15 Oct भारत ने यूएन मानवाधिकार कार्यालय पर आरोप लगाया: ‘दोहरे मापदंड’ का आरोप
✎ मानवाधिकार रिपोर्टिंग की विश्वसनीयता तभी बनती है जब मानदंड सभी देशों पर समान रूप से लागू हों, क्योंकि चयनात्मकता बहुपक्षवाद में भरोसे को कमजोर करती है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — अंतरराष्ट्रीय संबंध (संयुक्त राष्ट्र और उसकी संस्थाएँ, बहुपक्षवाद) | GS Paper II — राजव्यवस्था (संविधान के मौलिक अधिकार, अनुच्छेद 19, 21 और 32)
- Prelims: OHCHR (Office of the United Nations High Commissioner for Human Rights) — मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UN Human Rights Council) — जिनेवा स्थित, 47 सदस्य, महासभा की तीसरी समिति (Third Committee) — सामाजिक, मानवीय और सांस्कृतिक मामले, सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा (Universal Periodic Review — UPR), संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(7) — घरेलू अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप का निषेध, अनुच्छेद 19(2) — सार्वजनिक व्यवस्था के आधार पर युक्तियुक्त निर्बंधन, अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020) — इंटरनेट निलंबन की आनुपातिकता और न्यायिक समीक्षा
- Essay: मानवाधिकारों की सार्वभौमिकता बनाम अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में चयनात्मकता, बहुपक्षवाद में विश्वास: वैश्विक मानदंडों की विश्वसनीयता की चुनौती
त्वरित पुनरावृत्ति: मानवाधिकार रिपोर्टिंग की विश्वसनीयता तभी बनती है जब मानदंड सभी देशों पर समान रूप से लागू हों, क्योंकि चयनात्मकता बहुपक्षवाद में भरोसे को कमजोर करती है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति की बैठक में भारत के प्रतिनिधि अनुज स्वरूप ने मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर तुर्क की ब्रीफिंग के बाद OHCHR पर ‘दोहरे मानदंड’ और ‘चयनात्मकता’ का आरोप लगाया। भारत का कहना है कि उसके पड़ोस और पश्चिमी देशों में हुई विरोध-प्रदर्शनों की हिंसक प्रतिक्रियाओं पर रिपोर्टों में टिप्पणी नहीं की गई। साथ ही उन्होंने भारत के संवैधानिक ढाँचे, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख पर भारत के रुख को दोहराया और पाकिस्तान-अधिकृत जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकार स्थिति पर OHCHR से समान सक्रियता की अपेक्षा जताई। भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह मानवाधिकार परिषद के सदस्य के रूप में उच्चायुक्त और OHCHR के साथ सहयोग जारी रखेगा। यह प्रकरण इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इससे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार तंत्र की निष्पक्षता और उस पर भरोसे का प्रश्न सामने आता है।
पृष्ठभूमि
- OHCHR की स्थापना 1993 में वियना विश्व मानवाधिकार सम्मेलन की सिफारिशों के आधार पर संयुक्त राष्ट्र महासभा के संकल्प द्वारा हुई। इसका प्रमुख मानवाधिकार उच्चायुक्त होता है, जो संयुक्त राष्ट्र महासचिव को नहीं, बल्कि सीधे महासचिव के अधीन कार्य करता है।
- वर्ष 2006 में मानवाधिकार आयोग (Commission on Human Rights) के स्थान पर मानवाधिकार परिषद अस्तित्व में आई। परिषद के सदस्य महासभा द्वारा गुप्त मतदान से चुने जाते हैं और भौगोलिक वितरण का ध्यान रखा जाता है।
- वोल्कर तुर्क वर्तमान उच्चायुक्त हैं। उनकी रिपोर्टें और बयान विभिन्न देशों में विरोध-प्रदर्शनों, सुरक्षा बलों के कार्यों और इंटरनेट प्रतिबंधों पर केंद्रित रहते हैं।
- संयुक्त राष्ट्र चार्टर घरेलू मामलों में हस्तक्षेप का निषेध करता है, जबकि मानवाधिकार संस्थाएँ अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही की बात करती हैं। इन दोनों सिद्धांतों के बीच संतुलन बनाना इस विवाद की मूल पृष्ठभूमि है।
- भारत में मौलिक अधिकार संविधान के भाग III में हैं और सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा तथा अन्य आधारों पर युक्तियुक्त निर्बंधनों के अधीन हैं। भारत का तर्क है कि शिकायत निवारण के लिए न्यायालय उपलब्ध हैं।
मानवाधिकार रिपोर्टिंग में ‘चयनात्मकता’ क्या है?
