30 Oct कानपुर में श्रम संहिताओं पर क्षमता निर्माण कार्यक्रम: जानिए प्रमुख पहलू
✎ चार श्रम संहिताएँ (मजदूरी, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशा, 2019–2020) लगभग 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को समेकित करती हैं, और श्रम समवर्ती सूची का विषय होने के कारण इनका क्रियान्वयन…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — राजव्यवस्था एवं शासन (संघ-राज्य समन्वय, समवर्ती सूची के विषय, श्रम कल्याण) | GS Paper II — सामाजिक न्याय (असंगठित श्रमिकों और सामाजिक सुरक्षा से संबंधित सरकारी योजनाएँ) | GS Paper III — अर्थव्यवस्था (श्रम बाज़ार सुधार, रोजगार सृजन, औद्योगिक संबंध)
- Prelims: चार श्रम संहिताएँ (Four Labour Codes) और उनके वर्ष (2019 और 2020), मजदूरी संहिता, 2019 (Code on Wages, 2019), औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 (Industrial Relations Code, 2020), सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 (Code on Social Security, 2020) — गिग और प्लेटफ़ॉर्म श्रमिकों की परिभाषा, व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशा संहिता, 2020, समवर्ती सूची की प्रविष्टि 22, 23 और 24 (श्रम, सामाजिक सुरक्षा, श्रमिक कल्याण), प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन (PM-SYM) योजना — असंगठित श्रमिकों के लिए स्वैच्छिक अंशदायी पेंशन, ईपीएफओ, ईएसआईसी और श्रम कल्याण महानिदेशालय (DGLW) की भूमिका
- Essay: श्रम संहिताएँ: सुधार, सामाजिक सुरक्षा और रोजगार के बीच संतुलन, भारत में संघवाद और समवर्ती विषय: नीति-निर्माण में केंद्र-राज्य समन्वय की भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: चार श्रम संहिताएँ (मजदूरी, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशा, 2019–2020) लगभग 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को समेकित करती हैं, और श्रम समवर्ती सूची का विषय होने के कारण इनका क्रियान्वयन केंद्र-राज्य समन्वय से होता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
श्रम एवं रोजगार मंत्रालय और उत्तर प्रदेश सरकार के श्रम विभाग ने 28 अक्टूबर 2026 को कानपुर में ‘श्रम संवाद’ नामक क्षेत्रीय कार्यक्रम का संयुक्त आयोजन किया। इसका उद्देश्य नियोक्ताओं, मानव संसाधन और विधिक-वित्तीय क्षेत्र के पेशेवरों को नई श्रम संहिताओं और उनके अंतर्गत बनाए गए नियमों से परिचित कराना था। कार्यक्रम में ईपीएफओ, ईएसआईसी और डीजीएलडब्ल्यू के वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हुए। तकनीकी सत्रों में चारों श्रम संहिताओं के अनुपालन दायित्व, केंद्र एवं राज्य के अधिसूचित नियम, प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना (PMVBRY) तथा प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन (PM-SYM) योजना पर चर्चा हुई। इसके साथ ‘हैंडबुक ऑफ कंप्लायंस फॉर एम्प्लॉयर्स’ और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों का संकलन भी प्रतिभागियों को उपलब्ध कराया गया। यह घटना दर्शाती है कि संहिताओं का प्रभावी क्रियान्वयन अब मुख्यतः राज्य स्तरीय प्रशासन और अनुपालन-तंत्र पर निर्भर है।
पृष्ठभूमि
- भारत में श्रम कानूनों की संख्या अधिक थी और वे अनेक केंद्रीय व राज्य अधिनियमों में बिखरे हुए थे। इन्हें सरल और समेकित करने के लिए केंद्र सरकार ने चार श्रम संहिताएँ बनाईं, जिनमें लगभग 29 केंद्रीय श्रम कानून समाहित किए गए।
- श्रम संबंधी विषय संविधान की समवर्ती सूची में आते हैं, इसलिए संहिताओं का क्रियान्वयन केंद्र और राज्य दोनों की सहभागिता से होता है। राज्य अपने नियम बनाते हैं और उनका प्रवर्तन करते हैं।
- चारों संहिताएँ 2019 और 2020 में संसद द्वारा पारित हुईं और नवंबर 2025 से प्रभावी हुईं। इसके बाद केंद्र और राज्य स्तर पर नियमों का अधिसूचित होना और उनका अनुपालन सुनिश्चित करना प्रमुख कार्य बन गया।
- असंगठित क्षेत्र में बड़ी संख्या में श्रमिक कार्यरत हैं, जिन्हें पारंपरिक सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ कम मिलता था। PM-SYM जैसी योजनाएँ इसी अंतर को भरने के लिए शुरू की गईं।
- श्रम सुधारों का उद्देश्य श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा और नियोक्ताओं के लिए अनुपालन में सरलता, दोनों को साथ साधना है। इसी कारण जागरूकता और क्षमता-निर्माण को सुधार की सफलता की शर्त माना जा रहा है।
श्रम संहिताएँ क्या हैं?
