पंप स्टोरेज परियोजना: भारत के ऊर्जा भविष्य की ‘वॉटर बैटरी’ कैसे बन रही है?

पंप स्टोरेज परियोजना: भारत के ऊर्जा भविष्य की 'वॉटर बैटरी' कैसे बन रही है?

पंप स्टोरेज परियोजना: भारत के ऊर्जा भविष्य की ‘वॉटर बैटरी’ कैसे बन रही है?

पंप स्टोरेज परियोजना का कार्यअतिरिक्त बिजलीउत्पादन बढ़ने परपंपिंगपानी ऊपरी जलाशयभंडारणऊर्जा संग्रहितटर्बाइनमांग बढ़ने परबिजली उत्पादनग्रिड में आपूर्ति
पंप स्टोरेज परियोजना का कार्य

✎ पंप्ड स्टोरेज परियोजना जल और गुरुत्वाकर्षण से अतिरिक्त बिजली को ऊपरी जलाशय में संचित कर मांग के समय टर्बाइनों से उत्पादन करती है, और दीर्घ अवधि भंडारण में बैटरी ऊर्जा भंडारण (बीईएसएस) की पूरक भूमिका निभाती है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — Economy (आधारिक संरचना: ऊर्जा)  |  GS Paper III — Environment (ऊर्जा संक्रमण और स्वच्छ ऊर्जा)  |  GS Paper II — Governance (विद्युत क्षेत्र से संबंधित वैधानिक संस्थाएं और नीतिगत ढांचा)
  • Prelims: पंप्ड स्टोरेज परियोजना (Pumped Storage Project) और इसके दो जलाशय, बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (बीईएसएस), केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए), गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित क्षमता और 500 गीगावाट का 2030 लक्ष्य, आवृत्ति विनियमन (Frequency Regulation) और ग्रिड संतुलन, परिवर्तनशील नवीकरणीय ऊर्जा (Variable Renewable Energy), विद्युत अधिनियम, 2003 (Electricity Act, 2003), राउंड-ट्रिप दक्षता (Round-trip Efficiency)
  • Essay: नवीकरणीय ऊर्जा की परिवर्तनशीलता और ऊर्जा भंडारण: स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण की चुनौती, भारत में ऊर्जा सुरक्षा और ग्रिड स्थिरता: दीर्घ अवधि के भंडारण का महत्व

त्वरित पुनरावृत्ति: पंप्ड स्टोरेज परियोजना जल और गुरुत्वाकर्षण से अतिरिक्त बिजली को ऊपरी जलाशय में संचित कर मांग के समय टर्बाइनों से उत्पादन करती है, और दीर्घ अवधि भंडारण में बैटरी ऊर्जा भंडारण (बीईएसएस) की पूरक भूमिका निभाती है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

पीआईबी (PIB) की एक पृष्ठभूमि सामग्री में पंप्ड स्टोरेज परियोजनाओं की भूमिका को रेखांकित किया गया है। जुलाई 2026 तक भारत की स्थापित गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित विद्युत उत्पादन क्षमता 300 गीगावाट के आंकड़े को पार कर चुकी है और वित्त वर्ष 2025–26 में लगभग 55.29 गीगावाट क्षमता जोड़ी गई। वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट का लक्ष्य निर्धारित है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) (Central Electricity Authority) ने वित्त वर्ष 2031–32 तक 73.93 गीगावाट ऊर्जा भंडारण क्षमता की आवश्यकता का अनुमान लगाया है, जिसमें 26.69 गीगावाट पंप्ड स्टोरेज परियोजनाओं और 47.24 गीगावाट बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों से प्राप्त क्षमता शामिल है। सौर और पवन ऊर्जा के तेज विस्तार के साथ उत्पादन की परिवर्तनशीलता बढ़ रही है, इसलिए भंडारण की आवश्यकता पर अब अधिक ध्यान दिया जा रहा है।

