भारत पुनः द्विपक्षीय निवेश संधियों पर हस्ताक्षर क्यों कर रहा है? 2016 के पुनर्प्रारंभ के बाद क्या बदला?

भारत पुनः द्विपक्षीय निवेश संधियों पर हस्ताक्षर क्यों कर रहा है? 2016 के पुनर्प्रारंभ के बाद क्या बदला?

भारत पुनः द्विपक्षीय निवेश संधियों पर हस्ताक्षर क्यों कर रहा है? 2016 के पुनर्प्रारंभ के बाद क्या बदला?

भारत पुनः द्विपक्षीय निवेश संधियों पर हस्ताक्षर क्यों कर रहा है? 2016 के पुनर्प्रारंभ के बाद क्या बदला? — निवेश संधि पुनरावलोकन प्रक्रिया
आरेख: निवेश संधि पुनरावलोकन प्रक्रिया

✎ भारत अपनी द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) नीति में बदलाव कर रहा है, जिसमें 2016 के मॉडल की तुलना में स्थानीय उपचारों की समाप्ति (ELR) के नियम में अधिक लचीलापन लाया गया है, ताकि विदेशी निवेश को आकर्षित किया जा सके।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — अंतर्राष्ट्रीय संबंध  |  GS Paper III — अर्थव्यवस्था
  • Prelims: द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT), स्थानीय उपचारों की समाप्ति (ELR), निवेशक-राज्य विवाद निपटान (ISDS), मॉडल BIT 2016, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI), अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता
  • Essay: वैश्वीकरण के युग में अंतर्राष्ट्रीय निवेश संधियों का महत्व, भारत की आर्थिक संवृद्धि में विदेशी निवेश की भूमिका और चुनौतियाँ

त्वरित पुनरावृत्ति: भारत अपनी द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) नीति में बदलाव कर रहा है, जिसमें 2016 के मॉडल की तुलना में स्थानीय उपचारों की समाप्ति (ELR) के नियम में अधिक लचीलापन लाया गया है, ताकि विदेशी निवेश को आकर्षित किया जा सके।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

भारत सरकार ने 2016 में कई द्विपक्षीय निवेश संधियों (BITs) को समाप्त करने के बाद, अब एक नए दृष्टिकोण के साथ फिर से इन संधियों पर हस्ताक्षर करना शुरू कर दिया है। हाल ही में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और सऊदी अरब जैसे देशों के साथ नए समझौते किए गए हैं, जो 2016 के मॉडल BIT की तुलना में अधिक निवेशक-अनुकूल हैं और स्थानीय उपचारों की समाप्ति (ELR) के नियम में अधिक लचीलापन दिखाते हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी नए BIT टेम्पलेट को जल्द ही कैबिनेट से मंजूरी मिलने की बात कही है, जिससे विदेशी निवेश को आकर्षित करने की उम्मीद है।

पृष्ठभूमि

  • भारत ने 2016-17 में कई द्विपक्षीय निवेश संधियों को एकतरफा समाप्त कर दिया था, क्योंकि उसे अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता (International Arbitration) में कई मुकदमों का सामना करना पड़ा था।
  • इन मुकदमों का मुख्य कारण पिछली संधियों में ‘निष्पक्ष और न्यायसंगत व्यवहार’ (Fair and Equitable Treatment) जैसे व्यापक प्रावधान थे, जिनकी व्याख्या अक्सर भारत के खिलाफ की जाती थी।
  • 2016 में, भारत ने एक नया मॉडल द्विपक्षीय निवेश संधि (Model BIT) जारी किया, जिसने निवेशक-राज्य विवाद निपटान (ISDS) तंत्र तक पहुँच को प्रतिबंधित कर दिया और स्थानीय उपचारों की समाप्ति (Exhaustion of Local Remedies – ELR) के लिए पाँच साल की अनिवार्य अवधि निर्धारित की।
  • इस मॉडल BIT को विदेशी निवेशकों और व्यापारिक भागीदारों द्वारा अत्यधिक प्रतिबंधात्मक माना गया, जिससे नए निवेश समझौतों पर हस्ताक्षर करने की प्रक्रिया धीमी हो गई।
  • पिछले दशक में शुद्ध निवेश प्रवाह में कमी देखी गई, जिससे सरकार को अपने BIT ढांचे की समीक्षा करने और इसे अधिक निवेशक-अनुकूल बनाने की आवश्यकता महसूस हुई।
  • नए समझौतों में स्थानीय उपचारों की समाप्ति (ELR) की अवधि को कम किया गया है, जैसे UAE के साथ तीन साल और सऊदी अरब के साथ दो साल, जो निवेशकों के लिए अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता तक पहुँच को आसान बनाता है।

