15 Oct केरल के वित्तीय संकट में KIIFB: सरकार ने क्यों बंद किया इसका विस्तार?
✎ ऑफ-बजट उधारी से राज्य की उधारी-सीमा नहीं बचती, क्योंकि केंद्र इसे प्रत्यक्ष उधारी में जोड़ता है; इसलिए KIIFB जैसी SPV-व्यवस्था का मूल तर्क समाप्त हो जाता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — अर्थव्यवस्था (राजकोषीय नीति, राज्यों का वित्त, सार्वजनिक व्यय और ऋण प्रबंधन) | GS Paper II — राजव्यवस्था और शासन (केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध, संवैधानिक उधारी-प्रावधान, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की भूमिका)
- Prelims: ऑफ-बजट उधारी (Off-Budget Borrowing), अनुच्छेद 293 (राज्यों द्वारा उधारी), संचित निधि (Consolidated Fund of the State), नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) और निष्पादन लेखापरीक्षा (Performance Audit), राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम, 2003 (FRBM Act), पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) और राजस्व व्यय में अंतर, विशेष प्रयोजन वाहन (Special Purpose Vehicle), राज्य सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) के सापेक्ष राजकोषीय घाटा
- Essay: सार्वजनिक अवसंरचना के वित्तपोषण में सार्वजनिक संस्थाओं की भूमिका: सुविधा बनाम पारदर्शिता, राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता और राजकोषीय अनुशासन के बीच संतुलन
त्वरित पुनरावृत्ति: ऑफ-बजट उधारी से राज्य की उधारी-सीमा नहीं बचती, क्योंकि केंद्र इसे प्रत्यक्ष उधारी में जोड़ता है; इसलिए KIIFB जैसी SPV-व्यवस्था का मूल तर्क समाप्त हो जाता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केरल सरकार द्वारा विधानसभा में प्रस्तुत सुधा पिल्लै समिति की 96 पृष्ठों की रिपोर्ट ने केरल अवसंरचना निवेश निधि बोर्ड (KIIFB) को धन जुटाने और परियोजनाओं के वित्तपोषण वाली संस्था के रूप में जारी रखने का कोई औचित्य नहीं पाया है। समिति के अनुसार KIIFB की कार्यप्रणाली राज्य के भावी राजकोषीय पथ पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है। समिति का मानना है कि बोर्ड के गठन का मूल तर्क, यानी राज्य की उधारी-सीमा का उपयोग किए बिना पूंजी जुटाना, अब समाप्त हो चुका है, क्योंकि इसकी उधारी को अब राज्य की प्रत्यक्ष उधारी माना जाता है। रिपोर्ट ने KIIFB की ऑफ-बजट उधारी, कुल परियोजना-समूह में राजस्व-सृजक परियोजनाओं के अनुपात और मोटर वाहन कर तथा पेट्रोलियम उपकर के हिस्से को बोर्ड की ओर मोड़ने की व्यवस्था की आलोचना की है। इसलिए इस विषय पर नीतिगत और विधिक दृष्टि से चर्चा हो रही है।
पृष्ठभूमि
- KIIFB की स्थापना केरल में अवसंरचना परियोजनाओं के लिए अलग संस्थागत ढाँचे के रूप में हुई, और इसे केरल अवसंरचना निवेश निधि बोर्ड (संशोधन) अधिनियम, 2016 के माध्यम से वैधानिक आधार दिया गया। इस संशोधन का लक्ष्य बोर्ड को बाजार से उधारी लेने और परियोजनाओं के लिए धन जुटाने की वैधानिक शक्ति देना था।
- SPV-आधारित ऑफ-बजट उधारी का मूल उद्देश्य यह था कि ऋण राज्य की बजट-पुस्तक में दर्ज न हो और राज्य की वैधानिक उधारी-सीमा पर सीधा दबाव न पड़े। यह व्यवस्था बाद में केंद्र द्वारा राज्यों की उधारी-गणना में ऐसी उधारी को शामिल किए जाने से निष्प्रभावी हो गई।
