30 Sep एनजीटी ने हजारीबाग जिलाधिकारी को दिया नोटिस, ओकनी तालाब पुनरुद्धार में हुई लापरवाही
✎ राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों से संबंधित मामलों के त्वरित निपटान के लिए स्थापित एक विशेष न्यायिक निकाय है, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों पर कार्य करता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — शासन, पारदर्शिता और जवाबदेही के महत्वपूर्ण पक्ष, सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन से उत्पन्न विषय | GS Paper III — पर्यावरण और पारिस्थितिकी, पर्यावरण प्रभाव आकलन
- Prelims: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT), पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986, जल प्रदूषण (निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986, न्यायिक समीक्षा, पर्यावरण न्याय
- Essay: पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास में न्यायिक सक्रियता की भूमिका, भारत में पर्यावरणीय शासन की चुनौतियाँ और समाधान
त्वरित पुनरावृत्ति: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों से संबंधित मामलों के त्वरित निपटान के लिए स्थापित एक विशेष न्यायिक निकाय है, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों पर कार्य करता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal – NGT) ने हजारीबाग के ऐतिहासिक ओकनी तालाब के संरक्षण और जीर्णोद्धार से संबंधित मामले में जिला प्रशासन की ढिलाई पर कड़ा रुख अपनाया है। अनुपालन रिपोर्ट समय पर प्रस्तुत न करने के कारण NGT ने जिला दंडाधिकारी को नोटिस जारी कर दो महीने के भीतर शपथपत्र के साथ रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिससे पर्यावरणीय शासन और जवाबदेही का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है।
पृष्ठभूमि
- हजारीबाग पर्यावरण संरक्षण ट्रस्ट के अध्यक्ष जयगोपाल राय ने ओकनी तालाब के संरक्षण का मामला NGT के समक्ष उठाया था।
- NGT ने 3 जुलाई 2025 को जिला दंडाधिकारी को नगर निगम द्वारा तैयार की गई कार्ययोजना को लागू करने का निर्देश दिया था।
- ट्रिब्यूनल ने 3 जुलाई 2026 तक तालाब के संरक्षण का कार्य पूरा करने और 15 जुलाई 2026 तक अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया था।
- निर्धारित समय-सीमा के भीतर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल न होने के कारण NGT ने अब जिला प्रशासन पर सख्ती दिखाई है।
- NGT ने अगली सुनवाई 20 नवंबर को तय की है, जिसमें संबंधित अधिकारियों की व्यक्तिगत या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थिति अनिवार्य की गई है।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) क्या है?
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की स्थापना राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 (National Green Tribunal Act, 2010) के तहत की गई थी।
- यह पर्यावरण संरक्षण, वनों के संरक्षण और अन्य प्राकृतिक संसाधनों से संबंधित मामलों के प्रभावी और त्वरित निपटान के लिए एक विशेष निकाय है।
- NGT का उद्देश्य पर्यावरण संबंधी कानूनी अधिकारों को लागू करना और क्षतिग्रस्त व्यक्तियों या संपत्ति को राहत और मुआवजा प्रदान करना है।
- यह सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 द्वारा निर्धारित प्रक्रिया से बाध्य नहीं है, बल्कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों द्वारा निर्देशित होता है।
- NGT के पास जल प्रदूषण (निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974, जल प्रदूषण (निवारण एवं नियंत्रण) उपकर अधिनियम, 1977, वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980, वायु प्रदूषण (निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986, सार्वजनिक देयता बीमा अधिनियम, 1991 और जैविक विविधता अधिनियम, 2002 जैसे कानूनों के तहत आने वाले मामलों की सुनवाई का अधिकार है।
- यह भारत में पर्यावरणीय न्याय के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और पर्यावरणीय कानूनों के अनुपालन को सुनिश्चित करने में सहायक है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| एनजीटी (National Green Tribunal) की सख्ती | पर्यावरण संरक्षण और न्यायिक सक्रियता को दर्शाता है। |
| अनुपालन रिपोर्ट में देरी | प्रशासनिक जवाबदेही और पर्यावरणीय प्रतिबद्धताओं के प्रति उदासीनता का संकेत। |
| जिलाधिकारी को नोटिस | पर्यावरण कानूनों के उल्लंघन पर शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय करने का प्रयास। |
