross-Border Terrorism), भारत के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा चिंता का विषय रहा है, और भारत ने आतंकवाद के प्रति ‘शून्य सहिष्णुता’ (Zero Tolerance) की नीति का आह्वान किया है।
अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
- अंतर्राष्ट्रीय संघर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्था को कई तरह से प्रभावित करते हैं, जिनमें आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान, ऊर्जा और खाद्य कीमतों में वृद्धि, और वित्तीय बाजारों में अस्थिरता शामिल है।
- संघर्ष से प्रभावित क्षेत्रों से कच्चे माल, विशेषकर तेल और गैस की आपूर्ति बाधित होने से वैश्विक ऊर्जा संकट पैदा हो सकता है, जिससे सभी देशों में ऊर्जा की कीमतें बढ़ जाती हैं।
- कृषि-उत्पादक क्षेत्रों में संघर्ष खाद्य उत्पादन और वितरण को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे खाद्य असुरक्षा (Food Insecurity) और वैश्विक खाद्य कीमतों में वृद्धि हो सकती है।
- संघर्षों के कारण निवेश में कमी आती है और व्यापार बाधित होता है, जिससे आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) धीमी होती है और विकासशील देशों पर विशेष रूप से नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
- युद्ध और अस्थिरता के कारण बड़े पैमाने पर विस्थापन होता है, जिससे मानवीय संकट पैदा होते हैं और पड़ोसी देशों पर शरणार्थियों का बोझ पड़ता है, जिससे उन देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर भी दबाव पड़ता है।
- सैन्य खर्च में वृद्धि से सार्वजनिक वित्त पर दबाव पड़ता है और विकास परियोजनाओं के लिए संसाधनों की कमी होती है।
- समुद्री मार्गों पर हमलों और व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाने से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की लागत बढ़ जाती है और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अनिश्चितता आती है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा पर संघर्षों का प्रभाव | वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए बढ़ते खतरों को उजागर करता है, जिससे विकास और प्रगति बाधित होती है। |
| संघर्षों से दूर देशों पर आर्थिक बोझ | वैश्विक अर्थव्यवस्था की अंतर्संबंधता पर जोर देता है, जहां क्षेत्रीय संघर्षों के दूरगामी आर्थिक परिणाम होते हैं। |
| हर चीज का शस्त्रीकरण (Weaponization) | वित्त, बाजार पहुंच, आपूर्ति श्रृंखला और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और अस्थिरता को दर्शाता है। |
| आतंकवाद का खतरा | राज्य-प्रायोजित और सीमा पार आतंकवाद सहित वैश्विक शांति और व्यवस्था के लिए आतंकवाद के लगातार खतरे पर प्रकाश डालता है। |
| बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था | 1945 में स्थापित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में बदलाव और नई वैश्विक वास्तविकताओं के अनुकूल होने की आवश्यकता को इंगित करता है। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- संघर्षों के कारण खाद्य, ईंधन, उर्वरक और वित्त से संबंधित वैश्विक संकट उत्पन्न होते हैं, जिससे विशेष रूप से ग्लोबल साउथ (Global South) के देशों के लिए चुनौतियाँ बढ़ जाती हैं।
- समुद्री मार्गों में वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाने से वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति बाधित होती है, जिससे अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
सामरिक महत्व
- भारत का यह बयान वैश्विक मंच पर एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में उसकी स्थिति को मजबूत करता है, जो अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।
- यह विभिन्न संघर्षों के प्रति भारत के संतुलित दृष्टिकोण को दर्शाता है, जिसमें यूक्रेन युद्ध के लिए शांति पहल का समर्थन और पश्चिम एशिया में दो-राज्य समाधान की वकालत शामिल है।
भू-राजनीतिक महत्व
- यह संयुक्त राष्ट्र (UN) जैसे बहुपक्षीय मंचों की प्रभावशीलता पर सवाल उठाता है, विशेष रूप से शांति बनाए रखने और संघर्षों को रोकने में उनकी अक्षमता के संदर्भ में।
- यह एक बहुध्रुवीय विश्व की ओर बदलाव को रेखांकित करता है, जहां अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को नई वास्तविकताओं के अनुकूल होने की आवश्यकता है।
