07 Oct एसबीआई की दर वृद्धि: आरबीआई के फैसले से सेंसेक्स गिरा, जानिए पूरा मामला
✎ RBI की मौद्रिक नीति, विशेष रूप से रेपो दर में वृद्धि और 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' की नीतिगत स्थिति, मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने और मूल्य स्थिरता बनाए रखने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है, जिसका शेयर बाजार और व्यापक अर्थव्यवस्था पर…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोजगार से संबंधित विषय | GS Paper III — सरकारी बजट के मुख्य घटक | GS Paper III — निवेश मॉडल
- Prelims: रेपो दर (Repo Rate), मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee – MPC), मुद्रास्फीति (Inflation), राजकोषीय नीति (Fiscal Policy), बेंचमार्क सूचकांक (Benchmark Indices), कच्चा तेल (Crude Oil), विदेशी संस्थागत निवेशक (Foreign Institutional Investors – FIIs)
- Essay: भारतीय अर्थव्यवस्था की चुनौतियाँ और अवसर: एक व्यापक विश्लेषण, मुद्रास्फीति नियंत्रण और आर्थिक संवृद्धि के बीच संतुलन साधने में केंद्रीय बैंक की भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: RBI की मौद्रिक नीति, विशेष रूप से रेपो दर में वृद्धि और ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ की नीतिगत स्थिति, मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने और मूल्य स्थिरता बनाए रखने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है, जिसका शेयर बाजार और व्यापक अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा प्रमुख नीतिगत दर (रेपो दर) में वृद्धि और ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ (Calibrated Tightening) की नीतिगत स्थिति अपनाने के बाद शेयर बाजार में गिरावट दर्ज की गई। इसके अतिरिक्त, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) द्वारा लगातार पूंजी की निकासी ने भी बाजार की धारणा को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया। यह घटनाक्रम RBI की मौद्रिक नीति, वैश्विक आर्थिक कारकों और घरेलू शेयर बाजार के बीच जटिल संबंधों को उजागर करता है।
पृष्ठभूमि
- RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने सर्वसम्मति से रेपो दर को 25 आधार अंक बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत कर दिया, जो लगभग चार वर्षों में पहली वृद्धि है।
- RBI ने अपनी नीतिगत स्थिति को ‘तटस्थ’ (Neutral) से बदलकर ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ कर दिया है, जो निकट भविष्य में दर में कटौती की संभावना को खारिज करता है।
- कच्चे तेल का वैश्विक बेंचमार्क, ब्रेंट क्रूड (Brent Crude), 1.41 प्रतिशत बढ़कर 102 डॉलर प्रति बैरल हो गया, जिससे मुद्रास्फीति संबंधी चिंताएँ बढ़ गईं।
- विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने भारतीय इक्विटी बाजारों से 2,961.30 करोड़ रुपये की निकासी की, जिससे बाजार पर दबाव पड़ा।
- शेयर बाजार के प्रमुख सूचकांक, BSE सेंसेक्स (Sensex) और NSE निफ्टी (Nifty) दोनों में गिरावट दर्ज की गई, जिससे दो दिन की तेजी समाप्त हो गई।
- RBI ने मुद्रास्फीति के उच्च दृष्टिकोण और मूल्य स्थिरता पर जोर देने के साथ-साथ आर्थिक संवृद्धि के अनुमानों को भी संशोधित किया है।
मौद्रिक नीति और इसके उपकरण
- मौद्रिक नीति (Monetary Policy) भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा अर्थव्यवस्था में धन की आपूर्ति और ऋण की उपलब्धता को नियंत्रित करने के लिए उपयोग की जाने वाली नीति है। इसका मुख्य उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखते हुए आर्थिक संवृद्धि को बढ़ावा देना है।
- रेपो दर (Repo Rate) वह ब्याज दर है जिस पर RBI वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक ऋण देता है। रेपो दर में वृद्धि से बैंकों के लिए धन महंगा हो जाता है, जिससे वे आगे ग्राहकों को दिए जाने वाले ऋणों पर ब्याज दरें बढ़ाते हैं, और इस प्रकार अर्थव्यवस्था में धन की आपूर्ति कम होती है।
