आरबीआई ने सूरि फ्रेंड्स यूनियन सहकारी बैंक पर निदेशों का विस्तार किया, जानिए क्या है पूरा मामला

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आरबीआई ने सूरि फ्रेंड्स यूनियन सहकारी बैंक पर निदेशों का विस्तार किया, जानिए क्या है पूरा मामला

सहकारी बैंक पर RBI निर्देशों का विस्तारनिर्देश जारीपहली बार 21/07/2022विस्तार14/07/2026 तकनवीनतम विस्तार22/10/2026 से 22/01/2027
सहकारी बैंक पर RBI निर्देशों का विस्तार

✎ धारा 35A (सह-पठित धारा 56) के अंतर्गत RBI का निर्देश जनहित में सीमित अवधि के लिए जारी होता है, उसका विस्तार बैंक की वित्तीय स्थिति से संतुष्टि नहीं दर्शाता।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — अर्थव्यवस्था (बैंकिंग क्षेत्र का नियमन, वित्तीय स्थिरता, जमाकर्ता संरक्षण)  |  GS Paper II — शासन एवं राज्यव्यवस्था (संवैधानिक निकाय, सहकारिता और संघवाद, वैधानिक शक्तियों का प्रयोग)
  • Prelims: बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 35A और धारा 56, सहकारी बैंक: शहरी सहकारी बैंक (UCB) तथा राज्य व बहु-राज्य सहकारी बैंक का अंतर, RBI द्वारा जनहित में निर्देश जारी करने की शर्तें, जमा बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम (DICGC) और जमा बीमा की सीमा (₹5 लाख प्रति जमाकर्ता), प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन (PCA) ढाँचा, बैंकिंग विनियमन (संशोधन) अधिनियम, 2020, सातवीं अनुसूची: राज्य सूची की प्रविष्टि 32 तथा संघ सूची की प्रविष्टि 44 (सहकारी समितियों से संबंधित), 97वाँ संविधान संशोधन (2011): भाग IX-B और अनुच्छेद 19(1)(ग)
  • Essay: सहकारी बैंकिंग में नियामकीय हस्तक्षेप और जमाकर्ता हित: वित्तीय स्थिरता बनाम स्वायत्तता, सहकारिता राज्य का विषय या संघीय चिंता: सहकारी क्षेत्र में केंद्र-राज्य समन्वय की चुनौतियाँ

त्वरित पुनरावृत्ति: धारा 35A (सह-पठित धारा 56) के अंतर्गत RBI का निर्देश जनहित में सीमित अवधि के लिए जारी होता है, उसका विस्तार बैंक की वित्तीय स्थिति से संतुष्टि नहीं दर्शाता।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने 22 अक्टूबर 2026 को जारी प्रेस विज्ञप्ति में पश्चिम बंगाल के सूरी स्थित द सूरी फ्रेंड्स यूनियन सहकारी बैंक लिमिटेड (The Suri Friends’ Union Co-operative Bank Ltd.) के संबंध में बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 35A सह-पठित धारा 56 के अंतर्गत जारी निर्देशों की अवधि तीन माह और बढ़ाई है। यह विस्तार 22 अक्टूबर 2026 के कारोबार समाप्ति से 22 जनवरी 2027 के कारोबार समाप्ति तक है और समीक्षा के अधीन है। RBI ने स्पष्ट किया है कि इस विस्तार को बैंक की वित्तीय स्थिति से संतुष्टि नहीं माना जाए। इसलिए यह समाचार सहकारी बैंकों की नियामकीय निगरानी और जनहित में वैधानिक शक्ति के प्रयोग की प्रक्रिया को समझने के लिए प्रासंगिक है।

