भारत ने UN मानवाधिकार परिषद से आतंकवाद के खतरे पर ध्यान केंद्रित रखने का आग्रह किया

भारत ने UN मानवाधिकार परिषद से आतंकवाद के खतरे पर ध्यान केंद्रित रखने का आग्रह किया

भारत ने UN मानवाधिकार परिषद से आतंकवाद के खतरे पर ध्यान केंद्रित रखने का आग्रह किया

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आतंकवाद-मानवाधिकार चक्र

✎ आतंकवाद मानवाधिकारों, विशेषकर जीवन के अधिकार, के लिए गंभीर खतरा है; सहयोग, संवाद और सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा के माध्यम से मानवाधिकार संरक्षण ही संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद का उचित मार्ग माना गया है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — अंतरराष्ट्रीय संबंध (संयुक्त राष्ट्र की संस्थाएँ, भारत की कूटनीति और आतंकवाद पर वैश्विक सहमति)  |  GS Paper II — शासन (मानवाधिकार संस्थाओं की कार्यप्रणाली और सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा की भूमिका)  |  GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा (आतंकवाद का स्वरूप और उससे निपटने के अंतरराष्ट्रीय उपाय)
  • Prelims: संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) — जिनेवा में मुख्यालय; 47 सदस्य, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र महासभा तीन वर्ष के कार्यकाल के लिए चुनती है, सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा (Universal Periodic Review — UPR) — सभी सदस्य देशों की मानवाधिकार स्थिति की सहकर्मी समीक्षा; सहयोग और संवाद पर आधारित, देश-विशिष्ट आदेश (Country-specific mandates) बनाम सार्वभौमिक समीक्षा का अंतर, नागरिक और राजनीतिक अधिकार (ICCPR, 1966) बनाम आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार (ICESCR, 1966), विकास का अधिकार (Right to Development) और उसकी अंतरराष्ट्रीय पृष्ठभूमि, संयुक्त राष्ट्र वैश्विक आतंकवाद-रोधी रणनीति (UN Global Counter-Terrorism Strategy, 2006), आतंकवाद पर व्यापक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन (Comprehensive Convention on International Terrorism — CCIT), जिस पर सदस्य देशों के बीच परिभाषा को लेकर सहमति अब तक नहीं बनी है, संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) और मानवाधिकार परिषद की रिपोर्ट पर महासभा में चर्चा की प्रक्रिया
  • Essay: मानवाधिकारों का चयनात्मक प्रयोग और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की विश्वसनीयता, सुरक्षा और स्वतंत्रता: आतंकवाद-रोधी उपायों में मानवाधिकारों का संतुलन

त्वरित पुनरावृत्ति: आतंकवाद मानवाधिकारों, विशेषकर जीवन के अधिकार, के लिए गंभीर खतरा है; सहयोग, संवाद और सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा के माध्यम से मानवाधिकार संरक्षण ही संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद का उचित मार्ग माना गया है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में मानवाधिकार परिषद की रिपोर्ट पर हुई चर्चा के दौरान परिषद से आतंकवाद के खतरे पर “सतत ध्यान” बनाए रखने का आग्रह किया। भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि आतंकवाद मानवाधिकारों, विशेषकर जीवन के अधिकार, के सामने सबसे गंभीर खतरों में से एक है। उन्होंने याद दिलाया कि परिषद ने इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर पारित अपने प्रस्ताव में इस खतरे को पहचाना है। यह प्रस्ताव जुलाई में जिनेवा में अपनाया गया था और इसमें आतंकवाद की रोकथाम के लिए सहयोग बढ़ाने का आह्वान किया गया है। भारत ने परिषद पर मानवाधिकार के मुद्दे को “हथियार” बनाने और दोहरे मानदंड अपनाने के आरोप भी लगाए, तथा सहयोग, संवाद और सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा को उचित मंच बताया।

