कर्नाटक उच्च न्यायालय का लालफीताशाही पर तीखा व्यंग्य: कानून खुद फंसा लालफीताशाही में

कर्नाटक उच्च न्यायालय का लालफीताशाही पर तीखा व्यंग्य: कानून खुद फंसा लालफीताशाही में

कर्नाटक उच्च न्यायालय का लालफीताशाही पर तीखा व्यंग्य: कानून खुद फंसा लालफीताशाही में

लालफीताशाही का चक्रकानून बनानालालफीताशाही रोकने हेतुअपील दायरसेवा विवादों में विलंबफाइलें रुकनामेज से मेज तक जानाविधिक राय लेनाअनावश्यक विलंबनिर्णय न होनापरिसीमा अवधि बीतना
लालफीताशाही का चक्र

✎ परिसीमा के भीतर अपील दायर करना सरकार पर भी उतना ही बाध्यकारी है जितना किसी निजी वादकर्ता पर; विलंब की माफी केवल ठोस पर्याप्त कारण पर ही संभव है, प्रशासनिक औपचारिकताओं पर नहीं।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — शासन व्यवस्था (कार्यपालिका की जवाबदेही, प्रशासनिक सुधार और न्यायपालिका की भूमिका)  |  सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — संविधान (राज्य कार्यपालिका, न्यायिक समीक्षा और संघवाद)
  • Prelims: परिसीमा अधिनियम, 1963 (Limitation Act, 1963) और धारा 5 में विलंब की माफी का प्रावधान, कर्नाटक सरकारी मुकदमेबाज़ी अधिनियम, 2023 (Karnataka Conduct of Government Litigation Act, 2023), अनुच्छेद 162 — राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार, अनुच्छेद 166 — राज्य सरकार के कार्यों का संचालन और कार्य-आवंटन नियम, अनुच्छेद 226 — उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता, राष्ट्रीय वाद नीति, 2010 (National Litigation Policy, 2010) और आदर्श वादकर्ता की अवधारणा, पर्याप्त कारण (Sufficient Cause) का सिद्धांत और विलंब की माफी की सीमाएँ, अपील, पुनर्विचार और पुनरीक्षण में अंतर
  • Essay: कानून का शासन और राज्य की जवाबदेही: जब सरकार स्वयं अनुशासन का पालन न करे, लालफीताशाही से लड़ने वाले कानून की प्रभावशीलता: विधि-निर्माण बनाम प्रशासनिक संस्कृति

त्वरित पुनरावृत्ति: परिसीमा के भीतर अपील दायर करना सरकार पर भी उतना ही बाध्यकारी है जितना किसी निजी वादकर्ता पर; विलंब की माफी केवल ठोस पर्याप्त कारण पर ही संभव है, प्रशासनिक औपचारिकताओं पर नहीं।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

कर्नाटक उच्च न्यायालय की खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना और न्यायमूर्ति हेमा कुलकर्णी शामिल थे, ने राज्य सरकार की चार अपीलों पर सुनवाई करते हुए पाया कि इन अपीलों में विलंब 466 दिनों से लेकर 1,099 दिनों तक का था। ये अपीलें कर्नाटक राज्य विधि विश्वविद्यालय (Karnataka State Law University) के कुछ कर्मचारियों की सेवा से जुड़े एकल न्यायाधीश पीठ के निर्णयों के विरुद्ध दायर की गई थीं। न्यायालय ने टिप्पणी की कि राज्य ने लालफीताशाही रोकने के लिए कानून बनाया था, परंतु लालफीताशाही ने ही उस कानून के संचालन को रोक दिया है। न्यायालय के अनुसार, 2023 के अधिनियम में निर्धारित परिसीमा-अवधि और फाइलों की आवाजाही, विधिक राय लेने और निर्णय लेने की समय-सीमा का पालन इन मामलों में नहीं हुआ। विलंब के लिए दिए गए कारण, जैसे फाइलों का एक मेज़ से दूसरी मेज़ तक जाना और अधिकारियों के बीच पत्राचार, न्यायालय को पर्याप्त कारण के रूप में स्वीकार्य नहीं लगे। इसलिए यह निर्णय सरकारी मुकदमेबाज़ी में समय-सीमा के पालन और राज्य की जवाबदेही की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