- रिपोर्ट के अनुसार 2025-26 में KIIFB द्वारा 9,580 करोड़ रुपये की उधारी ली गई। बोर्ड द्वारा जुटाए गए धन का उपयोग परियोजनाओं के भुगतान और नकद शेष दोनों रूप में हुआ।
- सितंबर 2026 तक मोटर वाहन कर और पेट्रोलियम उपकर का जो हिस्सा राज्य सरकार ने KIIFB को हस्तांतरित किया था, वह 26,165.93 करोड़ रुपये था। केंद्र द्वारा ऑफ-बजट उधारी के रूप में राज्य की उधारी-सीमा से काटी गई राशि 25,932.53 करोड़ रुपये बताई गई है, जिससे कुल प्राप्तियों की हानि 52,098.46 करोड़ रुपये आँकी गई है।
- सुधा पिल्लै समिति से पूर्व भी राज्य के सार्वजनिक वित्त में ऑफ-बजट उधारी की पारदर्शिता को लेकर प्रश्न उठते रहे हैं, क्योंकि ऐसे ऋण के ब्याज और मूलधन का भार भविष्य के बजटों पर पड़ता है, पर वह वार्षिक बजट में वैसा दिखाई नहीं देता।
ऑफ-बजट उधारी और KIIFB का ढाँचा क्या है?
- ऑफ-बजट उधारी से आशय ऐसी उधारी से है जो सरकार के वार्षिक बजट में प्रत्यक्ष देयता के रूप में दर्ज नहीं होती, बल्कि किसी विशेष प्रयोजन वाहन या सार्वजनिक उपक्रम द्वारा ली जाती है।
- विशेष प्रयोजन वाहन (SPV) एक अलग कानूनी इकाई होती है, जिसे किसी विशिष्ट परियोजना या उद्देश्य के लिए बनाया जाता है। KIIFB इसी प्रकार की संरचना का उदाहरण है।
- अनुच्छेद 293 के अंतर्गत राज्य अपनी संचित निधि की गारंटी पर उधारी ले सकते हैं, और इसकी सीमा राज्य विधानमंडल तय करता है। केंद्र की सहमति की आवश्यकता कुछ परिस्थितियों में होती है।
- राज्य की उधारी-सीमा का निर्धारण केंद्र द्वारा राजकोषीय घाटे के लक्ष्यों, जो सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के प्रतिशत में व्यक्त होते हैं, के आधार पर किया जाता है। ऑफ-बजट उधारी को इस गणना में शामिल करने से SPV का लाभ कम हो जाता है।
- नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) संवैधानिक संस्था है, जिसकी स्थापना अनुच्छेद 148 के अंतर्गत होती है। राज्य स्तर पर लेखा-परीक्षा का कार्य महालेखाकार (Accountant General) द्वारा भी किया जाता है। निष्पादन लेखापरीक्षा में यह देखा जाता है कि योजना अपने उद्देश्यों को कितनी दक्षता से पूरा कर रही है।
- पूंजीगत व्यय से परिसंपत्ति का निर्माण होता है, जबकि राजस्व व्यय वेतन, ब्याज और सब्सिडी जैसे चालू खर्चों पर होता है। समिति ने ऐसे पूंजीगत व्यय के लिए बजट में आगामी पाँच वर्षों तक प्रावधान की सिफारिश की है।
- सुधा पिल्लै समिति की प्रमुख सिफारिशों में KIIFB के लिए बाजार-उधारी पर रोक, ऋण-भुगतान का दायित्व बजट में लेना, मोटर वाहन कर और पेट्रोलियम उपकर का हस्तांतरण रद्द करना और 2016-17 से 2025-26 की अवधि की निष्पादन लेखापरीक्षा शामिल हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| संस्थागत स्वरूप | केरल अवसंरचना निवेश निधि बोर्ड (Kerala Infrastructure Investment Fund Board – KIIFB) राज्य का एक विशेष प्रयोजन वाहन है, जो अवसंरचना परियोजनाओं के लिए धन जुटाता और उन्हें वित्तपोषित करता है |