- मौद्रिक नीति समिति (MPC) एक छह सदस्यीय निकाय है, जिसकी अध्यक्षता RBI गवर्नर करते हैं, जो भारत में बेंचमार्क ब्याज दर निर्धारित करने के लिए जिम्मेदार है। इसका गठन RBI अधिनियम, 1934 के तहत किया गया है।
- मुद्रास्फीति (Inflation) वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में सामान्य वृद्धि है, जिससे मुद्रा की क्रय शक्ति कम हो जाती है। RBI का प्राथमिक जनादेश मुद्रास्फीति को एक निश्चित लक्ष्य सीमा के भीतर रखना है।
- कैलिब्रेटेड टाइटनिंग (Calibrated Tightening) एक मौद्रिक नीतिगत स्थिति है जिसमें केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में वृद्धि करता है लेकिन यह सुनिश्चित करता है कि यह वृद्धि अर्थव्यवस्था की संवृद्धि को बाधित न करे। यह अक्सर तब अपनाया जाता है जब मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ रहा हो।
- कच्चे तेल की कीमतें (Crude Oil Prices) भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि भारत अपनी तेल आवश्यकताओं का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है। कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से आयात बिल बढ़ता है, व्यापार घाटा बढ़ता है और घरेलू मुद्रास्फीति पर दबाव पड़ता है।
- विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) विदेशी निवेशक हैं जो भारतीय वित्तीय बाजारों में निवेश करते हैं। उनके निवेश और निकासी का शेयर बाजार की चाल पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| RBI की नीतिगत दर में वृद्धि | मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने और रुपये के मूल्य को स्थिर करने का प्रयास। |
| ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ की नीतिगत मुद्रा | निकट भविष्य में दर में कटौती की संभावना को खारिज करना और आगे दर वृद्धि या ठहराव का संकेत। |
| कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें | आयातित मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ाना और व्यापार घाटे पर नकारात्मक प्रभाव। |
| विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) का बहिर्वाह | घरेलू शेयर बाजारों से पूंजी का बाहर जाना, जिससे बाजार में गिरावट। |
| घरेलू आर्थिक बुनियादी सिद्धांतों की मजबूती | RBI द्वारा विकास अनुमानों में ऊपर की ओर संशोधन, जो अर्थव्यवस्था की अंतर्निहित शक्ति को दर्शाता है। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- RBI द्वारा रेपो दर में वृद्धि से बैंकों के लिए उधार लेने की लागत बढ़ती है, जिससे अंततः उपभोक्ताओं और व्यवसायों के लिए ऋण महंगा हो जाता है। इसका उद्देश्य अर्थव्यवस्था में तरलता को कम करके मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना है।
- ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ (Calibrated Tightening) की नीतिगत मुद्रा यह दर्शाती है कि RBI निकट भविष्य में मुद्रास्फीति पर नियंत्रण को प्राथमिकता दे रहा है और विकास को बढ़ावा देने के लिए दर में कटौती की संभावना कम है।
- कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारत जैसे तेल आयातक देशों के लिए चिंता का विषय हैं, क्योंकि यह आयात बिल को बढ़ाता है, जिससे चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) बढ़ता है और रुपये पर दबाव पड़ता है।
- विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) द्वारा पूंजी का बहिर्वाह घरेलू शेयर बाजारों पर नकारात्मक प्रभाव डालता है और रुपये के मुकाबले डॉलर को मजबूत करता है, जिससे आयात महंगा हो जाता है।
राजकोषीय महत्व
- उच्च ब्याज दरें सरकार के लिए उधार लेने की लागत को बढ़ा सकती हैं, जिससे राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को प्रबंधित करना और अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
- मुद्रास्फीति पर नियंत्रण से सरकार की क्रय शक्ति बनी रहती है और सब्सिडी तथा सामाजिक कल्याण योजनाओं पर दबाव कम होता है।
सामाजिक महत्व
- उच्च मुद्रास्फीति आम आदमी की क्रय शक्ति को कम करती है, जिससे आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बढ़ जाती हैं, विशेष रूप से निम्न-आय वर्ग के लोगों पर इसका अधिक प्रभाव पड़ता है।
