कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण: पर्यावरण संरक्षण की नई तकनीक

कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण: पर्यावरण संरक्षण की नई तकनीक

कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण: पर्यावरण संरक्षण की नई तकनीक

कार्बन कैप्चर, उपयोग एवं भंडारण प्रक्रियाउत्सर्जन स्रोतCO₂ उत्सर्जनपृथक्करणCO₂ अलग करनाउपयोग/भंडारणCO₂ का उपयोग या संग्रह
कार्बन कैप्चर, उपयोग एवं भंडारण प्रक्रिया

✎ CCUS वह तकनीक है जिसमें CO₂ को स्रोत पर पकड़कर उपयोग या भूमिगत भंडारण द्वारा वायुमंडल से दूर रखा जाता है, और यह कठिन-से-न्यूनीकरण उद्योगों के नेट-ज़ीरो लक्ष्य में पूरक भूमिका निभाती है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — पर्यावरण (जलवायु परिवर्तन और शमन)  |  GS Paper III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (पर्यावरणीय प्रौद्योगिकी)  |  GS Paper III — अर्थव्यवस्था (ऊर्जा संक्रमण और औद्योगिक डीकार्बनीकरण)  |  GS Paper II — शासन (अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएँ और पर्यावरणीय विधान)
  • Prelims: कार्बन कैप्चर, उपयोग एवं भंडारण (CCUS), प्रत्यक्ष वायु से कार्बन कैप्चर (Direct Air Capture), भूवैज्ञानिक भंडारण और लवणीय जलभृत (Saline Aquifer), तेल-पुनर्प्राप्ति में CO₂ का उपयोग (Enhanced Oil Recovery), पेरिस समझौता और नेट-ज़ीरो लक्ष्य, ऊर्जा संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2022 और कार्बन क्रेडिट व्यापार योजना, हार्ड-टू-एबेट (कठिन-से-न्यूनीकरण) क्षेत्र
  • Essay: जलवायु शमन में तकनीकी समाधानों की भूमिका और उनकी सीमाएँ, विकास की आवश्यकता और उत्सर्जन में कमी के बीच संतुलन: भारत के लिए स्वच्छ ऊर्जा का मार्ग

त्वरित पुनरावृत्ति: CCUS वह तकनीक है जिसमें CO₂ को स्रोत पर पकड़कर उपयोग या भूमिगत भंडारण द्वारा वायुमंडल से दूर रखा जाता है, और यह कठिन-से-न्यूनीकरण उद्योगों के नेट-ज़ीरो लक्ष्य में पूरक भूमिका निभाती है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

यह सामग्री भारत सरकार के प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) के प्रेस विज्ञप्ति पृष्ठ से ली गई है, जिसमें मुख्य रूप से मंत्रालयों की सूची, नेविगेशन मेनू और कुछ अन्य विज्ञप्तियों के शीर्षक हैं। इस स्रोत में कार्बन कैप्चर, उपयोग एवं भंडारण (CCUS) से संबंधित कोई नई घोषणा, योजना, आँकड़ा या नीति निर्णय नहीं दिया गया है। इसलिए शीर्षक के रूप में आए इस विषय को परीक्षा की दृष्टि से स्थैतिक (static) पाठ्यक्रम के आधार पर समझना उचित होगा। जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक और घरेलू विमर्श में CCUS को उन उद्योगों के लिए एक संभावित विकल्प माना जाता है, जहाँ ऊर्जा या प्रक्रिया-जनित उत्सर्जन को पूरी तरह समाप्त करना कठिन है। अतः यह विषय नेट-ज़ीरो लक्ष्यों के संदर्भ में प्रासंगिक है।