पृष्ठभूमि

  • इस बैंक के लिए निर्देश पहली बार 21 जुलाई 2022 को छह माह की अवधि के लिए जारी हुए थे, जो 22 जनवरी 2023 तक वैध थे। इसके बाद समय-समय पर इनका विस्तार होता रहा है। नवीनतम विस्तार 14 जुलाई 2026 के निर्देश द्वारा किया गया था।
  • धारा 35A RBI को यह शक्ति देती है कि वह बैंकिंग कंपनी को निर्देश दे सके, यदि वह संतुष्ट हो कि ऐसा जनहित में, जमाकर्ताओं के हित की रक्षा हेतु, या बैंक के उचित प्रबंधन के लिए आवश्यक है। धारा 56 इन प्रावधानों को सहकारी बैंकों पर उपयुक्त संशोधनों के साथ लागू करती है।
  • बैंकिंग विनियमन (संशोधन) अधिनियम, 2020 के बाद सहकारी बैंकों पर RBI की नियामकीय पहुँच और निगरानी के उपकरण सुदृढ़ हुए, जिनमें बोर्ड के अधिग्रहण से संबंधित प्रावधान भी शामिल हैं।
  • संविधान में 97वें संशोधन (2011) द्वारा सहकारी समितियों से संबंधित भाग IX-B जोड़ा गया और अनुच्छेद 19(1)(ग) के अंतर्गत सहकारी समिति बनाने के अधिकार को मूल अधिकार के रूप में मान्यता दी गई। इसी संदर्भ में सहकारिता के शासन में राज्य और केंद्र की भूमिकाएँ विभाजित हैं।
  • सहकारी बैंकों का ढाँचा दो स्तरों पर है: राज्य सहकारी समिति अधिनियमों के अंतर्गत पंजीकृत बैंक और बहु-राज्य सहकारी समिति अधिनियम, 2002 के अंतर्गत बहु-राज्य बैंक। बैंकिंग नियमन के मामले में दोनों पर RBI के निर्देश लागू होते हैं, जबकि पंजीकरण व प्रशासन के मामले में भूमिकाएँ अलग हैं।

धारा 35A सह-पठित धारा 56 के अंतर्गत RBI के निर्देश क्या हैं?

  • धारा 35A बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 का वह प्रावधान है जिससे RBI किसी बैंकिंग कंपनी या सभी बैंकिंग कंपनियों को निर्देश जारी कर सकता है, बशर्ते वह संतुष्ट हो कि यह जनहित में या जमाकर्ताओं के हित की रक्षा के लिए आवश्यक है।
  • धारा 56 इस अधिनियम के अनेक प्रावधानों को सहकारी बैंकों पर लागू करती है, इसलिए सहकारी बैंकों पर भी RBI के निर्देश इसी आधार पर जारी होते हैं।
  • ऐसे निर्देश सामान्यतः सीमित अवधि के लिए होते हैं और उनकी समीक्षा की जाती है। अवधि का विस्तार तभी किया जाता है जब RBI उसे जनहित में आवश्यक माने।
  • विस्तार का अर्थ यह नहीं होता कि RBI बैंक की वित्तीय स्थिति से संतुष्ट है। यह नियामकीय सावधानी का संकेत है, न कि बैंक के सुदृढ़ होने का प्रमाण।
  • जमाकर्ताओं के लिए जमा बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम (DICGC) प्रति जमाकर्ता प्रति बैंक ₹5 लाख तक की जमा राशि का बीमा करता है। यह बीमा सहकारी बैंकों पर भी लागू होता है।
  • RBI सहकारी बैंकों की निगरानी के लिए प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन (PCA) ढाँचा भी लागू करता है, जिसमें पूँजी, परिसंपत्ति गुणवत्ता और लाभप्रदता के संकेतकों के आधार पर सुधारात्मक कदम उठाए जाते हैं।
  • सहकारिता राज्य सूची की प्रविष्टि 32 का विषय है, जबकि बहु-राज्य सहकारी समितियाँ संघ सूची की प्रविष्टि 44 से संबंधित हैं। इसलिए बैंकिंग नियमन में RBI की भूमिका और सहकारी प्रशासन में राज्य की भूमिका को अलग-अलग समझना आवश्यक है।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
निदेश का विस्तार (Extension of Directive) जनहित को ध्यान में रखते हुए निदेश को 22 अक्टूबर 2026 के बाद तीन माह के लिए, यानी 22 जनवरी 2027 के कारोबार समाप्ति तक बढ़ाया गया है। यह विस्तार समीक्षा के अधीन है।
वैधानिक आधार यह विस्तार बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 35A की उप-धारा (1) के अंतर्गत किया गया है। धारा 56 के माध्यम से यह प्रावधान सहकारी बैंकों पर भी लागू होता है।
बैंक की वित्तीय स्थिति पर टिप्पणी RBI ने स्पष्ट किया है कि इस विस्तार को बैंक की वित्तीय स्थिति से संतुष्टि का संकेत नहीं माना जाना चाहिए। निदेश का उद्देश्य नियामकीय निगरानी को बनाए रखना है।
निदेश की अवधि का इतिहास मूल निदेश 21 जुलाई 2022 को छह माह के लिए जारी हुआ था। इसके बाद कई बार विस्तार हुआ, और पिछला विस्तार 14 जुलाई 2026 के निदेश द्वारा 22 अक्टूबर 2026 तक किया गया था।
अन्य शर्तों की स्थिति मूल निदेश की अन्य सभी शर्तें अपरिवर्तित रहेंगी। इसका अर्थ है कि विस्तार केवल अवधि से संबंधित है, नियामकीय प्रतिबंधों की प्रकृति में कोई नया बदलाव नहीं किया गया है।