- स्थिर आर्थिक वातावरण और नियंत्रित मुद्रास्फीति सामाजिक स्थिरता और नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार के लिए महत्वपूर्ण है।
चुनौतियाँ
1. मुद्रास्फीति पर नियंत्रण
- खाद्य और ईंधन की कीमतों में अस्थिरता के कारण मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना एक सतत चुनौती है, विशेष रूप से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान और भू-राजनीतिक तनाव के कारण।
- RBI की मौद्रिक नीति का प्रभाव अक्सर समय के साथ आता है, और इस बीच, उच्च मुद्रास्फीति उपभोक्ताओं और व्यवसायों को प्रभावित कर सकती है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था – मुद्रास्फीति, मौद्रिक नीति
2. आर्थिक संवृद्धि और मुद्रास्फीति के बीच संतुलन
- RBI के लिए यह सुनिश्चित करना एक चुनौती है कि मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के प्रयास आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) को बाधित न करें, क्योंकि उच्च ब्याज दरें निवेश और उपभोग को हतोत्साहित कर सकती हैं।
- नीतिगत दरों में वृद्धि से आर्थिक गतिविधियों में मंदी आ सकती है, जिससे रोजगार सृजन और आय वृद्धि प्रभावित हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था – आर्थिक संवृद्धि, मौद्रिक नीति
3. वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताएँ
- कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि, वैश्विक मुद्रास्फीति का दबाव और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में मंदी की आशंका जैसे बाहरी कारक भारतीय अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजारों को प्रभावित करते हैं।
- विदेशी पूंजी के बहिर्वाह को प्रबंधित करना और रुपये के मूल्य को स्थिर रखना एक चुनौती है, खासकर जब वैश्विक निवेशक जोखिम से बचने की प्रवृत्ति दिखाते हैं।
यूपीएससी लिंक: अंतर्राष्ट्रीय संबंध – वैश्विक अर्थव्यवस्था, भारतीय अर्थव्यवस्था
4. राजकोषीय प्रबंधन
- सरकार के लिए राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करना और सार्वजनिक ऋण को प्रबंधित करना एक चुनौती है, खासकर जब ब्याज दरें बढ़ रही हों और आर्थिक संवृद्धि को बढ़ावा देने के लिए व्यय की आवश्यकता हो।
- राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों के बीच समन्वय सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है ताकि आर्थिक स्थिरता प्राप्त की जा सके।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था – राजकोषीय नीति, सार्वजनिक वित्त
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| उच्च मुद्रास्फीति | क्रय शक्ति में कमी, जीवन-यापन की लागत में वृद्धि। |
| आर्थिक संवृद्धि में संभावित मंदी | उच्च ब्याज दरों के कारण निवेश और उपभोग में कमी। |
| कच्चे तेल की कीमतें | आयात बिल में वृद्धि, चालू खाता घाटा और रुपये पर दबाव। |
| विदेशी पूंजी का बहिर्वाह | शेयर बाजार में गिरावट, रुपये का अवमूल्यन। |
| वैश्विक आर्थिक अस्थिरता | बाहरी झटकों के प्रति भारतीय अर्थव्यवस्था की संवेदनशीलता। |
आगे की राह
- RBI को मुद्रास्फीति के दबावों पर कड़ी निगरानी रखनी चाहिए और आवश्यकतानुसार मौद्रिक नीति उपकरणों का उपयोग करना चाहिए, जबकि आर्थिक संवृद्धि को बनाए रखने के लिए लचीलापन भी बनाए रखना चाहिए।
- सरकार को आपूर्ति-पक्ष के मुद्दों को संबोधित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो मुद्रास्फीति को बढ़ाते हैं, जैसे कि कृषि उत्पादन में सुधार, आपूर्ति श्रृंखला दक्षता बढ़ाना और आवश्यक वस्तुओं के भंडारण को विनियमित करना।
- राजकोषीय समेकन (Fiscal Consolidation) के प्रयासों को जारी रखना चाहिए ताकि सरकारी उधार लेने की लागत को कम किया जा सके और निजी क्षेत्र के लिए ऋण की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके।
- ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने और कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों में निवेश को बढ़ावा देना चाहिए।
- घरेलू निवेश को प्रोत्साहित करने और विदेशी पूंजी के बहिर्वाह के प्रभाव को कम करने के लिए व्यापार करने में आसानी (Ease of Doing Business) में सुधार और नीतिगत स्थिरता सुनिश्चित करनी चाहिए।