सुरक्षा महत्व
- आतंकवाद को अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए एक गंभीर और लगातार खतरे के रूप में पहचानना, विशेष रूप से राज्य-प्रायोजित और सीमा पार आतंकवाद के संदर्भ में।
- समुद्री सुरक्षा पर बढ़ते खतरों को उजागर करता है, जो अंतर्राष्ट्रीय जलमार्गों में वाणिज्यिक जहाजों और चालक दल की सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है।
चुनौतियाँ
1. वैश्विक संघर्षों का आर्थिक प्रभाव
- संघर्षों से दूर देशों को भी खाद्य, ईंधन और उर्वरक की कीमतों में वृद्धि तथा आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान के कारण आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है।
- यह वैश्विक मुद्रास्फीति (Inflation) और आर्थिक अस्थिरता को बढ़ाता है, जिससे विकासशील देशों की आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) धीमी हो जाती है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था, अंतर्राष्ट्रीय संबंध
2. अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों की प्रभावशीलता
- संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की शांति बनाए रखने और संघर्षों को रोकने की क्षमता पर सवाल उठते हैं।
- संस्थानों का कमजोर होना और ‘हाइपर-कॉम्पिटिशन’ की मानसिकता वैश्विक सहयोग और सामूहिक सुरक्षा के लिए चुनौतियाँ पेश करती है।
यूपीएससी लिंक: अंतर्राष्ट्रीय संबंध, शासन
3. आतंकवाद का मुकाबला
- राज्य-प्रायोजित और सीमा पार आतंकवाद वैश्विक व्यवस्था के लिए एक सीधा खतरा बना हुआ है, जिसके लिए ‘शून्य सहिष्णुता’ की नीति आवश्यक है।
- आतंकवाद के अपराधियों को जवाबदेह ठहराना और आतंकवाद को सामान्य करने के प्रयासों का विरोध करना एक बड़ी चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: आंतरिक सुरक्षा, अंतर्राष्ट्रीय संबंध
4. बहुध्रुवीय विश्व में अनुकूलन
- 1945 में स्थापित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को नई वैश्विक वास्तविकताओं और बहुध्रुवीयता के उदय के साथ तालमेल बिठाने में कठिनाई हो रही है।
- बदलती वैश्विक व्यवस्था के लिए समायोजन आसान नहीं होगा और इसके लिए सभ्य संवाद तथा सहयोग की आवश्यकता है।
यूपीएससी लिंक: अंतर्राष्ट्रीय संबंध
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| संघर्षों का वैश्विक प्रभाव | दूरस्थ देशों पर आर्थिक बोझ, विकास की गति धीमी। |
| हर चीज का शस्त्रीकरण | वित्त, बाजार पहुंच, आपूर्ति श्रृंखला और प्रौद्योगिकी में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और अस्थिरता। |
| आतंकवाद का लगातार खतरा | राज्य-प्रायोजित और सीमा पार आतंकवाद वैश्विक व्यवस्था के लिए सीधा खतरा। |
| समुद्री सुरक्षा | अंतर्राष्ट्रीय जलमार्गों में वाणिज्यिक जहाजों और चालक दल को निशाना बनाना। |
| अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में बदलाव | 1945 की व्यवस्था का नई बहुध्रुवीय वास्तविकताओं के अनुकूल न होना। |
आगे की राह
- अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय मंचों को मजबूत करना।
- संघर्षों के मूल कारणों को संबोधित करने और शांतिपूर्ण समाधान को बढ़ावा देने के लिए कूटनीतिक प्रयासों को तेज करना।
- खाद्य, ईंधन और उर्वरक जैसे आवश्यक वस्तुओं की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को सुरक्षित और लचीला बनाना।
- आतंकवाद के खिलाफ ‘शून्य सहिष्णुता’ की नीति को बनाए रखना और राज्य-प्रायोजित आतंकवाद के अपराधियों को जवाबदेह ठहराना।
- समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने और अंतर्राष्ट्रीय जलमार्गों में वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षा के लिए सहयोग बढ़ाना।
- एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के लिए सभ्य संवाद और सहयोग के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को अनुकूलित करना।
- डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (Digital Public Infrastructure) जैसे नवाचारों के माध्यम से विकासशील देशों में सामाजिक-आर्थिक लाभों का विस्तार करना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा · संयुक्त राष्ट्र महासभा · बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था · आतंकवाद · वैश्वीकरण · खाद्य सुरक्षा · ऊर्जा सुरक्षा · वैश्विक दक्षिण · अंतर्राष्ट्रीय संबंध · भारत की विदेश नीति · भू-राजनीति · विकासशील देश