पृष्ठभूमि

  • भारत में सरकार को मुकदमेबाज़ी में अक्सर विलंब से अपील दायर करने के कारण आलोचना झेलनी पड़ी है। सार्वजनिक धन और न्यायिक समय पर इसका सीधा प्रभाव पड़ता है।
  • परिसीमा अधिनियम, 1963 के अंतर्गत अपील दायर करने की समय-सीमा निर्धारित है। धारा 5 के अंतर्गत न्यायालय पर्याप्त कारण दिखाए जाने पर विलंब की माफी दे सकता है, परंतु यह शक्ति सीमित और विवेकाधीन है।
  • उच्चतम न्यायालय ने कई निर्णयों में राज्य और उसके विभागों द्वारा विलंब को सामान्य रूप से स्वीकार न करने का सिद्धांत दोहराया है, और यह भी कहा है कि सरकार को निजी वादकर्ता से भिन्न व्यवहार का लाभ नहीं मिलना चाहिए।
  • राज्य सरकारों ने सरकारी मुकदमों के प्रबंधन के लिए नीतिगत और विधिक उपाय अपनाए हैं। कर्नाटक सरकारी मुकदमेबाज़ी अधिनियम, 2023 ऐसा ही एक प्रयास है, जिसका उद्देश्य सरकारी मुकदमों में व्यवस्था और जवाबदेही लाना बताया गया है।
  • सेवा-विवादों में सरकार का अपील में विलंब प्रायः कर्मचारियों के अधिकारों और प्रशासनिक निर्णयों की अनिश्चितता को लंबा खींचता है, जिससे प्रशासनिक दक्षता पर भी प्रभाव पड़ता है।

सरकारी मुकदमेबाज़ी में परिसीमा और आदर्श वादकर्ता की अवधारणा क्या है?

  • परिसीमा (Limitation) का अर्थ है वह निश्चित अवधि जिसके भीतर किसी अधिकार के प्रवर्तन के लिए न्यायालय में वाद या अपील दायर करनी होती है। इसका उद्देश्य मुकदमों का समयबद्ध निपटारा और अधिकारों में स्थिरता सुनिश्चित करना है।
  • परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 5 के अंतर्गत न्यायालय पर्याप्त कारण दिखाए जाने पर विलंब को क्षमा कर सकता है। पर्याप्त कारण की व्याख्या में वास्तविक और ईमानदार कारण अपेक्षित हैं, केवल प्रशासनिक औपचारिकताएँ पर्याप्त नहीं मानी जातीं।
  • आदर्श वादकर्ता (Model Litigant) की अवधारणा के अनुसार राज्य को निष्पक्ष, ईमानदार और समयबद्ध व्यवहार करना चाहिए। उससे अपेक्षा है कि वह विधि के शासन का पालन करे और अनावश्यक मुकदमेबाज़ी या विलंब से बचे।
  • राष्ट्रीय वाद नीति, 2010 (National Litigation Policy, 2010) सरकार को अनावश्यक मुकदमेबाज़ी कम करने और मुकदमों के प्रभावी प्रबंधन की दिशा में प्रेरित करती है। यह नीति सरकारी वादों के समन्वय और निर्णय-प्रक्रिया की गति पर बल देती है।
  • संविधान के अनुच्छेद 162 के अंतर्गत राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है, और अनुच्छेद 166 के अंतर्गत राज्य सरकार के कार्यों के संचालन और निर्णय-प्रक्रिया के नियम बनाए जाते हैं। प्रशासनिक विलंब की जवाबदेही इन्हीं संवैधानिक-प्रशासनिक ढाँचों से जुड़ी है।
  • लालफीताशाही (Red Tapism) से तात्पर्य अनावश्यक नियमों, औपचारिकताओं और फाइलों के धीमे आवागमन से उत्पन्न प्रशासनिक जड़ता से है। यह सरकारी निर्णयों में विलंब का प्रमुख कारण माना जाता है।
  • न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के माध्यम से उच्च न्यायालय प्रशासनिक कार्यों और प्रक्रियाओं की वैधता जाँच सकते हैं, और अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट अधिकारिता का प्रयोग कर सकते हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्त्व
कर्नाटक सरकारी मुकदमेबाजी संचालन अधिनियम, 2023 (Karnataka Conduct of Government Litigation Act, 2023) राज्य सरकार और उसके अधिकारियों की मुकदमेबाजी के लिए समय-सीमा, जवाबदेही और निर्णय-प्रक्रिया तय करने वाला राज्य-कानून
परिसीमा अवधि का पालन अपील, पुनर्विलोकन और पुनरीक्षण दायर करने की परिसीमा अवधि का सख्ती से पालन इस अधिनियम का मूल उद्देश्य है
विलंब के आँकड़े अपीलों में 466 दिन से लेकर 1,099 दिन तक का विलंब दर्ज हुआ; चारों अपीलें कर्नाटक राज्य विधि विश्वविद्यालय के कुछ कर्मचारियों की सेवा से संबंधित थीं
निर्णय देने वाली पीठ खंडपीठ (Division Bench) ने सुनवाई की, जिसमें न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना और न्यायमूर्ति हेमा कुलकर्णी शामिल थे
विलंब क्षमा का आधार विलंब क्षमा के लिए पर्याप्त कारण (Sufficient Cause) सिद्ध करना आवश्यक है; केवल फाइलों की आवाजाही का विवरण पर्याप्त कारण नहीं माना गया