द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) क्या है?

  • द्विपक्षीय निवेश संधि (Bilateral Investment Treaty – BIT) दो देशों के बीच एक समझौता है जो एक-दूसरे के देश में निजी निवेश को नियंत्रित करने वाले नियमों को निर्धारित करता है।
  • इन संधियों का प्राथमिक उद्देश्य विदेशी निवेश को बढ़ावा देना, उसकी रक्षा करना और निवेशकों को कानूनी स्पष्टता प्रदान करना है।
  • BITs आमतौर पर निवेश के लिए गैर-भेदभावपूर्ण व्यवहार, निवेश के अधिग्रहण के लिए उचित मुआवजा और विवाद निपटान तंत्र जैसे प्रावधान शामिल करते हैं।
  • निवेशक-राज्य विवाद निपटान (Investor-State Dispute Settlement – ISDS) एक तंत्र है जो विदेशी निवेशकों को मेजबान राज्य द्वारा संधि के कथित उल्लंघनों के लिए सीधे दावे दायर करने की अनुमति देता है।
  • स्थानीय उपचारों की समाप्ति (Exhaustion of Local Remedies – ELR) एक नियम है जिसके तहत एक विदेशी निवेशक को अंतर्राष्ट्रीय दावा दायर करने से पहले मेजबान राज्य के घरेलू न्यायालयों या प्रशासनिक निकायों में निवारण की मांग करनी होती है।
  • भारत का 2016 का मॉडल BIT ISDS तंत्र तक पहुँच को सीमित करने और ELR के लिए लंबी अवधि निर्धारित करने पर केंद्रित था, जबकि नए समझौते इस नियम में अधिक लचीलापन दिखा रहे हैं।
  • ये संधियाँ विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (Foreign Direct Investment – FDI) को आकर्षित करने और आर्थिक संबंधों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) दो देशों के बीच निवेश के नियमों को परिभाषित करती है, विदेशी निवेश को बढ़ावा देती है और सुरक्षा प्रदान करती है।
स्थानीय उपचारों की समाप्ति (ELR) विदेशी निवेशकों को अंतर्राष्ट्रीय दावा दायर करने से पहले मेजबान देश के घरेलू न्यायालयों या प्रशासनिक निकायों में निवारण प्राप्त करने की आवश्यकता होती है।
निवेशक-राज्य विवाद निपटान (ISDS) तंत्र विदेशी निवेशों की सुरक्षा के लिए एक तंत्र, जो निवेशकों को कथित संधि उल्लंघनों के लिए मेजबान राज्यों के खिलाफ दावे लाने की अनुमति देता है।
2016 का मॉडल BIT भारत द्वारा पहले अपनाई गई निवेश संधि का एक खाका, जिसमें ELR के लिए 5 साल की अवधि थी, जिसे निवेशकों द्वारा एक बड़ी चुनौती माना गया था।
नया BIT ढाँचा (2024) निवेशक-अनुकूल बनाने और विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए 2016 के मॉडल BIT की समीक्षा के बाद विकसित किया गया नया ढाँचा। इसमें ELR अवधि में अधिक लचीलापन है।