- चयनात्मकता का अर्थ है कि एक ही प्रकार की घटनाओं पर अलग-अलग देशों के संबंध में अलग स्तर की टिप्पणी या जाँच की जाए। आलोचना तब उठती है जब समान परिस्थितियों में प्रतिक्रिया में असमानता दिखे।
- दोहरे मानदंड का आशय है कि एक ही सिद्धांत को सभी पर समान रूप से लागू न किया जाए। बहुपक्षीय मंच पर यह विश्वास को कमजोर करता है।
- OHCHR के पास विशेष प्रक्रियाएँ (Special Procedures), संधि निकाय (Treaty Bodies) और सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा जैसे तंत्र हैं। UPR में प्रत्येक सदस्य देश की मानवाधिकार स्थिति की नियमित समीक्षा होती है।
- ‘राइट ऑफ रिप्लाई’ (उत्तर देने का अधिकार) वह कूटनीतिक प्रक्रिया है जिसमें प्रभावित देश अपना पक्ष रखता है। भारत ने इसी मंच का उपयोग अपना रुख दर्ज कराने के लिए किया।
- भारतीय संविधान में अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा का अधिकार देता है, जिस पर अनुच्छेद 19(2) और 19(3) के अंतर्गत सार्वजनिक व्यवस्था के आधार पर युक्तियुक्त निर्बंधन लगाए जा सकते हैं।
- अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है, जबकि अनुच्छेद 32 और 226 के तहत नागरिक सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में राहत माँग सकते हैं।
- सर्वोच्च न्यायालय ने अनुराधा भसीन मामले (2020) में कहा कि इंटरनेट निलंबन आनुपातिक, सीमित अवधि का और न्यायिक समीक्षा के अधीन होना चाहिए।
- बहुपक्षवाद की विश्वसनीयता इस पर निर्भर है कि मानदंड सभी देशों पर समान रूप से लागू हों। इसी कारण यह विषय संयुक्त राष्ट्र सुधार और वैश्विक शासन की बहस से भी जुड़ता है।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| संस्थागत संदर्भ | संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (Office of the United Nations High Commissioner for Human Rights – OHCHR) मानवाधिकार स्थिति पर रिपोर्ट और वक्तव्य जारी करता है। स्रोत में इसे OCHR लिखा गया है, जबकि मान्य संक्षिप्त नाम OHCHR है। |
| मंच | महासभा की तीसरी समिति (Third Committee) सामाजिक, मानवीय और सांस्कृतिक मामलों पर विचार करती है। इसी सत्र में उच्चायुक्त वोल्कर तुर्क की ब्रीफिंग के बाद भारत ने अपनी आपत्ति दर्ज की। |
| भारत की स्थिति | भारत मानवाधिकार परिषद (Human Rights Council) का सदस्य है। भारत ने कहा कि वह उच्चायुक्त और कार्यालय के साथ विश्वास और साझेदारी की भावना से काम जारी रखेगा। |
| आरोप की प्रकृति | भारत ने ‘दोहरे मानदंड’ (double standards) और ‘अत्यधिक चयनात्मकता’ (extreme selectivity) का आरोप लगाया। उसके अनुसार पड़ोस और पश्चिमी देशों में जन-प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसक प्रतिक्रियाओं पर रिपोर्टों में टिप्पणी नहीं की गई। |
| संवैधानिक तर्क | भारत ने कहा कि संविधान के भाग III में दिए गए मौलिक अधिकार सभी नागरिकों को प्राप्त हैं, परंतु ये लोक व्यवस्था और सुरक्षा के अधीन हैं। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के संबंध में भी उसने यही रुख दोहराया। |
| विवादित क्षेत्र संबंधी मांग | भारत ने पाकिस्तान-अधिकृत जम्मू-कश्मीर के संबंध में उच्चायुक्त की रिपोर्टों की तुलना में पाकिस्तान सरकार द्वारा उठाए गए कदमों पर रिपोर्ट की मांग की। यह मुद्दा संयुक्त राष्ट्र मंच पर भारत-पाकिस्तान विवाद का हिस्सा बन गया। |
महत्व
कूटनीतिक एवं बहुपक्षीय
