आरबीआई की 63वीं बैठक: रेपो रेट में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी, जानें पूरा विवरण

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आरबीआई की 63वीं बैठक: रेपो रेट में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी, जानें पूरा विवरण

मौद्रिक नीति निर्धारण प्रक्रियानीति लक्ष्य निर्धारणमुद्रास्फीति लक्ष्यवैश्विक परिदृश्य आकलनकच्चे तेल की कीमतरेपो दर निर्णय25 आधार अंक वृद्धिनीति रुख घोषणासधी हुई कसावटकार्यवृत्त प्रकाशनधारा 45ZL
मौद्रिक नीति निर्धारण प्रक्रिया

✎ मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने अक्टूबर 2026 में रेपो दर 25 आधार अंक बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत की, SDF 5.25 प्रतिशत और MSF व बैंक दर 5.75 प्रतिशत रखी तथा रुख सधी हुई कसावट का अपनाया।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — अर्थव्यवस्था (मौद्रिक नीति, मुद्रास्फीति नियंत्रण, बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र, वैश्विक आर्थिक घटनाओं का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव)  |  GS Paper II — शासन (वैधानिक निकाय, RBI अधिनियम, 1934 के तहत संस्थागत संरचना और नीतिगत पारदर्शिता)
  • Prelims: मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee) और धारा 45ZB, RBI अधिनियम, 1934, धारा 45ZL के अंतर्गत कार्यवृत्त (Minutes) का प्रकाशन: बैठक के 14वें दिन, रेपो दर (Repo Rate) और तरलता समायोजन सुविधा (Liquidity Adjustment Facility), स्थायी जमा सुविधा (Standing Deposit Facility) और सीमांत स्थायी सुविधा (Marginal Standing Facility), बैंक दर (Bank Rate) और मौद्रिक नीति गलियारा (Policy Corridor), आधार अंक (Basis Point): 100 आधार अंक = 1 प्रतिशत अंक, सधी हुई कसावट (Calibrated Tightening) बनाम तटस्थ और समायोजनकारी रुख, लचीला मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (Flexible Inflation Targeting): 4 प्रतिशत ±2 प्रतिशत
  • Essay: महंगाई नियंत्रण और आर्थिक संवृद्धि के बीच संतुलन: केंद्रीय बैंक की दुविधा, वैश्विक भू-राजनीतिक संकट और मौद्रिक नीति की सीमाएँ: भारत के संदर्भ में

त्वरित पुनरावृत्ति: मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने अक्टूबर 2026 में रेपो दर 25 आधार अंक बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत की, SDF 5.25 प्रतिशत और MSF व बैंक दर 5.75 प्रतिशत रखी तथा रुख सधी हुई कसावट का अपनाया।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

भारतीय रिज़र्व बैंक (Reserve Bank of India) ने 21 अक्टूबर 2026 को मौद्रिक नीति समिति की 63वीं बैठक (5 से 7 अक्टूबर 2026) का कार्यवृत्त जारी किया। समिति ने सर्वसम्मति से रेपो दर 25 आधार अंक बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत कर दी। इसके परिणामस्वरूप स्थायी जमा सुविधा दर 5.25 प्रतिशत और सीमांत स्थायी सुविधा दर तथा बैंक दर 5.75 प्रतिशत हो गई। समिति ने नीति रुख को सधी हुई कसावट में बदला है। कार्यवृत्त में पश्चिम एशिया में संघर्ष के पुनः बढ़ने और कच्चे तेल की कीमतों में तीव्र उतार-चढ़ाव को वैश्विक अनिश्चितता के मुख्य कारक के रूप में रेखांकित किया गया है। अमेरिकी फेडरल रिज़र्व द्वारा सितंबर 2026 में 25 आधार अंकों की वृद्धि और प्रमुख केंद्रीय बैंकों की कसावट से वैश्विक नीति दरों में और वृद्धि की अपेक्षाएँ बनी हैं। साथ ही, वैश्विक बॉण्ड प्रतिफल ऐतिहासिक उच्च स्तर पर हैं। धारा 45ZL के अनुसार कार्यवृत्त में प्रस्ताव, प्रत्येक सदस्य का मत और प्रत्येक सदस्य का वैधानिक वक्तव्य शामिल होता है, जिससे नीति-निर्णय की प्रक्रिया सार्वजनिक जाँच के लिए उपलब्ध होती है।