महत्व

नियामकीय (Regulatory)

  • धारा 35A RBI को जनहित में, या बैंक के हानिकारक आचरण को रोकने के लिए, निदेश जारी करने की शक्ति देती है।
  • सहकारी बैंकों पर बैंककारी कानून का प्रयोग यह दर्शाता है कि सहकारी स्वरूप होने के बावजूद उनकी बैंकिंग गतिविधियाँ RBI की निगरानी में आती हैं।
  • निदेश की समीक्षा-आधारित अवधि नियामक को स्थिति के अनुसार हस्तक्षेप को समायोजित करने का अवसर देती है।

वित्तीय स्थिरता (Financial Stability)

  • किसी एक कमजोर सहकारी बैंक के कारण व्यापक प्रणालीगत जोखिम न बने, इसके लिए समय पर नियामकीय हस्तक्षेप आवश्यक है।
  • सहकारी बैंक छोटे क्षेत्रों में वित्तीय समावेशन का माध्यम हैं, इसलिए उनकी स्थिरता स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण है।

जमाकर्ता संरक्षण (Depositor Protection)

  • जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा नियामक का प्रमुख उद्देश्य है।
  • जमा बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम (DICGC) द्वारा प्रति जमाकर्ता अधिकतम 5 लाख रुपये तक की जमा राशि का बीमा किया जाता है। यह सीमा 2020 से लागू है।

संघीय ढाँचा (Federal Structure)

  • बैंकिंग संविधान की सातवीं अनुसूची की संघ सूची (प्रविष्टि 45) में है, जबकि सहकारी समितियाँ राज्य सूची (प्रविष्टि 32) में आती हैं।
  • ऐसे बैंकों पर RBI का नियंत्रण संघ और राज्य के अधिकार-क्षेत्र के बीच समन्वय का व्यावहारिक उदाहरण है।

चुनौतियाँ

1. बार-बार विस्तार और समाधान में विलंब

  • निदेश की अवधि कई बार बढ़ाई गई है, जिससे यह प्रश्न उठता है कि बैंक की स्थिति सुधारने की प्रक्रिया कितनी प्रभावी है।
  • लंबे समय तक निदेश लागू रहने से बैंक के ग्राहकों और जमाकर्ताओं में अनिश्चितता बनी रह सकती है।

2. सहकारी बैंकों का दोहरा नियंत्रण

  • सहकारी बैंकों का गठन और प्रबंधन राज्य सहकारी कानूनों तथा रजिस्ट्रार के अधीन होता है, जबकि बैंकिंग विनियमन RBI के पास है।
  • दोहरे नियंत्रण से जवाबदेही का स्पष्ट विभाजन कठिन हो जाता है और सुधार-कार्रवाई में समन्वय की आवश्यकता पड़ती है।

3. जमाकर्ता हित और परिसंपत्ति सुधार के बीच संतुलन

  • नियामक को जमाकर्ताओं की सुरक्षा और बैंक के पुनर्गठन के बीच संतुलन बनाना होता है।
  • कठोर कार्रवाई से जमाकर्ताओं का भरोसा प्रभावित हो सकता है, जबकि ढिलाई से जोखिम बढ़ता है।

4. सार्वजनिक सूचना की सीमा

  • प्रेस विज्ञप्ति में निदेश के विशिष्ट प्रतिबंधों या बैंक की वित्तीय कमियों का विवरण नहीं दिया गया है।
  • पारदर्शिता और सूचना-आधारित सार्वजनिक निगरानी के लिए नियामकीय संवाद का स्पष्ट होना आवश्यक है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
विस्तार की पुनरावृत्ति समाधान की समय-सीमा अनिश्चित होने से जमाकर्ताओं और बैंक दोनों के लिए अनिश्चितता बनी रहती है।
दोहरा नियामकीय ढाँचा RBI और राज्य रजिस्ट्रार के बीच समन्वय की कमी सुधार-प्रक्रिया को धीमा कर सकती है।
जमाकर्ता सुरक्षा बीमा सीमा से ऊपर की जमा राशि वाले जमाकर्ताओं के लिए जोखिम बना रहता है।
सूचना की पारदर्शिता निदेश की विशिष्ट शर्तों का सार्वजनिक विवरण सीमित होने से बाहरी मूल्यांकन कठिन होता है।