- बहुपक्षीय संस्थाओं की विश्वसनीयता इस बात पर टिकी है कि सभी देशों पर एक समान मानदंड लागू हों। चयनात्मक रिपोर्टिंग से संस्थाओं में विश्वास घटता है।
- भारत मानवाधिकार परिषद का सदस्य होने के कारण संस्थाओं के भीतर रहकर अपनी आपत्ति रखता है। इससे संवाद और सुधार की संभावना बनी रहती है।
- महासभा की समितियों में ‘उत्तर का अधिकार’ (right of reply) जैसी प्रक्रियाओं से देश अपना पक्ष रिकॉर्ड पर लाते हैं।
मानवाधिकार शासन
- मानवाधिकार की सार्वभौमिकता का सिद्धांत मानता है कि सभी व्यक्तियों के अधिकार समान हैं। सार्वभौम घोषणा (Universal Declaration of Human Rights), 1948 इसी दृष्टि पर आधारित है।
- नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदा (International Covenant on Civil and Political Rights – ICCPR) में जन-प्रदर्शन, सभा और विधि-सम्मत प्रक्रिया से जुड़े प्रावधान हैं। इनके क्रियान्वयन की निगरानी में निष्पक्षता आवश्यक है।
- सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा (Universal Periodic Review) जैसी प्रक्रियाएँ सभी सदस्य देशों को समान आधार पर परखती हैं।
संवैधानिक एवं विधिक
- भारत का संविधान मौलिक अधिकारों के साथ उचित प्रतिबंधों की व्यवस्था करता है, जिससे जन-प्रदर्शन के अधिकार और लोक व्यवस्था के बीच संतुलन बनता है।
- न्यायालयों की उपलब्धता को भारत ने मानवाधिकार संरक्षण का मुख्य माध्यम बताया। इससे घरेलू न्यायिक उपायों और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टिंग के बीच संबंध का प्रश्न उठता है।
- जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के बाद भारत ने इस क्षेत्र को अपने संवैधानिक ढांचे का अभिन्न भाग बताया है। यह तर्क संप्रभुता से जुड़ा है।
क्षेत्रीय एवं सुरक्षा
- दक्षिण एशिया में जन-प्रदर्शनों और सुरक्षा बलों की कार्रवाई पर अंतरराष्ट्रीय टिप्पणियाँ क्षेत्रीय स्थिरता और द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित करती हैं।
- भारत-पाकिस्तान के बीच मानवाधिकार का मुद्दा संयुक्त राष्ट्र मंचों पर बार-बार आता है, जिससे इन मंचों की तटस्थता पर प्रश्न उठते हैं।
चुनौतियाँ
1. चयनात्मकता बनाम सार्वभौमिकता
- एक ही प्रकार की घटनाओं पर अलग-अलग स्तर की प्रतिक्रिया से संस्था की विश्वसनीयता घटती है।
- यदि कुछ देशों की घटनाएँ विस्तार से और कुछ की संक्षेप में दर्ज हों, तो रिपोर्टों की पद्धति पर सवाल उठते हैं।
- सार्वभौमिकता का अर्थ है कि मानदंड सभी पर समान रूप से लागू हों, चाहे देश कोई भी हो।
यूपीएससी लिंक: GS-2: अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ और मानवाधिकार
2. बहुपक्षवाद में विश्वास का क्षरण
- भारत ने चेतावनी दी कि दोहरे मानदंड बहुपक्षवाद और OHCHR के कार्य में विश्वास को कम करते हैं।
- सहयोग के लिए सदस्य देशों का भरोसा आवश्यक है, विशेषकर जब संस्थाएँ वित्तीय और राजनयिक समर्थन पर निर्भर हों।
यूपीएससी लिंक: GS-2: भारत के हित और बहुपक्षीय संस्थाएँ
3. लोक व्यवस्था और जन-प्रदर्शन के अधिकार का संतुलन
- मौलिक अधिकार निरपेक्ष नहीं हैं। लोक व्यवस्था और सुरक्षा के आधार पर उनपर उचित प्रतिबंध लग सकते हैं।
- प्रतिबंधों की वैधता, आनुपातिकता और प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं, जिनकी जांच न्यायालय करते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-2: मौलिक अधिकार और राज्य की भूमिका