पृष्ठभूमि

  • भारत के विद्युत क्षेत्र का नियामक ढांचा विद्युत अधिनियम, 2003 (Electricity Act, 2003) पर आधारित है। इसकी धारा 3 के अंतर्गत राष्ट्रीय विद्युत नीति और राष्ट्रीय विद्युत योजना बनाई जाती है, और केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) इस क्षेत्र की तकनीकी और योजना संबंधी संस्था है।
  • सौर और पवन जैसी नवीकरणीय ऊर्जा की उत्पादन प्रकृति सूर्य के प्रकाश, मौसम और दिन के समय पर निर्भर करती है। इसी कारण उत्पादन और मांग के बीच बेमेल (Mismatch) पैदा होता है, जिसे पाटने के लिए भंडारण आवश्यक हो जाता है।
  • भारत का गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित क्षमता लक्ष्य पेरिस समझौते के अंतर्गत राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित जलवायु प्रतिबद्धताओं से जुड़ा है, और इसी संदर्भ में 2030 तक 500 गीगावाट का लक्ष्य रखा गया है।
  • जल-विद्युत परियोजनाओं की परंपरागत भूमिका मुख्यतः आधार-भार (Base Load) और मौसमी प्रवाह के प्रबंधन तक सीमित थी। पंप्ड स्टोरेज इसे दैनिक और साप्ताहिक स्तर पर ऊर्जा भंडारण के उपकरण के रूप में विस्तारित करता है।
  • भारत में बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों का तेज विस्तार भी हो रहा है, जिससे पंप्ड स्टोरेज और बैटरी भंडारण के बीच पूरक संबंध की चर्चा बढ़ी है।

पंप्ड स्टोरेज परियोजना क्या है?

  • पंप्ड स्टोरेज परियोजना (Pumped Storage Project) ऊर्जा भंडारण की एक जल-आधारित प्रणाली है, जिसे प्रायः वॉटर बैटरी कहा जाता है। यह जल और गुरुत्वाकर्षण बल का उपयोग करके बिजली को संचित करती है।
  • इसमें आमतौर पर अलग-अलग ऊंचाइयों पर स्थित दो जलाशय होते हैं: ऊपरी जलाशय और निचला जलाशय।
  • अतिरिक्त बिजली उपलब्ध होने की अवधि में पंप के माध्यम से पानी निचले जलाशय से ऊपरी जलाशय में पहुंचाया जाता है। इस प्रक्रिया में बिजली का उपयोग होता है और वह जल की स्थितिज ऊर्जा (Potential Energy) के रूप में संचित हो जाती है।
  • जब मांग बढ़ती है, तो ऊपरी जलाशय का पानी टर्बाइनों से होकर नीचे आता है और विद्युत उत्पादन होता है। इस प्रकार यह परियोजना उत्पादन के समय और उपभोग के समय के अंतर को पाटती है।
  • दीर्घ अवधि का भंडारण, बड़ी मात्रा में ऊर्जा का संचयन और लंबा परिचालन जीवन इसकी प्रमुख विशेषताएं हैं। इसके लिए उपयुक्त भू-आकृतिक और भौगोलिक परिस्थितियां आवश्यक होती हैं।
  • बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (बीईएसएस) कम अवधि की आवश्यकताओं, जैसे आवृत्ति विनियमन और अधिकतम मांग प्रबंधन, में तेजी से प्रतिक्रिया देती है। इसके विपरीत पंप्ड स्टोरेज बड़े पैमाने पर और लंबी अवधि के भंडारण में अधिक उपयुक्त है।
  • पंप्ड स्टोरेज में पंपिंग के दौरान ऊर्जा की कुछ हानि होती है, इसलिए इसकी राउंड-ट्रिप दक्षता (Round-trip Efficiency) सीमित होती है। फिर भी ग्रिड की स्थिरता और नवीकरणीय ऊर्जा के एकीकरण में इसका रणनीतिक महत्व है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
कार्य-सिद्धांत अतिरिक्त बिजली के समय निचले जलाशय से पानी को पंप करके ऊपरी जलाशय में पहुंचाया जाता है और मांग के समय उसी पानी को टर्बाइनों से गुजारकर बिजली बनाई जाती है। इसीलिए इसे ‘वॉटर बैटरी’ कहा जाता है।
भंडारण की अवधि पंप्ड स्टोरेज परियोजना (Pumped Storage Project – PSP) दीर्घ अवधि का ऊर्जा भंडारण उपलब्ध कराती है, जबकि बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (Battery Energy Storage System – BESS) अपेक्षाकृत कम अवधि की आवश्यकताओं पर तेजी से प्रतिक्रिया देती है।
भौगोलिक आवश्यकता इसके लिए अलग-अलग ऊंचाइयों पर दो जलाशयों और उपयुक्त स्थलाकृति की आवश्यकता होती है, इसलिए इसकी स्थापना स्थल-विशेष पर निर्भर रहती है।
ग्रिड में भूमिका आवृत्ति विनियमन, अधिकतम मांग के प्रबंधन और ग्रिड संतुलन में सहायता करके विद्युत ग्रिड की स्थिरता बनाए रखती है।
परिचालन जीवन लंबा परिचालन जीवन होने के कारण यह विद्युत अवसंरचना की दीर्घकालिक आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायक है।