- श्रम संहिताएँ (Labour Codes) चार विधायी ढाँचे हैं: मजदूरी संहिता, 2019; औद्योगिक संबंध संहिता, 2020; सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020; और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशा संहिता, 2020।
- मजदूरी संहिता में वेतन, न्यूनतम मजदूरी, बोनस और समान पारिश्रमिक से जुड़े प्रावधान एक ही संहिता में रखे गए हैं।
- औद्योगिक संबंध संहिता ट्रेड यूनियन, औद्योगिक विवाद और छंटनी से जुड़े नियमों को समेकित करती है। इसमें छंटनी और कुछ अन्य प्रावधानों के लिए सरकारी अनुमति की सीमा 100 से बढ़ाकर 300 श्रमिक की गई है।
- सामाजिक सुरक्षा संहिता में भविष्य निधि, कर्मचारी राज्य बीमा, मातृत्व लाभ और ग्रेच्युटी जैसे लाभ शामिल हैं। इसमें असंगठित, गिग और प्लेटफ़ॉर्म श्रमिकों के लिए भी प्रावधान किए गए हैं।
- व्यावसायिक सुरक्षा संहिता कार्यस्थल की सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य-दशाओं को नियमित करती है।
- संहिताओं के अंतर्गत नियम केंद्र और राज्य दोनों बनाते हैं, इसलिए अनुपालन की वास्तविक जिम्मेदारी राज्य प्रशासन और नियोक्ताओं पर अधिक आती है।
- PM-SYM (Pradhan Mantri Shram Yogi Maandhan) स्वैच्छिक और अंशदायी पेंशन योजना है, जो 18 से 40 वर्ष आयु के असंगठित श्रमिकों के लिए है। 60 वर्ष की आयु के बाद न्यूनतम 3,000 रुपये मासिक पेंशन का प्रावधान है और केंद्र सरकार अंशदान में समान योगदान देती है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| चार श्रम संहिताएँ | केंद्रीय श्रम कानूनों को वेतन, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और व्यावसायिक सुरक्षा व कार्य-दशा, इन चार संहिताओं में समेकित किया गया है। इससे कानूनों की संख्या घटी है और अनुपालन सरल हुआ है। |
| समवर्ती सूची का विषय | श्रम संघ, औद्योगिक विवाद, सामाजिक सुरक्षा और श्रमिक कल्याण सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची में आते हैं। इसलिए केंद्र और राज्य, दोनों नियम बनाते हैं और उनमें समन्वय आवश्यक होता है। |
| केंद्र-राज्य नियम | चारों संहिताओं के अंतर्गत केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा अलग-अलग नियम अधिसूचित किए गए हैं। कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के श्रम विभाग की भूमिका इसी व्यवस्था का व्यावहारिक रूप था। |
| नियोक्ता-केंद्रित अनुपालन सामग्री | ‘हैंडबुक ऑफ कंप्लायंस फॉर एम्प्लॉयर्स’ (Handbook of Compliance for Employers) और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों का संकलन नियोक्ताओं और अनुपालन पेशेवरों के लिए व्यावहारिक मार्गदर्शन का साधन है। |
| सामाजिक सुरक्षा संस्थाएँ | कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (Employees’ Provident Fund Organisation, EPFO), कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) और श्रम कल्याण महानिदेशालय (DGLW) की उपस्थिति से सामाजिक सुरक्षा का संस्थागत ढाँचा स्पष्ट होता है। |
| रोजगार और पेंशन योजनाएँ | प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना (Pradhan Mantri Viksit Bharat Rozgar Yojana, PM-VBRY) और प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन (Pradhan Mantri Shram Yogi Maandhan, PM-SYM) पर सत्र हुए, जो संहिताओं के सामाजिक सुरक्षा पक्ष से जुड़ते हैं। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- श्रम संहिताओं से कानूनी जटिलता घटने की अपेक्षा है, जिससे नियोक्ताओं के लिए अनुपालन लागत और अनिश्चितता कम हो सकती है।