आगे की राह

  • बैंक की वित्तीय पुनर्संरचना के लिए स्पष्ट समय-सीमा और मापनीय लक्ष्य निर्धारित किए जाएँ।
  • सहकारी बैंकों के निदेशक मंडल और प्रबंधन की योग्यता तथा स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए शासन-सुधार लागू हों।
  • RBI और राज्य सहकारी रजिस्ट्रार के बीच सूचना-साझाकरण और समन्वय तंत्र को संस्थागत रूप दिया जाए।
  • जमाकर्ताओं को निदेश की सामान्य प्रकृति और अपने अधिकारों के बारे में सरल भाषा में जानकारी उपलब्ध कराई जाए।
  • जमा बीमा की जागरूकता बढ़ाई जाए, ताकि बैंक-संकट के समय अफवाहों से जमा निकासी का दबाव न बने।
  • समय पर सुधार-कार्रवाई हेतु प्रारंभिक चेतावनी संकेतकों की नियमित निगरानी को मजबूत किया जाए।
  • सहकारी बैंकों के लिए पेशेवर पूंजी-जुटान और जोखिम-प्रबंधन के मानकों को क्रमिक रूप से लागू किया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

सहकारी बैंक (Co-operative Bank) · बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 (Banking Regulation Act, 1949) · धारा 35A और धारा 56 (Sections 35A and 56) · भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) · दोहरा विनियमन (Dual Regulation) · संघ सूची की प्रविष्टि 45 और राज्य सूची की प्रविष्टि 32 (Union List Entry 45 and State List Entry 32) · जमा बीमा और ऋण गारंटी निगम (Deposit Insurance and Credit Guarantee Corporation, DICGC) · तत्काल सुधारात्मक कार्रवाई (Prompt Corrective Action, PCA) · बहु-राज्य सहकारी समिति अधिनियम, 2002 (Multi-State Co-operative Societies Act, 2002) · जमाकर्ता हित संरक्षण (Depositor Protection) · सहकारी संघवाद (Co-operative Federalism) · वैधानिक निर्देश बनाम वित्तीय सुदृढ़ता का प्रमाण (Regulatory Directions vs Certification of Soundness)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 246: संघ और राज्य के विधायी अधिकार-क्षेत्र
  • सातवीं अनुसूची, संघ सूची प्रविष्टि 45: बैंकिंग विषय का केंद्रीय अधिकार
  • सातवीं अनुसूची, राज्य सूची प्रविष्टि 32: सहकारी समितियों का राज्य विषय

अवधारणा प्रवाह

बैंक की वित्तीय और प्रबंधकीय स्थिति पर नियामकीय चिंता उत्पन्न होती है।  →  धारा 35A के अंतर्गत RBI सहकारी बैंक के लिए निदेश जारी करता है।  →  धारा 56 के माध्यम से यह निदेश सहकारी बैंक पर लागू होता है।  →  निदेश की अवधि समय-समय पर समीक्षा के आधार पर बढ़ाई जाती है।  →  जनहित को ध्यान में रखते हुए निदेश को 22 जनवरी 2027 तक विस्तारित किया जाता है।  →  विस्तार बैंक की स्थिति पर संतोष का संकेत नहीं है, और अन्य शर्तें यथावत रहती हैं।  →  आगामी समीक्षा के आधार पर निदेश को जारी रखने, संशोधित करने या समाप्त करने का निर्णय होगा।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 56 के अंतर्गत कुछ विशिष्ट प्रावधान सहकारी समितियों पर संशोधनों सहित लागू होते हैं।
2. धारा 35A के अंतर्गत भारतीय रिज़र्व बैंक लोकहित में बैंकिंग कंपनियों को निर्देश जारी कर सकता है, और धारा 56 के माध्यम से यह शक्ति सहकारी बैंकों पर भी लागू होती है।
3. बहु-राज्य सहकारी समितियाँ केवल संबंधित राज्यों के सहकारी समिति अधिनियमों द्वारा ही शासित होती हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 और 2 सही हैं: धारा 56 बैंकिंग विनियमन अधिनियम के चुने हुए प्रावधानों को सहकारी बैंकों पर संशोधनों सहित लागू करती है, और धारा 35A के निर्देश इसी के माध्यम से सहकारी बैंकों पर लागू होते हैं। कथन 3 गलत है, क्योंकि बहु-राज्य सहकारी समितियाँ बहु-राज्य सहकारी समिति अधिनियम, 2002 द्वारा शासित होती हैं, न कि केवल राज्य अधिनियमों द्वारा।

