26 Oct सुप्रीम कोर्ट ने विधायकों के दलबदल पर केंद्र और चुनाव आयोग को भेजा नोटिस
✎ दसवीं अनुसूची अयोग्यता से बचने के लिए इस्तीफे का उपयोग करने की समस्या का समाधान न्यायिक और संवैधानिक स्तर पर अभी विचाराधीन है; अनुच्छेद 101(3)(a) और 190(3) के तहत इस्तीफा स्वीकार होते ही स्थान रिक्त माना जाता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — राजव्यवस्था (Polity): संसद और राज्य विधानमंडल, दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law), निर्वाचन आयोग की भूमिका | GS Paper IV — नीतिशास्त्र (Ethics): लोक सेवा में विश्वास, प्रतिनिधिक लोकतंत्र में नैतिक उत्तरदायित्व
- Prelims: दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule), अनुच्छेद 101(3)(a) और अनुच्छेद 190(3): सदस्य के इस्तीफे से स्थान रिक्त होना, अनुच्छेद 102(2) और अनुच्छेद 191(2): सदस्यता के अयोग्य ठहराए जाने के आधार, 91वाँ संविधान संशोधन, 2003 (दल-बदल के आधार पर विभाजन की छूट समाप्त), लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 151A (उपचुनाव की समय-सीमा), किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू मामला, 1992 (अध्यक्ष के निर्णय की न्यायिक समीक्षा), अनुच्छेद 324: निर्वाचन आयोग की शक्तियाँ और अधीक्षण, व्हिप (Whip) और सदन में पार्टी निर्देश का उल्लंघन
- Essay: प्रतिनिधिक लोकतंत्र में जनादेश की पवित्रता और विधायक की नैतिक जवाबदेही, दल-बदल पर रोक: संवैधानिक प्रावधान, इस्तीफे के रास्ते से बचाव और उसके समाधान
त्वरित पुनरावृत्ति: दसवीं अनुसूची अयोग्यता से बचने के लिए इस्तीफे का उपयोग करने की समस्या का समाधान न्यायिक और संवैधानिक स्तर पर अभी विचाराधीन है; अनुच्छेद 101(3)(a) और 190(3) के तहत इस्तीफा स्वीकार होते ही स्थान रिक्त माना जाता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय ने 26 अक्टूबर 2026 को एक याचिका पर केंद्र सरकार और भारत निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी किया है। याचिका में यह प्रश्न उठाया गया है कि क्या विधायक दल-बदल के लिए इस्तीफा देकर सदन छोड़ सकते हैं और फिर उपचुनाव के माध्यम से दोबारा चुने जा सकते हैं, जबकि उनके विरुद्ध दसवीं अनुसूची के अंतर्गत अयोग्यता की याचिकाएँ अध्यक्ष के समक्ष लंबित हों। यह याचिका मद्रास उच्च न्यायालय के 24 सितंबर के उस निर्णय के विरुद्ध दायर अपील है, जिसमें तमिलनाडु में कुछ विधायकों के इस्तीफे और दल बदलने को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी गई थी। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इस प्रक्रिया से सार्वजनिक धन पर उपचुनाव का बोझ पड़ता है और जनता का विश्वास टूटता है। मामला अभी प्रारंभिक नोटिस के चरण में है, इसलिए इसे केवल संवैधानिक प्रश्न के रूप में समझना चाहिए।
पृष्ठभूमि
- दसवीं अनुसूची को 1985 में 52वें संविधान संशोधन के द्वारा जोड़ा गया था, ताकि दल-बदल की राजनीतिक अस्थिरता पर रोक लगाई जा सके।
- 91वें संविधान संशोधन, 2003 ने दल-बदल विरोधी कानून में निर्णायक बदलाव किया। इसके द्वारा विभाजन के आधार पर दल-बदल की छूट (एक-तिहाई सदस्य) समाप्त कर दी गई और केवल दो-तिहाई सदस्यों के विलय को ही मान्यता दी गई।
- दसवीं अनुसूची में अयोग्यता के मामलों पर निर्णय लेने की शक्ति सदन के अध्यक्ष (Speaker) या विधान परिषद के सभापति को दी गई है, और यह निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन है।
- किहोतो होलोहन मामले (1992) में सर्वोच्च न्यायालय ने दसवीं अनुसूची की संवैधानिक वैधता को बनाए रखा, किंतु अध्यक्ष के निर्णय को न्यायिक समीक्षा के दायरे में रखा।
- भारत में मतदाता द्वारा प्रतिनिधि को वापस बुलाने (Recall) की व्यवस्था नहीं है। इसलिए किसी सदस्य को बीच कार्यकाल में हटाने का वैधानिक मार्ग केवल अयोग्यता, इस्तीफा या निर्वाचन-संबंधी अन्य कारण हैं।
- उपचुनाव की व्यवस्था लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 151A के अंतर्गत होती है, जिसमें रिक्ति होने के बाद निर्धारित समय-सीमा के भीतर उपचुनाव कराना अपेक्षित है।
दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) क्या है?