पृष्ठभूमि

  • पेरिस समझौता (2015) के अंतर्गत देशों ने वैश्विक तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तर से काफी नीचे, 2 डिग्री सेल्सियस से कम रखने और सम्भव हो तो 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने का लक्ष्य अपनाया। इसके लिए शुद्ध-शून्य उत्सर्जन की ओर बढ़ना आवश्यक माना गया।
  • IPCC की छठी आकलन रिपोर्ट (AR6) में यह उल्लेख है कि कुछ परिदृश्यों में उत्सर्जन-न्यूनीकरण के लिए CCUS और कार्बन हटाने की तकनीकों की भूमिका आवश्यक मानी गई है, विशेषकर भारी उद्योगों और बिजली क्षेत्र में।
  • भारत ने ग्लासगो में आयोजित COP26 (2021) में वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन (Net Zero) प्राप्त करने का लक्ष्य घोषित किया। इसे राष्ट्रीय स्तर पर पंचामृत लक्ष्यों के साथ जोड़ा गया।
  • ऊर्जा संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2022 ने भारत में कार्बन क्रेडिट व्यापार योजना (Carbon Credit Trading Scheme) के लिए विधिक आधार प्रदान किया, जिसमें उत्सर्जन-तीव्र क्षेत्रों के लिए उत्सर्जन-लक्ष्य और क्रेडिट-व्यापार की व्यवस्था है।
  • सीमेंट, इस्पात, उर्वरक और रसायन जैसे उद्योगों में प्रक्रिया-जनित CO₂ उत्सर्जन होता है, जिसे केवल ऊर्जा-स्रोत बदलकर पूरी तरह कम करना कठिन है। इसी कारण CCUS को इन क्षेत्रों के लिए विचारणीय विकल्प माना जाता है।

कार्बन कैप्चर, उपयोग एवं भंडारण (CCUS) क्या है?

  • CCUS एक ऐसी तकनीकी श्रृंखला है, जिसमें औद्योगिक स्रोतों या ऊर्जा संयंत्रों से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) को वायुमंडल में जाने से पहले पकड़ा (capture) जाता है।
  • कैप्चर के बाद CO₂ को संपीड़ित करके परिवहन किया जाता है। इसके लिए पाइपलाइन, जहाज या सड़क-रेल परिवहन का उपयोग हो सकता है।
  • उपयोग (Utilisation) के अंतर्गत CO₂ का प्रयोग रसायन, ईंधन, निर्माण सामग्री (जैसे कंक्रीट में) या तेल-पुनर्प्राप्ति (Enhanced Oil Recovery) में किया जाता है।
  • भंडारण (Storage) के अंतर्गत CO₂ को भूमिगत भू-वैज्ञानिक संरचनाओं में स्थायी रूप से रखा जाता है, जैसे枯 हो चुके तेल-गैस भंडार, लवणीय जलभृत (Saline Aquifer) या बेसाल्ट चट्टानें।
  • प्रत्यक्ष वायु से कार्बन कैप्चर (Direct Air Capture) में CO₂ सीधे वायुमंडल से निकाली जाती है। यह स्रोत-आधारित कैप्चर से भिन्न है और अपेक्षाकृत अधिक ऊर्जा-गहन है।
  • CCUS की प्रमुख चुनौतियों में उच्च लागत, ऊर्जा की खपत, भंडारण स्थलों की भू-वैज्ञानिक उपयुक्तता, दीर्घकालिक निगरानी और सार्वजनिक स्वीकार्यता शामिल हैं।
  • CCUS को अक्सर नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता और हरित हाइड्रोजन जैसे विकल्पों के पूरक के रूप में देखा जाता है, विकल्प के रूप में नहीं।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
पृथक्करण (Capture): ताप विद्युत संयंत्र, सीमेंट, इस्पात और उर्वरक संयंत्रों जैसे बड़े उत्सर्जन स्रोतों से कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) को गैस मिश्रण से अलग करना उत्सर्जन-गहन उद्योगों से होने वाला उत्सर्जन सीधे घटाने का तकनीकी विकल्प, विशेषकर जहाँ ऊर्जा-दक्षता या ईंधन-परिवर्तन के उपाय सीमित हैं
परिवहन (Transport): पृथक की गई CO2 को पाइपलाइन, जहाज, या सड़क और रेल माध्यम से भंडारण अथवा उपयोग स्थल तक ले जाना स्रोत और गंतव्य के बीच भौगोलिक दूरी का समाधान; इसके लिए साझा अवसंरचना की योजना आवश्यक होती है
उपयोग (Utilisation): CO2 को रसायन, ईंधन, निर्माण सामग्री या तेल पुनर्प्राप्ति (Enhanced Oil Recovery) में प्रयोग करना उत्सर्जन को उपयोगी उत्पाद में बदलकर आर्थिक मूल्य जोड़ने की संभावना; परियोजना की लागत कुछ हद तक इससे संतुलित हो सकती है
भंडारण (Storage):枯 हो चुके तेल-गैस भंडारों, लवणीय जलभृतों (Saline Aquifers) जैसी भूगर्भीय संरचनाओं में CO2 को दीर्घकाल तक बंद रखना CO2 को वायुमंडल से दीर्घकाल तक अलग रखना; इसकी सफलता भूगर्भीय सीलिंग और निगरानी की गुणवत्ता पर निर्भर है
ऊर्जा दंड (Energy Penalty): पृथक्करण प्रक्रिया में अतिरिक्त ऊर्जा की खपत, जिससे संयंत्र की दक्षता घटती है तकनीक की आर्थिक व्यावहारिकता तय करने वाला केंद्रीय कारक; इसी कारण लागत में कमी के लिए अनुसंधान आवश्यक है