महत्व

विधिक और संवैधानिक

  • विधि के शासन (Rule of Law) का सिद्धांत यह मानता है कि राज्य भी उन्हीं नियमों से बंधा है जो वह नागरिकों पर लागू करता है
  • अनुच्छेद 14 की भावना के अनुसार राज्य और नागरिक दोनों के साथ विधि में समान व्यवहार अपेक्षित है
  • परिसीमन अधिनियम, 1963 (Limitation Act, 1963) की धारा 5 विलंब क्षमा का प्रावधान करती है, परंतु इसके लिए पर्याप्त कारण दिखाना अनिवार्य है

प्रशासनिक और शासन

  • लालफीताशाही (Red Tapism) की पहचान: फाइलों का एक मेज से दूसरी मेज तक जाना और विधिक राय लेने में अनावश्यक समय लगना निर्णय-प्रक्रिया को धीमा करता है
  • कानून बनाने का उद्देश्य तभी पूरा होता है जब उसका पालन करने वाली संस्थाएँ स्वयं उसका अनुपालन करें
  • जवाबदेही तंत्र की आवश्यकता: समय-सीमा का उल्लंघन होने पर उत्तरदायित्व तय करने की व्यवस्था स्पष्ट होनी चाहिए

न्यायिक व्यवस्था

  • राज्य सरकार सबसे बड़ी वादकर्ता होती है; उसके विलंब से उच्च न्यायालयों पर लंबित मामलों का बोझ बढ़ता है
  • सेवा-संबंधी विवादों के लंबित रहने से कर्मचारियों के अधिकार और प्रशासनिक स्थिरता दोनों प्रभावित होते हैं

सार्वजनिक वित्त

  • लंबी मुकदमेबाजी में राज्य के संसाधन, अधिकारियों का समय और विधिक व्यय लगातार खर्च होते हैं
  • समय पर निर्णय से अनावश्यक दायित्व और भविष्य की देनदारियों के बढ़ने का जोखिम कम होता है

चुनौतियाँ

1. प्रशासनिक विलंब की संस्कृति

  • फाइलों का आवागमन, पत्राचार और विधिक राय लेने में समय-सीमा का पालन न होना
  • विलंब को सामान्य प्रक्रिया मान लेने से जवाबदेही कमजोर पड़ती है
  • अधिकारियों के बीच समन्वय की कमी से निर्णय टलते रहते हैं

2. विलंब क्षमा में पर्याप्त कारण का अभाव

  • प्रशासनिक व्यस्तता या सामान्य प्रक्रिया को विलंब का वैध कारण नहीं माना गया
  • न्यायालय ने कहा कि ये कारण प्रशासनिक गतिविधि का विवरण हैं, न कि असाधारण बाधा का प्रमाण
  • बार-बार विलंब से न्यायिक समय और संसाधनों पर अनावश्यक दबाव बढ़ता है

3. राज्य की आदर्श वादकर्ता की भूमिका

  • राज्य से अपेक्षा है कि वह आदर्श वादकर्ता (Model Litigant) की तरह ईमानदारी और समय-पालन से मुकदमे लड़े
  • राज्य द्वारा अपवाद माँगना विधि के समान अनुप्रयोग के सिद्धांत को कमजोर करता है
  • सार्वजनिक विश्वास पर प्रभाव: कानून बनाने वाली संस्था का स्वयं पालन न करना विश्वसनीयता घटाता है