Q2. निम्नलिखित दो कथनों (A) और (R) पर विचार कीजिए:
कथन (A): सहकारी बैंकों में रखी जमाओं पर भी जमा बीमा और ऋण गारंटी निगम (DICGC) द्वारा बीमा सुरक्षा उपलब्ध है।
कारण (R): जमा बीमा और ऋण गारंटी निगम अधिनियम, 1961 के अंतर्गत भारतीय रिज़र्व बैंक से लाइसेंस प्राप्त सहकारी बैंक भी बीमित बैंक की परिभाषा में आते हैं।
नीचे दिए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए।

  1. (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है
  2. (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है
  3. (A) सही है, किंतु (R) गलत है
  4. (A) गलत है, किंतु (R) सही है

उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है — DICGC अधिनियम, 1961 के अंतर्गत RBI से लाइसेंस प्राप्त सहकारी बैंक बीमित बैंक हैं, इसलिए उनकी जमाओं पर बीमा सुरक्षा लागू होती है। अतः (A) और (R) दोनों सही हैं और (R) (A) की सही व्याख्या करता है। जमा बीमा सीमा प्रति जमाकर्ता प्रति बैंक 5 लाख रुपये है।

Q3. निम्नलिखित सूचियों का मिलान कीजिए:
सूची I (विधिक प्रावधान/संस्था)
A. बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 35A
B. बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 56
C. जमा बीमा और ऋण गारंटी निगम (DICGC)
D. बहु-राज्य सहकारी समिति अधिनियम, 2002

सूची II (कार्य/विषय)
1. जमाओं पर बीमा सुरक्षा प्रदान करना
2. लोकहित में बैंकों को निर्देश जारी करने की शक्ति
3. बैंकिंग विनियमन अधिनियम के चुने हुए प्रावधानों को सहकारी समितियों पर लागू करना
4. बहु-राज्य सहकारी समितियों का शासन और विनियमन
नीचे दिए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए।