महत्व

पर्यावरणीय एवं जलवायु

  • कार्बन कैप्चर, उपयोग एवं भंडारण (CCUS) उन औद्योगिक उत्सर्जनों को कम करने का साधन है जिन्हें नवीकरणीय ऊर्जा से पूरी तरह प्रतिस्थापित करना कठिन है, जैसे सीमेंट के रासायनिक उत्सर्जन और इस्पात उत्पादन की प्रक्रिया-जनित CO2।
  • भारत ने वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन (Net Zero) का लक्ष्य घोषित किया है। इस लक्ष्य में कार्बन पृथक्करण और भंडारण जैसी तकनीकों की भूमिका को IPCC के मूल्यांकन रिपोर्टों में भी स्वीकार किया गया है।

आर्थिक एवं औद्योगिक

  • उपयोग घटक से CO2 को रसायन, ईंधन और निर्माण सामग्री में बदलने पर नए औद्योगिक बाज़ार विकसित हो सकते हैं।
  • तेल एवं गैस क्षेत्र की मौजूदा अवसंरचना का पुनः उपयोग संभव होने से परिवर्तन-काल में रोजगार और निवेश का आधार बना रह सकता है।

ऊर्जा सुरक्षा एवं रणनीतिक

  • जीवाश्म ईंधन पर आधारित उद्योगों को चरणबद्ध रूप से स्वच्छ बनाने से ऊर्जा संक्रमण की गति संतुलित रहती है और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा बनी रहती है।
  • भूगर्भीय भंडारण के लिए उपयुक्त तलछटी बेसिनों की पहचान भारत के ऊर्जा-खनिज नक्शे के साथ जुड़कर रणनीतिक योजना का हिस्सा बन सकती है।

अंतरराष्ट्रीय दायित्व

  • पेरिस समझौते के अंतर्गत राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) को पूरा करने में ऐसी तकनीकें सहायक मानी जाती हैं, परंतु उनका प्रभाव उनके वास्तविक परिनियोजन पर निर्भर करता है।

चुनौतियाँ

1. ऊँची लागत एवं ऊर्जा दंड

  • पृथक्करण प्रक्रिया में अतिरिक्त ऊर्जा लगती है, जिससे संयंत्र की परिचालन लागत बढ़ती है और मूल्य-निर्धारण कठिन होता है।
  • वर्तमान में अधिकांश परियोजनाएँ प्रायोगिक या पायलट चरण में हैं, जहाँ पूँजी-निवेश का जोखिम अधिक है।

2. भूगर्भीय भंडारण की सुरक्षा और निगरानी

  • भंडारित CO2 के रिसाव से भूजल, मृदा और स्थानीय पारिस्थितिकी को खतरा हो सकता है, इसलिए दीर्घकालिक निगरानी अनिवार्य है।
  • उपयुक्त भूगर्भीय संरचना की पहचान, परीक्षण और सीलिंग की तकनीकी क्षमता विकसित करना आवश्यक है।

3. परिवहन अवसंरचना का अभाव

  • स्रोत और भंडारण स्थल के बीच पाइपलाइन या परिवहन नेटवर्क के बिना CCUS परियोजनाएँ व्यावहारिक नहीं होतीं।
  • क्लस्टर-आधारित मॉडल, जिसमें कई उद्योग साझा अवसंरचना का उपयोग करें, लागत कम कर सकता है, परंतु इसके लिए समन्वित योजना चाहिए।