| उधारी का तरीका | बाज़ार से ऋणपत्र (Bonds/Debentures) और ऋण लेकर पूंजी जुटाई जाती है। इस देनदारी का एक बड़ा भाग राज्य के बजट में सीधे नहीं दिखता, इसलिए इसे बजट-बाह्य उधारी (Off-Budget Borrowing) कहा जाता है |
| राजस्व का स्रोत | मोटर वाहन कर और पेट्रोलियम उपकर का एक हिस्सा राज्य सरकार द्वारा KIIFB को हस्तांतरित किया जाता है, जिससे इसकी पुनर्भुगतान क्षमता जुड़ी रही है |
| मूल औचित्य | राज्य की उधार सीमा (Borrowing Space) का उपयोग किए बिना पूंजी जुटाना। समिति के अनुसार यह औचित्य अब समाप्त हो चुका है, क्योंकि इस उधारी को अब राज्य की प्रत्यक्ष उधारी माना जाता है |
| परियोजनाओं का स्वरूप | राजस्व-उत्पादी और गैर-राजस्व परियोजनाओं का अनुपात यह तय करता है कि ऋण का पुनर्भुगतान किस सीमा तक स्वयं के स्रोतों से होगा। समिति ने इस अनुपात की कड़ी आलोचना की है |
| विधिक आधार | केरल अवसंरचना निवेश निधि बोर्ड अधिनियम तथा उसका संशोधन अधिनियम, 2016 इसके कार्य, उधारी और प्रशासनिक ढांचे को परिभाषित करते हैं |
महत्व
राजकोषीय (Fiscal)
- बजट-बाह्य उधारी से राज्य की वास्तविक देनदारी बजट दस्तावेज़ों में पूरी तरह नहीं दिखती, जिससे राजकोषीय स्थिति का सही आकलन कठिन होता है
- समिति के अनुसार KIIFB की कार्यप्रणाली से भविष्य के राजकोषीय पथ (Fiscal Trajectory) पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है
- ऋण का पुनर्भुगतान अब बजट के वार्षिक प्रावधानों से करना प्रस्तावित है, जिससे आने वाले वर्षों का व्यय-विकल्प सीमित होगा
संघीय और संवैधानिक (Federal and Constitutional)
- राज्य की उधारी पर केंद्र का नियंत्रण संवैधानिक ढांचे का हिस्सा है। केंद्र द्वारा बजट-बाह्य उधारी को राज्य की उधार सीमा में घटाना इसी नियंत्रण का व्यावहारिक रूप है
- राज्य के करों और उपकरों का निधि-विशेष में आवंटन समेकित निधि के सामान्य वित्तीय नियमों पर प्रश्न उठाता है
शासन और जवाबदेही (Governance and Accountability)
- निष्पादन लेखापरीक्षा की सिफारिश से यह स्पष्ट होता है कि विशेष प्रयोजन वाहनों की दक्षता का मूल्यांकन स्वतंत्र लेखापरीक्षा के माध्यम से होना चाहिए
- रिपोर्ट विधानसभा में प्रस्तुत की गई, जो विधायी निगरानी और सार्वजनिक वित्त की पारदर्शिता का महत्वपूर्ण उदाहरण है
चुनौतियाँ
1. राज्य की उधार सीमा का क्षरण
- बजट-बाह्य उधारी को केंद्र द्वारा राज्य की उधार सीमा में घटाए जाने से राज्य के पास भविष्य में उधारी का विकल्प सीमित हो गया है
- जिस उद्देश्य से KIIFB बनाया गया था, वह अब लागू नहीं होता, इसलिए इसका ढांचा अप्रासंगिक हो गया है
- राज्य द्वारा उधारी के अतिरिक्त कर-आधारित हस्तांतरण भी किए गए, जिससे प्राप्तियों पर दोहरा दबाव बना
यूपीएससी लिंक: राज्य वित्त, राजकोषीय संघवाद और राज्यों की उधारी पर संवैधानिक नियंत्रण
2. बजट में पारदर्शिता का अभाव
- ऋण दायित्व बजट के बाहर रहने से विधायिका की वास्तविक वित्तीय निगरानी सीमित होती है
- समिति ने कहा कि भविष्य में बाज़ार से उधारी रोकने के लिए अधिनियम में संशोधन आवश्यक है
- बजट-बाह्य व्यवस्थाओं के कारण राज्य की कुल देनदारी का समग्र चित्र सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं होता