महत्व

ऊर्जा सुरक्षा और ग्रिड स्थिरता

  • सौर और पवन ऊर्जा के उत्पादन में दिन-रात और मौसम के अनुसार होने वाले उतार-चढ़ाव को संतुलित करने में पंप्ड स्टोरेज परियोजना की भूमिका महत्वपूर्ण है।
  • अधिकतम मांग के समय बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित करके ग्रिड को संकट से बचाने में यह सहायक है।
  • नवीकरणीय ऊर्जा की ‘परिवर्तनशील’ प्रकृति को ‘आपूर्ति-योग्य’ बनाने में इसका योगदान है, जिससे राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होती है।

नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों से संबंध

  • वर्ष 2030 तक गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित क्षमता को 500 गीगावाट तक पहुंचाने के लक्ष्य के लिए भंडारण अवसंरचना अनिवार्य पूरक है।
  • जुलाई 2026 तक गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित स्थापित क्षमता 300 गीगावाट के आंकड़े को पार कर चुकी है, और वित्त वर्ष 2025–26 में लगभग 55.29 गीगावाट क्षमता जोड़ी गई।
  • केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण (Central Electricity Authority – CEA) के अनुमान के अनुसार वित्त वर्ष 2031–32 तक कुल 73.93 गीगावाट ऊर्जा भंडारण क्षमता की आवश्यकता होगी, जिसमें 26.69 गीगावाट पीएसपी और 47.24 गीगावाट बीईएसएस से प्राप्त क्षमता शामिल है।

पर्यावरणीय और आर्थिक पक्ष

  • जीवाश्म ईंधन आधारित चरम-मांग वाले संयंत्रों पर निर्भरता घटाकर कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने में यह सहायक हो सकती है।
  • दीर्घ अवधि के ऊर्जा भंडारण से स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग का समय-विस्तार होता है, जिससे नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्रों की उपयोगिता बढ़ती है।

चुनौतियाँ

1. भौगोलिक और स्थल-चयन की सीमा

  • पीएसपी के लिए उपयुक्त ऊंचाई-अंतर और जल-उपलब्धता वाले स्थल सीमित हैं।
  • उपयुक्त स्थलों का चयन सामान्यतः पहाड़ी और वनाच्छादित क्षेत्रों में होता है, जहां भूमि और पर्यावरणीय बाधाएं अधिक होती हैं।

2. लंबी परियोजना-अवधि और भारी पूंजी निवेश

  • पीएसपी की स्थापना में अधिक समय और भारी प्रारंभिक पूंजी लगती है, जिससे परियोजनाओं के पूरा होने में विलंब की आशंका रहती है।
  • बैटरी ऊर्जा भंडारण की तुलना में इसकी स्थापना-गति धीमी होने से लक्ष्य-पूर्ति पर दबाव बढ़ता है।

3. पर्यावरणीय स्वीकृति और भूमि अधिग्रहण

  • जलाशय निर्माण से वनभूमि, जैव-विविधता और स्थानीय जनसमुदाय पर प्रभाव पड़ सकते हैं।
  • भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास से जुड़ी प्रक्रियाएं परियोजना-निष्पादन में समय लेती हैं।