4. कानून का प्रभावी क्रियान्वयन

  • कानून का अस्तित्व पर्याप्त नहीं; उसके प्रवर्तन की संस्थागत व्यवस्था आवश्यक है
  • समय-सीमा और निगरानी तंत्र के बिना कानून केवल विधि-पुस्तिका में सीमित रह जाता है
  • विभागों की क्षमता और प्रशिक्षण में कमी क्रियान्वयन को कमजोर करती है

5. सार्वजनिक संसाधनों पर भार

  • लंबित अपीलों से विधिक व्यय और अधिकारियों के समय की लागत बढ़ती है
  • सेवा-विवादों के लंबित रहने से प्रशासनिक निर्णय और वित्तीय दायित्व अनिश्चित रहते हैं

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
परिसीमा अवधि का उल्लंघन 466 से 1,099 दिन तक का विलंब कानून की मूल भावना के विपरीत है
विलंब क्षमा के कारण फाइलों का आवागमन और पत्राचार पर्याप्त कारण नहीं माने गए
जवाबदेही का अभाव समय-सीमा तोड़ने पर संबंधित अधिकारियों के उत्तरदायित्व की स्पष्ट व्यवस्था दिखाई नहीं दी
कानून और व्यवहार का अंतर राज्य का स्वयं पालन न करना विधि के शासन में विश्वास को प्रभावित करता है
न्यायिक बोझ सरकारी अपीलों के विलंब से उच्च न्यायालय में लंबित मामलों की संख्या बढ़ती है
कर्मचारियों पर प्रभाव सेवा-संबंधी विवाद लंबे खिंचने से कर्मचारियों के अधिकार और प्रशासनिक निर्णय अनिश्चित रहते हैं

आगे की राह

  • सभी विभागों में अपील और पुनरीक्षण की परिसीमा अवधि की अनिवार्य सूची और अनुस्मारक प्रणाली लागू की जाए
  • फाइल-प्रवाह की निगरानी के लिए ई-ऑफिस (e-Office) जैसी डिजिटल प्रणाली के माध्यम से हर चरण का समय-चिह्नांकन किया जाए
  • विधिक राय लेने और निर्णय देने के लिए स्पष्ट समय-सीमा तय की जाए
  • विलंब क्षमा के आवेदनों में तथ्यात्मक और दस्तावेज़ी कारण देना अनिवार्य किया जाए
  • समय-सीमा का उल्लंघन होने पर संबंधित अधिकारी के उत्तरदायित्व का निर्धारण किया जाए
  • राष्ट्रीय मुकदमा नीति, 2010 (National Litigation Policy, 2010) के सिद्धांतों के अनुरूप राज्य-स्तरीय मुकदमा नीति का प्रभावी क्रियान्वयन हो
  • अधिकारियों को आदर्श वादकर्ता के सिद्धांत और परिसीमा कानून पर नियमित प्रशिक्षण दिया जाए
  • लंबित अपीलों की नियमित समीक्षा और सार्वजनिक रिपोर्टिंग से पारदर्शिता बढ़ाई जाए

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

मॉडल वादकर्ता (Model Litigant) · परिसीमा अवधि (Limitation Period) · विलंब की माफी (Condonation of Delay) · पर्याप्त कारण (Sufficient Cause) · परिसीमा अधिनियम, 1963 (Limitation Act, 1963) · कर्नाटक सरकार मुकदमा संचालन अधिनियम, 2023 (Karnataka Conduct of Government Litigation Act, 2023) · विधि के शासन (Rule of Law) · समता का अधिकार, अनुच्छेद 14 (Right to Equality, Article 14) · राज्य सरकार का कार्य-संचालन, अनुच्छेद 166 (Conduct of Government Business, Article 166) · लालफीताशाही (Red Tapism) · प्रशासनिक जवाबदेही (Administrative Accountability) · राष्ट्रीय मुकदमा नीति, 2010 (National Litigation Policy, 2010)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 14 — राज्य और नागरिकों के लिए विधि में समान व्यवहार