4. संघर्ष-क्षेत्रों में जवाबदेही और स्वतंत्र जांच
- हिंसा की घटनाओं में स्वतंत्र, त्वरित और निष्पक्ष जांच मानवाधिकार संरक्षण का मूल तत्व है।
- इंटरनेट पर प्रतिबंध, कानूनी प्रतिनिधित्व और परिवार से संपर्क जैसे विषय भी जवाबदेही के दायरे में आते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-2: मानवाधिकार और संवैधानिक संरक्षण
5. तथ्यों की पुष्टि और रिपोर्टिंग की पारदर्शिता
- सीमित पहुंच वाले क्षेत्रों में तथ्यों की पुष्टि कठिन होती है, जिससे रिपोर्टें अधूरी या एकपक्षीय दिख सकती हैं।
- स्रोतों की विविधता और खुली पद्धति से रिपोर्टों पर भरोसा बढ़ता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की कार्यप्रणाली
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| दोहरे मानदंड का आरोप | एक समान पद्धति न अपनाए जाने पर संस्था की निष्पक्षता पर प्रश्न उठता है और सदस्य देशों का सहयोग घटता है। |
| संप्रभुता बनाम बाहरी टिप्पणी | आंतरिक कानून-व्यवस्था के मामलों में बाहरी टिप्पणी को देश अपनी संप्रभुता में हस्तक्षेप मान सकते हैं। |
| लोक व्यवस्था बनाम मौलिक अधिकार | प्रतिबंधों की आवश्यकता और अधिकारों के संरक्षण के बीच संतुलन बनाना कठिन होता है। |
| जवाबदेही और जांच | हिंसा के आरोपों की स्वतंत्र और समयबद्ध जांच न होने से पीड़ितों को न्याय मिलने में विलंब होता है। |
| संयुक्त राष्ट्र मंचों का राजनीतिकरण | पड़ोसी देशों के बीच विवादित मुद्दे मानवाधिकार चर्चा में उठते हैं, जिससे मूल विषय पीछे रह सकता है। |
| सूचना और पहुंच की सीमा | इंटरनेट बंदी और प्रतिबंधों के कारण स्वतंत्र सत्यापन कठिन होता है। |
आगे की राह
- सभी देशों की घटनाओं पर एक समान पद्धति, मानक और प्रक्रिया अपनाई जाए, ताकि चयनात्मकता का आरोप न लगे।
- सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा जैसी प्रक्रियाओं में सभी सदस्य देशों के रिकॉर्ड की समान जांच हो।
- हिंसा और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों की स्वतंत्र, त्वरित और पारदर्शी जांच सुनिश्चित हो।
- संबंधित देश अपने घरेलू न्यायिक उपायों और विधि-सम्मत प्रक्रिया की जानकारी रिपोर्टों में उपलब्ध कराएँ।
- तथ्य-संग्रह में खुली पहुंच और स्रोतों के सत्यापन की प्रक्रिया को मजबूत किया जाए।
- उच्चायुक्त कार्यालय और सदस्य देशों के बीच नियमित, रचनात्मक और द्विपक्षीय संवाद बनाए रखा जाए।
- अंतरराष्ट्रीय विधि और संधि-दायित्वों के सम्मान की भारतीय प्रतिबद्धता (अनुच्छेद 51) को संवाद के आधार के रूप में प्रयोग किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
मानवाधिकार सार्वभौमिकता (Universality of Human Rights) · दोहरे मापदंड (Double Standards) · चयनात्मकता (Selectivity) · बहुपक्षवाद (Multilateralism) · संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) · संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UN Human Rights Council) · सार्वभौමिक आवधिक समीक्षा (Universal Periodic Review) · अनुच्छेद 19(2) के उचित निर्बंधन · अनुच्छेद 21 और प्रक्रियागत न्याय · न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) · संप्रभुता बनाम अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायित्व · विरोध-प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक व्यवस्था
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 19 — सभा और जन-प्रदर्शन पर उचित प्रतिबंध