पृष्ठभूमि

  • आतंकवाद को मानवाधिकार से जोड़ने का प्रश्न संयुक्त राष्ट्र में लंबे समय से विचाराधीन है। संयुक्त राष्ट्र वैश्विक आतंकवाद-रोधी रणनीति (2006) आतंकवाद को सदस्य देशों के सामूहिक दायित्व के रूप में स्वीकार करती है और यह भी कहती है कि आतंकवाद-रोधी उपाय मानवाधिकार कानूनों के अनुरूप होने चाहिए।
  • मानवाधिकार परिषद 2006 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग (Commission on Human Rights) के स्थान पर स्थापित हुई। इसे संयुक्त राष्ट्र महासभा के अधीन रखा गया, ताकि इसकी संरचना और कार्यप्रणाली अधिक प्रभावी हो सके।
  • सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा की व्यवस्था उसी 2006 के संकल्प से आई। इसके अंतर्गत सभी सदस्य देशों की मानवाधिकार स्थिति का नियमित मूल्यांकन होता है, ताकि कोई भी देश उससे बाहर न रहे।
  • देश-विशिष्ट जाँच और सार्वभौमिक समीक्षा के बीच मतभेद विकसित देशों और विकासशील देशों की चिंताओं से जुड़ा है। विकासशील देश अक्सर यह तर्क देते हैं कि चयनित देशों पर केंद्रित जाँच राजनीतिक दबाव का साधन बन सकती है।
  • भारत की नीति आतंकवाद के किसी भी रूप को अस्वीकार्य मानने और आतंकवाद के बीच “अच्छे” और “बुरे” भेद को खारिज करने पर आधारित रही है। इसी दृष्टिकोण को भारत बहुपक्षीय मंचों पर बार-बार रखता रहा है।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद क्या है?

  • संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद संयुक्त राष्ट्र की एक अंतर-सरकारी संस्था है, जिसका मुख्यालय जिनेवा (स्विट्ज़रलैंड) में है।
  • इसके 47 सदस्य संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा गुप्त मतदान से तीन वर्ष के कार्यकाल के लिए चुने जाते हैं, और भौगोलिक वितरण का ध्यान रखा जाता है।
  • परिषद मानवाधिकारों के संवर्धन और संरक्षण के लिए प्रस्ताव पारित करती है, विशेष प्रतिवेदकों की नियुक्ति करती है और मानवाधिकार स्थिति पर चर्चा करती है। इसकी रिपोर्ट महासभा में प्रस्तुत की जाती है।
  • सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा में प्रत्येक सदस्य देश की स्थिति की समीक्षा लगभग साढ़े चार वर्ष के चक्र में होती है। इसमें देश की अपनी रिपोर्ट, संयुक्त राष्ट्र निकायों और विशेषज्ञों की रिपोर्ट, तथा नागरिक समाज के इनपुट शामिल होते हैं।
  • नागरिक और राजनीतिक अधिकार नागरिक एवं राजनीतिक अधिकार अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदा (ICCPR) में वर्णित हैं, जबकि आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार ICESCR में आते हैं। दोनों को सार्वभौमिक घोषणा (1948) से आधार मिलता है।
  • भारत के संदर्भ में यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण है कि मानवाधिकार संरक्षण में सहयोग और संवाद को प्राथमिकता दी जाए, जबकि आतंकवाद को जीवन के अधिकार के लिए गंभीर खतरे के रूप में देखा जाए।
  • आलोचना का एक पक्ष यह है कि संस्था को राजनीतिक दबाव से मुक्त और सभी देशों के प्रति समान व्यवहार करने वाली होना चाहिए, ताकि उसकी विश्वसनीयता बनी रहे।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
प्रस्तुति का मंच भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में मानवाधिकार परिषद (United Nations Human Rights Council) की रिपोर्ट पर हुई चर्चा में अपना पक्ष रखा। परिषद जिनेवा में स्थित है।
परिषद का संकल्प जुलाई में जिनेवा में अपनाए गए अंतरराष्ट्रीय सहयोग संबंधी संकल्प में आतंकवाद को मानवाधिकारों के लिए गंभीर खतरों में गिना गया और आतंकवाद की रोकथाम के लिए सहयोग बढ़ाने का आह्वान किया गया।
मुख्य तर्क आतंकवाद से सबसे पहले जीवन के अधिकार (Right to Life) पर आघात होता है, इसलिए इसे मानवाधिकार की मूल चिंता के रूप में देखा जाना चाहिए।
शून्य सहिष्णुता का सिद्धांत भारत ने परिषद से आतंकवाद पर ‘शून्य सहिष्णुता’ (Zero Tolerance) के आधार पर निरंतर ध्यान देने का आग्रह किया। आतंकवादी कृत्यों के बीच भेद करने के प्रयासों को इस सिद्धांत के विरुद्ध बताया गया।
मानवाधिकार-शासन की पद्धति देश-विशिष्ट जनादेश की जगह सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा (Universal Periodic Review) को उचित मंच बताया गया, क्योंकि उसमें संबंधित देश की भागीदारी और सभी देशों के साथ समान व्यवहार होता है।
अधिकारों का संतुलन नागरिक और राजनीतिक अधिकारों के साथ आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों तथा विकास के अधिकार को समान महत्व देने की बात कही गई।