4. नीतिगत और विनियामक ढाँचे की अपूर्णता

  • CO2 के स्वामित्व, दायित्व, लाइसेंसिंग और भूगर्भीय अधिकारों से संबंधित स्पष्ट कानूनी ढाँचा अभी विकसित हो रहा है।
  • कार्बन मूल्य-निर्धारण या प्रोत्साहन तंत्र के अभाव में निजी निवेश को आकर्षित करना कठिन है।

5. सार्वजनिक स्वीकार्यता और दीर्घकालिक दायित्व

  • स्थानीय समुदाय भंडारण स्थलों के प्रति आशंकित रह सकते हैं, इसलिए पारदर्शी सूचना और परामर्श प्रक्रिया आवश्यक है।
  • परियोजना-समाप्ति के बाद निगरानी और दायित्व किसके पास रहेगा, यह प्रश्न अभी अनसुलझा है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
लागत और तकनीकी परिपक्वता पृथक्करण की ऊँची लागत और ऊर्जा दंड के कारण परियोजनाएँ सीमित पैमाने पर ही व्यावहारिक हैं
भूगर्भीय सुरक्षा CO2 रिसाव से भूजल और पारिस्थितिकी को खतरा; दीर्घकालिक निगरानी की क्षमता सीमित
परिवहन नेटवर्क पाइपलाइन और साझा अवसंरचना के अभाव में स्रोत और भंडारण स्थल के बीच संपर्क कठिन
विधिक और नियामक ढाँचा स्वामित्व, दायित्व और लाइसेंसिंग के स्पष्ट नियम न होने से निवेशकों में अनिश्चितता
वित्त पोषण परिपक्व बाज़ार या कार्बन मूल्य-निर्धारण के बिना निजी पूँजी जुटाना कठिन

आगे की राह

  • पायलट परियोजनाओं से प्राप्त आँकड़ों को सार्वजनिक करके तकनीकी क्षमता और लागत का वास्तविक मूल्यांकन किया जाए।
  • उत्सर्जन-गहन उद्योगों के क्लस्टर बनाकर साझा परिवहन और भंडारण अवसंरचना विकसित की जाए।
  • भूगर्भीय भंडारण स्थलों की पहचान, सीलिंग परीक्षण और दीर्घकालिक निगरानी के लिए मानक प्रोटोकॉल तय किए जाएँ।
  • CO2 के स्वामित्व, दायित्व और लाइसेंसिंग पर स्पष्ट विधिक ढाँचा बनाया जाए, जिसमें संबंधित मंत्रालयों और नियामक संस्थाओं की भूमिका परिभाषित हो।
  • अनुसंधान एवं विकास में पृथक्करण की ऊर्जा-दक्षता बढ़ाने और उपयोग-आधारित उत्पादों के लिए सार्वजनिक वित्त पोषण सुनिश्चित किया जाए।
  • कार्बन मूल्य-निर्धारण या समान प्रोत्साहन तंत्र पर विचार करके निजी निवेश के लिए अनुकूल वातावरण बनाया जाए।
  • स्थानीय समुदायों के साथ पारदर्शी परामर्श और पर्यावरणीय प्रभाव आकलन को अनिवार्य प्रक्रिया बनाया जाए।
  • उत्सर्जन-कटौती के अन्य उपायों, जैसे नवीकरणीय ऊर्जा और ऊर्जा-दक्षता, के साथ CCUS का समन्वित लक्ष्य-निर्धारण किया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

कार्बन अभिग्रहण, उपयोग एवं भंडारण (Carbon Capture, Utilisation and Storage — CCUS) · हार्ड-टू-एबेट क्षेत्र (Hard-to-abate Sectors) · शुद्ध शून्य उत्सर्जन (Net Zero Emissions) · राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (Nationally Determined Contributions — NDC) · पेरिस समझौता (Paris Agreement) · भूवैज्ञानिक भंडारण (Geological Storage) · वृद्धिशील तेल पुनर्प्राप्ति (Enhanced Oil Recovery — EOR) · कार्बन क्रेडिट व्यापार योजना (Carbon Credit Trading Scheme) · ऊर्जा संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2022 (Energy Conservation (Amendment) Act, 2022) · पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 (Environment (Protection) Act, 1986) · जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) · औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन (Industrial Decarbonisation)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 48A: पर्यावरण संरक्षण का राज्य का दायित्व
  • अनुच्छेद 51A(g): प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा का मौलिक कर्तव्य
  • अनुच्छेद 253: अंतरराष्ट्रीय संधियों के क्रियान्वयन हेतु संसदीय विधि-निर्माण