- स्पष्ट और समेकित नियम औपचारिक क्षेत्र में निवेश और उद्यम विस्तार के लिए अनुकूल परिवेश बनाते हैं, जो आर्थिक संवृद्धि के लिए आवश्यक है।
- सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के लिए सरल अनुपालन उनकी औपचारिक क्षेत्र में भागीदारी बढ़ा सकता है।
सामाजिक महत्व
- सामाजिक सुरक्षा को व्यापक करने का लक्ष्य रखा गया है, ताकि असंगठित और गिग कार्यबल भी ईपीएफओ, ईएसआईसी जैसी योजनाओं के दायरे में आ सकें।
- कार्य-दशा, सुरक्षा और कल्याण संबंधी प्रावधानों की स्पष्टता श्रमिकों के गरिमापूर्ण कार्य के अधिकार को मजबूत करती है।
शासन और प्रशासनिक महत्व
- केंद्र और राज्य के बीच नियमों का समन्वय संघीय ढाँचे में सहयोगी शासन का उदाहरण है।
- हितधारकों के साथ संवाद से नीति-क्रियान्वयन में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ती है, और नीति निर्माण की प्रक्रिया में नागरिक भागीदारी को बल मिलता है।
चुनौतियाँ
1. राज्य स्तर पर नियमों में एकरूपता
- चारों संहिताओं के लिए केंद्र और राज्यों के नियम अलग-अलग बनते हैं, इसलिए सभी राज्यों में प्रावधानों की व्याख्या और प्रक्रिया में भिन्नता संभव है।
- एक ही उद्यम के कई राज्यों में कार्य करने पर अनुपालन जटिल हो सकता है।
यूपीएससी लिंक: संघवाद, केंद्र-राज्य समन्वय और समवर्ती सूची
2. असंगठित और अनौपचारिक श्रमिकों की पहुँच
- बड़ी संख्या में श्रमिक अनौपचारिक क्षेत्र में हैं, जिन तक पंजीकरण और सामाजिक सुरक्षा लाभ पहुँचना कठिन है।
- पंजीकरण, आधार-सत्यापन और जागरूकता की कमी से योजनाओं का वास्तविक कवरेज सीमित रह सकता है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक सुरक्षा, सार्वजनिक नीति और समावेशी विकास
3. एमएसएमई पर अनुपालन भार
- छोटे उद्यमों के पास समर्पित मानव संसाधन और विधिक क्षमता कम होती है, इसलिए नए नियमों का पालन उनके लिए कठिन हो सकता है।
- नियमों की जानकारी न होने पर अनजाने उल्लंघन और विवाद की स्थिति बन सकती है।
यूपीएससी लिंक: सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम तथा शासन में नियम-आधारित सुधार
4. श्रमिक-नियोक्ता संतुलन और विवाद समाधान
- लचीले रोजगार और छँटनी संबंधी प्रावधानों को लेकर श्रमिक संगठनों और नियोक्ताओं के दृष्टिकोण भिन्न हो सकते हैं।
- औद्योगिक विवादों के निपटारे के लिए प्रभावी और सुलभ तंत्र की आवश्यकता बनी रहती है।
यूपीएससी लिंक: औद्योगिक संबंध, श्रम संघ और औद्योगिक विवाद निपटान तंत्र
5. डिजिटल प्रणाली और क्षमता निर्माण
- पंजीकरण, विवरणी-प्रस्तुति और लाभ-वितरण के लिए डिजिटल प्रणालियों का सुचारु संचालन आवश्यक है।
- निरीक्षण अधिकारियों और अनुपालन पेशेवरों की क्षमता बढ़ाना लगातार चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: ई-शासन, प्रशासनिक क्षमता और लोक सेवा वितरण
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| राज्यों में नियमों की भिन्नता | एकीकृत बाजार में अनुपालन की जटिलता और व्याख्या में असमानता |
| अनौपचारिक श्रमिकों का कवरेज | पंजीकरण और लाभ पहुँच में कमी, विशेषकर गिग और स्वरोजगार श्रमिकों में |
| एमएसएमई पर अनुपालन भार | सीमित विधिक और मानव संसाधन क्षमता के कारण उल्लंघन का जोखिम |
| औद्योगिक विवाद निपटान | श्रमिक-नियोक्ता असहमति के समय समय पर समाधान न होने की आशंका |
| जागरूकता का अभाव | नियोक्ताओं और श्रमिकों दोनों को अधिकारों और दायित्वों की पूरी जानकारी न होना |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना (Pradhan Mantri Viksit Bharat Rozgar Yojana, PM-VBRY)
- प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन (Pradhan Mantri Shram Yogi Maandhan, PM-SYM)
आगे की राह
