मद्रास उच्च न्यायालय ने चिदंबरम मंदिर के प्रबंधन में बदलाव किया, पीढ़ी दर पीढ़ी के पुजारियों पर लगाया आरोप

मद्रास उच्च न्यायालय ने चिदंबरम मंदिर के प्रबंधन में बदलाव किया, पीढ़ी दर पीढ़ी के पुजारियों पर लगाया आरोप

मंदिर प्रशासन बदलाव प्रक्रिया2014 में सर्वोच्च न्यादीक्षितर समुदाय को प्रशासनकुप्रबंधनअनधिकृत निर्माण, अतिक्रमण2026 में उच्च न्यायालयप्रबंध बोर्ड गठन
मंदिर प्रशासन बदलाव प्रक्रिया

✎ अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदाय को प्रबंधन का अधिकार देता है, परंतु कुप्रबंधन की स्थिति में उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के अंतर्गत प्रबंध बोर्ड गठित कर सकता है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — राजव्यवस्था और शासन (धार्मिक संस्थाओं का प्रबंधन, अनुच्छेद 26, राज्य का नियंत्रण, न्यायपालिका की भूमिका)  |  GS Paper I — भारतीय विरासत और संस्कृति (मंदिर स्थापत्य, प्राचीन संरचनाओं का संरक्षण, धार्मिक परंपराएँ)
  • Prelims: अनुच्छेद 26 (धार्मिक संप्रदायों के प्रबंधन का अधिकार), अनुच्छेद 25 से 30 (धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकार), अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार), हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ विन्यास अधिनियम, 1959 (तमिलनाडु), हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ विन्यास विभाग (HR&CE), पदेन सदस्य (Ex-officio Member), धर्मार्थ न्यास (Charitable Trust) और लोक न्यास सिद्धांत (Public Trust Doctrine), दीक्षितर (Dikshitar) परंपरा और चिदंबरम नटराज मंदिर
  • Essay: राज्य का नियंत्रण बनाम धार्मिक संप्रदायों की स्वायत्तता: संवैधानिक संतुलन, धरोहर संरक्षण और धार्मिक गतिविधियों के बीच सामंजस्य: विरासत के प्रति उत्तरदायी प्रशासन

त्वरित पुनरावृत्ति: अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदाय को प्रबंधन का अधिकार देता है, परंतु कुप्रबंधन की स्थिति में उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के अंतर्गत प्रबंध बोर्ड गठित कर सकता है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

मद्रास उच्च न्यायालय ने 30 अक्टूबर 2026 को निर्णय दिया कि पोधु दीक्षितर (Podhu Dikshidar) समुदाय, जिसे वर्ष 2014 में सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के बाद चिदंबरम सभानायगर मंदिर (Chidambaram Sabanayagar Temple) का प्रशासन सौंपा गया था, ने इस मंदिर का कुप्रबंधन किया है। न्यायालय की खंडपीठ ने मंदिर के संचालन के लिए प्रबंध बोर्ड (Board of Management) का गठन किया, जिसकी अध्यक्षता और उपाध्यक्षता सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय न्यायाधीशों को सौंपी गई। बोर्ड से अनधिकृत निर्माण हटाने, अतिक्रमित संपत्तियाँ वापस लेने, बकाया किराया वसूलने, खातों का उचित रखरखाव करने और मंदिर के नवीनीकरण का कार्य विरासत संरचना को क्षति पहुँचाए बिना करने को कहा गया है। यह मामला धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन में राज्य और न्यायपालिका की भूमिका तथा प्राचीन संरचनाओं के संरक्षण की व्यवस्था की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