महत्व

आर्थिक महत्व

  • नए BITs विदेशी निवेश के शुद्ध प्रवाह में गिरावट के बीच निवेश को आकर्षित करने में मदद करेंगे, जिससे आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) को बढ़ावा मिलेगा।
  • निवेशकों के लिए कानूनी निश्चितता और सुरक्षा प्रदान करके, ये संधियाँ भारत को एक आकर्षक निवेश गंतव्य के रूप में स्थापित करती हैं।
  • ELR अवधि में लचीलापन निवेशकों के लिए ISDS तंत्र तक पहुँच को बढ़ाता है, जिससे उनके हितों की बेहतर सुरक्षा होती है।

सामरिक महत्व

  • सऊदी अरब और UAE जैसे देशों के साथ नए BITs भारत के भू-राजनीतिक संबंधों को मजबूत करते हैं और आर्थिक साझेदारी को गहरा करते हैं।
  • यह कदम भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ और ‘वेस्ट एशिया’ नीतियों के अनुरूप है, जो प्रमुख व्यापारिक भागीदारों के साथ संबंधों को मजबूत करने पर केंद्रित है।
  • निवेश संधियों का आधुनिकीकरण वैश्विक निवेश परिदृश्य में भारत की स्थिति को बेहतर बनाता है।

शासन और नीतिगत महत्व

  • नया ढाँचा निवेशक संरक्षण और राज्य के सार्वजनिक हित में विनियमन के अधिकार के बीच सावधानीपूर्वक संतुलन बनाता है, जिससे संप्रभु शासन के लिए पर्याप्त नीतिगत स्थान बना रहता है।
  • यह भारत की निवेश नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है, जो पहले के अधिक सतर्क दृष्टिकोण से हटकर अधिक लचीलेपन की ओर बढ़ रहा है।
  • सरकार द्वारा 2016 के मॉडल BIT की समीक्षा और नए टेम्पलेट को मंजूरी देने की घोषणा नीति निर्माण में सक्रिय दृष्टिकोण को दर्शाती है।

चुनौतियाँ

1. ELR अवधि में एकरूपता का अभाव

  • विभिन्न BITs में ELR अवधि (जैसे UAE के साथ 3 साल, सऊदी अरब के साथ 2 साल) में भिन्नता निवेशकों के लिए भ्रम पैदा कर सकती है और एक समान निवेश माहौल को बाधित कर सकती है।
  • विशेषज्ञों ने इस मुद्दे पर एक समान संधि अभ्यास की आवश्यकता पर बल दिया है।

2. राज्य के विनियमन के अधिकार का संतुलन

  • निवेशक संरक्षण और राज्य के सार्वजनिक हित में विनियमन के अधिकार के बीच सही संतुलन बनाना एक सतत चुनौती है, ताकि संप्रभु नीतिगत स्थान बना रहे।
  • बहुत अधिक निवेशक-अनुकूल प्रावधान राज्य की नियामक क्षमता को सीमित कर सकते हैं।

3. अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता की लागत और जटिलता

  • ISDS तंत्र तक बढ़ी हुई पहुँच से भारत के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता दावों की संख्या में वृद्धि हो सकती है, जिसमें कानूनी लागत और समय शामिल है।
  • इन विवादों का प्रबंधन करना जटिल और संसाधन-गहन हो सकता है।

4. वैश्विक निवेश मानकों के साथ तालमेल

  • भारत को अपने BITs को वैश्विक निवेश मानकों और सर्वोत्तम प्रथाओं के साथ संरेखित करना होगा ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे प्रभावी हैं और अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों द्वारा स्वीकार किए जाते हैं।
  • लगातार बदलते वैश्विक आर्थिक परिदृश्य के अनुकूल होना आवश्यक है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
ELR अवधि में भिन्नता निवेशकों के लिए भ्रम और असमान व्यवहार की संभावना।
राज्य के विनियमन के अधिकार का संरक्षण निवेशक संरक्षण के साथ सार्वजनिक हित में नियामक क्षमता को संतुलित करना।
ISDS दावों में वृद्धि अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता की लागत और प्रशासनिक बोझ।
मॉडल BIT का निरंतर विकास बदलते वैश्विक निवेश परिदृश्य के अनुकूल होने की आवश्यकता।