- यह कानून संविधान की दसवीं अनुसूची में निहित है और संसद तथा राज्य विधानमंडलों के सदस्यों पर लागू होता है।
- अयोग्यता के दो प्रमुख आधार हैं: (क) स्वेच्छा से राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ना, और (ख) दल के व्हिप के विरुद्ध मतदान या मतदान से अनुपस्थित रहना, जब तक उसे पूर्व अनुमति से या 15 दिनों के भीतर माफ़ न किया गया हो।
- अनुच्छेद 102(2) (संसद) और अनुच्छेद 191(2) (राज्य विधानमंडल) के अंतर्गत दसवीं अनुसूची के आधार पर सदस्य अयोग्य ठहराए जा सकते हैं।
- अनुच्छेद 101(3)(a) और अनुच्छेद 190(3) के अनुसार सदस्य द्वारा सदन के पीठासीन अधिकारी को इस्तीफा देने पर उसका स्थान रिक्त माना जाता है।
- अयोग्यता की याचिका पर निर्णय का अधिकार अध्यक्ष के पास है, किंतु कार्यवाही के दौरान यदि सदस्य इस्तीफा दे दे तो अयोग्यता का प्रश्न व्यावहारिक रूप से अप्रासंगिक हो जाता है, जिसे इस याचिका में मुख्य समस्या के रूप में रखा गया है।
- निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) अनुच्छेद 324 के अंतर्गत उपचुनाव का संचालन करता है और अधिसूचना जारी करता है।
- दल-बदल कानून का उद्देश्य राजनीतिक स्थिरता और जनादेश की रक्षा है; इसकी सीमाओं पर सुधार के लिए विधि आयोग और संसदीय समितियों ने समय-समय पर सुझाव दिए हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विषय | महत्त्व |
|---|---|
| दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) की मूल भावना | संविधान की दसवीं अनुसूची दल-बदल के आधार पर सदस्यों की अयोग्यता तय करती है, ताकि निर्वाचित प्रतिनिधि जनादेश से मनमाने ढंग से विमुख न हों |
| सदन की सदस्यता से त्यागपत्र | अनुच्छेद 190(3) के अनुसार त्यागपत्र अध्यक्ष को लिखित रूप में दिया जाता है और अध्यक्ष द्वारा स्वीकार किए जाने पर स्थान रिक्त माना जाता है |
| लंबित अयोग्यता याचिकाएँ | अध्यक्ष के समक्ष अयोग्यता याचिकाएँ लंबित रहते हुए त्यागपत्र देने से दसवीं अनुसूची का उद्देश्य निष्प्रभावी होने की आशंका उत्पन्न होती है |
| उपचुनाव (By-election) | जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 151A के अंतर्गत रिक्त स्थान पर सामान्यतः निर्धारित अवधि के भीतर उपचुनाव कराना अपेक्षित है, जिससे सार्वजनिक धन का व्यय होता है |
| निर्वाचन आयोग की भूमिका | अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग को संसद और राज्य विधानमंडलों के निर्वाचनों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति प्राप्त है |
| न्यायिक समीक्षा की सीमा | किहोटो होलोहन बनाम जाचिल्हु मामले (1992) में सर्वोच्च न्यायालय ने दसवीं अनुसूची को वैध ठहराया, किंतु अध्यक्ष के निर्णय को न्यायिक समीक्षा के अधीन रखा |
महत्व
लोकतांत्रिक शासन
- निर्वाचित प्रतिनिधि का कार्यकाल पूरे पाँच वर्ष के लिए जनादेश पर आधारित होता है, इसलिए बीच में त्यागपत्र देकर दल बदलना प्रतिनिधिक लोकतंत्र की मूल भावना को प्रभावित करता है
- मतदाता की आवाज़ शासन में केवल मतदान के माध्यम से व्यक्त होती है, अतः जनादेश का सम्मान लोकतांत्रिक वैधता का आधार है
संवैधानिक और संस्थागत