पृष्ठभूमि

  • चिदंबरम का नटराज (सभानायगर) मंदिर तमिलनाडु के कुड्डालोर जिले में स्थित है और शैव परंपरा का प्रमुख केंद्र माना जाता है। इसका प्रशासन परंपरागत रूप से दीक्षितर समुदाय के पास रहा है।
  • वर्ष 2014 में सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के अनुसार मंदिर का प्रशासन पोधु दीक्षितर समुदाय को सौंपा गया, जिसके बाद प्रबंधन से जुड़े विवाद लगातार सामने आते रहे।
  • तमिलनाडु में हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ विन्यास अधिनियम, 1959 के अंतर्गत राज्य का हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ विन्यास विभाग (HR&CE) बहुत से मंदिरों की संपत्ति और प्रशासन की निगरानी करता है।
  • न्यायालय ने पाया कि पिछले 12 वर्षों की मंदिर-आय का पूरा और सही हिसाब प्रस्तुत नहीं किया गया, अनधिकृत निर्माणों से प्राचीन संरचना को क्षति पहुँची और मंदिर की संपत्तियों पर अतिक्रमण हुआ।
  • खंडपीठ ने इन परिस्थितियों को कुप्रबंधन (Maladministration) मानते हुए हस्तक्षेप को उचित ठहराया, जो उच्च न्यायालय की संवैधानिक शक्ति के अंतर्गत आता है।

प्रबंध बोर्ड (Board of Management) क्या है?

  • प्रबंध बोर्ड ऐसी व्यवस्था है जिसमें न्यायालय किसी धार्मिक संस्था के प्रशासन को अस्थायी या विशेष रूप से नियुक्त निकाय को सौंपता है, ताकि संपत्ति, खातों और धार्मिक कार्यों का सुचारु संचालन हो सके।
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक कार्यों के प्रबंधन, संस्थाओं की स्थापना और संपत्ति के प्रशासन का अधिकार देता है, परंतु यह अधिकार लोक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है।
  • अनुच्छेद 25 से 28 धार्मिक स्वतंत्रता से संबंधित हैं, जबकि अनुच्छेद 26 संप्रदाय के सामूहिक प्रबंधन अधिकार की बात करता है।
  • अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय मौलिक और अन्य अधिकारों की रक्षा तथा प्रशासनिक अनियमितताओं के विरुद्ध रिट जारी कर सकता है।
  • लोक न्यास सिद्धांत (Public Trust Doctrine) के अनुसार मंदिर की संपत्ति और आय का उपयोग धार्मिक उद्देश्य और जनहित के लिए होना चाहिए, न कि किसी व्यक्ति या समूह के निजी लाभ के लिए।
  • तमिलनाडु में धार्मिक संस्थाओं पर राज्य का नियंत्रण मुख्यतः हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ विन्यास अधिनियम, 1959 के माध्यम से होता है, और विभाग की सचिव पदेन सदस्य के रूप में बोर्ड में शामिल होते हैं।
  • प्राचीन धरोहर संरचनाओं के नवीनीकरण में मूल स्वरूप को बनाए रखना और धार्मिक अनुष्ठानों (जैसे कुंभाभिषेक) को शास्त्रीय विधि से संपन्न करना आवश्यक माना जाता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
प्रबंध मंडल (Board of Management) की संरचना दो सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय न्यायाधीश क्रमशः अध्यक्ष और सह-अध्यक्ष हैं; सेवानिवृत्त IAS अधिकारी सदस्य हैं। इससे मंदिर प्रशासन में न्यायिक और प्रशासनिक अनुभव का समावेश हुआ है।
पदेन सदस्य पोदू दीक्षितार संघ के सचिव और हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ विन्यास विभाग (HR&CE) के सचिव पदेन सदस्य हैं। इससे समुदाय और राज्य सरकार दोनों के प्रतिनिधित्व का संतुलन बना रहता है।
विरासत संरक्षण का निर्देश तमिलनाडु विरासत आयोग (Tamil Nadu Heritage Commission) के परामर्श से अनधिकृत और अनावश्यक निर्माण हटाने हैं। जीर्णोद्धार प्राचीन संरचना को बदले बिना होना है।
संपत्ति और वित्तीय निर्देश संपत्तियों की सूची बनाना, लापता मूल्यवान वस्तुएँ सुरक्षित करना, किराया तथा पट्टा बकाया वसूलना, अतिक्रमित भूमि मुक्त कराना और उचित लेखा-बही रखना अनिवार्य है।
धार्मिक अनुष्ठान जीर्णोद्धार के बाद कुंभाभिषेकम जैसे प्रोक्षण (consecration) अनुष्ठान धार्मिक विधि के अनुसार कराने का निर्देश है। इससे धार्मिक परंपरा और संरक्षण दोनों का समन्वय अपेक्षित है।
प्रशासनिक सहायता सभी सरकारी प्राधिकरणों को प्रबंध मंडल की सहायता का निर्देश है और अतिक्रमण हटाने में जिला प्रशासन की भूमिका तय की गई है।