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 51’, ‘note’: ‘अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देना’}
अवधारणा प्रवाह
वैश्विक संघर्ष → दूरस्थ देशों पर आर्थिक बोझ → आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और मुद्रास्फीति → अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को खतरा → बहुपक्षीय सहयोग की आवश्यकता
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संयुक्त राष्ट्र महासभा (UN General Assembly) संयुक्त राष्ट्र के छह प्रमुख अंगों में से एक है।
2. संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रत्येक सदस्य देश के पास एक वोट होता है, चाहे उसकी जनसंख्या या आर्थिक शक्ति कुछ भी हो।
3. महासभा के प्रस्ताव सदस्य देशों के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। संयुक्त राष्ट्र महासभा, सुरक्षा परिषद, आर्थिक और सामाजिक परिषद, न्यास परिषद, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय और सचिवालय संयुक्त राष्ट्र के छह प्रमुख अंग हैं। कथन 2 भी सही है। महासभा में प्रत्येक सदस्य देश को समान प्रतिनिधित्व प्राप्त है। कथन 3 गलत है। महासभा के प्रस्ताव आमतौर पर सदस्य देशों के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होते हैं, बल्कि वे सिफारिशें या घोषणाएं होती हैं।
Q2. अभिकथन (A): भारत ने संयुक्त राष्ट्र में कहा है कि संघर्षों से दूर देश भी उन युद्धों की कीमत चुका रहे हैं जिनमें उनकी कोई भूमिका नहीं है।
कारण (R): वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के शस्त्रीकरण और खाद्य, ईंधन तथा उर्वरकों की कीमतों में वृद्धि ने विकासशील देशों को विशेष रूप से प्रभावित किया है।
उपर्युक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
- A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सही है, लेकिन R गलत है।
- A गलत है, लेकिन R सही है।
उत्तर: A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है, जैसा कि समाचार में बताया गया है। कारण (R) भी सही है और यह बताता है कि कैसे संघर्षों से दूर देश भी प्रभावित हो रहे हैं, विशेष रूप से ‘वैश्विक दक्षिण’ के देश। इसलिए, R, A की सही व्याख्या है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य में, भारत की बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की वकालत और वैश्विक शांति व सुरक्षा में इसकी भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था (Multipolar World Order) की अवधारणा को संक्षेप में समझाएं और वर्तमान वैश्विक संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता बताएं।
2. **भारत की बहुध्रुवीयता की वकालत:**
* भारत की विदेश नीति में बहुध्रुवीयता के महत्व पर प्रकाश डालें।
* बताएं कि भारत एक ऐसी व्यवस्था क्यों चाहता है जहां शक्ति कुछ ही देशों के बजाय कई केंद्रों में वितरित हो।
* गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement) के सिद्धांतों से इसकी निरंतरता का उल्लेख करें।
3. **वैश्विक शांति और सुरक्षा में भारत की भूमिका:**
* संयुक्त राष्ट्र में भारत के योगदान (शांति स्थापना मिशन, आतंकवाद के खिलाफ आवाज) का उल्लेख करें।
* विकासशील देशों (‘वैश्विक दक्षिण’) के हितों के संरक्षक के रूप में भारत की भूमिका।
* खाद्य, ईंधन और उर्वरक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भारत के रुख पर चर्चा करें।
* क्षेत्रीय स्थिरता (जैसे हिंद-प्रशांत क्षेत्र) में भारत के प्रयासों का उल्लेख करें।
4. **आलोचनात्मक परीक्षण:**
* बहुध्रुवीयता के मार्ग में आने वाली चुनौतियां (जैसे बड़े शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा, क्षेत्रीय संघर्ष)।
* भारत की अपनी सीमाओं और चुनौतियों का उल्लेख करें (जैसे आर्थिक दबाव, आंतरिक मुद्दे)।
* क्या भारत अपनी आकांक्षाओं के अनुरूप प्रभावी ढंग से कार्य कर पा रहा है, इस पर विचार करें।
5. **निष्कर्ष:** भारत की बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की वकालत के महत्व और वैश्विक शांति व सुरक्षा के लिए इसके दीर्घकालिक निहितार्थों को सारांशित करें।
स्रोत: news.un.org
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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