- अनुच्छेद 21 — जीवन और विधि-सम्मत प्रक्रिया का संरक्षण
- अनुच्छेद 32 — मौलिक अधिकारों के लिए सर्वोच्च न्यायालय का उपाय
- अनुच्छेद 51 — अंतरराष्ट्रीय विधि और संधि-दायित्वों का सम्मान
अवधारणा प्रवाह
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जन-प्रदर्शनों और हिंसक प्रतिक्रियाओं की घटनाएँ सामने आती हैं। → संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय इन घटनाओं पर रिपोर्ट और वक्तव्य तैयार करता है। → महासभा की तीसरी समिति में उच्चायुक्त की ब्रीफिंग होती है और सदस्य देश अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। → भारत मानवाधिकार परिषद के सदस्य के रूप में रिपोर्टिंग में चयनात्मकता और दोहरे मानदंडों का आरोप लगाता है। → भारत अपने संवैधानिक ढांचे, लोक व्यवस्था की आवश्यकता और न्यायिक उपायों का तर्क रखता है। → भारत पाकिस्तान से समान मानदंड पर रिपोर्ट की मांग करता है, जिससे क्षेत्रीय विवाद संयुक्त राष्ट्र मंच पर आता है। → इस विवाद का दीर्घकालिक प्रभाव बहुपक्षीय संस्थाओं में विश्वास और सहयोग की स्थिति पर पड़ता है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की स्थापना संयुक्त राष्ट्र महासभा के संकल्प द्वारा वर्ष 2006 में की गई थी, जिसने मानवाधिकार आयोग का स्थान लिया।
2. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त की नियुक्ति संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा की जाती है।
3. सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा (Universal Periodic Review) की प्रक्रिया मानवाधिकार परिषद के अंतर्गत संचालित होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: मानवाधिकार परिषद महासभा संकल्प 60/251 (2006) द्वारा बनी और उसने पूर्ववर्ती मानवाधिकार आयोग का स्थान लिया। कथन 2 गलत है: उच्चायुक्त की नियुक्ति महासचिव करते हैं, जिसकी स्वीकृति महासभा देती है, सुरक्षा परिषद नहीं। कथन 3 सही है: UPR मानवाधिकार परिषद की विशिष्ट प्रक्रिया है, जिसमें सभी सदस्य राज्यों के रिकॉर्ड की समीक्षा होती है। अतः उत्तर केवल दो है।
Q2. अभिकथन (A) और कारण (R) पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): भारत में मौलिक अधिकार निरपेक्ष नहीं हैं और राज्य विरोध-प्रदर्शनों पर सार्वजनिक व्यवस्था के आधार पर उचित निर्बंधन लगा सकता है।
कारण (R): संविधान के अनुच्छेद 19(2) में वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सार्वजनिक व्यवस्था सहित कुछ आधारों पर उचित निर्बंधन लगाने की व्यवस्था है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (A) सही है, परंतु (R) गलत है।
- (A) गलत है, परंतु (R) सही है।
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — अनुच्छेद 19(2) राज्य को सार्वजनिक व्यवस्था, शिष्टाचार, राज्य की सुरक्षा आदि आधारों पर उचित निर्बंधन लगाने की शक्ति देता है, इसलिए मौलिक अधिकार निरपेक्ष नहीं हैं। कारण (R) अभिकथन (A) की वैधानिक आधारशिला है। निर्बंधन की उचित्तता की जाँच न्यायालय करते हैं, जैसा श्रेया सिंघल मामले (2015) में हुआ।
Q3. निम्नलिखित सुमेलन कीजिए:
सूची I (संस्था)
A. संयुक्त राष्ट्र महासभा की तृतीय समिति
B. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद
C. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (भारत)
सूची II (विशेषता)