पृष्ठभूमि

  • RBI अधिनियम, 1934 में संशोधन (2016) के माध्यम से धारा 45ZA से 45ZL जोड़ी गईं और मौद्रिक नीति निर्धारण के लिए बहुसदस्यीय मौद्रिक नीति समिति की स्थापना की गई। यह व्यवस्था मौद्रिक नीति की जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ाने के उद्देश्य से लाई गई।
  • भारत सरकार और RBI के बीच हुए समझौते के अनुसार उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति का लक्ष्य 4 प्रतिशत है, जिसमें दोनों ओर 2 प्रतिशत की सहनशील सीमा है। इसे लचीले मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण का ढाँचा कहा जाता है।
  • पश्चिम एशिया के संघर्ष से आपूर्ति-पक्ष के झटके आते हैं, जैसे कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि, जिससे आयातित मुद्रास्फीति का दबाव बनता है और विदेशी पूँजी प्रवाह तथा विनिमय दर पर भी असर पड़ता है।
  • वैश्विक स्तर पर प्रमुख केंद्रीय बैंकों द्वारा नीति दरें बढ़ाए जाने से पूँजी के वैश्विक प्रवाह की दिशा और ब्याज दर अंतर पर प्रभाव पड़ता है, जिससे घरेलू वित्तीय स्थितियों को नियंत्रित करने की चुनौती बढ़ती है।
  • कार्यवृत्त के अनुसार निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया। यह तथ्य नीति के प्रति समिति में साझा आकलन को दर्शाता है, परंतु वैधानिक वक्तव्यों और विस्तृत घरेलू आकलन के लिए मूल कार्यवृत्त का अध्ययन आवश्यक है।

मौद्रिक नीति समिति (MPC) क्या है?

  • मौद्रिक नीति समिति RBI अधिनियम, 1934 की धारा 45ZB के अंतर्गत गठित एक वैधानिक निकाय है। यह रेपो दर सहित नीति दरों के निर्धारण के लिए उत्तरदायी है।
  • समिति में छह सदस्य होते हैं: RBI गवर्नर (अध्यक्ष), मौद्रिक नीति के प्रभारी उप-गवर्नर, RBI का एक अधिकारी जिसे केंद्रीय बोर्ड नामित करता है, और केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त तीन बाह्य सदस्य।
  • निर्णय बहुमत से लिए जाते हैं। मत बराबर होने की स्थिति में गवर्नर को निर्णायक मत (Casting Vote) का अधिकार है।
  • धारा 45ZI(11) के अंतर्गत प्रत्येक सदस्य अपने निर्णय का कारण बताते हुए वक्तव्य देता है, जिसे कार्यवृत्त के साथ प्रकाशित किया जाता है।
  • तरलता समायोजन सुविधा के अंतर्गत रेपो दर वह दर है जिस पर RBI बैंकों को अल्पकालिक ऋण देता है। रिवर्स रेपो और स्थायी जमा सुविधा दर बैंकों की जमाराशि पर लागू होती है।
  • मौद्रिक नीति गलियारे में स्थायी जमा सुविधा दर निचली सीमा और सीमांत स्थायी सुविधा दर ऊपरी सीमा होती है। रेपो दर इन दोनों के बीच रहती है। इस बैठक में SDF रेपो से 25 आधार अंक नीचे और MSF व बैंक दर रेपो से 25 आधार अंक ऊपर रखी गई।
  • नीति रुख (Stance) बताता है कि केंद्रीय बैंक भविष्य में नीति दरों को किस दिशा में ले जाने का इरादा रखता है। समायोजनकारी, तटस्थ और कसावट जैसे रुख होते हैं।
  • मौद्रिक नीति का प्रभाव ब्याज दरों के माध्यम से माँग, ऋण और मुद्रास्फीति तक पहुँचता है, इसलिए इसके प्रभाव में कुछ समय (Policy Lag) लगता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
रेपो दर में वृद्धि तरलता समायोजन सुविधा (LAF) के तहत नीतिगत रेपो दर 25 आधार अंक (Basis Points) बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत की गई। इससे बैंकों की उधारी लागत पर सीधा असर पड़ता है।
SDF, MSF और बैंक दर का समायोजन स्थायी जमा सुविधा (SDF) दर 5.25 प्रतिशत और सीमांत स्थायी सुविधा (MSF) तथा बैंक दर 5.75 प्रतिशत पर समायोजित हुई। इससे रेपो दर के साथ पूरा नीतिगत गलियारा (Policy Corridor) स्पष्ट होता है।
नियंत्रित कसाव (Calibrated Tightening) का रुख MPC ने नीतिगत रुख को नियंत्रित कसाव में बदला। इसका अर्थ है कि आगे की नीति मुद्रास्फीति और आर्थिक संवृद्धि के आँकड़ों पर क्रमिक और सावधानीपूर्वक निर्भर रहेगी।
सर्वसम्मत निर्णय सभी सदस्यों ने प्रस्ताव के पक्ष में मत दिया। इससे यह संकेत मिलता है कि समिति के भीतर आकलन और नीतिगत दिशा पर व्यापक सहमति थी।
वैश्विक कारक पश्चिम एशिया में संघर्ष के पुनः तीव्र होने से कच्चे तेल की कीमतों में तीव्र उतार-चढ़ाव आया। अमेरिकी फेडरल रिज़र्व (US Federal Reserve) द्वारा सितंबर में दर वृद्धि और अन्य केंद्रीय बैंकों की कसाव-नीति से वैश्विक नीतिगत दरों की अपेक्षाएँ ऊँची हुईं।
प्रकाशन प्रक्रिया RBI अधिनियम, 1934 की धारा 45ZL के अनुसार बैठक के चौदहवें दिन कार्यवृत्त प्रकाशित हुआ। यह बैठक 5 से 7 अक्टूबर 2026 तक हुई थी और कार्यवृत्त 21 अक्टूबर 2026 को जारी हुआ।