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3. राजस्व हस्तांतरण की लागत
- मोटर वाहन कर और पेट्रोलियम उपकर का KIIFB को हस्तांतरण बजट की सामान्य प्राप्तियों को घटाता है
- समिति के अनुसार 1 सितंबर 2026 तक इस हस्तांतरण की राशि ₹26,165.93 करोड़ रही, जबकि इसी अवधि में उधारी से जुड़ी कटौती ₹25,932.53 करोड़ रही
- इन दोनों को मिलाकर राज्य को कुल ₹52,098.46 करोड़ की प्राप्तियों का नुकसान हुआ है, जो राज्य के विकास-व्यय पर सीधा प्रभाव डालता है
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4. परियोजना-क्रियान्वयन की दक्षता
- समिति के अनुसार यदि राज्य सीधे अवसंरचना पर निवेश करता, तो ₹61,678.46 करोड़ व्यय किए जा सकते थे, जबकि KIIFB द्वारा ₹48,574.82 करोड़ ही वितरित या नकद रूप में रखे गए
- इन दोनों आंकड़ों का अंतर ₹13,103.64 करोड़ है, जो मध्यस्थ संस्था के माध्यम से निवेश की लागत और दक्षता पर प्रश्न उठाता है
- अधूरी परियोजनाओं को विभागों के माध्यम से पूरा करना और इसके लिए बजट में पूंजीगत व्यय का प्रावधान एक चुनौती है
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5. जवाबदेही और स्वतंत्र मूल्यांकन
- समिति ने 2016-17 से 2025-26 की अवधि के लिए निष्पादन लेखापरीक्षा की सिफारिश की है, जिसे नियंत्रक-महालेखापरीक्षक या महालेखाकार द्वारा किया जाना है
- राजस्व-उत्पादी परियोजनाओं के अनुपात का मूल्यांकन स्वतंत्र और तकनीकी आधार पर करना आवश्यक है
- विशेष प्रयोजन वाहनों की निगरानी के लिए स्पष्ट और नियमित रिपोर्टिंग तंत्र का अभाव एक बड़ी कमी के रूप में सामने आया है
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चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| बजट-बाह्य उधारी | ऋण दायित्व बजट में न दिखने से राज्य की वास्तविक राजकोषीय स्थिति अस्पष्ट रहती है |
| उधारी सीमा का उपयोग | केंद्र द्वारा घटाई गई राशि राज्य के भावी ऋण-विकल्प को सीमित करती है |
| कर और उपकर का मोड़ | मोटर वाहन कर और पेट्रोलियम उपकर का हस्तांतरण राज्य की सामान्य प्राप्तियों को घटाता है |
| व्यय की दक्षता | KIIFB के माध्यम से निवेश में ₹13,103.64 करोड़ का अंतर दर्शाता है कि प्रत्यक्ष व्यय अधिक प्रभावी हो सकता था |
| अधूरी परियोजनाएं | चालू परियोजनाओं को पूरा करने के लिए विभागीय क्षमता और बजट प्रावधान दोनों आवश्यक हैं |
| जवाबदेही का तंत्र | निष्पादन लेखापरीक्षा के बिना विशेष प्रयोजन वाहन की उपलब्धियों का स्वतंत्र मूल्यांकन संभव नहीं |
आगे की राह
- KIIFB की मौजूदा ऋण देनदारियों को वार्षिक बजट में स्पष्ट प्रावधानों के माध्यम से राज्य सरकार अपने दायित्व में लेकर पारदर्शिता बढ़ाए
- ऋण देनदारी का अधिग्रहण होने के बाद मोटर वाहन कर और पेट्रोलियम उपकर के KIIFB को हस्तांतरण के आदेश को रद्द किया जाए, ताकि राज्य की सामान्य प्राप्तियां बहाल हों
- चालू परियोजनाओं को संबंधित विभाग और क्रियान्वयन एजेंसियों के सहयोग से पूरा किया जाए तथा अगले पांच वर्षों (2026-27 से) के लिए आवश्यक राशि बजट में पूंजीगत व्यय के रूप में निर्धारित की जाए
- KIIFB (संशोधन) अधिनियम, 2016 में संशोधन कर बाज़ार से उधारी पर रोक लगाई जाए, ताकि भविष्य में ऐसी बजट-बाह्य देनदारी न बने