1. सामाजिक, मानवीय और सांस्कृतिक विषयों से संबंधित समिति
2. मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के अंतर्गत गठित वैधानिक निकाय
3. महासभा द्वारा भौगोलिक आधार पर चुने गए 47 सदस्य राज्य
सही सुमेलन चुनिए:
- A-3, B-1, C-2
- A-1, B-2, C-3
- A-2, B-3, C-1
- A-3, B-2, C-1
उत्तर: A-3, B-1, C-2 — महासभा की तृतीय समिति सामाजिक, मानवीय और सांस्कृतिक मामलों को देखती है, इसलिए A-1 नहीं, बल्कि सुमेलन में B-1 का संबंध मानवाधिकार परिषद से नहीं है। इस प्रश्न में सही सुमेलन A-3 (मानवाधिकार परिषद के 47 सदस्य), B-1 (तृतीय समिति) और C-2 (मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के अंतर्गत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग) है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ मानवाधिकारों की सार्वभौमिकता और राज्यों की संप्रभुता के बीच का तनाव संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार तंत्र की विश्वसनीयता को किस प्रकार प्रभावित करता है? चयनात्मकता के आरोपों के संदर्भ में आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(2) और अनुच्छेद 21 के ढाँचे में विरोध-प्रदर्शनों के दौरान राज्य की कार्रवाई की न्यायिक समीक्षा किन कसौटियों पर होती है और यह बहुपक्षीय संवाद के लिए क्या अर्थ रखती है। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर संरचना (मॉडल-उत्तर संकेत-बिंदु): (1) भूमिका: 2026 में भारत द्वारा OHCHR पर दोहरे मापदंड और चयनात्मकता के आरोप का उल्लेख करें (महासभा की तृतीय समिति में प्रथम सचिव अनुज स्वरूप का बयान; उच्चायुक्त वोल्कर तुर्क की रिपोर्टें), बिना किसी पक्ष को अंतिम रूप से दोषी ठहराए। (2) सार्वभौमिकता के पक्ष: मानवाधिकार सार्वभौमिक, अविभाज्य और परस्पर निर्भर हैं (वियना घोषणा, 1993); सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा (UDHR), 1948; नागरिक एवं राजनीतिक अधिकार अंतरराष्ट्रीय प्रतिज्ञापत्र (ICCPR), 1966, जिसे भारत ने 1979 में अनुमोदित किया। OHCHR की स्थापना 1993 में महासभा संकल्प 48/141 से हुई। (3) संप्रभुता के पक्ष: संयुक्त राष्ट्र चार्टर अनुच्छेद 2(7) घरेलू मामलों में हस्तक्षेप से रोकता है; राज्य का तर्क कि तुलनात्मक रिपोर्टिंग असंतुलित होने से बहुपक्षवाद का विश्वास घटता है। (4) चयनात्मकता की जाँच: मानवाधिकार परिषद के 47 सदस्य, UPR की भूमिका, विशेष प्रक्रियाएँ; विश्वसनीयता के लिए समान मानदंड और तथ्य-आधारित रिपोर्टिंग की आवश्यकता। (5) संवैधानिक ढाँचा: अनुच्छेद 19(2) के आधार; अनुच्छेद 21 में प्रक्रिया द्वारा स्थापित विधि (मेनका गांधी बनाम भारत संघ, 1978); श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) में निर्बंधन की उचित्तता; अनुवर्ती न्यायिक समीक्षा; अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020) में इंटरनेट निलंबन पर आनुपातिकता और कारणों के प्रकाशन की अपेक्षा। अनुच्छेद 32 और 226 के उपचार। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993) की भूमिका। (6) संतुलित निष्कर्ष: सार्वभौमिकता और संप्रभुता में समन्वय; पारदर्शी, समान और तथ्य-आधारित रिपोर्टिंग, घरेलू न्यायिक-संस्थागत उपायों का सम्मान तथा अंतरराष्ट्रीय संवाद में विश्वास बहाली; अनुच्छेद 51 (अंतरराष्ट्रीय विधि के प्रति सम्मान) का संदर्भ।
स्रोत: orissapost.com
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