अवधारणा प्रवाह

उत्सर्जन-गहन उद्योगों (ताप विद्युत, सीमेंट, इस्पात) से CO2 उत्सर्जन होता है।  →  पृथक्करण तकनीक से CO2 को गैस मिश्रण से अलग किया जाता है, जिसमें ऊर्जा दंड और लागत आती है।  →  पृथक की गई CO2 को पाइपलाइन या अन्य साधनों से भंडारण या उपयोग स्थल तक पहुँचाया जाता है।  →  उपयोग के मार्ग में CO2 रसायन या ईंधन बनती है, जबकि भंडारण में उसे भूगर्भीय संरचना में दीर्घकाल तक बंद रखा जाता है।  →  सफल परिनियोजन के लिए विधिक ढाँचा, निगरानी और वित्त पोषण आवश्यक है, जिससे उत्सर्जन में वास्तविक कटौती सुनिश्चित हो।  →  इस प्रकार CCUS शुद्ध-शून्य उत्सर्जन के लक्ष्य में एक सहायक तकनीकी घटक के रूप में योगदान देता है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. CCUS तकनीक के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बिजली संयंत्रों, सीमेंट संयंत्रों और इस्पात संयंत्रों जैसे बिंदु स्रोतों (Point Sources) से कार्बन डाइऑक्साइड को पृथक्करण द्वारा अलग किया जा सकता है।
2. पूर्ववर्ती तेल एवं गैस भंडारों (Depleted Oil and Gas Reservoirs) में संपीड़ित CO2 को भूवैज्ञानिक भंडारण के लिए प्रविष्ट किया जा सकता है।
3. CCUS का मुख्य उद्देश्य नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्रों से उत्पन्न विद्युत की लागत घटाना है।

उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है, क्योंकि CO2 पृथक्करण मुख्यतः उच्च CO2 सांद्रता वाले बिंदु स्रोतों पर किया जाता है। कथन 2 सही है, क्योंकि तेल व गैस क्षेत्रों की भूवैज्ञानिक संरचना CO2 को सुरक्षित रूप से रोककर रख सकती है। कथन 3 गलत है, क्योंकि CCUS का मूल उद्देश्य जीवाश्म ईंधन आधारित तथा प्रक्रिया-जनित उत्सर्जन को कम करना है, न कि नवीकरणीय संयंत्रों की लागत घटाना।

Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): सीमेंट और इस्पात जैसे हार्ड-टू-एबेट क्षेत्रों में CCUS को डीकार्बोनाइजेशन के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
कारण (R): इन उद्योगों में होने वाला प्रक्रिया-जनित उत्सर्जन (जैसे सीमेंट में चूनापत्थर के कैल्सीनेशन से निकली CO2) केवल नवीकरणीय विद्युत अपनाकर पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता।

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. (a) A और R दोनों सत्य हैं और R, A की सही व्याख्या है
  2. (b) A और R दोनों सत्य हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
  3. (c) A सत्य है, किंतु R असत्य है
  4. (d) A असत्य है, किंतु R सत्य है

उत्तर: (a) A और R दोनों सत्य हैं और R, A की सही व्याख्या है — दोनों कथन सत्य हैं। सीमेंट उत्पादन में चूनापत्थर के विघटन से होने वाला उत्सर्जन ईंधन बदलने से नहीं घटता, इसलिए ऐसे क्षेत्रों में CCUS की भूमिका अनिवार्य मानी जाती है। R इसी तर्क से A की सीधी व्याख्या देता है।

Q3. CCUS श्रृंखला के घटकों को उनके उदाहरणों से सुमेलित कीजिए:

सूची-I (घटक)
A. पृथक्करण (Capture)
B. परिवहन (Transport)
C. भूवैज्ञानिक भंडारण (Geological Storage)
D. उपयोग (Utilisation)

सूची-II (विधि/उदाहरण)
1. पाइपलाइन या जहाज़ द्वारा CO2 को इंजेक्शन स्थल तक ले जाना
2. गहरी लवणीय जलभृत संरचनाओं (Saline Aquifers) में CO2 इंजेक्ट करना
3. अमीन-आधारित विलायक द्वारा CO2 का अवशोषण
4. तेल क्षेत्रों में CO2 इंजेक्ट करके तेल पुनर्प्राप्ति बढ़ाना