4. ऊर्जा-क्षय और दक्षता का प्रश्न

  • पंपिंग और टर्बाइन चक्र में कुछ ऊर्जा-हानि होती है, इसलिए भंडारित बिजली का पूरा भाग वापस नहीं मिलता।
  • इसकी आर्थिक व्यवहार्यता इस पर निर्भर करती है कि पंपिंग के लिए सस्ती बिजली कब उपलब्ध है और मांग के समय ऊंचा मूल्य कितना मिलता है।

5. बाजार-ढांचा और नियामकीय स्पष्टता

  • भंडारण सेवा के लिए मूल्य-निर्धारण, क्षमता-भुगतान और संचालन-नियमों का स्पष्ट ढांचा आवश्यक है।
  • विभिन्न प्रकार के भंडारण (पीएसपी और बीईएसएस) के बीच प्रतिस्पर्धा और पूरकता का संतुलन नीति-निर्माण में चुनौती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
स्थल-उपलब्धता उपयुक्त ऊंचाई-अंतर और जल-स्रोत वाले स्थल सीमित हैं।
परियोजना-समय पीएसपी की स्थापना में लंबा समय लगता है, जिससे 2031–32 के अनुमान पर दबाव बढ़ सकता है।
पर्यावरणीय प्रभाव वनभूमि, जैव-विविधता और स्थानीय समुदायों पर प्रभाव की आशंका रहती है।
पूंजी-निवेश प्रारंभिक लागत अधिक होने से निजी और सार्वजनिक निवेश को आकर्षित करने में कठिनाई हो सकती है।
ऊर्जा-दक्षता पंपिंग और टर्बाइन चक्र में ऊर्जा-हानि होती है, जिससे परिचालन-लागत प्रभावित होती है।

आगे की राह

  • संभावित स्थलों की पहचान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक समेकित डेटाबेस तैयार किया जाए, जिसमें ऊंचाई-अंतर, जल-उपलब्धता और पर्यावरणीय संवेदनशीलता का विवरण हो।
  • पीएसपी परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय और वन स्वीकृति की प्रक्रिया को समयबद्ध और पारदर्शी बनाया जाए, बिना पर्यावरणीय मानकों से समझौता किए।
  • भूमि-अधिग्रहण और पुनर्वास के लिए स्पष्ट, न्यायसंगत और समयबद्ध प्रक्रिया अपनाई जाए।
  • पीएसपी और बीईएसएस के बीच पूरकता को ध्यान में रखते हुए एक एकीकृत भंडारण-योजना बनाई जाए, ताकि दीर्घ और अल्प अवधि, दोनों की आवश्यकताएं पूरी हों।
  • भंडारण सेवाओं के लिए मूल्य-निर्धारण, क्षमता-भुगतान और संचालन-नियमों का स्पष्ट नियामकीय ढांचा विकसित किया जाए।
  • परियोजनाओं के वित्तपोषण में दीर्घ-अवधि के निवेशकों और सार्वजनिक-निजी भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाए।
  • वितरण कंपनियों और प्रसारण अवसंरचना के विकास को पंप्ड स्टोरेज परियोजनाओं के साथ समन्वित किया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

पंप्ड स्टोरेज परियोजना (Pumped Storage Project) · ऊर्जा भंडारण (Energy Storage) · परिवर्तनशीलता (Variability) और ग्रिड एकीकरण · दीर्घ अवधि का ऊर्जा भंडारण · बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (BESS) · केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) · सहायक सेवाएं (Ancillary Services) · पर्यावरणीय स्वीकृति और भूमि अधिग्रहण · पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) · गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता (500 गीगावाट लक्ष्य) · राष्ट्रीय विद्युत योजना (National Electricity Plan)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 246: विद्युत विषय पर विधायी शक्ति का वितरण
  • सातवीं अनुसूची: समवर्ती सूची की प्रविष्टि 38 (विद्युत)
  • अनुच्छेद 48A: पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन का राज्य का दायित्व