महत्व

धार्मिक एवं सांस्कृतिक

  • चिदंबरम सभानायगर मंदिर (Chidambaram Sabanayagar Temple) दक्षिण भारत के प्रमुख शैव तीर्थों में है, इसलिए इसके प्रबंधन का प्रश्न धार्मिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
  • धार्मिक अनुष्ठानों की प्रामाणिकता बनाए रखना और प्रोक्षण को विधि के अनुसार संपन्न कराना परंपरा के संरक्षण से जुड़ा है।

विधिक एवं संवैधानिक

  • अनुच्छेद 26 के अंतर्गत धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक कार्यों के प्रबंधन का अधिकार है, परंतु यह अधिकार विधि के अधीन और लोक-व्यवस्था के अध्यधीन है।
  • अनुच्छेद 25(2)(b) राज्य को धार्मिक संस्थाओं के सामाजिक कल्याण और सुधार के लिए विधि बनाने की शक्ति देता है। हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ विन्यास अधिनियम के अंतर्गत HR&CE विभाग की भूमिका इसी संदर्भ में समझी जाती है।
  • सर्वोच्च न्यायालय के 2014 के आदेश से प्रशासन सौंपे जाने के बाद उच्च न्यायालय द्वारा कुप्रबंधन की समीक्षा न्यायिक समीक्षा के सिद्धांत का व्यावहारिक उदाहरण है।

प्रशासनिक एवं शासन

  • प्रबंध मंडल जैसी व्यवस्था यह दर्शाती है कि जब संस्थागत जवाबदेही विफल हो, तब न्यायालय वैकल्पिक प्रशासनिक ढाँचा खड़ा कर सकता है।
  • जिला प्रशासन और HR&CE विभाग के समन्वय से यह मॉडल सरकारी और न्यायिक तंत्र के बीच सहयोग का उदाहरण बनता है।

विरासत संरक्षण एवं आर्थिक

  • प्राचीन संरचना को अनधिकृत निर्माण से बचाना विश्व धरोहर स्तर के स्मारकों के संरक्षण के सिद्धांत से मेल खाता है।
  • मंदिर संपत्तियों से आय बढ़ाने और बकाया वसूली से धार्मिक संस्थाओं की वित्तीय आत्मनिर्भरता सुदृढ़ हो सकती है।

चुनौतियाँ

1. धार्मिक स्वायत्तता और राज्य हस्तक्षेप का संतुलन

  • अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदाय को अपने मामलों के प्रबंधन का अधिकार देता है, जबकि न्यायालय और राज्य का हस्तक्षेप कुप्रबंधन की स्थिति में वैध माना गया है।
  • हस्तक्षेप की सीमा तय करना और प्रबंधन में समुदाय की भागीदारी बनाए रखना एक कठिन संतुलन है।

2. विरासत संरक्षण बनाम निर्माण और पुनर्विकास

  • मंदिर परिसर में अनियंत्रित निर्माण से प्राचीन संरचना को क्षति पहुँची है, जिससे संरक्षण की प्राथमिकता स्पष्ट हुई है।
  • जीर्णोद्धार में मूल स्थापत्य को बदले बिना आधुनिक सुविधाएँ जोड़ना तकनीकी और नीतिगत चुनौती है।

3. अतिक्रमण और संपत्ति की वसूली

  • मंदिर की भूमि और संपत्तियों पर अतिक्रमण तथा किराया व पट्टा बकाया की वसूली लंबे समय से समस्या रही है।
  • अतिक्रमण हटाने में स्थानीय प्रशासन की भूमिका और विधिक प्रक्रियाओं का पालन आवश्यक है।