महत्व

कूटनीतिक एवं रणनीतिक

  • आतंकवाद को मानवाधिकार के केंद्रीय विषय के रूप में स्थापित करने से भारत की वैश्विक आतंकवाद-विरोधी स्थिति को बहुपक्षीय मंच पर समर्थन मिलता है।
  • परिषद के संकल्प का हवाला देकर भारत ने अपनी माँग को अंतरराष्ट्रीय सहमति के दस्तावेज़ से जोड़ा, जिससे उसका तर्क अधिक विश्वसनीय बनता है।

मानवाधिकार-शासन

  • सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा पर बल देने का अर्थ है कि मानवाधिकार मूल्यांकन सहयोग और संवाद पर आधारित हो, न कि एकतरफ़ा आलोचना पर।
  • सभी अधिकारों को ‘समान महत्व’ देने का तर्क मानवाधिकार की अविभाज्यता (Indivisibility of Human Rights) के सिद्धांत से जुड़ता है, जिसे 1993 के वियना घोषणापत्र में दोहराया गया था।

विकासशील देशों के संदर्भ में

  • गरीबी और अविकास को मानवाधिकार उल्लंघन के कारणों के रूप में देखने से विकास के अधिकार (Right to Development) की वैधता पुष्ट होती है।
  • आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर ज़ोर देने से विकासशील देशों की प्राथमिकताएँ वैश्विक विमर्श में स्थान पाती हैं।

चुनौतियाँ

1. आतंकवाद की सर्वमान्य परिभाषा का अभाव

  • आतंकवाद की कोई सर्वमान्य अंतरराष्ट्रीय परिभाषा अब तक नहीं बन सकी है। प्रस्तावित व्यापक अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद सम्मेलन (Comprehensive Convention on International Terrorism) पर सहमति न बन पाने का मुख्य कारण यही परिभाषा-विवाद है।
  • परिभाषा के अभाव में ‘वैध’ और ‘अवैध’ हिंसा के बीच भेद पर मतभेद बना रहता है, जिससे सहयोग कठिन होता है।

2. दोहरे मापदंड और चयनात्मकता का आरोप

  • यदि मानवाधिकार मंच पर कुछ देशों को चुनकर निशाना बनाया जाए, तो उसकी विश्वसनीयता घटती है। यही आरोप भारत ने परिषद पर लगाया है।
  • चयनात्मकता से परिषद के भीतर विभाजन बढ़ता है और सर्वसम्मति से काम करने की उसकी क्षमता कमज़ोर होती है।

3. देश-विशिष्ट जनादेश बनाम सहयोग

  • देश-विशिष्ट जनादेश (Country-specific Mandates) को संबंधित देश की सहमति के बिना लागू करने पर उसकी प्रभावशीलता पर प्रश्न उठते हैं।
  • सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा में हर देश की रिपोर्ट, संयुक्त राष्ट्र निकायों की रिपोर्ट और नागरिक समाज के सुझाव शामिल होते हैं, इसलिए वह अधिक संतुलित मानी जाती है। फिर भी उसकी सिफ़ारिशों के कार्यान्वयन की बाध्यता सीमित है।