आगे की राह

  • ELR अवधि के संबंध में एक समान और सुसंगत संधि अभ्यास विकसित करना, संभवतः 1-2 वर्ष की अवधि के साथ।
  • निवेशक संरक्षण और राज्य के विनियमन के अधिकार के बीच संतुलन को लगातार परिष्कृत करना, जिससे संप्रभु नीतिगत स्थान बना रहे।
  • ISDS तंत्र के दुरुपयोग को रोकने और मध्यस्थता की लागत को कम करने के लिए तंत्र विकसित करना।
  • नए BITs पर हस्ताक्षर करते समय विभिन्न व्यापारिक भागीदारों की विशिष्ट आवश्यकताओं और संवेदनशीलता पर विचार करना।
  • अंतर्राष्ट्रीय निवेश कानून और मध्यस्थता में घरेलू विशेषज्ञता को मजबूत करना।
  • निवेश संधियों की प्रभावशीलता का नियमित मूल्यांकन करना और आवश्यकतानुसार उन्हें अद्यतन करना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

द्विपक्षीय निवेश संधि · BIT मॉडल 2016 · स्थानीय उपचारों की समाप्ति · निवेशक-राज्य विवाद निपटान · प्रत्यक्ष विदेशी निवेश · आर्थिक संवृद्धि · अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता · निवेश संरक्षण · नीतिगत स्थान · वैश्विक निवेश

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 253’, ‘note’: ‘अंतर्राष्ट्रीय समझौतों को लागू करने की शक्ति’}

अवधारणा प्रवाह

विदेशी निवेश आकर्षित करने की आवश्यकता  →  2016 के मॉडल BIT की समीक्षा और कमियाँ  →  नए BIT ढाँचे का विकास (ELR में लचीलापन)  →  UAE, सऊदी अरब जैसे देशों के साथ नए BITs पर हस्ताक्षर  →  विदेशी निवेश में वृद्धि और आर्थिक संवृद्धि  →  निवेशक संरक्षण और राज्य के विनियमन के अधिकार का संतुलन

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) दो देशों के बीच एक समझौता है जो एक-दूसरे के राष्ट्रों में निजी निवेश को नियंत्रित करता है।
2. निवेशक-राज्य विवाद निपटान (ISDS) तंत्र विदेशी निवेशों की सुरक्षा के लिए डिज़ाइन किया गया है, जिससे निवेशकों को मेजबान राज्यों के खिलाफ संधि उल्लंघनों के दावों को लाने की अनुमति मिलती है।
3. भारत ने 2016 में अपने मॉडल BIT में ‘स्थानीय उपचारों की समाप्ति’ (ELR) के लिए पाँच वर्ष की अवधि अनिवार्य की थी।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि BITs वास्तव में दो देशों के बीच निजी निवेश के नियमों को परिभाषित करते हैं। कथन 2 भी सही है क्योंकि ISDS तंत्र निवेशकों को मेजबान राज्यों के खिलाफ संधि उल्लंघनों के दावों को उठाने की अनुमति देता है। कथन 3 भी सही है क्योंकि भारत ने 2016 में अपने मॉडल BIT में स्थानीय उपचारों की समाप्ति के लिए पाँच वर्ष की अवधि अनिवार्य की थी, जो विदेशी निवेशकों के लिए एक बड़ी चुनौती थी।

Q2. द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) के संदर्भ में, ‘स्थानीय उपचारों की समाप्ति’ (ELR) नियम का क्या अर्थ है?