- दसवीं अनुसूची में अध्यक्ष अर्ध-न्यायिक भूमिका निभाता है, और उसके निर्णय की समीक्षा का प्रश्न संस्थागत संतुलन से जुड़ा है
- निर्वाचन आयोग और विधानसभा सचिवालय की भूमिका स्पष्ट होने से शक्तियों के पृथक्करण और उत्तरदायित्व की व्यवस्था मजबूत होती है
वित्तीय और प्रशासनिक
- उपचुनाव के आयोजन में निर्वाचन आयोग, राज्य प्रशासन और सुरक्षा बलों के संसाधन लगते हैं, जिससे सार्वजनिक व्यय बढ़ता है
- बार-बार उपचुनाव से प्रशासनिक कार्यों और आदर्श आचार संहिता की अवधि पर भी प्रभाव पड़ता है
नैतिक और सार्वजनिक विश्वास
- राजनीतिक दलों और विधायकों में जनता का विश्वास तभी बना रहता है जब सार्वजनिक पद का उपयोग सिद्धांत और जनादेश के अनुरूप हो
- दल-बदल से राजनीतिक नैतिकता पर प्रश्न उठते हैं, जिससे शासन में सार्वजनिक जवाबदेही का विमर्श प्रभावित होता है
चुनौतियाँ
1. त्यागपत्र के माध्यम से दसवीं अनुसूची को निष्प्रभावी करना
- अयोग्यता की कार्यवाही से बचने के लिए सदस्य पहले त्यागपत्र देते हैं, जिससे अध्यक्ष के निर्णय का व्यावहारिक प्रश्न अप्रासंगिक हो जाता है
- याचिका के अनुसार त्यागपत्र उसी दिन स्वीकार होने से अध्यक्ष के विवेक और निष्पक्षता पर भी प्रश्न उठते हैं
यूपीएससी लिंक: GS-2: संविधान की दसवीं अनुसूची, संसदीय और विधायी व्यवस्था
2. अध्यक्ष के निर्णय में विलंब
- अयोग्यता याचिकाओं पर समयबद्ध निर्णय की कोई निश्चित संवैधानिक समय-सीमा नहीं है, जिससे कार्यवाही लंबी खिंच सकती है
- सदन में बहुमत वाले दल के पक्ष में निर्णय की आशंका से निष्पक्षता के प्रति संदेह उत्पन्न होता है
यूपीएससी लिंक: GS-2: विधायिका के पीठासीन अधिकारी की भूमिका, संसदीय संस्थाएँ
3. उपचुनाव और सार्वजनिक धन का व्यय
- बार-बार उपचुनाव कराने से निर्वाचन आयोग और राज्य सरकार पर वित्तीय तथा प्रशासनिक भार बढ़ता है
- जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 151A के अंतर्गत समयबद्ध उपचुनाव की बाध्यता से यह व्यय सीधे जनता पर पड़ता है
यूपीएससी लिंक: GS-2: निर्वाचन सुधार, निर्वाचन आयोग की शक्तियाँ
4. निर्वाचन विवादों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा
- अनुच्छेद 329(ख) के अनुसार निर्वाचन संबंधी विवादों में हस्तक्षेप सीमित रखा गया है, जिससे न्यायालय की भूमिका का दायरा विवादित रहता है
- त्यागपत्र, स्वीकृति और उपचुनाव की प्रक्रिया के बीच न्यायिक हस्तक्षेप का उचित बिंदु तय करना कठिन होता है
यूपीएससी लिंक: GS-2: न्यायपालिका की भूमिका, न्यायिक समीक्षा
5. निर्वाचन आयोग और विधानसभा अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र का संबंध
- विधानसभा अध्यक्ष अयोग्यता पर निर्णय देता है, जबकि निर्वाचन आयोग उपचुनाव का संचालन करता है, और दोनों के बीच समन्वय की स्पष्ट व्यवस्था सीमित है
- इससे एक ही घटनाक्रम में अलग-अलग संस्थाओं के निर्णय परस्पर असंगत हो सकते हैं
यूपीएससी लिंक: GS-2: संवैधानिक निकाय, संघवाद और संस्थागत समन्वय
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| समस्या | चिंता |
|---|---|
| त्यागपत्र द्वारा अयोग्यता से बचाव | दसवीं अनुसूची के उद्देश्य का अप्रभावी होना और जनादेश का उल्लंघन |