- वित्तीय बाजारों की स्थिरता बनाए रखने और निवेशकों के विश्वास को बढ़ावा देने के लिए नियामक ढांचे को मजबूत करना चाहिए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
मौद्रिक नीति समिति (MPC) · रेपो दर · मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण · राजकोषीय नीति · वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें · विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) · शेयर बाजार · आर्थिक स्थिरता · ब्याज दरें · तरलता समायोजन सुविधा (LAF)
अवधारणा प्रवाह
उच्च मुद्रास्फीति और कमजोर रुपया → RBI द्वारा रेपो दर में वृद्धि और ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ की नीति → बैंकों के लिए उधार लेने की लागत में वृद्धि → उपभोक्ताओं और व्यवसायों के लिए ऋण महंगा → अर्थव्यवस्था में तरलता में कमी, निवेश और उपभोग पर प्रभाव → मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने का प्रयास
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) में छह सदस्य होते हैं।
2. MPC का प्राथमिक उद्देश्य आर्थिक संवृद्धि को बढ़ावा देना है।
3. रेपो दर वह दर है जिस पर RBI वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक ऋण देता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। MPC में छह सदस्य होते हैं – तीन RBI से और तीन केंद्र सरकार द्वारा नामित। कथन 2 गलत है। MPC का प्राथमिक उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखना है, जबकि संवृद्धि को ध्यान में रखना है। कथन 3 सही है। रेपो दर वह दर है जिस पर वाणिज्यिक बैंक RBI से उधार लेते हैं।
Q2. अभिकथन (A): भारतीय रिजर्व बैंक ने हाल ही में रेपो दर में वृद्धि की है।
कारण (R): उच्च मुद्रास्फीति और कमजोर होती मुद्रा के कारण RBI ने अपनी नीतिगत स्थिति को ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ की ओर स्थानांतरित कर दिया है।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A का सही स्पष्टीकरण नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है। — अभिकथन (A) सही है, क्योंकि RBI ने हाल ही में रेपो दर में 25 आधार अंकों की वृद्धि की है। कारण (R) भी सही है और A का सही स्पष्टीकरण है, क्योंकि RBI ने बढ़ती मुद्रास्फीति और कमजोर होती मुद्रा के दबाव में अपनी नीतिगत स्थिति को ‘न्यूट्रल’ से ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ में बदल दिया है, जिसका अर्थ है कि निकट भविष्य में दर में कटौती की संभावना कम है और आगे दर वृद्धि या ठहराव हो सकता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (MPC) के उद्देश्यों और कार्यप्रणाली का आलोचनात्मक परीक्षण करें। बढ़ती मुद्रास्फीति और वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों के संदर्भ में इसकी हालिया नीतिगत कार्रवाइयों के निहितार्थों पर भी चर्चा करें। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर में मौद्रिक नीति समिति (MPC) की संरचना, उसके प्राथमिक उद्देश्य (मूल्य स्थिरता) और द्वितीयक उद्देश्य (आर्थिक संवृद्धि को ध्यान में रखना) को स्पष्ट करना होगा। इसकी कार्यप्रणाली, जिसमें रेपो दर जैसे प्रमुख नीतिगत दरों का निर्धारण शामिल है, पर भी प्रकाश डालना होगा। आलोचनात्मक परीक्षण में MPC की स्वायत्तता, सरकार के साथ उसके संबंधों और विभिन्न आर्थिक स्थितियों में उसकी प्रभावशीलता पर विचार किया जा सकता है। दूसरे भाग में, हालिया समाचारों के संदर्भ में, बढ़ती मुद्रास्फीति और उच्च कच्चे तेल की कीमतों के कारण RBI द्वारा रेपो दर में वृद्धि और ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ की नीतिगत स्थिति अपनाने के निहितार्थों का विश्लेषण करना होगा। इसमें संवृद्धि पर संभावित प्रभाव, निवेश पर असर और मुद्रास्फीति नियंत्रण में इसकी भूमिका शामिल होगी। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) के बहिर्वाह और शेयर बाजार पर इसके प्रभाव का भी उल्लेख किया जा सकता है।
स्रोत: orissapost.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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