  1. A-2, B-3, C-1, D-4
  2. A-1, B-2, C-3, D-4
  3. A-3, B-2, C-1, D-4
  4. A-2, B-1, C-3, D-4

उत्तर: A-2, B-3, C-1, D-4 — धारा 35A लोकहित में निर्देश जारी करने की शक्ति देती है (A-2)। धारा 56 बैंकिंग विनियमन अधिनियम के प्रावधानों को सहकारी समितियों पर लागू करती है (B-3)। DICGC जमाओं का बीमा करता है (C-1)। बहु-राज्य सहकारी समिति अधिनियम, 2002 ऐसी समितियों के शासन का विषय है (D-4)।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ सहकारी बैंकों का विनियमन संवैधानिक रूप से एक जटिल संरचना में होता है, जहाँ बैंकिंग संघ सूची का विषय है और सहकारिता राज्य सूची का। बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 35A और धारा 56 के अंतर्गत भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा सहकारी बैंकों पर लोकहित में निर्देश जारी करने और उन्हें समय-समय पर बढ़ाने की प्रक्रिया इसी दोहरी व्यवस्था का एक उदाहरण है। इस व्यवस्था का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि यदि रिज़र्व बैंक के निर्देश की अवधि बढ़ाए जाने को बैंक की वित्तीय सुदृढ़ता का प्रमाण मान लिया जाए, तो जमाकर्ताओं और सहकारी संघवाद पर क्या परिणाम होंगे। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर संरचना (मॉडल उत्तर बिंदु):
1. भूमिका: सहकारी बैंक भारतीय वित्तीय ढांचे में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में बचत और ऋण का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। सहकारिता संविधान के अनुच्छेद 243ZH से 243ZT (भाग IXB, 97वें संशोधन, 2011) के अंतर्गत आती है; इसके आधार पर राज्य सहकारी कानून बनाते हैं।
2. संवैधानिक ढांचा: संघ सूची की प्रविष्टि 45 (बैंकिंग) के अंतर्गत केंद्र बैंकिंग विनियमन का अधिकार रखता है; राज्य सूची की प्रविष्टि 32 (सहकारी समितियाँ) के अंतर्गत राज्य सहकारी समितियों का गठन और शासन करते हैं। इससे दोहरा विनियमन उत्पन्न होता है।
3. वैधानिक प्रावधान: बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 35A (लोकहित में या जमाकर्ताओं के हित में निर्देश देने की शक्ति) और धारा 56 (सहकारी बैंकों पर संशोधनों सहित लागू प्रावधान)। 2020 के संशोधन द्वारा सहकारी बैंकों पर RBI का नियामक अधिकार सुदृढ़ किया गया।
4. समीक्षा समितियाँ: नरसिम्हन समिति (1991, 1998) ने बैंकिंग सुधारों में सुदृढ़ पर्यवेक्षण पर बल दिया; माधवपेड्डी रामकृष्ण समिति (1999) ने शहरी सहकारी बैंकों की समस्याओं की जाँच की; वैद्यनाथन समिति (2004) ने ग्रामीण सहकारी ऋण ढांचे के पुनरुद्धार की सिफारिश की।
5. समालोचनात्मक पक्ष (पक्ष में तर्क): जमाकर्ता हित संरक्षण, जमा बीमा (DICGC द्वारा प्रति जमाकर्ता 5 लाख रुपये तक), तत्काल सुधारात्मक कार्रवाई (PCA) ढांचा, RBI का व्यापक नियामक अनुभव और प्रणालीगत स्थिरता।
6. समालोचनात्मक पक्ष (विपक्ष/चुनौतियाँ): राज्य और केंद्र के बीच अधिकार-क्षेत्र की अस्पष्टता, सहकारी स्वायत्तता पर प्रभाव, विनियमन की एकरूपता का अभाव, छोटे सहकारी बैंकों पर अनुपालन का बोझ, और संस्थागत शासन की कमियाँ।
7. निर्देशों की अवधि बढ़ाने की प्रकृति: RBI के निर्देश ‘समीक्षा के अधीन’ होते हैं। प्रेस विज्ञप्ति स्पष्ट करती है कि अवधि बढ़ाना बैंक की वित्तीय स्थिति से संतुष्टि का संकेत नहीं है। इस अंतर को जमाकर्ताओं के बीच स्पष्ट रखना आवश्यक है।
8. परिणाम (उप-प्रश्न): यदि अवधि विस्तार को सुदृढ़ता का प्रमाण माना जाए तो जमाकर्ताओं में अनुचित भरोसा, बाज़ार अनुशासन का ह्रास और नैतिक जोखिम (moral hazard) उत्पन्न हो सकता है; वहीं असंगत व्याख्या से सहकारी संघवाद और राज्य प्राधिकरणों के साथ समन्वय पर दबाव बढ़ सकता है।
9. निष्कर्ष: संतुलित दृष्टिकोण—लोकहित में नियामक हस्तक्षेप आवश्यक है, किंतु पारदर्शिता, स्पष्ट मानदंड, राज्य-केंद्र समन्वय और निर्देशों की वास्तविक समीक्षा से ही विश्वास बनाए रखा जा सकता है।

स्रोत: RBI

West Bengal PCS (WBPSC / WBCS) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 35A के साथ पठित धारा 56 के अंतर्गत निर्देशों के संदर्भ में, पश्चिम बंगाल के सुरि स्थित ‘सूरी फ्रेंड्स यूनियन सहकारी बैंक लिमिटेड’ के संबंध में हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा उठाए गए कदम का मुख्य उद्देश्य क्या था?

  1. A. बैंक के विलय को अनिवार्य करना
  2. B. बैंक के संचालन पर प्रतिबंध लगाना तथा जमाकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना
  3. C. बैंक के निदेशकों को गिरफ्तार करना
  4. D. बैंक का राष्ट्रीयकरण करना

उत्तर: B. बैंक के संचालन पर प्रतिबंध लगाना तथा जमाकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना — RBI ने बैंक के संचालन पर प्रतिबंध लगाकर जमाकर्ताओं की सुरक्षा तथा वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए यह कदम उठाया था।

Mains: भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा ‘सूरी फ्रेंड्स यूनियन सहकारी बैंक लिमिटेड’ पर धारा 35A के अंतर्गत लगाए गए प्रतिबंधों के पश्चात, पश्चिम बंगाल में सहकारी बैंकिंग प्रणाली की सुरक्षा एवं पारदर्शिता सुनिश्चित करने हेतु आवश्यक सुधारों पर चर्चा कीजिए।


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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