- केंद्र और राज्यों के नियमों में एकरूपता के लिए नियमित समन्वय बैठकें और साझा मानक-प्रक्रियाएँ विकसित की जाएँ।
- असंगठित और गिग श्रमिकों के पंजीकरण के लिए सरल, बहुभाषी और डिजिटल पहुँच सुनिश्चित की जाए।
- एमएसएमई के लिए अनुपालन सहायता केंद्र, सरल विवरणी प्रारूप और चरणबद्ध प्रवर्तन की व्यवस्था की जाए।
- हैंडबुक और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों को क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध कराया जाए, ताकि अधिक नियोक्ता और श्रमिक उन्हें समझ सकें।
- औद्योगिक विवाद निपटान के लिए त्वरित और सुलभ तंत्र को सुदृढ़ किया जाए और श्रमिक-नियोक्ता संवाद की संस्थागत व्यवस्था बने।
- निरीक्षण अधिकारियों और अनुपालन पेशेवरों के लिए नियमित प्रशिक्षण और क्षमता-निर्माण कार्यक्रम चलाए जाएँ।
- सामाजिक सुरक्षा लाभों के बीच समन्वय के लिए आधार-आधारित डेटाबेस और अंतर-संचालनीय प्रणालियाँ विकसित की जाएँ।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
श्रम संहिताएँ · श्रम सुधार · सामाजिक सुरक्षा · श्रमिक कल्याण · क्षमता निर्माण · जागरूकता कार्यक्रम · केंद्र-राज्य समन्वय · औद्योगिक संबंध · नियोक्ता दायित्व · श्रम कानून
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 43: जीवन-निर्वाह मजदूरी और शिष्ट कार्य-परिस्थितियाँ का राज्य-नीति निर्देशक सिद्धांत
- अनुच्छेद 41: बेरोजगारी, वृद्धावस्था में लोक सहायता का आधार
- अनुच्छेद 42: कार्य की शिष्ट दशाएँ और मातृत्व सहायता का प्रावधान
- सातवीं अनुसूची, समवर्ती सूची: श्रम संघ, सामाजिक सुरक्षा और श्रमिक कल्याण
अवधारणा प्रवाह
संविधान के राज्य-नीति निर्देशक सिद्धांतों के आधार पर श्रमिक कल्याण और सामाजिक सुरक्षा का लक्ष्य तय होता है। → पुराने केंद्रीय श्रम कानूनों को चार श्रम संहिताओं में समेकित किया जाता है। → केंद्र और राज्य सरकारें समवर्ती सूची के अंतर्गत अपने-अपने नियम अधिसूचित करती हैं। → नियोक्ताओं, विधिक और वित्तीय पेशेवरों के लिए जागरूकता और क्षमता-निर्माण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। → हैंडबुक और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न जैसी सामग्री से व्यावहारिक अनुपालन संभव होता है। → ईपीएफओ, ईएसआईसी और अन्य संस्थाएँ सामाजिक सुरक्षा लाभों का वितरण और निगरानी करती हैं। → अनुपालन में सुधार, अनौपचारिक श्रमिकों के कवरेज और श्रम-बाजार की पारदर्शिता से आर्थिक और सामाजिक परिणाम सुधरने की अपेक्षा की जाती है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ‘श्रम संवाद’ कार्यक्रम का आयोजन श्रम एवं रोजगार मंत्रालय और उत्तर प्रदेश सरकार के श्रम विभाग द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था।
2. इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य नई श्रम संहिताओं और उनके नियमों के बारे में नियोक्ताओं तथा पेशेवरों के बीच जागरूकता बढ़ाना था।
3. कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) और कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) ने इस कार्यक्रम में भाग नहीं लिया।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 और 2 सही हैं। ‘श्रम संवाद’ कार्यक्रम का आयोजन श्रम एवं रोजगार मंत्रालय तथा उत्तर प्रदेश सरकार के श्रम विभाग द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था, जिसका उद्देश्य नई श्रम संहिताओं और उनके नियमों के बारे में जागरूकता बढ़ाना था। कथन 3 गलत है क्योंकि ईपीएफओ और ईएसआईसी दोनों ने इस कार्यक्रम में भाग लिया था।
Q2. निम्नलिखित में से कौन सी योजनाएँ ‘श्रम संवाद’ कार्यक्रम के दौरान तकनीकी सत्रों में चर्चा का विषय थीं?