| दो महीने की मोहलत | प्रशासन को अपनी त्रुटियों को सुधारने और आवश्यक कार्रवाई करने का अवसर प्रदान करना। |
| ओकनी तालाब का संरक्षण | शहरी जल निकायों के महत्व और उनके जीर्णोद्धार की आवश्यकता पर बल। |
महत्व
पर्यावरण संरक्षण
- यह मामला शहरी जल निकायों के संरक्षण और जीर्णोद्धार के महत्व को रेखांकित करता है, जो जैव विविधता, भूजल पुनर्भरण और स्थानीय जलवायु संतुलन के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- एनजीटी का हस्तक्षेप पर्यावरण कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन और पारिस्थितिक तंत्रों की रक्षा के लिए नियामक निकायों की भूमिका को सुदृढ़ करता है।
शासन और जवाबदेही
- जिलाधिकारी को नोटिस जारी करना प्रशासनिक अधिकारियों की पर्यावरणीय दायित्वों के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करने में एनजीटी की सक्रिय भूमिका को दर्शाता है।
- यह घटना सरकार के विभिन्न स्तरों पर पर्यावरणीय परियोजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता और समयबद्धता की आवश्यकता पर बल देती है।
न्यायिक सक्रियता
- एनजीटी का यह कदम पर्यावरणीय न्याय के सिद्धांत को आगे बढ़ाता है और यह सुनिश्चित करता है कि पर्यावरणीय क्षति को रोकने और सुधारने के लिए आवश्यक कार्रवाई की जाए।
- यह दर्शाता है कि नागरिक समाज संगठन (जैसे हजारीबाग पर्यावरण संरक्षण ट्रस्ट) पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, न्यायिक मंचों के माध्यम से मुद्दों को उठाकर।
चुनौतियाँ
1. प्रशासनिक उदासीनता और विलंब
- पर्यावरण संरक्षण से संबंधित आदेशों के अनुपालन में प्रशासनिक ढिलाई और अनावश्यक देरी एक बड़ी चुनौती है।
- यह परियोजनाओं के समय पर पूरा होने में बाधा डालता है और पर्यावरणीय क्षति को बढ़ाता है।
यूपीएससी लिंक: शासन व्यवस्था, पारदर्शिता और जवाबदेही
2. अंतर-विभागीय समन्वय का अभाव
- पर्यावरण संरक्षण के लिए अक्सर कई विभागों के बीच समन्वय की आवश्यकता होती है, जिसका अभाव प्रगति में बाधा डाल सकता है।
- कार्ययोजनाओं के क्रियान्वयन में विभिन्न हितधारकों को एक साथ लाना चुनौतीपूर्ण होता है।
यूपीएससी लिंक: शासन व्यवस्था, पारदर्शिता और जवाबदेही
3. पर्यावरण कानूनों का कमजोर प्रवर्तन
- पर्यावरण कानूनों के प्रभावी प्रवर्तन में चुनौतियां बनी हुई हैं, जिससे उल्लंघनकर्ताओं को जवाबदेह ठहराना मुश्किल हो जाता है।
- नियामक निकायों के आदेशों का पालन न करने पर पर्याप्त दंडात्मक कार्रवाई का अभाव भी एक समस्या है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण संरक्षण, प्रदूषण और क्षरण
4. शहरी जल निकायों पर अतिक्रमण और प्रदूषण
- शहरीकरण और जनसंख्या वृद्धि के कारण तालाबों और अन्य जल निकायों पर अतिक्रमण और प्रदूषण का दबाव बढ़ रहा है।
- इनका जीर्णोद्धार और संरक्षण एक जटिल कार्य है जिसमें सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय पहलुओं को संतुलित करना होता है।
यूपीएससी लिंक: शहरीकरण, उनकी समस्याएं और उनके उपचार
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| एनजीटी आदेशों का अनुपालन न होना | पर्यावरण न्याय और नियामक संस्थाओं की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न। |
| जिला प्रशासन की ढिलाई | स्थानीय स्तर पर शासन की जवाबदेही और पर्यावरणीय प्रतिबद्धताओं का अभाव। |
| तालाबों का अतिक्रमण और प्रदूषण | शहरी पारिस्थितिकी तंत्रों का क्षरण और जल संसाधनों की कमी। |
| पर्यावरण संरक्षण ट्रस्ट की पहल | नागरिक समाज की सक्रियता के बावजूद प्रशासनिक प्रतिक्रिया में देरी। |
| शपथपत्र के साथ रिपोर्ट की मांग | प्रशासनिक प्रक्रियाओं में गंभीरता और सत्यनिष्ठा की कमी को उजागर करना। |
आगे की राह
- एनजीटी के आदेशों का समयबद्ध और प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत निगरानी तंत्र स्थापित किया जाना चाहिए।
- पर्यावरण संरक्षण से संबंधित परियोजनाओं के लिए प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए और विलंब के लिए दंड का प्रावधान होना चाहिए।
- शहरी जल निकायों के संरक्षण और जीर्णोद्धार के लिए व्यापक कार्ययोजनाएं बनाई जानी चाहिए, जिनमें अतिक्रमण हटाना, प्रदूषण नियंत्रण और सामुदायिक भागीदारी शामिल हो।
- पर्यावरण कानूनों के प्रवर्तन को मजबूत किया जाना चाहिए और उल्लंघनकर्ताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।
- नागरिक समाज संगठनों और स्थानीय समुदायों को पर्यावरण संरक्षण प्रयासों में सक्रिय रूप से शामिल किया जाना चाहिए, जिससे जमीनी स्तर पर स्वामित्व और सततता सुनिश्चित हो सके।
- पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर जागरूकता बढ़ाने के लिए जन अभियान चलाए जाने चाहिए, ताकि लोग अपने जल निकायों के महत्व को समझें और उनके संरक्षण में योगदान दें।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
राष्ट्रीय हरित अधिकरण · पर्यावरण संरक्षण · न्यायिक सक्रियता · सतत विकास · जल निकाय संरक्षण · पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 · आदेशों का अनुपालन · जिला प्रशासन की भूमिका
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 48A’, ‘note’: ‘पर्यावरण का संरक्षण और सुधार’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 51A(g)’, ‘note’: ‘पर्यावरण की रक्षा और सुधार’}
अवधारणा प्रवाह
हजारीबाग के ओकनी तालाब का क्षरण → हजारीबाग पर्यावरण संरक्षण ट्रस्ट द्वारा एनजीटी में याचिका → एनजीटी द्वारा तालाब संरक्षण का आदेश और कार्ययोजना → जिला प्रशासन द्वारा अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने में देरी → एनजीटी द्वारा जिलाधिकारी को नोटिस और सख्ती → पर्यावरण संरक्षण और प्रशासनिक जवाबदेही पर बल
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. NGT की स्थापना एक सांविधिक निकाय के रूप में राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत की गई थी।
2. यह पर्यावरण संरक्षण और वनों तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित मामलों के प्रभावी और शीघ्र निपटान के लिए स्थापित किया गया है।
3. NGT का मुख्यालय नई दिल्ली में है और इसकी क्षेत्रीय पीठें भी हैं।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। NGT की स्थापना राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत एक सांविधिक निकाय के रूप में की गई थी। कथन 2 सही है। इसका प्राथमिक उद्देश्य पर्यावरण संबंधी विवादों का त्वरित निपटान करना है। कथन 3 सही है। NGT का प्रधान कार्यालय नई दिल्ली में है और इसकी भोपाल, पुणे, कोलकाता और चेन्नई में क्षेत्रीय पीठें हैं।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा अधिनियम राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है?
- जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1974
- वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980
- लोक दायित्व बीमा अधिनियम, 1991
- वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972
उत्तर: वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 — वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972, NGT के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है। NGT जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1974, वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986, वायु (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1981, जैव विविधता अधिनियम, 2002 और लोक दायित्व बीमा अधिनियम, 1991 के तहत नागरिक मामलों की सुनवाई करता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास को बढ़ावा देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए और इसके समक्ष आने वाली चुनौतियों पर भी प्रकाश डालिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की स्थापना, उद्देश्य और सांविधिक प्रकृति का संक्षिप्त विवरण (राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010)।
2. NGT की महत्वपूर्ण भूमिका:
क. पर्यावरण संबंधी विवादों का त्वरित निपटान।
ख. न्यायिक सक्रियता और पर्यावरण कानूनों का प्रवर्तन (उदाहरण: गंगा/यमुना प्रदूषण, अवैध खनन, आर्द्रभूमि संरक्षण जैसे मामलों का उल्लेख)।
ग. ‘प्रदूषक भुगतान सिद्धांत’ (Polluter Pays Principle) और ‘सतत विकास’ (Sustainable Development) जैसे सिद्धांतों का अनुप्रयोग।
घ. पर्यावरणीय क्षति के लिए मुआवजे का निर्धारण।
ङ. जन जागरूकता और पर्यावरणीय शासन में सुधार।
3. NGT के समक्ष चुनौतियाँ:
क. आदेशों के अनुपालन का अभाव (जैसे वर्तमान ओकनी तालाब मामला)।
ख. सीमित अधिकार क्षेत्र (कुछ महत्वपूर्ण अधिनियमों का शामिल न होना, जैसे वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम)।
ग. मानव संसाधन और वित्तीय संसाधनों की कमी।
घ. अपीलीय प्रक्रिया में देरी।
ङ. राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों से सहयोग की कमी।
च. तकनीकी विशेषज्ञता की कमी।
4. निष्कर्ष: NGT की भूमिका को सुदृढ़ करने के लिए आवश्यक उपाय और आगे की राह, जिसमें अनुपालन तंत्र को मजबूत करना और अधिकार क्षेत्र का विस्तार शामिल है।
स्रोत: amarujala.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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