महत्व

आर्थिक

  • रेपो दर बढ़ने से बैंकों की ऋण और जमा दरों पर दबाव बढ़ता है, जिससे उपभोग और निवेश की माँग पर असर पड़ता है। मुद्रास्फीति को लक्ष्य के भीतर रखना इसका मुख्य उद्देश्य है।
  • मौद्रिक नीति में कसाव से रुपये के बाह्य मूल्य और पूँजी प्रवाह पर भी प्रभाव पड़ता है, क्योंकि वैश्विक ब्याज दरें ऊँची हो रही हैं।

मौद्रिक नीति ढाँचा

  • मौद्रिक नीति समिति (MPC) की संरचना RBI अधिनियम, 1934 की धारा 45ZB के अंतर्गत है। समिति का निर्णय बहुमत या सर्वसम्मति से होता है और उसका कार्यवृत्त पारदर्शिता के लिए प्रकाशित किया जाता है।
  • धारा 45ZL के तहत कार्यवृत्त में संकल्प, प्रत्येक सदस्य का मत और धारा 45ZI(11) के अंतर्गत सदस्यों के वक्तव्य शामिल होते हैं। इससे नीतिगत निर्णय की जवाबदेही बढ़ती है।

वित्तीय स्थिरता

  • वैश्विक बॉन्ड प्रतिफल रिकॉर्ड ऊँचाई पर है। इससे उभरती अर्थव्यवस्थाओं की वित्तीय परिस्थितियाँ कड़ी होती हैं और जोखिम-परिसंपत्तियों की कीमतों में समायोजन का खतरा बनता है।

चुनौतियाँ

1. आयातित मुद्रास्फीति का दबाव

  • पश्चिम एशिया संघर्ष से कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता बनी हुई है। इससे परिवहन और उत्पादन लागत के माध्यम से मुद्रास्फीति पर दबाव आता है।
  • आपूर्ति-पक्ष के झटकों में मौद्रिक नीति की सीमा होती है, क्योंकि ब्याज दर से आपूर्ति बढ़ाई नहीं जा सकती।

2. वैश्विक ब्याज दरों और बॉन्ड प्रतिफल का दबाव

  • अमेरिकी फेडरल रिज़र्व सहित प्रमुख केंद्रीय बैंकों की कसाव-नीति से वैश्विक पूँजी की लागत बढ़ी है।
  • ऊँचे वैश्विक प्रतिफल से विदेशी पोर्टफोलियो निवेश में उतार-चढ़ाव और रुपये पर दबाव की आशंका रहती है।