अवधारणा प्रवाह

नवीकरणीय ऊर्जा (सौर और पवन) का उत्पादन बढ़ता है, परंतु उत्पादन सूर्य के प्रकाश और मौसम के अनुसार बदलता है।  →  अतिरिक्त उत्पादन के समय बिजली का उपयोग पंपिंग द्वारा पानी को ऊपरी जलाशय में पहुंचाने में होता है।  →  मांग चरम पर होने या नवीकरणीय उत्पादन घटने पर संग्रहित पानी टर्बाइनों से गुजारा जाता है और बिजली उत्पन्न होती है।  →  इस प्रकार बिजली का उत्पादन और उपयोग अलग-अलग समय पर संभव होता है, जिससे विद्युत ग्रिड की स्थिरता बनी रहती है।  →  बढ़ती नवीकरणीय क्षमता के साथ CEA द्वारा वित्त वर्ष 2031–32 तक 73.93 गीगावाट भंडारण की आवश्यकता का अनुमान लगाया गया है, जिसमें पीएसपी का योगदान 26.69 गीगावाट है।  →  लक्ष्य-पूर्ति के लिए स्थल-चयन, पर्यावरणीय स्वीकृति और वित्तपोषण की बाधाओं को दूर करना आवश्यक है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पंप्ड स्टोरेज परियोजना में अधिशेष बिजली की अवधि के दौरान निचले जलाशय से पानी को पंप करके ऊपरी जलाशय में पहुंचाया जाता है।
2. बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियां पंप्ड स्टोरेज परियोजनाओं की तुलना में आवृत्ति विनियमन के लिए अपेक्षाकृत तेजी से प्रतिक्रिया दे सकती हैं।
3. पंप्ड स्टोरेज परियोजनाओं के लिए भौगोलिक स्थलाकृति की कोई विशेष आवश्यकता नहीं होती।

उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: पंप्ड स्टोरेज में अतिरिक्त बिजली के समय पानी ऊपर पंप होता है और मांग के समय टर्बाइनों से गुजरकर बिजली बनती है। कथन 2 सही है: PIB पृष्ठभूमि के अनुसार BESS कम अवधि की आवश्यकताओं पर तेजी से प्रतिक्रिया देती हैं। कथन 3 गलत है: पंप्ड स्टोरेज के लिए दो अलग ऊंचाइयों वाले जलाशय और उपयुक्त भौगोलिक परिस्थितियां आवश्यक होती हैं, इसीलिए इसे ‘उपयुक्त भौगोलिक परिस्थितियों’ की आवश्यकता कहा गया है।

Q2. अभिकथन (A): पंप्ड स्टोरेज परियोजनाएं भारत में दीर्घ अवधि के ऊर्जा भंडारण के लिए उपयुक्त मानी जाती हैं।
कारण (R): इन परियोजनाओं में ऊपरी जलाशय में संग्रहित जल ही भंडारण माध्यम का कार्य करता है और इनका परिचालन जीवन लंबा होता है।

उपर्युक्त कथनों के संदर्भ में सही उत्तर चुनिए:

  1. A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सही है, परंतु R गलत है।
  4. A गलत है, परंतु R सही है।

उत्तर: A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है। — A सही है: PIB के अनुसार PSP दीर्घ अवधि के बड़े पैमाने पर ऊर्जा भंडारण की सुविधा देती हैं। R भी सही है और A की व्याख्या करता है, क्योंकि जल भंडारण का माध्यम होने के कारण और लंबे परिचालन जीवन से ही यह दीर्घ अवधि के भंडारण में सक्षम होती हैं।

Q3. निम्नलिखित सूचियों को सुमेलित कीजिए:
सूची-I (अवधारणा)
A. राउंड-ट्रिप दक्षता (Round-trip Efficiency)
B. क्लोज्ड-लूप पंप्ड स्टोरेज परियोजना
C. सहायक सेवाएं (Ancillary Services)

सूची-II (विवरण)
i. पूर्ण चार्ज-डिस्चार्ज चक्र में प्राप्त ऊर्जा और दी गई ऊर्जा का अनुपात
ii. ऐसी परियोजना जो प्राकृतिक नदी प्रवाह से सीधे जुड़ी नहीं होती और दो कृत्रिम जलाशयों पर आधारित होती है
iii. आवृत्ति नियमन और ग्रिड स्थिरता बनाए रखने हेतु दी जाने वाली सहायक ग्रिड सेवाएं