4. लेखा-पारदर्शिता और वित्तीय जवाबदेही

  • पिछले 12 वर्षों की आय का पूरा और सही विवरण न देना वित्तीय पारदर्शिता में गंभीर कमी को दर्शाता है।
  • धार्मिक संस्थाओं के दान और अन्नदानम जैसे कार्यों के लिए संग्रहित धन का उचित लेखा-जोखा आवश्यक है।

5. परंपरा और प्रशासनिक मानकों का समन्वय

  • प्रोक्षण और अन्य अनुष्ठान धार्मिक विधि के अनुसार होने हैं, जबकि संरक्षण और प्रशासन के मानक भी लागू होते हैं।
  • धार्मिक परंपरा और आधुनिक प्रबंधन के बीच समन्वय बिठाना प्रबंध मंडल के लिए निरंतर चुनौती होगी।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
अनियंत्रित निर्माण प्राचीन संरचना को भौतिक क्षति और विरासत मूल्य में गिरावट का खतरा।
अतिक्रमण मंदिर की भूमि और संपत्तियों पर कब्जे से राजस्व और संपत्ति की हानि।
किराया और पट्टा बकाया मंदिर की आय में कमी, जिससे रखरखाव और धार्मिक गतिविधियाँ प्रभावित होती हैं।
लेखा-पारदर्शिता का अभाव आय और व्यय का सही विवरण न होने से जवाबदेही कमजोर होती है।
प्रबंधन में टकराव पूर्ववर्ती प्रबंधन और नए प्रबंध मंडल के बीच हस्तांतरण में विवाद की आशंका।
परंपरा बनाम संरक्षण धार्मिक अनुष्ठानों और विरासत नियमों के बीच व्यावहारिक समन्वय की चुनौती।

आगे की राह

  • प्रबंध मंडल को संपत्तियों की पूर्ण सूची और डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करने चाहिए, ताकि भविष्य में अतिक्रमण पर निगरानी संभव हो।
  • किराया और पट्टा बकाया की वसूली के लिए स्पष्ट समय-सीमा और विधिक प्रक्रिया अपनाई जाए।
  • लेखा-बही का नियमित लेखा-परीक्षण हो और आय-व्यय का सार्वजनिक खुलासा किया जाए।
  • जीर्णोद्धार से पहले तमिलनाडु विरासत आयोग और पुरातत्व विशेषज्ञों से तकनीकी मूल्यांकन कराया जाए।
  • अतिक्रमण हटाने में जिला प्रशासन और राजस्व तंत्र के बीच समन्वय तय किया जाए।
  • धार्मिक समुदाय, HR&CE विभाग और प्रबंध मंडल के बीच संवाद की संरचना बने, ताकि परंपरा और प्रशासन में संतुलन रहे।
  • मंदिर आय के उपयोग के लिए स्पष्ट बजट और व्यय-नीति बनाई जाए, जिसमें संरक्षण और धार्मिक गतिविधियों दोनों को स्थान मिले।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

चिदंबरम सबानायगर मंदिर · पोदु दीक्षितार · मद्रास उच्च न्यायालय · प्रबंधन बोर्ड · धार्मिक स्वतंत्रता · अनुच्छेद 25 · अनुच्छेद 26 · राज्य का हस्तक्षेप · हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग · न्यायिक समीक्षा · कुप्रशासन · सांस्कृतिक विरासत संरक्षण

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 26: धार्मिक कार्यों के प्रबंधन का अधिकार
  • अनुच्छेद 25(2)(b): राज्य द्वारा धार्मिक संस्थाओं का सुधार
  • अनुच्छेद 226: उच्च न्यायालय का रिट-क्षेत्राधिकार