3. संवृद्धि और मुद्रास्फीति नियंत्रण में संतुलन

  • नीतिगत दर बढ़ाने से मुद्रास्फीति नियंत्रित होती है, परंतु अधिक कसाव से निवेश और रोज़गार-सृजन की गति धीमी हो सकती है।
  • नियंत्रित कसाव का रुख इसी द्वंद्व को संतुलित करने के लिए चुना गया है, जिसमें आगे के आँकड़ों के अनुसार निर्णय लिए जाएँगे।

4. राजकोषीय स्थिरता और सार्वजनिक ऋण

  • प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में उच्च सार्वजनिक ऋण और राजकोषीय स्थिरता की चिंताएँ वैश्विक बॉन्ड बाज़ार को प्रभावित कर रही हैं।
  • राजकोषीय और मौद्रिक नीति के बीच समन्वय न होने पर ब्याज दर-चक्र का प्रभाव और जटिल हो सकता है।

5. परिसंपत्ति मूल्यांकन और वित्तीय स्थिरता जोखिम

  • AI से जुड़े परिसंपत्ति मूल्यांकन ऊँचे बने हुए हैं। यदि इनमें तीव्र समायोजन होता है, तो वित्तीय बाज़ारों में अस्थिरता आ सकती है।
  • वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों के और कसने से भारतीय वित्तीय बाज़ारों पर भी प्रभाव पड़ सकता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

समस्या चिंता
कच्चे तेल की अस्थिर कीमतें पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण आयातित मुद्रास्फीति का खतरा बना हुआ है।
वैश्विक ब्याज दरों में वृद्धि ऊँचे वैश्विक दरें और बॉन्ड प्रतिफल पूँजी प्रवाह और रुपये पर दबाव डाल सकते हैं।
संवृद्धि बनाम मुद्रास्फीति का संतुलन अधिक कसाव से निवेश और माँग धीमी पड़ने का जोखिम है।
राजकोषीय स्थिरता सार्वजनिक ऋण का उच्च स्तर मौद्रिक नीति के प्रभाव को जटिल बना सकता है।
AI-संबंधित परिसंपत्ति मूल्यांकन ऊँचे मूल्यांकन में तीव्र सुधार वित्तीय स्थिरता के लिए जोखिम है।

आगे की राह

  • मुद्रास्फीति पर नज़र रखने के लिए खाद्य और ऊर्जा कीमतों के उच्च-आवृत्ति आँकड़ों की निगरानी को प्राथमिकता दी जाए।
  • कच्चे तेल की आपूर्ति और मूल्य के झटकों से निपटने के लिए ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक भंडारण की क्षमता बढ़ाई जाए।
  • पूँजी प्रवाह के अचानक उलटने के जोखिम से बचाव हेतु विदेशी मुद्रा भंडार का प्रबंधन सुदृढ़ किया जाए।
  • मौद्रिक और राजकोषीय नीति के बीच समन्वय बनाए रखा जाए, ताकि ब्याज दर-चक्र का प्रभाव संतुलित रहे।
  • बैंकिंग प्रणाली में ब्याज दर परिवर्तन के संचरण (Transmission) की गति और दक्षता की नियमित समीक्षा की जाए।
  • AI से जुड़े परिसंपत्ति मूल्यांकन और वित्तीय संस्थाओं के जोखिम-प्रबंधन पर वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के माध्यम से निगरानी बढ़ाई जाए।
  • नीति-निर्णय की पारदर्शिता के लिए कार्यवृत्त, मत-विवरण और सदस्यों के वक्तव्यों का समय पर प्रकाशन जारी रखा जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

मौद्रिक नीति समिति (MPC) · भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 · रेपो दर · मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण · तरलता समायोजन सुविधा (LAF) · स्थायी जमा सुविधा (SDF) · सीमांत स्थायी सुविधा (MSF) · कैलिब्रेटेड टाइटनिंग (Calibrated Tightening) · वैश्विक आर्थिक चुनौतियाँ · घरेलू आर्थिक परिदृश्य