सही सुमेलन चुनिए:

  1. A-i, B-ii, C-iii
  2. A-ii, B-i, C-iii
  3. A-i, B-iii, C-ii
  4. A-iii, B-i, C-ii

उत्तर: A-i, B-ii, C-iii — राउंड-ट्रिप दक्षता पूर्ण भंडारण चक्र में प्राप्त ऊर्जा और डाली गई ऊर्जा का अनुपात है (A-i)। क्लोज्ड-लूप PSP दो कृत्रिम जलाशयों पर आधारित होती है और नदी प्रवाह से सीधे नहीं जुड़ती (B-ii)। सहायक सेवाएं आवृत्ति नियमन और ग्रिड स्थिरता के लिए दी जाती हैं (C-iii)।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में नवीकरणीय ऊर्जा का तेजी से विस्तार ऊर्जा भंडारण की आवश्यकता को बढ़ा रहा है। केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) द्वारा वित्त वर्ष 2031-32 तक 73.93 गीगावाट ऊर्जा भंडारण क्षमता के अनुमान के संदर्भ में पंप्ड स्टोरेज परियोजनाओं (PSP) की भूमिका की आलोचनात्मक समीक्षा कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि क्या बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियां (BESS) इनका पूर्ण विकल्प बन सकती हैं, और ऐसी स्थिति में किन नीतिगत उपायों की आवश्यकता होगी। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर संरचना (मॉडल उत्तर संकेत):
1. भूमिका: नवीकरणीय ऊर्जा (सौर और पवन) की परिवर्तनशीलता के कारण उत्पादन और मांग में बेमेल। जुलाई 2026 तक गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता 300 गीगावाट पार; वित्त वर्ष 2025-26 में लगभग 55.29 गीगावाट जुड़ी; 2030 तक 500 गीगावाट का लक्ष्य। CEA अनुमान: कुल 73.93 गीगावाट, जिसमें 26.69 गीगावाट PSP और 47.24 गीगावाट BESS।
2. PSP की भूमिका: दो ऊंचाई वाले जलाशय, अधिशेष अवधि में पंपिंग और मांग के समय टर्बाइन से उत्पादन; दीर्घ अवधि भंडारण, अधिकतम मांग में आपूर्ति, ग्रिड स्थिरता; लंबा परिचालन जीवन; राउंड-ट्रिप दक्षता लगभग 70-80 प्रतिशत (व्यापक रूप से उद्धृत)।
3. PSP की सीमाएं: उपयुक्त स्थलाकृति और जल उपलब्धता; लंबा निर्माण समय और उच्च पूंजी लागत; पर्यावरणीय स्वीकृति (पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 और EIA अधिसूचना, 2006); वन भूमि की स्वीकृति (वन संरक्षण संशोधन अधिनियम, 2023); जलमग्नता और भूमि अधिग्रहण में उचित प्रतिकर एवं पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के प्रावधान; अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 के तहत ग्राम सभा की भूमिका।
4. BESS की भूमिका और सीमाएं: तेज प्रतिक्रिया, कम समय में स्थापना, उपभोग केन्द्रों के निकट तैनाती; किंतु दीर्घ अवधि भंडारण में लागत, जीवनकाल और अवक्रमण (degradation) की चुनौतियां।
5. तुलनात्मक निष्कर्ष: दोनों पूरक हैं, विकल्प नहीं। PSP दीर्घ अवधि और BESS अल्पकालिक/तीव्र-प्रतिक्रिया आवश्यकताओं हेतु उपयुक्त।
6. नीतिगत उपाय: राष्ट्रीय विद्युत योजना (National Electricity Plan, विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 3(4)) के माध्यम से एकीकृत योजना; स्थल चयन में पर्यावरण और सामुदायिक सहमति का समन्वय; सहायक सेवा बाजार और भंडारण के लिए स्पष्ट टैरिफ व्यवस्था; सार्वजनिक-निजी भागीदारी।
7. निष्कर्ष: संतुलित, बहु-तकनीकी भंडारण मिश्रण, जिसमें स्थलीय, पर्यावरणीय और सामाजिक आयामों का समावेश हो।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


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