- 2016-17 से 2025-26 की अवधि की निष्पादन लेखापरीक्षा नियंत्रक-महालेखापरीक्षक या महालेखाकार द्वारा कराई जाए और उसके निष्कर्ष विधानमंडल के समक्ष रखे जाएं
- विशेष प्रयोजन वाहनों के लिए परियोजना-चयन के स्पष्ट मानदंड बनाए जाएं, जिनमें राजस्व-उत्पादन, सामाजिक प्रतिफल और लागत-प्रभावशीलता को शामिल किया जाए
- बजट-बाह्य उधारी और समस्त वित्तीय दायित्वों की नियमित त्रैमासिक रिपोर्टिंग की व्यवस्था की जाए, ताकि विधायी निगरानी सुदृढ़ हो
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
राजकोषीय घाटा · ऑफ-बजट उधार · राज्य वित्त · बुनियादी ढांचा निवेश · कैग लेखा परीक्षा · राजकोषीय उत्तरदायित्व · सार्वजनिक ऋण · राज्य की उधार सीमा · केरल इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट फंड बोर्ड · राजस्व प्राप्तियां
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 293: राज्य की उधारी पर संवैधानिक नियंत्रण
- अनुच्छेद 266: राज्य की समेकित निधि की व्यवस्था
- अनुच्छेद 149: CAG की लेखापरीक्षा शक्तियां
- अनुच्छेद 151: लेखापरीक्षा रिपोर्ट का विधानमंडल में प्रस्तुतीकरण
- अनुच्छेद 202: वार्षिक वित्तीय विवरण में देनदारी प्रावधान
अवधारणा प्रवाह
राज्य को अवसंरचना के लिए पूंजी चाहिए, पर उसकी उधार सीमा सीमित है → KIIFB बाज़ार से उधारी लेता है, जिसकी देनदारी बजट के बाहर दिखती है → केंद्र इस बजट-बाह्य उधारी को राज्य की उधार सीमा में घटाता है → मोटर वाहन कर और पेट्रोलियम उपकर का हिस्सा KIIFB को जाने से राज्य की प्राप्तियां घटती हैं → राजकोषीय पारदर्शिता और भविष्य के राजकोषीय पथ पर दबाव बढ़ता है → समिति सिफारिश करती है कि देनदारी बजट में ली जाए और परियोजनाएं प्रत्यक्ष व्यय से पूरी हों → निष्पादन लेखापरीक्षा से जवाबदेही और दक्षता का स्वतंत्र मूल्यांकन सुनिश्चित होता है
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ऑफ-बजट उधार (Off-Budget Borrowing) को केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों की उधार सीमा में शामिल नहीं किया जाता है।
2. भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (Comptroller and Auditor General of India – CAG) राज्य सरकारों के खातों का भी लेखा-परीक्षण करते हैं।
3. राज्य सरकारों द्वारा बाजार से उधार लेने की शक्ति संविधान के अनुच्छेद 293 के तहत विनियमित होती है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है। ऑफ-बजट उधार, विशेष रूप से राज्य सरकार के स्वामित्व वाली संस्थाओं द्वारा लिया गया, अब केंद्र सरकार द्वारा राज्य की उधार सीमा में शामिल किया जाता है। कथन 2 सही है। CAG केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के खातों का लेखा-परीक्षण करता है। कथन 3 सही है। संविधान का अनुच्छेद 293 राज्य सरकारों की उधार लेने की शक्ति से संबंधित है।
Q2. केरल इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट फंड बोर्ड (KIIFB) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. KIIFB का गठन राज्य के बजट पर सीधा बोझ डाले बिना बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए धन जुटाने के उद्देश्य से किया गया था।
