15 Oct सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग पर राहुल गांधी के याचिका पर नोटिस जारी किया
✎ अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को निर्वाचनों के अधीक्षण की शक्ति देता है, जबकि अनुच्छेद 329 के अनुसार निर्वाचन परिणामों को निर्वाचन याचिका के माध्यम से ही चुनौती दी जा सकती है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS पेपर II — राजव्यवस्था एवं शासन (संवैधानिक निकाय, निर्वाचन आयोग, न्यायपालिका की भूमिका) | GS पेपर II — राजव्यवस्था एवं शासन (लोकतांत्रिक प्रक्रियाएँ और जनप्रतिनिधित्व)
- Prelims: अनुच्छेद 324 (निर्वाचन आयोग में निर्वाचनों के अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण की शक्ति), अनुच्छेद 329 (निर्वाचन सम्बन्धी मामलों में न्यायालयीय हस्तक्षेप पर रोक), अनुच्छेद 32 (मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु रिट क्षेत्राधिकार), मुख्य निर्वाचन आयुक्त (Chief Election Commissioner) की पदावधि और हटाने की प्रक्रिया, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और 1951 (निर्वाचक नामावली और निर्वाचन संचालन), निर्वाचन याचिका (Election Petition) और उसकी सुनवाई का अधिकार क्षेत्र, आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) का स्वरूप और लागू होने का समय, न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की सीमाएँ
- Essay: संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और जनविश्वास: लोकतंत्र में निर्वाचन आयोग की साख, न्यायिक हस्तक्षेप और निर्वाचन प्रक्रिया की शुचिता के बीच संतुलन
त्वरित पुनरावृत्ति: अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को निर्वाचनों के अधीक्षण की शक्ति देता है, जबकि अनुच्छेद 329 के अनुसार निर्वाचन परिणामों को निर्वाचन याचिका के माध्यम से ही चुनौती दी जा सकती है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और उनके साथ 12 अन्य विपक्षी नेताओं की याचिका पर भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) और तीनों निर्वाचन आयुक्तों को नोटिस जारी किया है। याचिका में कथित निर्वाचन अनियमितताओं और निर्वाचन आयोग के कामकाज की स्वतंत्र जाँच की माँग की गई है। यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें निर्वाचन आयोग की संवैधानिक भूमिका, उसकी स्वायत्तता, और न्यायालय के समक्ष ऐसे विवादों की सुनवाई के अधिकार-क्षेत्र जैसे प्रश्न एक साथ सामने आते हैं। न्यायालय ने अभी केवल नोटिस जारी किया है, अर्थात् पक्षकारों से जवाब माँगा गया है; इस पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला गया है। परीक्षा की दृष्टि से इस घटना को तथ्य के रूप में और संस्थागत प्रक्रिया के उदाहरण के रूप में समझना आवश्यक है।
पृष्ठभूमि
- भारत का निर्वाचन आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत स्थापित एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय है, जिसे संसद, राज्य विधानमंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के निर्वाचनों के अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण की शक्ति प्राप्त है।
- निर्वाचन आयोग में एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त होते हैं; वर्तमान व्यवस्था में आयोग बहु-सदस्यीय है, इसलिए नोटिस तीनों आयुक्तों को भी भेजा गया।
- संविधान ने निर्वाचन आयोग को कार्यपालिका के प्रभाव से बचाने के लिए सुरक्षा उपाय किए हैं, जैसे मुख्य निर्वाचन आयुक्त को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान रीति से ही हटाया जा सकना।
- निर्वाचन सम्बन्धी विवादों के समाधान की व्यवस्था अनुच्छेद 329 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में है, जिसके अंतर्गत चुनाव परिणाम को निर्वाचन याचिका के माध्यम से ही चुनौती दी जा सकती है।
- सर्वोच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर रिट क्षेत्राधिकार का प्रयोग कर सकता है, और संस्थागत कार्यप्रणाली से जुड़े प्रश्नों पर भी विचार कर सकता है, किंतु चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप की सीमाएँ न्यायिक व्याख्या से तय होती हैं।
निर्वाचन आयोग और निर्वाचन विवादों की संवैधानिक व्यवस्था क्या है?
- अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग को निर्वाचनों के संचालन के लिए व्यापक अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण की शक्ति दी गई है। यह शक्ति संसद द्वारा बनाए गए विधानों के अधीन है।
- मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की सेवा शर्तें संसद द्वारा निर्धारित की जाती हैं। मुख्य निर्वाचन आयुक्त को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की भाँति ही हटाया जा सकता है, जबकि अन्य आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश पर हटाया जा सकता है।
- अनुच्छेद 329 के अनुसार निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन और निर्वाचन सम्बन्धी विधि के विषयों में न्यायालयीय हस्तक्षेप सीमित रखा गया है। निर्वाचन के परिणाम को निर्वाचन याचिका द्वारा ही चुनौती दी जाती है।
- जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 निर्वाचक नामावली तैयार करने और निर्वाचन क्षेत्रों से सम्बन्धित व्यवस्थाएँ देता है, जबकि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 निर्वाचन के संचालन, अयोग्यता और निर्वाचन याचिकाओं से सम्बन्धित है।
- आदर्श आचार संहिता निर्वाचन आयोग द्वारा निर्वाचन की घोषणा के साथ लागू होती है। यह संहिता राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के आचरण को नियंत्रित करती है और इसका आधार निर्वाचन आयोग की विवेकाधीन शक्ति तथा परंपरा है, न कि किसी एक विधि का प्रावधान।
- न्यायिक समीक्षा के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय यह देख सकता है कि प्रशासनिक या संवैधानिक निकाय की कार्रवाई संविधान के अनुरूप है या नहीं, किंतु न्यायालय द्वारा निर्वाचन प्रक्रिया को स्थगित करना या परिणाम पलटना सामान्यतः निर्वाचन याचिका की प्रक्रिया से ही संभव होता है।
- सर्वोच्च न्यायालय का नोटिस जारी करना केवल प्रारंभिक चरण है। इसमें प्रतिवादी पक्ष से जवाब माँगा जाता है और न्यायालय तय करता है कि मामले में सुनवाई आगे बढ़ाई जाए या नहीं।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| याचिका का स्वरूप | लोक सभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन के 12 अन्य नेताओं ने कथित निर्वाचन अनियमितताओं और निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) के कामकाज की स्वतंत्र जाँच की माँग की है। यह मामला मुख्य रूप से निर्वाचन प्रक्रिया की पारदर्शिता और संस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा है। |
| सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई | सर्वोच्च न्यायालय ने निर्वाचन आयोग और उसके तीनों आयुक्तों को नोटिस जारी कर उनका पक्ष माँगा है। अभी याचिका के गुण-दोष पर कोई निर्णय नहीं हुआ है, इसलिए यह केवल प्रारंभिक चरण है। |
| संवैधानिक आधार | निर्वाचन आयोग की शक्तियाँ अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निहित हैं। मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए याचिका सीधे सर्वोच्च न्यायालय में अनुच्छेद 32 के अंतर्गत दायर की जा सकती है। |
| न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा | अनुच्छेद 329 निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप पर रोक लगाता है और चुनाव से जुड़े विवादों के लिए निर्वाचन याचिका की व्यवस्था करता है। इसलिए यह मामला न्यायालय के अधिकार-क्षेत्र की सीमाओं के प्रश्न को भी सामने लाता है। |
| नियुक्ति व्यवस्था की पृष्ठभूमि | सर्वोच्च न्यायालय के 2023 के निर्णय (Anoop Baranwal मामला) के बाद मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 लागू हुआ। इससे आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर संसदीय और संवैधानिक विमर्श जारी है। |
महत्व
संवैधानिक (Constitutional)
- निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता और उसकी संवैधानिक जवाबदेही की परख होती है।
- अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन की अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति की सीमाएँ स्पष्ट होने की संभावना है।
- न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के माध्यम से शक्तियों के प्रयोग की वैधता पर सिद्धांत विकसित हो सकते हैं।
लोकतांत्रिक (Democratic)
- निर्वाचन प्रक्रिया में जनविश्वास सुदृढ़ करने के लिए पारदर्शिता और जवाबदेही आवश्यक है।