सही सुमेलन चुनिए:

  1. A-3, B-1, C-2, D-4
  2. A-1, B-3, C-4, D-2
  3. A-2, B-4, C-1, D-3
  4. A-3, B-4, C-2, D-1

उत्तर: A-3, B-1, C-2, D-4 — पृथक्करण के लिए अमीन-आधारित अवशोषण (3) एक प्रमुख पोस्ट-कंबशन विधि है। परिवहन पाइपलाइन या जहाज़ से होता है (1)। गहरी लवणीय संरचनाओं में भंडारण (2) और CO2 का तेल क्षेत्रों में उपयोग EOR के रूप में (4) होता है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ शुद्ध शून्य उत्सर्जन के लक्ष्य की दिशा में कार्बन अभिग्रहण, उपयोग एवं भंडारण (CCUS) को हार्ड-टू-एबेट क्षेत्रों के लिए अनिवार्य विकल्प माना जा रहा है। परंतु इसके विस्तार में तकनीकी, आर्थिक और नियामकीय बाधाएँ बनी हुई हैं। इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। क्या CCUS को जीवाश्म ईंधन के उपयोग को लंबा खींचने का साधन बनने से रोकने के लिए कोई नीतिगत सुरक्षा-उपाय आवश्यक हैं? (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल उत्तर संरचना: (1) परिभाषा और श्रृंखला: पृथक्करण (पोस्ट-कंबशन, प्री-कंबशन, ऑक्सी-ईंधन दहन, प्रत्यक्ष वायु पृथक्करण), परिवहन (पाइपलाइन/जहाज़), भंडारण (枯 तेल-गैस भंडार, गहरे लवणीय जलभृत) और उपयोग (EOR, रसायन, निर्माण सामग्री, सिंथेटिक ईंधन) का संक्षिप्त चित्र। (2) हार्ड-टू-एबेट क्षेत्र: सीमेंट में चूनापत्थर के कैल्सीनेशन से प्रक्रिया-जनित उत्सर्जन और इस्पात में ब्लास्ट फर्नेस का उत्सर्जन; IPCC की Special Report on Global Warming of 1.5°C (2018) में CCS को शमन मार्गों का आवश्यक घटक बताया गया है। (3) भारत का संदर्भ: 2070 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य (COP26, ग्लासगो, 2021); NDC के अंतर्गत उत्सर्जन-तीव्रता लक्ष्य; ऊर्जा संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2022 के तहत कार्बन क्रेडिट व्यापार योजना की व्यवस्था, जो CCUS को वित्तीय प्रोत्साहन से जोड़ सकती है; पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 और EIA अधिसूचना, 2006 के अंतर्गत परियोजना-स्वीकृति। (4) बाधाएँ: उच्च पूंजीगत एवं परिचालन लागत; CO2 परिवहन-अवसंरचना का अभाव; भंडारण स्थलों का भूवैज्ञानिक मूल्यांकन और दीर्घकालिक रिसाव-निगरानी; स्पष्ट दायित्व-ढाँचे का अभाव। (5) दो दृष्टिकोण: समर्थक (CCUS को अपरिहार्य और पूरक मानना; नॉर्वे की Sleipner परियोजना (1996) को दीर्घकालिक भंडारण का उदाहरण मानना) बनाम आलोचक (EOR को ‘ग्रीन वॉशिंग’ का साधन मानना; नवीकरणीय ऊर्जा व ऊर्जा दक्षता पर अधिक निवेश की वकालत)। (6) नीतिगत सुरक्षा-उपाय: EOR से प्राप्त तेल-उत्पादन के उत्सर्जन लेखांकन का पारदर्शी मानक; भंडारित CO2 की दीर्घकालिक निगरानी और दायित्व-नियम; उपयोग-आधारित परियोजनाओं को स्थायी स्थायित्व मानदंडों से जोड़ना; CCUS को प्राथमिकता के रूप में नहीं, बल्कि हार्ड-टू-एबेट क्षेत्रों तक सीमित सहायक उपाय के रूप में रखना। (7) निष्कर्ष: संतुलित और निष्पक्ष आकलन जिसमें तकनीक की भूमिका को मान्यता दी जाए, पर उसे उत्सर्जन-कटौती के मूल विकल्पों का विकल्प न बनने दिया जाए।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


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