अवधारणा प्रवाह

2014 में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से पोदू दीक्षितार समुदाय को मंदिर का प्रशासन सौंपा गया।  →  प्रशासन के दौरान संरचना को क्षति, अतिक्रमण, किराया बकाया और लेखा में अपारदर्शिता जैसी समस्याएँ सामने आईं।  →  मद्रास उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने कुप्रबंधन का निष्कर्ष निकाला और न्यायिक हस्तक्षेप किया।  →  दो सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय न्यायाधीशों की अध्यक्षता में प्रबंध मंडल गठित किया गया, जिसमें HR&CE विभाग के सचिव पदेन सदस्य हैं।  →  प्रबंध मंडल अतिक्रमण हटाने, संपत्ति व बकाया की वसूली और लेखा-व्यवस्था सुधारने का कार्य करेगा।  →  विरासत-अनुरूप जीर्णोद्धार और विधि-सम्मत प्रोक्षण के बाद मंदिर का सामान्य धार्मिक संचालन पुनः स्थापित होने की अपेक्षा है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत का संविधान धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है।
2. राज्य धार्मिक संस्थानों के कुप्रशासन के मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
3. अनुच्छेद 26 धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता से संबंधित है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है। कथन 2 गलत है। राज्य सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के आधार पर धार्मिक संस्थानों के कुप्रशासन या वित्तीय अनियमितताओं के मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है, जैसा कि चिदंबरम मंदिर मामले में देखा गया। कथन 3 सही है। अनुच्छेद 26 धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता से संबंधित है।

Q2. भारत के संविधान के तहत, धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता से संबंधित कौन सा अनुच्छेद है?

  1. अनुच्छेद 25
  2. अनुच्छेद 26
  3. अनुच्छेद 27
  4. अनुच्छेद 28

उत्तर: अनुच्छेद 26 — अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है, जिसमें धार्मिक और धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए संस्थानों की स्थापना और रखरखाव, अपने स्वयं के मामलों का प्रबंधन, चल और अचल संपत्ति का स्वामित्व और अधिग्रहण, और कानून के अनुसार ऐसी संपत्ति का प्रशासन शामिल है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ धार्मिक संप्रदायों को अपने मामलों का प्रबंधन करने की स्वतंत्रता के संवैधानिक प्रावधानों पर चर्चा कीजिए। चिदंबरम सबानायगर मंदिर मामले में मद्रास उच्च न्यायालय के हालिया निर्णय के आलोक में राज्य के हस्तक्षेप की सीमा का भी विश्लेषण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. संवैधानिक प्रावधान: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का विस्तृत उल्लेख करें, विशेष रूप से धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने की स्वतंत्रता पर ध्यान केंद्रित करें। अनुच्छेद 26 के तहत प्रदान की गई चार स्वतंत्रताओं (संस्थानों की स्थापना, अपने मामलों का प्रबंधन, संपत्ति का अधिग्रहण और प्रशासन) को स्पष्ट करें।
2. राज्य के हस्तक्षेप की सीमा: बताएं कि ये स्वतंत्रताएं पूर्ण नहीं हैं और सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन हैं। राज्य के हस्तक्षेप के उन आधारों की व्याख्या करें जहां कुप्रशासन, वित्तीय अनियमितताएं या धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों में हस्तक्षेप होता है।
3. चिदंबरम सबानायगर मंदिर मामला: मद्रास उच्च न्यायालय के निर्णय का संदर्भ दें, जिसमें पोदु दीक्षितारों द्वारा कुप्रशासन और वित्तीय अनियमितताओं के कारण प्रबंधन बोर्ड की नियुक्ति की गई। मंदिर की संपत्ति के अतिक्रमण, खातों की जानकारी साझा न करने और प्राचीन संरचना को नुकसान जैसे विशिष्ट मुद्दों का उल्लेख करें।
4. न्यायिक समीक्षा की भूमिका: इस संदर्भ में न्यायिक समीक्षा की भूमिका पर प्रकाश डालें, जिसमें न्यायालय धार्मिक संस्थानों के प्रशासन में संतुलन स्थापित करने के लिए हस्तक्षेप कर सकता है, जबकि धार्मिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों को बनाए रखता है।
5. निष्कर्ष: धार्मिक स्वतंत्रता और राज्य के नियामक अधिकार के बीच संतुलन की आवश्यकता पर जोर दें, विशेष रूप से जब कुप्रशासन या सार्वजनिक हित का मुद्दा हो।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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