- मतदाता सूची, मतदान और मतगणना से जुड़ी प्रक्रियाओं पर स्पष्टता से नागरिकों का भरोसा बढ़ सकता है।
संस्थागत (Institutional)
- नियंत्रण और संतुलन (Checks and Balances) की व्यवस्था में न्यायपालिका की भूमिका स्पष्ट होती है।
- संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता तभी बनी रहती है जब उनकी कार्यप्रणाली पर उठे प्रश्नों का खुला और प्रक्रियागत उत्तर मिले।
प्रक्रियागत (Procedural)
- यह मामला बताता है कि संवैधानिक याचिका (अनुच्छेद 32) और निर्वाचन विवाद (अनुच्छेद 329) की प्रक्रियाएँ अलग-अलग हैं, और उनका सही चयन महत्त्वपूर्ण है।
चुनौतियाँ
1. स्वतंत्र जाँच की संवैधानिक सीमा
- निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक निकाय है, और उसकी कार्यप्रणाली की जाँच का स्वरूप तय करना सूक्ष्म विधिक प्रश्न है।
- अनुच्छेद 329 के कारण चुनाव प्रक्रिया के दौरान न्यायिक हस्तक्षेप सीमित रखा गया है, इसलिए जाँच की माँग और संवैधानिक ढाँचे के बीच संतुलन आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: GS-II: भारतीय संविधान, संवैधानिक निकाय और न्यायपालिका की भूमिका
2. निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति और स्वायत्तता
- 2023 के अधिनियम के बाद नियुक्ति समिति की संरचना पर विभिन्न दृष्टिकोण सामने आए हैं।
- आयोग की स्वायत्तता तभी सुनिश्चित होती है जब नियुक्ति, सेवा-शर्तों और पदावधि की व्यवस्था पारदर्शी और सुरक्षित हो।
यूपीएससी लिंक: GS-II: संवैधानिक निकाय, नियुक्ति प्रक्रिया और स्वायत्तता
3. निर्वाचन प्रक्रिया में विश्वास की कमी
- आरोपों और खंडनों के बीच जनता के सामने तथ्य स्पष्ट न होने से संस्था की विश्वसनीयता पर प्रभाव पड़ता है।
- मतदाता सूची, इलेक्ट्रॉनिक मतदान प्रणाली और मतगणना से जुड़े प्रक्रियागत प्रश्नों का तकनीकी और प्रशासनिक स्पष्टीकरण आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: GS-II: शासन, लोक प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही
4. न्यायालय और संस्थाओं के बीच अधिकार-क्षेत्र
- निर्वाचन संबंधी विवादों के लिए निर्वाचन याचिका की वैधानिक व्यवस्था है, जबकि मौलिक अधिकार के उल्लंघन पर सीधी याचिका का विकल्प भी है।
- दोनों मार्गों के बीच अंतर स्पष्ट न होने पर प्रक्रियागत विलंब और विवाद बढ़ सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-II: न्यायपालिका, शक्तियों का पृथक्करण और संस्थाओं के बीच संबंध
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| जाँच का दायरा | स्वतंत्र जाँच का स्वरूप, दायरा और उसके अधिकार-क्षेत्र का निर्धारण स्पष्ट नहीं है। |
| संवैधानिक संतुलन | निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता और न्यायिक निगरानी के बीच सीमा-रेखा तय करना कठिन है। |
| विश्वास का संकट | संस्थाओं पर जनविश्वास में कमी का प्रभाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया की वैधता की धारणा पर पड़ सकता है। |
| नियुक्ति प्रक्रिया | आयुक्तों की नियुक्ति के तरीके पर चल रही बहस स्वायत्तता के प्रश्न से जुड़ी है। |
| प्रक्रियागत विलंब | नोटिस, जवाब और सुनवाई के चरणों में समय लगने से निर्णय में देरी की आशंका रहती है। |
आगे की राह
- सर्वोच्च न्यायालय में निर्वाचन आयोग द्वारा दिए गए जवाब में प्रक्रियाओं और तथ्यों का स्पष्ट और सत्यापन-योग्य विवरण प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
- निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़े आँकड़े, जैसे मतदाता सूची के संशोधन और मतगणना के रिकॉर्ड, सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराने की व्यवस्था सुदृढ़ की जानी चाहिए।
- आरोपों की जाँच के लिए स्पष्ट प्रक्रिया और समय-सीमा तय करने पर विचार किया जा सकता है, ताकि विवाद लंबे समय तक न खिंचे।
- नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और सभी संबंधित पक्षों की भूमिका पर संवैधानिक विमर्श को संस्थागत रूप से आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
- निर्वाचन आयोग और न्यायपालिका के अधिकार-क्षेत्र की सीमाएँ विधिक व्याख्या और निर्णयों के माध्यम से स्पष्ट होनी चाहिए।
- निर्वाचन संबंधी शिकायतों के निवारण के लिए मौजूदा वैधानिक तंत्र की प्रभावशीलता का मूल्यांकन समय-समय पर किया जाना चाहिए।