| अध्यक्ष के निर्णय में विलंब | अयोग्यता याचिकाओं का वर्षों तक लंबित रहना और निष्पक्षता पर संदेह |
| उपचुनाव का वित्तीय भार | सार्वजनिक धन का बार-बार व्यय और प्रशासनिक संसाधनों पर दबाव |
| न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा | अनुच्छेद 329(ख) और न्यायिक समीक्षा के बीच संतुलन का अस्पष्ट होना |
| संस्थाओं के बीच समन्वय का अभाव | अध्यक्ष, निर्वाचन आयोग और न्यायालय के निर्णयों में असंगति की आशंका |
| राजनीतिक नैतिकता में गिरावट | सार्वजनिक विश्वास और प्रतिनिधिक लोकतंत्र की साख पर प्रभाव |
आगे की राह
- दसवीं अनुसूची में अयोग्यता याचिकाओं के निस्तारण के लिए समय-सीमा निर्धारित करने पर विचार किया जा सकता है, जैसा कि विभिन्न समितियों ने सुझाया है
- त्यागपत्र के बाद उपचुनाव के दुरुपयोग को रोकने के लिए त्यागपत्र की परिस्थितियों की जाँच की प्रक्रिया पर विचार किया जा सकता है
- अध्यक्ष के निर्णयों की पारदर्शिता बढ़ाने हेतु कारण-सहित आदेश और सार्वजनिक प्रकाशन की व्यवस्था सुदृढ़ की जा सकती है
- निर्वाचन आयोग और विधानसभा सचिवालय के बीच सूचना-साझाकरण और समन्वय तंत्र स्थापित किया जा सकता है
- उपचुनाव के वित्तीय भार का आकलन और उसे सार्वजनिक रूप से प्रकाशित करने से नीति-निर्माण में सहायता मिलेगी
- दल-बदल से संबंधित सभी पक्षों के लिए आचार-संहिता और राजनीतिक दलों के आंतरिक लोकतंत्र को सुदृढ़ करना दीर्घकालिक उपाय है
- सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों, जैसे किहोटो होलोहन मामला, के आलोक में अध्यक्ष की भूमिका और न्यायिक समीक्षा के दायरे की स्पष्टता बढ़ाई जा सकती है
- विधायी सुधार के माध्यम से जनादेश की अवधि और प्रतिनिधि के उत्तरदायित्व पर व्यापक सार्वजनिक विमर्श को प्रोत्साहित किया जा सकता है
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) · दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) · स्वैच्छिक त्यागपत्र और सदस्यता की समाप्ति · पद-त्याग के बाद उपचुनाव (By-election) · अनुच्छेद 190(3) और अनुच्छेद 191(2) · विधानसभा अध्यक्ष की निर्णय-शक्ति और न्यायिक समीक्षा · किहोटो होलोहन मामला (Kihoto Hollohan Case, 1992) · निर्वाचन आयोग की भूमिका (अनुच्छेद 324) · प्रतिनिधिक लोकतंत्र में जनादेश और विश्वास · जन-धन की हानि और सार्वजनिक व्यय
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 190(3): त्यागपत्र की स्वीकृति का प्रावधान
- अनुच्छेद 191: विधायक की सदस्यता से अयोग्यता
- दसवीं अनुसूची: दल-बदल आधारित अयोग्यता
- अनुच्छेद 324: निर्वाचन आयोग का अधीक्षण और नियंत्रण
- अनुच्छेद 329(ख): निर्वाचन विवादों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा
अवधारणा प्रवाह
विधायक द्वारा विधायी दल के निर्देश के विरुद्ध मतदान → दसवीं अनुसूची के अंतर्गत अयोग्यता याचिकाएँ अध्यक्ष के समक्ष लंबित → विधायक द्वारा त्यागपत्र, जो उसी दिन अध्यक्ष द्वारा स्वीकार → त्यागपत्र देने वाले सदस्य का नए राजनीतिक दल में सम्मिलित होना → रिक्त स्थान पर उपचुनाव, जिसका संचालन निर्वाचन आयोग द्वारा किया जाता है → सार्वजनिक धन का व्यय और जनादेश की अवधि पर प्रभाव → सर्वोच्च न्यायालय में अपील, जिस पर केंद्र और निर्वाचन आयोग से जवाब माँगा गया