4. नागरिक-राजनीतिक और आर्थिक-सामाजिक अधिकारों का असंतुलन

  • मानवाधिकार विमर्श में अक्सर नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अधिक ध्यान दिया जाता है, जबकि भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा और आवास जैसे अधिकार पीछे रह जाते हैं।
  • विकासशील देशों के लिए गरीबी और अविकास ही मानवाधिकार चुनौतियों की जड़ हैं, इसलिए इनकी उपेक्षा से समग्र मानवाधिकार संरक्षण अधूरा रहता है।

5. आतंकवाद और मानवाधिकार संरक्षण के बीच संतुलन

  • आतंकवाद-विरोधी उपायों के दौरान नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध लगने का खतरा रहता है, इसलिए राज्य की सुरक्षा और व्यक्ति के अधिकारों के बीच संतुलन आवश्यक है।
  • भारत में अवैधानिक गतिविधि (निवारण) अधिनियम, 1967 (Unlawful Activities (Prevention) Act, 1967) जैसे कानूनों के प्रयोग में न्यायिक समीक्षा की भूमिका इसी संतुलन का उदाहरण है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
परिभाषा-विवाद आतंकवाद की सर्वमान्य परिभाषा के अभाव में व्यापक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन पर सहमति कठिन बनी हुई है।
राजनीतिकरण का आरोप मानवाधिकार परिषद के मंच का चयनात्मक या राजनीतिक उपयोग उसकी विश्वसनीयता को कमज़ोर करता है।
देश-विशिष्ट जनादेश संबंधित देश की भागीदारी के बिना लागू जनादेश से सुधार के बजाय परिषद के भीतर विभाजन बढ़ने का खतरा रहता है।
अधिकारों की असमान प्राथमिकता नागरिक-राजनीतिक अधिकारों पर अधिक ज़ोर से आर्थिक-सामाजिक अधिकार और विकास का अधिकार उपेक्षित रह जाते हैं।
सुरक्षा और स्वतंत्रता का संतुलन आतंकवाद-विरोधी उपायों से नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रभाव पड़ने की आशंका बनी रहती है।

आगे की राह

  • आतंकवाद की सर्वमान्य परिभाषा पर सहमति के लिए बहुपक्षीय वार्ताओं को पुनर्जीवित करना और व्यापक अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद सम्मेलन को अंतिम रूप देना।
  • मानवाधिकार परिषद में देश-विशिष्ट जनादेश के स्थान पर संवाद, क्षमता-निर्माण और संबंधित देश की भागीदारी पर आधारित तंत्र को प्राथमिकता देना।
  • सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा की सिफ़ारिशों के कार्यान्वयन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर समन्वित तंत्र और नियमित अनुवर्ती प्रक्रिया विकसित करना।
  • नागरिक-राजनीतिक और आर्थिक-सामाजिक अधिकारों को एक-दूसरे के पूरक मानकर सतत विकास लक्ष्यों के साथ मानवाधिकार नीति को जोड़ना।
  • आतंकवाद-विरोधी कानूनों में न्यायिक समीक्षा और पारदर्शी प्रक्रिया सुनिश्चित करना, ताकि सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता में संतुलन बना रहे।
  • विकासशील देशों की क्षमता-वृद्धि के लिए तकनीकी सहायता और वित्तीय सहयोग को बढ़ावा देना, क्योंकि गरीबी मानवाधिकार चुनौतियों का एक प्रमुख कारण है।
  • संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न निकायों के बीच समन्वय सुधारकर मानवाधिकार विमर्श में सर्वसम्मति और विश्वसनीयता को मज़बूत करना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

मानवाधिकार परिषद (United Nations Human Rights Council) · आतंकवाद और मानवाधिकार (Terrorism and Human Rights) · जीवन का अधिकार और अनुच्छेद 21 (Right to Life, Article 21) · सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा (Universal Periodic Review) · देश-विशिष्ट आदेश (Country-specific Mandates) · मानवाधिकारों का राजनीतिकरण (Politicisation of Human Rights) · मानवाधिकारों की अविभाज्यता और परस्पर निर्भरता (Indivisibility and Interdependence of Human Rights) · विकास का अधिकार (Right to Development) · वैश्विक आतंकवाद-रोधी रणनीति (Global Counter-Terrorism Strategy) · आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार (Economic, Social and Cultural Rights) · संयुक्त राष्ट्र महासभा (United Nations General Assembly) · सहकारी संघवाद और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की भूमिका