अवधारणा प्रवाह

पश्चिम एशिया संघर्ष और कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता से वैश्विक मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ा।  →  अमेरिकी फेडरल रिज़र्व और अन्य केंद्रीय बैंकों ने दरें बढ़ाईं, जिससे वैश्विक बॉन्ड प्रतिफल ऊँचे हुए।  →  आयातित मुद्रास्फीति और वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों के कसने से घरेलू मुद्रास्फीति का जोखिम बढ़ा।  →  मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने तरलता समायोजन सुविधा (LAF) के तहत रेपो दर 25 आधार अंक बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत की।  →  SDF, MSF और बैंक दर के समायोजन से पूरा नीतिगत गलियारा नई दर-संरचना के अनुरूप हुआ।  →  नियंत्रित कसाव के रुख के साथ आगे की नीति आँकड़ों पर निर्भर रहेगी, और कार्यवृत्त से निर्णय की पारदर्शिता सुनिश्चित होती है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. मौद्रिक नीति समिति (MPC) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. MPC का गठन भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ZB के तहत किया गया है।
2. भारतीय रिज़र्व बैंक का गवर्नर MPC का पदेन अध्यक्ष होता है।
3. MPC की बैठकों का कार्यवृत्त (minutes) बैठक के सातवें दिन प्रकाशित किया जाता है।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। MPC का गठन भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ZB के तहत किया गया है। कथन 2 सही है। भारतीय रिज़र्व बैंक का गवर्नर MPC का पदेन अध्यक्ष होता है। कथन 3 गलत है। भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ZL के अनुसार, MPC की बैठकों का कार्यवृत्त बैठक के चौदहवें दिन प्रकाशित किया जाता है। अतः, केवल दो कथन सही हैं।

Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा मौद्रिक नीति का एक मात्रात्मक उपकरण नहीं है?

  1. बैंक दर
  2. रेपो दर
  3. खुले बाज़ार के परिचालन (Open Market Operations)
  4. नैतिक दबाव (Moral Suasion)

उत्तर: नैतिक दबाव (Moral Suasion) — नैतिक दबाव (Moral Suasion) मौद्रिक नीति का एक गुणात्मक उपकरण है, जबकि बैंक दर, रेपो दर और खुले बाज़ार के परिचालन मात्रात्मक उपकरण हैं। गुणात्मक उपकरण चयनात्मक होते हैं और विशिष्ट क्षेत्रों को लक्षित करते हैं, जबकि मात्रात्मक उपकरण अर्थव्यवस्था में ऋण की कुल मात्रा को प्रभावित करते हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ मौद्रिक नीति समिति (MPC) के उद्देश्यों और संरचना का विश्लेषण कीजिए। भारतीय अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति नियंत्रण और आर्थिक संवृद्धि (economic growth) को संतुलित करने में इसकी भूमिका का भी मूल्यांकन कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** मौद्रिक नीति समिति (MPC) का संक्षिप्त परिचय, इसका गठन और मुख्य कार्य।
2. **उद्देश्य:** भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 में संशोधन के बाद MPC के प्राथमिक उद्देश्य (मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण) और द्वितीयक उद्देश्य (संवृद्धि को समर्थन) का उल्लेख।
3. **संरचना:** MPC के छह सदस्यों (तीन RBI से और तीन केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त) का विवरण, अध्यक्ष (RBI गवर्नर) की भूमिका और निर्णय लेने की प्रक्रिया (बहुमत से मतदान, टाई होने पर गवर्नर का निर्णायक मत)।
4. **मुद्रास्फीति नियंत्रण में भूमिका:**
* मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढाँचा (4% +/- 2%)।
* नीतिगत दरों (रेपो दर, SDF, MSF) के माध्यम से मुद्रा आपूर्ति को नियंत्रित करना।
* हाल के निर्णयों का संदर्भ (जैसे रेपो दर में वृद्धि, ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ का रुख) और उनके निहितार्थ।
5. **आर्थिक संवृद्धि को संतुलित करने में भूमिका:**
* उच्च मुद्रास्फीति के संवृद्धि पर नकारात्मक प्रभावों को कम करना।
* संवृद्धि को समर्थन देने के लिए अनुकूल मौद्रिक स्थितियों का निर्माण, जब मुद्रास्फीति नियंत्रण में हो।
* वैश्विक और घरेलू आर्थिक परिदृश्य का आकलन करते हुए नीतिगत निर्णय लेना।
6. **चुनौतियाँ और आलोचनाएँ:** वैश्विक अस्थिरता, आपूर्ति-पक्ष के झटके, मौद्रिक नीति की सीमाओं पर चर्चा।
7. **निष्कर्ष:** MPC की प्रभावशीलता और भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए इसके महत्व का सारांश।

स्रोत: RBI


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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