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यदि कोई सदस्य उस राजनीतिक दल की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ देता है, जिसके टिकट पर वह निर्वाचित हुआ था, तो दसवीं अनुसूची के अंतर्गत वह अयोग्य ठहराया जा सकता है।
2. दल-बदल से संबंधित अयोग्यता पर विधानसभा अध्यक्ष का निर्णय किसी भी स्थिति में न्यायिक समीक्षा के अधीन नहीं होता।
3. यदि किसी मूल राजनीतिक दल का किसी अन्य दल में विलय हो और उसके विधायक दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य इस विलय से सहमत हों, तो उन्हें अयोग्यता से संरक्षण प्राप्त होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: दसवीं अनुसूची के अनुच्छेद 2(1)(a) के अनुसार स्वेच्छा से दल की सदस्यता छोड़ना अयोग्यता का आधार है। कथन 2 गलत है: किहोटो होलोहन मामले (1992) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अध्यक्ष का निर्णय संविधान के अनुच्छेद 136, 226 और 32 के अंतर्गत न्यायिक समीक्षा के अधीन है। कथन 3 सही है: पैराग्राफ 4 के अनुसार मूल दल के विलय को मान्यता तब मिलती है जब विधायक दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य सहमत हों।
Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए, जिनमें एक कथन (A) और एक कारण (R) दिया गया है:
कथन (A): संविधान के अनुच्छेद 190(3) के अंतर्गत यदि कोई विधायक अध्यक्ष को लिखित रूप में त्यागपत्र दे और अध्यक्ष उसे स्वीकार कर ले, तो उसकी सीट रिक्त हो जाती है।
कारण (R): लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 151A के अंतर्गत जहाँ रिक्त स्थान के बाद शेष कार्यकाल एक वर्ष से अधिक हो, वहाँ उपचुनाव रिक्ति की तिथि से छह मास के भीतर कराना अपेक्षित है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (A) सही है, किंतु (R) गलत है।
- (A) गलत है, किंतु (R) सही है।
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है। — (A) सही है: अनुच्छेद 190(3) में त्यागपत्र से सीट रिक्त होने का प्रावधान है। (R) भी सही है: धारा 151A उपचुनाव की समय-सीमा तय करती है। किंतु (R) यह नहीं बताता कि त्यागपत्र से सीट रिक्त क्यों और कैसे होती है, इसलिए वह (A) की व्याख्या नहीं है।
Q3. निम्नलिखित सुमेलन (मिलान) पर विचार कीजिए:
स्तंभ I (विषय):
(a) किसी सदस्य की सीट का त्यागपत्र द्वारा रिक्त होना
(b) विधायक की दल-बदल के आधार पर अयोग्यता
(c) मूल दल के विलय पर अयोग्यता से संरक्षण
(d) रिक्त सीट पर उपचुनाव की समय-सीमा
स्तंभ II (प्रावधान):
1. संविधान का अनुच्छेद 190(3)
2. संविधान का अनुच्छेद 191(2)
3. दसवीं अनुसूची का पैराग्राफ 4
4. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 151A
सही सुमेलन चुनिए:
- a-1, b-2, c-3, d-4
- a-2, b-1, c-4, d-3
- a-1, b-3, c-2, d-4
- a-4, b-2, c-3, d-1