अवधारणा प्रवाह

राज्य सरकार सेवा-संबंधी एकल न्यायाधीश के निर्णयों के विरुद्ध अपील दायर करती है  →  अपीलें परिसीमा अवधि के बाद दायर होती हैं और विलंब 466 से 1,099 दिन तक पहुँचता है  →  फाइलों की आवाजाही, पत्राचार और विधिक राय लेने में समय लगता है, जिसे विलंब का कारण बताया जाता है  →  पर्याप्त कारण सिद्ध न होने से विलंब क्षमा का आधार कमजोर पड़ता है  →  खंडपीठ 2023 के अधिनियम के अनुपालन की कमी पर टिप्पणी करती है  →  राज्य से आदर्श वादकर्ता के रूप में समय-सीमा के पालन की अपेक्षा दोहराई जाती है  →  परिणामस्वरूप शासन में जवाबदेही और विधि के शासन को मज़बूत करने की आवश्यकता रेखांकित होती है

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 5 के अंतर्गत न्यायालय पर्याप्त कारण दर्शाए जाने पर अपील दाखिल करने में हुए विलंब को माफ कर सकता है।
2. कलेक्टर, भूमि अधिग्रहण बनाम मुस्त. कटिजी (1987) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने तकनीकी आधारों की तुलना में वास्तविक न्याय को प्राथमिकता देने के दृष्टिकोण को अपनाया था।
3. संविधान के अनुच्छेद 166 के अंतर्गत राज्य के राज्यपाल को सरकारी कार्य के सुविधाजनक संचालन हेतु नियम बनाने की शक्ति है, किंतु ऐसे नियम केवल मुख्यमंत्री द्वारा बनाए जाते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: धारा 5 पर्याप्त कारण होने पर विलंब की माफी का प्रावधान करती है। कथन 2 सही है: कटिजी मामले में न्यायालय ने सरकारी विलंब के संदर्भ में उदार दृष्टिकोण अपनाते हुए ठोस न्याय पर बल दिया। कथन 3 गलत है: अनुच्छेद 166(3) के अंतर्गत नियम राज्यपाल बनाते हैं, मुख्यमंत्री नहीं; अतः सही कथन केवल दो हैं।

Q2. अभिकथन (A): राज्य को एक आदर्श वादकर्ता (Model Litigant) के रूप में कार्य करना चाहिए और उसके द्वारा अपील दाखिल करने में हुए विलंब को केवल पर्याप्त कारण दर्शाए जाने पर ही माफ किया जाना चाहिए।
कारण (R): परिसीमा के नियम राज्य तथा निजी वादकर्ताओं पर समान रूप से लागू होते हैं, जो विधि के समक्ष समता के सिद्धांत से जुड़ा है।
उपर्युक्त के संदर्भ में नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है
  2. (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है
  3. (A) सही है, किंतु (R) गलत है
  4. (A) गलत है, किंतु (R) सही है

उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है — (A) सही है, क्योंकि राज्य से आदर्श वादकर्ता की अपेक्षा की जाती है और विलंब की माफी के लिए पर्याप्त कारण आवश्यक है। (R) भी सही है, क्योंकि परिसीमा का नियम सामान्यतः सभी पक्षों पर लागू होता है, और यही समता के सिद्धांत (अनुच्छेद 14) का व्यावहारिक आधार है। (R) द्वारा (A) की व्याख्या होती है, इसलिए विकल्प (A) सही है।

Q3. निम्नलिखित सुमेलों पर विचार कीजिए:
सूची I (अनुच्छेद)
1. अनुच्छेद 166
2. अनुच्छेद 226
3. अनुच्छेद 300
4. अनुच्छेद 14

सूची II (विषय)
a. राज्य सरकार के कार्य-संचालन हेतु नियम
b. उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता
c. विधि के समक्ष समता
d. सरकार के विरुद्ध या सरकार द्वारा वाद

सही सुमेलन चुनिए:

  1. 1-a, 2-b, 3-d, 4-c
  2. 1-a, 2-b, 3-c, 4-d
  3. 1-b, 2-a, 3-d, 4-c
  4. 1-d, 2-b, 3-a, 4-c