  1. यह एक नियम है जो विदेशी निवेशक को अंतर्राष्ट्रीय दावा दायर करने से पहले मेजबान राज्य के घरेलू न्यायालयों या प्रशासनिक निकायों में निवारण प्राप्त करने की आवश्यकता होती है।
  2. यह एक नियम है जो मेजबान राज्य को किसी भी अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता से पहले निवेशक के सभी दावों को समाप्त करने की अनुमति देता है।
  3. यह एक नियम है जो निवेशक को स्थानीय कानूनों का पालन करने से छूट देता है यदि कोई विवाद उत्पन्न होता है।
  4. यह एक नियम है जो मेजबान राज्य को किसी भी निवेश विवाद को स्थानीय स्तर पर निपटाने के लिए मजबूर करता है, भले ही निवेशक सहमत न हो।

उत्तर: यह एक नियम है जो विदेशी निवेशक को अंतर्राष्ट्रीय दावा दायर करने से पहले मेजबान राज्य के घरेलू न्यायालयों या प्रशासनिक निकायों में निवारण प्राप्त करने की आवश्यकता होती है। — स्थानीय उपचारों की समाप्ति (ELR) नियम का अर्थ है कि एक विदेशी निवेशक को अंतर्राष्ट्रीय दावा दायर करने से पहले मेजबान राज्य के घरेलू न्यायालयों या प्रशासनिक निकायों में निवारण प्राप्त करना होगा। यह अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता का सहारा लेने से पहले घरेलू कानूनी प्रक्रियाओं को प्राथमिकता देता है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत ने हाल ही में द्विपक्षीय निवेश संधियों (BITs) के अपने दृष्टिकोण में बदलाव किया है। 2016 के मॉडल BIT की प्रमुख विशेषताओं पर चर्चा कीजिए और समझाइए कि नए समझौतों में ‘स्थानीय उपचारों की समाप्ति’ (ELR) नियम में अधिक लचीलापन क्यों दिखाया गया है। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) क्या है और भारत के लिए इसका महत्व। 2016 में भारत द्वारा दर्जनों BITs को समाप्त करने के संदर्भ का संक्षिप्त उल्लेख।
2. **2016 मॉडल BIT की प्रमुख विशेषताएँ:**
* ‘स्थानीय उपचारों की समाप्ति’ (ELR) के लिए पाँच वर्ष की अनिवार्य अवधि पर जोर।
* निवेशक-राज्य विवाद निपटान (ISDS) तंत्र तक पहुंच को प्रतिबंधित करना।
* राज्य के विनियमन के अधिकार (Right to Regulate) पर अधिक ध्यान केंद्रित करना।
* सार्वजनिक हित में नीतिगत स्थान (Policy Space) को संरक्षित करने का प्रयास।
3. **नए समझौतों में लचीलेपन के कारण:**
* **निवेश प्रवाह में कमी:** शुद्ध निवेश प्रवाह में तीव्र गिरावट को संबोधित करना।
* **निवेशक-मित्रता:** विदेशी निवेश को आकर्षित करने और उसे बनाए रखने के लिए अधिक निवेशक-अनुकूल माहौल बनाना।
* **ELR अवधि में कमी:** UAE (तीन वर्ष) और सऊदी अरब (दो वर्ष) जैसे देशों के साथ नए समझौतों में ELR अवधि को कम करना।
* **ISDS तक बेहतर पहुंच:** निवेशकों को ISDS तंत्र तक बेहतर पहुंच प्रदान करना, जिससे कानूनी निश्चितता और विश्वास बढ़ता है।
* **संतुलित दृष्टिकोण:** निवेशक संरक्षण और राज्य के विनियमन के अधिकार के बीच संतुलन स्थापित करना।
4. **निष्कर्ष:** भारत के बदलते दृष्टिकोण का महत्व, आर्थिक संवृद्धि पर इसका संभावित प्रभाव और वैश्विक निवेश परिदृश्य में भारत की स्थिति।

स्रोत: The Indian Express


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