उत्तर: a-1, b-2, c-3, d-4 — अनुच्छेद 190(3) त्यागपत्र/अनुपस्थिति से सीट रिक्त होने से संबंधित है। अनुच्छेद 191(2) विधान मंडल के सदस्यों की दसवीं अनुसूची के अंतर्गत अयोग्यता से संबंधित है। दसवीं अनुसूची का पैराग्राफ 4 विलय के मामले में संरक्षण देता है। धारा 151A उपचुनाव की छह मास की समय-सीमा तय करती है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ “स्वेच्छा से त्यागपत्र देकर उसी सदन में नए दल के टिकट पर पुनः निर्वाचित होने का मार्ग, यद्यपि दसवीं अनुसूची में प्रत्यक्ष रूप से वर्जित नहीं है, दल-बदल विरोधी व्यवस्था के उद्देश्य को निष्प्रभावी कर सकता है।” इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही यह भी बताइए कि सर्वोच्च न्यायालय, निर्वाचन आयोग और विधानमंडल के अध्यक्ष के स्तर पर कौन-से उपाय इस ‘पिछले द्वार’ को बंद करने में सहायक हो सकते हैं। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. भूमिका: दसवीं अनुसूची (52वाँ संविधान संशोधन, 1985) का उद्देश्य राजनीतिक अस्थिरता और दल-बदल की ‘आया राम-गया राम’ प्रवृत्ति पर रोक लगाना था। मई 2026 के बाद तमिलनाडु के घटनाक्रम का संदर्भ देते हुए सर्वोच्च न्यायालय में लंबित याचिका (नोटिस जारी, मद्रास उच्च न्यायालय का 24 सितंबर का निर्णय) का उल्लेख कीजिए, किंतु पक्ष न लीजिए।
2. संवैधानिक ढाँचा: अनुच्छेद 190(3) (त्यागपत्र से सीट रिक्त), अनुच्छेद 191(2) (दसवीं अनुसूची के अंतर्गत अयोग्यता), दसवीं अनुसूची का पैराग्राफ 2(1)(a) (स्वेच्छा से दल-त्याग), पैराग्राफ 4 (विलय), पैराग्राफ 6 (अध्यक्ष का निर्णय)।
3. न्यायिक व्याख्या: किहोटो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू (1992) — अध्यक्ष का निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन, पर समय-सीमा का प्रश्न; रवि एस. नाइक बनाम भारत संघ (1994) — ‘स्वेच्छा से त्याग’ की व्यापक व्याख्या; राजेंद्र सिंह राणा बनाम स्वामी प्रसाद मौर्य (2007) — त्यागपत्र और अयोग्यता कार्यवाही के आपसी संबंध पर न्यायालयीय दृष्टि। (मामलों का सार सावधानी से प्रस्तुत करें।)
4. तर्क-पक्ष (आलोचना): त्यागपत्र के बाद अयोग्यता कार्यवाही निष्प्रभावी होने से ‘पहले त्यागपत्र, फिर उपचुनाव’ का मार्ग; प्रतिनिधि के जनादेश का विश्वास-भंग; उपचुनाव पर सार्वजनिक व्यय (राज्य-कोष पर भार); मतदाता के चयन का अधिकार।
5. विपरीत दृष्टिकोण: त्यागपत्र को जनप्रतिनिधि का मौलिक अधिकार मानना; अभिव्यक्ति और अंतरात्मा की स्वतंत्रता; दल-बदल विरोधी कानून को अत्यधिक कठोर बनाने से विधायी असंतोष के दमन का खतरा; उपचुनाव में मतदाता द्वारा जनादेश की पुनः पुष्टि।
6. सुधार-सुझाव: दिनेश गोस्वामी समिति (1990) और विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट (1999) की सिफारिशें; त्यागपत्र की स्वीकृति के लिए अध्यक्ष द्वारा लंबित अयोग्यता याचिकाओं पर विचार का नियम; निर्वाचन आयोग द्वारा उपचुनाव का नियंत्रण और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 151A की समीक्षा; अध्यक्ष के निर्णय हेतु समय-सीमा (किहोटो होलोहन की सिफारिश) का कानूनी रूप।
7. निष्कर्ष: संतुलित मत — वैधानिक ‘पिछला द्वार’ बंद करने हेतु संस्थागत सुधार और न्यायिक दिशा-निर्देश, बिना विधायकों के वैध असहमति के अधिकार को समाप्त किए।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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