उत्तर: 1-a, 2-b, 3-d, 4-c — अनुच्छेद 166 राज्य सरकार के कार्य-संचालन और आदेशों के प्रमाणीकरण से संबंधित है (1-a)। अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालय को मूल अधिकार और अन्य प्रयोजनों हेतु रिट जारी करने की शक्ति देता है (2-b)। अनुच्छेद 300 सरकार के विरुद्ध और सरकार द्वारा वाद से संबंधित है (3-d)। अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समता का प्रावधान करता है (4-c)।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ राज्य को सामान्यतः सबसे बड़ा वादकर्ता माना जाता है। इस कथन की विवेचना कीजिए कि सरकार से एक आदर्श वादकर्ता (Model Litigant) के रूप में अपेक्षित आचरण, निजी वादकर्ता की तुलना में अधिक कठोर परिसीमा-अनुशासन की मांग करता है। साथ ही उत्तर दीजिए कि यदि सरकारी विभागों की अपीलों में विलंब की माफी नियमित रूप से दी जाती है, तो विधि के शासन और प्रशासनिक जवाबदेही पर क्या परिणाम होते हैं। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर की रूपरेखा: (1) भूमिका: कर्नाटक उच्च न्यायालय का हालिया अवलोकन, जिसमें कर्नाटक सरकार मुकदमा संचालन अधिनियम, 2023 के बावजूद अपीलों में 466 से 1,099 दिन तक के विलंब दर्ज हुए और न्यायालय ने कहा कि ‘लालफीताशाही ने विधि के संचालन को ही रोक दिया।’ (2) विधिक ढाँचा: परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 5 के अंतर्गत पर्याप्त कारण पर विलंब की माफी; अनुच्छेद 14 में समता का सिद्धांत; अनुच्छेद 166 के अंतर्गत सरकारी कार्य-संचालन के नियम; अनुच्छेद 300 के अंतर्गत सरकार के विरुद्ध और सरकार द्वारा वाद। (3) सरकार के पक्ष में तर्क: कटिजी (1987) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सरकारी विभाग निर्णय-प्रक्रिया की जटिलता और फाइलों की आवाजाही से प्रभावित होते हैं, इसलिए तकनीकी आधार पर न्याय से वंचित नहीं करना चाहिए; सार्वजनिक धन और जनहित का प्रश्न भी उभरता है। (4) विपक्ष में तर्क: राष्ट्रीय मुकदमा नीति, 2010 का उद्देश्य सरकारी मुकदमेबाजी को सीमित और अनुशासित करना था; आदर्श वादकर्ता की अवधारणा के अनुसार राज्य को ‘विशेषाधिकार-प्राप्त विलंबकर्ता’ के रूप में नहीं देखा जा सकता; विलंब की माफी का नियमित प्रयोग अनुच्छेद 14 के अंतर्गत असमान व्यवहार का प्रश्न उठाता है। (5) संतुलित दृष्टिकोण: ‘पर्याप्त कारण’ का कठोर मूल्यांकन, विलंब के कारणों का दस्तावेजीकरण, फाइल-गति की समय-सीमा तथा दोषी अधिकारियों पर उत्तरदायित्व तय करना। (6) परिणाम: सार्वजनिक धन की हानि, न्यायिक समय का अपव्यय, प्रशासनिक जवाबदेही का क्षरण, विधि के प्रति जनविश्वास में कमी; दूसरी ओर, नियमित माफी से राज्य के वैध दावे का मूल्यांकन होने पर भी न्याय की संभावना। (7) निष्कर्ष: विधि के शासन के लिए राज्य पर उच्च अनुशासन की अपेक्षा है, और विधायी अधिनियम का सार्थक क्रियान्वयन ही उसकी प्रामाणिकता सिद्ध करता है।

स्रोत: The Hindu

Karnataka PCS (KPSC) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा लालफीताशाही को नियंत्रित करने हेतु बनाए गए कानून के संबंध में व्यक्त की गई विडंबना का मुख्य कारण क्या है?

  1. A. कानून का अत्यधिक कठोर होना
  2. B. कानून के कार्यान्वयन में सरकारी विभागों द्वारा ही लालफीताशाही का पालन किया जाना
  3. C. कानून में न्यायालयों को अपर्याप्त अधिकार प्रदान किया जाना
  4. D. कानून का पूर्णतः लागू न किया जाना

उत्तर: B. कानून के कार्यान्वयन में सरकारी विभागों द्वारा ही लालफीताशाही का पालन किया जाना — कर्नाटक उच्च न्यायालय ने बताया कि लालफीताशाही को नियंत्रित करने हेतु बनाए गए कानून का पालन स्वयं सरकारी विभागों द्वारा नहीं किया जा रहा, जिससे कानून का उद्देश्य ही विफल हो रहा है।

Mains: कर्नाटक में लालफीताशाही को नियंत्रित करने हेतु बनाए गए कानून के प्रभावी कार्यान्वयन में आने वाली प्रमुख बाधाओं का विश्लेषण करते हुए, सरकार द्वारा उठाए जाने वाले कदमों पर चर्चा कीजिए।


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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