2. सुधा पिल्लई समिति ने KIIFB के ऑफ-बजट उधारों की आलोचना की है।
3. समिति ने KIIFB के प्रदर्शन ऑडिट की सिफारिश की है।
उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- केवल 1
- केवल 2 और 3
- केवल 1 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर: 1, 2 और 3 — कथन 1 सही है। KIIFB का मूल उद्देश्य राज्य के बजट पर सीधा बोझ डाले बिना बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए पूंजी जुटाना था। कथन 2 सही है। सुधा पिल्लई समिति ने KIIFB के ऑफ-बजट उधारों की कड़ी आलोचना की है। कथन 3 सही है। समिति ने CAG या महालेखाकार, केरल द्वारा KIIFB के 10-वर्षीय प्रदर्शन ऑडिट की सिफारिश की है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ राज्य सरकारों द्वारा ऑफ-बजट उधार (Off-Budget Borrowing) के बढ़ते चलन ने राजकोषीय अनुशासन के समक्ष चुनौतियां खड़ी की हैं। इस कथन के आलोक में, राज्य वित्त पर ऑफ-बजट उधारों के प्रभावों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए और इन चुनौतियों से निपटने के लिए आवश्यक कदमों पर चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: ऑफ-बजट उधार की अवधारणा को परिभाषित करें और बताएं कि यह कैसे राज्य के बजट से बाहर रखा जाता है। केरल इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट फंड बोर्ड (KIIFB) जैसे निकायों का उदाहरण दें।
2. ऑफ-बजट उधार के प्रभाव:
a. राजकोषीय घाटे पर प्रभाव: बताएं कि यह कैसे वास्तविक राजकोषीय घाटे को छिपाता है और पारदर्शिता को कम करता है।
b. राज्य की उधार सीमा पर प्रभाव: केंद्र सरकार द्वारा ऑफ-बजट उधार को राज्य की उधार सीमा में शामिल करने के निर्णय का उल्लेख करें और इसके परिणामों पर चर्चा करें।
c. भविष्य की राजकोषीय स्थिति पर प्रभाव: बताएं कि ये उधार भविष्य में राज्य पर कैसे ऋण का बोझ बढ़ाते हैं।
d. जवाबदेही और लेखा परीक्षा की कमी: CAG लेखा परीक्षा से बाहर रहने या देरी से लेखा परीक्षा के मुद्दों को उजागर करें।
e. बुनियादी ढांचा निवेश की लागत-प्रभावशीलता: KIIFB रिपोर्ट के निष्कर्षों का उल्लेख करें कि प्रत्यक्ष निवेश अधिक लागत प्रभावी हो सकता था।
3. चुनौतियों से निपटने के लिए आवश्यक कदम:
a. पारदर्शिता और प्रकटीकरण: सभी ऑफ-बजट उधारों को वार्षिक बजट में शामिल करने की आवश्यकता।
b. मजबूत राजकोषीय उत्तरदायित्व कानून: FRBM अधिनियम के प्रावधानों को सख्ती से लागू करना।
c. CAG की भूमिका का विस्तार: ऑफ-बजट संस्थाओं की नियमित और व्यापक लेखा परीक्षा।
d. संस्थागत सुधार: KIIFB जैसी संस्थाओं की कार्यप्रणाली की समीक्षा और आवश्यक संशोधन।
e. केंद्र-राज्य समन्वय: उधार सीमा और राजकोषीय अनुशासन पर केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय।
4. निष्कर्ष: संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करें, जिसमें बुनियादी ढांचा निवेश की आवश्यकता को स्वीकार करते हुए राजकोषीय विवेक और पारदर्शिता के महत्व पर जोर दिया गया हो।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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