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 21: जीवन के अधिकार का संरक्षण
  • अनुच्छेद 51: अंतरराष्ट्रीय शांति और सहयोग को बढ़ावा
  • अनुच्छेद 253: अंतरराष्ट्रीय संधियों के कार्यान्वयन हेतु विधान

अवधारणा प्रवाह

आतंकवाद को मानवाधिकारों, विशेषकर जीवन के अधिकार, के लिए गंभीर खतरा माना गया।  →  मानवाधिकार परिषद ने जुलाई में जिनेवा में अंतरराष्ट्रीय सहयोग संबंधी संकल्प अपनाया और आतंकवाद की रोकथाम का आह्वान किया।  →  भारत ने महासभा की चर्चा में परिषद से इस खतरे पर शून्य सहिष्णुता के आधार पर निरंतर ध्यान देने का आग्रह किया।  →  साथ ही भारत ने देश-विशिष्ट जनादेश और दोहरे मापदंड की आलोचना करते हुए सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा को उचित मंच बताया।  →  इस तर्क में सभी अधिकारों, विशेषकर आर्थिक-सामाजिक अधिकारों और विकास के अधिकार, को समान महत्व देने पर बल दिया गया।  →  इसका परिणाम है कि मानवाधिकार परिषद में सर्वसम्मति, विश्वसनीयता और सहयोग-आधारित कार्यप्रणाली पर विमर्श तेज़ हुआ है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मानवाधिकार परिषद संयुक्त राष्ट्र महासभा की एक सहायक संस्था है।
2. इसके सदस्यों का चुनाव संयुक्त राष्ट्र महासभा में गुप्त मतदान द्वारा होता है।
3. सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा (Universal Periodic Review) की प्रक्रिया संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा संचालित की जाती है।

उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: मानवाधिकार परिषद की स्थापना वर्ष 2006 में महासभा के संकल्प 60/251 द्वारा हुई और यह महासभा की सहायक संस्था है। कथन 2 सही है: परिषद के 47 सदस्य महासभा में गुप्त मतदान और पूर्ण बहुमत से चुने जाते हैं। कथन 3 गलत है, क्योंकि सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा मानवाधिकार परिषद के अंतर्गत होती है, सुरक्षा परिषद के अंतर्गत नहीं।

Q2. निम्नलिखित में से प्रत्येक कथन के आधार पर उत्तर चुनिए।

अभिकथन (A): सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा को देश-विशिष्ट आदेशों की तुलना में सहयोग के अधिक उपयुक्त मंच के रूप में देखा जाता है।
तर्क (R): सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा में सभी सदस्य देशों की समान रूप से समीक्षा होती है और इसमें संबंधित देश की रिपोर्ट, संयुक्त राष्ट्र निकायों की रिपोर्ट तथा नागरिक समाज के इनपुट शामिल होते हैं।

  1. (a) A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है।
  2. (b) A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. (c) A सही है, लेकिन R गलत है।
  4. (d) A गलत है, लेकिन R सही है।

उत्तर: (a) A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है। — सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा सभी संयुक्त राष्ट्र सदस्य देशों पर समान रूप से लागू होती है और इसका आधार सहयोग तथा संबंधित देश की भागीदारी है। यही कारण है कि इसे एकपक्षीय आलोचना से अलग एक उपयुक्त मंच माना जाता है। अतः R, A की सही व्याख्या करता है।

Q3. निम्नलिखित दस्तावेज़ों/घोषणाओं को उनके वर्ष से सुमेलित कीजिए:

सूची I (दस्तावेज़/घोषणा)
A. सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा (Universal Declaration of Human Rights)
B. विकास के अधिकार पर घोषणा (Declaration on the Right to Development)
C. वियना घोषणा और कार्य योजना (Vienna Declaration and Programme of Action)
D. वैश्विक आतंकवाद-रोधी रणनीति (Global Counter-Terrorism Strategy)

सूची II (वर्ष)
1. 1948
2. 1986
3. 1993
4. 2006

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही सुमेलन चुनिए:

  1. A-1, B-2, C-3, D-4
  2. A-2, B-1, C-3, D-4
  3. A-1, B-3, C-2, D-4
  4. A-1, B-2, C-4, D-3

उत्तर: A-1, B-2, C-3, D-4 — सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा वर्ष 1948 में अपनाई गई। विकास के अधिकार पर घोषणा वर्ष 1986 में महासभा द्वारा अपनाई गई। वियना घोषणा वर्ष 1993 में अपनाई गई, जिसमें मानवाधिकारों की सार्वभौमिकता, अविभाज्यता और परस्पर निर्भरता पर बल दिया गया। वैश्विक आतंकवाद-रोधी रणनीति वर्ष 2006 में महासभा द्वारा अपनाई गई।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत ने मानवाधिकार परिषद से आतंकवाद के खतरे पर निरंतर और समुचित ध्यान देने का आग्रह किया है और साथ ही यह तर्क दिया है कि मानवाधिकारों को राजनीतिक चयनात्मकता से मुक्त रखा जाना चाहिए। मानवाधिकारों की सार्वभौमिकता और अविभाज्यता के सिद्धांत के संदर्भ में इस तर्क का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि देश-विशिष्ट आदेश और सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा में से कौन-सी प्रणाली वैश्विक मानवाधिकार संरक्षण के लिए अधिक प्रभावी है और क्यों। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर की रूपरेखा:
(1) भूमिका: मानवाधिकार परिषद की स्थापना (महासभा संकल्प 60/251, 2006), उसकी 47 सदस्यीय संरचना, जिनेवा मुख्यालय; हाल के संदर्भ में भारत का आतंकवाद पर ध्यान बनाए रखने का आग्रह।
(2) आतंकवाद को मानवाधिकार का खतरा मानने का आधार: आतंकवाद को जीवन के अधिकार (ICCPR का अनुच्छेद 6) के लिए गंभीर खतरा मानना; वैश्विक आतंकवाद-रोधी रणनीति (2006) के चार स्तंभ; संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का संकल्प 1373 (2001); व्यापक अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद सम्मेलन (CCIT) पर सहमति का लंबित होना।
(3) सिद्धांत का परीक्षण: वियना घोषणा (1993), पैरा 5 में मानवाधिकारों की सार्वभौमिकता, अविभाज्यता और परस्पर निर्भरता; ‘चयनात्मकता’ और ‘दोहरे मानदंड’ की आलोचना का तर्कसंगत आधार; सदस्य देशों के बीच राजनीतिक ध्रुवीकरण से परिषद की विश्वसनीयता पर प्रभाव।
(4) अधिकारों का संतुलन: नागरिक-राजनीतिक अधिकार (ICCPR, 1966) बनाम आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार (ICESCR, 1966) तथा विकास का अधिकार (1986 की घोषणा); विकासशील देशों में गरीबी को मानवाधिकार-चुनौती के रूप में देखना।
(5) तुलनात्मक विश्लेषण: देश-विशिष्ट आदेश (विशेष प्रतिवेदक और स्वतंत्र विशेषज्ञ) के लाभ (त्वरित ध्यान, गंभीर उल्लंघन पर केंद्रित) बनाम हानि (संबंधित देश की सहमति के बिना विभाजन); सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा के लाभ (सभी देशों पर समान प्रक्रिया, चार-साढ़े चार वर्ष का चक्र, राज्य, संयुक्त राष्ट्र निकायों और नागरिक समाज की रिपोर्टें) और इसकी सीमाएँ (कार्यान्वयन पर निर्भरता, प्रतिबद्धता में अंतर)।
(6) भारतीय संवैधानिक संदर्भ: अनुच्छेद 21 का विस्तार (मेनका गांधी बनाम भारत संघ, 1978; ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे नगर निगम, 1985 में आजीविका का अधिकार); भाग III और भाग IV के बीच संतुलन; मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के अंतर्गत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग।
(7) निष्कर्ष: आतंकवाद और विकास दोनों मानवाधिकार-विमर्श के अभिन्न अंग; सहयोग, संवाद और क्षमता-निर्माण के माध्यम से सार्वभौमिक और संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता पर तर्कसंगत निष्कर्ष।

स्रोत: orissapost.com


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