- तकनीकी प्रणालियों, जैसे इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीन के सत्यापन और ऑडिट, की प्रक्रिया को सार्वजनिक जानकारी के साथ सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) · अनुच्छेद 324 (Article 324) · संस्थागत स्वायत्तता (Institutional Autonomy) · मुख्य निर्वाचन आयुक्त (Chief Election Commissioner) · पदावधि-संरक्षण (Security of Tenure) · चयन समिति (Selection Committee) · मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 · अनुच्छेद 329(ख) (Article 329(b)) · न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) · मूल ढाँचा सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) · आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) · संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 324: निर्वाचन आयोग की अधीक्षण और नियंत्रण की शक्ति
- अनुच्छेद 32: मौलिक अधिकारों के लिए सीधी याचिका
- अनुच्छेद 329: निर्वाचन मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप पर रोक
अवधारणा प्रवाह
लोक सभा में विपक्ष के नेता और इंडिया गठबंधन के 12 अन्य नेताओं द्वारा निर्वाचन अनियमितताओं की स्वतंत्र जाँच के लिए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर। → याचिका में निर्वाचन आयोग और उसके कामकाज पर प्रश्न उठाए गए, जिससे संस्थागत जवाबदेही का मुद्दा सामने आया। → सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका की प्रारंभिक जाँच के बाद निर्वाचन आयोग और उसके तीनों आयुक्तों को नोटिस जारी किया। → निर्वाचन आयोग से लिखित जवाब और तथ्यात्मक विवरण प्राप्त होने के बाद न्यायालय याचिका के गुण-दोष पर विचार करेगा। → अनुच्छेद 324, 32 और 329 के अंतर्गत न्यायालय की अधिकार-सीमा तय होने पर जाँच का स्वरूप और दायरा निर्धारित होगा। → निर्णय के आधार पर निर्वाचन प्रक्रिया की पारदर्शिता और संस्थागत विश्वसनीयता से जुड़े सुधारों पर नीतिगत विमर्श आगे बढ़ सकता है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग को निर्वाचक नामावलियों की तैयारी और संपूर्ण निर्वाचन संचालन के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति प्राप्त है।
2. मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिस रीति और आधारों पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है।
3. आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) एक कानूनी अधिनियम के रूप में, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 द्वारा प्रवर्तनीय है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है, क्योंकि अनुच्छेद 324(1) निर्वाचन आयोग में निर्वाचन के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति निहित करता है। कथन 2 भी सही है, क्योंकि अनुच्छेद 324(5) मुख्य निर्वाचन आयुक्त को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान संरक्षण देता है। कथन 3 गलत है, क्योंकि आदर्श आचार संहिता कोई वैधानिक संहिता नहीं है; यह राजनीतिक दलों की सहमति और आयोग की परंपरा पर आधारित है।
Q2. अभिकथन (A): मुख्य निर्वाचन आयुक्त को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जैसा पदावधि-संरक्षण प्राप्त है।
कारण (R): संविधान के अनुच्छेद 324(5) में यह उपबंध है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसी रीति और उन्हीं आधारों पर पद से हटाया जाएगा, जिस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है।
उपर्युक्त अभिकथन और कारण के संदर्भ में सही उत्तर चुनिए।
- (a) A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है।
- (b) A और R दोनों सही हैं, परंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- (c) A सही है, परंतु R गलत है।
- (d) A गलत है, परंतु R सही है।
उत्तर: (a) A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है। — अनुच्छेद 324(5) के अंतर्गत मुख्य निर्वाचन आयुक्त को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान रीति और आधारों पर ही हटाया जा सकता है, इसलिए उसे पदावधि-संरक्षण प्राप्त है। यही उपबंध अभिकथन की सही व्याख्या करता है। अन्य निर्वाचन आयुक्तों की पदच्युति के लिए मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश आवश्यक है, जो इस संरक्षण को और सुदृढ़ करता है।
Q3. निम्नलिखित सुमेलन पर विचार कीजिए:
सूची-I (संवैधानिक उपबंध)
A. अनुच्छेद 324
B. अनुच्छेद 325
C. अनुच्छेद 326
D. अनुच्छेद 329
सूची-II (विषय)
1. वयस्क मताधिकार
2. प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के लिए एक ही साधारण निर्वाचक नामावली
3. निर्वाचन विवादों में न्यायालयों के हस्तक्षेप पर रोक
4. निर्वाचन आयोग में निर्वाचन के अधीक्षण और नियंत्रण की शक्ति
सही सुमेलन चुनिए।
- A-4, B-2, C-1, D-3
- A-3, B-4, C-2, D-1
- A-4, B-1, C-3, D-2
- A-2, B-3, C-4, D-1
उत्तर: A-4, B-2, C-1, D-3 — अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति देता है (4)। अनुच्छेद 325 एक ही साधारण निर्वाचक नामावली का प्रावधान करता है (2)। अनुच्छेद 326 वयस्क मताधिकार का आधार है (1)। अनुच्छेद 329 निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप पर रोक लगाता है (3)।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ निर्वाचन आयोग की विश्वसनीयता उसकी संस्थागत स्वायत्तता पर टिकी है, और यह स्वायत्तता आयुक्तों की नियुक्ति की पद्धति तथा उनके पदावधि-संरक्षण पर निर्भर करती है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 के संदर्भ में निर्वाचन आयोग के संवैधानिक सुरक्षा-उपायों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि क्या अनुच्छेद 329(ख) के होते हुए निर्वाचन संबंधी विवादों में न्यायिक समीक्षा की गुंजाइश बचती है और यदि हाँ, तो उसकी सीमाएँ क्या हैं। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर की संरचना: (1) भूमिका: निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) लोकतंत्र की संरचनात्मक गारंटी है; हाल में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्वाचन आयोग और आयुक्तों को नोटिस जारी किया है, जिसमें निर्वाचन की निष्पक्षता और आयोग के कामकाज की स्वतंत्र जाँच की माँग है। मामला लंबित है, इसलिए उसके परिणाम पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। (2) संवैधानिक ढाँचा: अनुच्छेद 324(1) में अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति; अनुच्छेद 324(2) में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य आयुक्तों की संख्या और नियुक्ति की विधि; अनुच्छेद 324(5) में पदच्युति की रीति और अन्य आयुक्तों के लिए मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश का उपबंध; अनुच्छेद 325 और 326 के उपबंध। (3) न्यायिक व्याख्या: मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य निर्वाचन आयुक्त (1978) में अनुच्छेद 324 के व्यापक शक्तियों वाले स्वरूप की व्याख्या; इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण (1975) में स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्वाचन को संविधान के मूल ढाँचे का भाग मानना; अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023) में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और मुख्य न्यायाधीश की समिति का निर्देश। (4) विधायी प्रतिक्रिया: 2023 के अधिनियम में चयन समिति में प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष को रखा गया, मुख्य न्यायाधीश को समिति से हटाया गया; वेतन और सेवा शर्तों को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समकक्ष रखा गया। इसके परिवर्तन पर विवेचना करें। (5) संतुलित दृष्टिकोण: कार्यपालिका-प्रधान चयन के पक्ष में तर्क (संसदीय उत्तरदायित्व, लोकतांत्रिक वैधता); स्वतंत्र या बहुसदस्यीय चयन के पक्ष में तर्क (निष्पक्षता, निर्वाचन आयोग की निरपेक्षता; दिनेश गोस्वामी समिति, 1990 की सिफारिशें)। तुलनात्मक संदर्भ: यूनाइटेड किंगडम का इलेक्टोरल कमीशन और कनाडा का Elections Canada। (6) न्यायिक समीक्षा: अनुच्छेद 329(ख) निर्वाचन विवादों को केवल निर्वाचन याचिका (लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 का भाग VI) के माध्यम से उठाने का उपबंध करता है; किन्तु मूल ढाँचे और मनमानी के आधार पर प्रशासनिक कार्यों की न्यायिक समीक्षा की सीमित गुंजाइश मानी गई है। (7) निष्कर्ष: संस्थागत विश्वास के लिए पारदर्शी चयन, पदावधि-संरक्षण और उत्तरदायी प्रक्रिया का संतुलन आवश्यक है; आयोग की स्वायत्तता संवैधानिक नैतिकता का परीक्षण है।
स्रोत: Hindustan Times
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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