1. प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना (पीएमवीबीआरवाई)
2. प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन (पीएम-एसवाईएम) योजना
3. प्रधानमंत्री जन धन योजना
सही विकल्प का चयन करें:
- केवल 1
- केवल 2
- 1 और 2 दोनों
- 1, 2 और 3
उत्तर: 1 और 2 दोनों — कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना (पीएमवीबीआरवाई) और प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन (पीएम-एसवाईएम) योजना पर जानकारी दी गई थी। प्रधानमंत्री जन धन योजना इस कार्यक्रम का हिस्सा नहीं थी।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में श्रम सुधारों के महत्व पर चर्चा कीजिए और नई श्रम संहिताओं के प्रभावी क्रियान्वयन में क्षमता-निर्माण तथा जागरूकता कार्यक्रमों की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: परिचय: भारत में श्रम सुधारों की आवश्यकता और उनके उद्देश्यों पर संक्षिप्त चर्चा करें।
मुख्य भाग:
1. श्रम सुधारों का महत्व: आर्थिक संवृद्धि, निवेश प्रोत्साहन, रोजगार सृजन, श्रमिक कल्याण, सामाजिक सुरक्षा और औद्योगिक शांति बनाए रखने में श्रम सुधारों की भूमिका का विस्तृत वर्णन करें।
2. नई श्रम संहिताएँ: चार प्रमुख श्रम संहिताओं (मजदूरी संहिता, औद्योगिक संबंध संहिता, व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थिति संहिता, और सामाजिक सुरक्षा संहिता) का उल्लेख करें और उनके मुख्य प्रावधानों पर प्रकाश डालें।
3. क्षमता-निर्माण और जागरूकता कार्यक्रमों की भूमिका: ‘श्रम संवाद’ जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से नियोक्ताओं, श्रमिकों और अन्य हितधारकों के बीच नई संहिताओं के प्रावधानों, अनुपालन आवश्यकताओं और लाभों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के महत्व पर चर्चा करें। इसमें केंद्र-राज्य समन्वय, हितधारकों की भागीदारी और प्रभावी क्रियान्वयन के लिए व्यावहारिक मार्गदर्शन की भूमिका शामिल होगी।
4. चुनौतियों और आगे की राह: क्रियान्वयन में आने वाली संभावित चुनौतियों (जैसे जागरूकता की कमी, अनुपालन लागत, राज्यों द्वारा नियमों का निर्माण) और उन्हें दूर करने के उपायों पर प्रकाश डालें।
निष्कर्ष: श्रम सुधारों के माध्यम से एक संतुलित और न्यायसंगत श्रम बाजार बनाने तथा ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ और ‘ईज ऑफ लिविंग’ दोनों को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दें।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
Uttar Pradesh PCS (UPPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: उत्तर प्रदेश के कानपुर में आयोजित ‘श्रम संवाद’ कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य क्या था?
- A. श्रम संहिताओं पर क्षेत्रीय स्तर का क्षमता-निर्माण एवं जागरूकता कार्यक्रम
- B. औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण हेतु तकनीकी प्रशिक्षण
- C. कृषि उत्पादन में नवाचार को बढ़ावा देना
- D. पर्यटन विकास के लिए स्थानीय समुदायों को संगठित करना
उत्तर: A. श्रम संहिताओं पर क्षेत्रीय स्तर का क्षमता-निर्माण एवं जागरूकता कार्यक्रम — इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य श्रम संहिताओं पर क्षेत्रीय स्तर पर क्षमता निर्माण एवं जागरूकता फैलाना था, ताकि श्रमिकों एवं नियोजकों को उनके अधिकारों एवं कर्तव्यों की जानकारी मिल सके।
Mains: उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा कानपुर में आयोजित ‘श्रम संवाद’ कार्यक्रम के माध्यम से श्रमिकों एवं उद्यमियों के बीच जागरूकता बढ़ाने के लिए उठाए गए कदमों का वर्णन कीजिए। साथ ही, बताइए कि इस प्रकार के कार्यक्रम राज्य की औद्योगिक अर्थव्यवस्था एवं श्रमिकों के कल्याण में किस प्रकार योगदान कर सकते हैं।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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