01 Nov रुपये की गिरावट: घबराहट नहीं, नीति चाहिए
✎ रुपये की गिरावट के समय नीति का मूल प्रश्न है कि विदेशी मुद्रा बहिर्प्रवाह पर रोक (LRS) और पूंजी प्रवाह आकर्षित करने के उपायों के बीच संतुलन कैसे बने, और इस संतुलन की विश्वसनीयता के लिए असंभव त्रयी की सीमाओं को समझकर स्पष्ट…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III — अर्थव्यवस्था (विदेशी मुद्रा बाज़ार, विनिमय दर, भुगतान संतुलन, मौद्रिक नीति) | सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III — अर्थव्यवस्था (विदेशी पूंजी प्रवाह और पूंजी खाता नियंत्रण)
- Prelims: उदारीकृत प्रेषण योजना (Liberalised Remittance Scheme), LRS, विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999 (FEMA), चालू खाता परिवर्तनीयता (Current Account Convertibility), पूंजी खाता परिवर्तनीयता (Capital Account Convertibility), प्रबंधित तैरती विनिमय दर व्यवस्था (Managed Floating Exchange Rate System), असंभव त्रयी (Impossible Trinity), विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) और विदेशी संस्थागत निवेश (FPI) का अंतर, विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves), रेपो दर (Repo Rate)
- Essay: मुद्रा की स्थिरता बनाम बाज़ार की स्वतंत्रता: क्या विदेशी मुद्रा प्रवाह पर नियंत्रण उचित उपाय है?, खुली अर्थव्यवस्था में नीतिगत विश्वसनीयता: अस्पष्ट संकेत बाज़ार की अनिश्चितता कैसे बढ़ाते हैं?
त्वरित पुनरावृत्ति: रुपये की गिरावट के समय नीति का मूल प्रश्न है कि विदेशी मुद्रा बहिर्प्रवाह पर रोक (LRS) और पूंजी प्रवाह आकर्षित करने के उपायों के बीच संतुलन कैसे बने, और इस संतुलन की विश्वसनीयता के लिए असंभव त्रयी की सीमाओं को समझकर स्पष्ट नीति-संवाद कैसे सुनिश्चित हो।
यह खबर चर्चा में क्यों?
नवंबर 2026 में भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 7 प्रतिशत गिरकर 94.95 के स्तर पर पहुंच गया, जबकि एक वर्ष पहले यह 88.84 था। इस दौरान भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने विदेशी मुद्रा बाज़ार में हस्तक्षेप किया और रेपो दर बढ़ाई, फिर भी गिरावट का रुख बना रहा। इसी बीच RBI के एक चर्चा-पत्र (discussion paper) में उदारीकृत प्रेषण योजना (LRS) के अंतर्गत विदेश भेजी जाने वाली राशि पर सख्त प्रतिबंधों के प्रस्ताव सामने आए, जिनमें चालू खाते के लेन-देन की सीमा को 2,50,000 डॉलर से घटाकर 50,000 डॉलर प्रति वर्ष करने का सुझाव शामिल है। इन प्रस्तावों और सरकारी स्तर पर दिए गए संदेशों में असंगति दिखने से बाज़ार में अनिश्चितता बढ़ी है। लेख के अनुसार बाज़ार को इस समय स्पष्ट, विश्वसनीय संवाद और निकट अवधि की सुसंगत रणनीति की अपेक्षा है।
पृष्ठभूमि
- विनिमय दर में गिरावट: लगभग 12 महीनों में रुपया लगभग 7 प्रतिशत गिरकर 88.84 से 94.95 प्रति अमेरिकी डॉलर हो गया, जिससे डॉलर में भुगतान वाले आयात (जैसे कच्चा तेल और सोना) रुपये में महंगे हो गए।
- वैश्विक दबाव: कच्चे तेल की कीमतें 115 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंचीं; रूस-यूक्रेन और इज़राइल/अमेरिका-ईरान संघर्षों से वैश्विक वित्तीय बाज़ारों में अनिश्चितता बनी हुई है।
- अमेरिकी ब्याज दरों का प्रभाव: अमेरिकी सरकार की बढ़ती उधारी से 10 वर्षीय अमेरिकी बॉन्ड की यील्ड लगभग 5 प्रतिशत तक पहुंची, जिससे डॉलर-आधारित परिसंपत्तियां अन्य मुद्राओं की तुलना में आकर्षक बनीं।
- बचाव के उपाय: RBI ने डॉलर बेचकर रुपया सहारा देने का प्रयास किया और रेपो दर बढ़ाई, ताकि रुपये-आधारित बॉन्ड विदेशी निवेशकों के लिए आकर्षक हों।
- LRS का पैमाना: 2025-26 में LRS के अंतर्गत लगभग 29 अरब डॉलर का प्रेषण हुआ, इसलिए विदेश भेजी जाने वाली राशि को विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव का प्रमुख स्रोत माना गया।
विनिमय दर और पूंजी प्रवाह प्रबंधन क्या है?
- विनिमय दर किसी मुद्रा का दूसरी मुद्रा में मूल्य है। भारत में प्रबंधित तैरती विनिमय दर व्यवस्था लागू है, जिसमें दर मुख्यतः मांग और आपूर्ति से तय होती है, किंतु अत्यधिक अस्थिरता की स्थिति में RBI विदेशी मुद्रा बाज़ार में हस्तक्षेप करता है।
- रुपये में गिरावट से डॉलर-आधारित आयात महंगे होते हैं, जिससे आयातित मुद्रास्फीति (Imported Inflation) का दबाव बढ़ता है और चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) बढ़ सकता है।
- RBI के प्रमुख उपकरण हैं: विदेशी मुद्रा बाज़ार में हस्तक्षेप (डॉलर बेचना या खरीदना), रेपो दर में परिवर्तन, और पूंजी प्रवाह का विनियमन। RBI अधिनियम, 1934 के अंतर्गत RBI मौद्रिक नीति और मुद्रा प्रबंधन का कार्य करता है।
- FEMA, 1999 भारत में विदेशी मुद्रा लेन-देन का वैधानिक ढांचा है। LRS इसी ढांचे के अंतर्गत व्यक्तियों को एक निश्चित सीमा तक विदेश में धन भेजने की अनुमति देती है।
- चालू खाता परिवर्तनीयता का अर्थ है कि वस्तुओं, सेवाओं और सामान्य चालू लेन-देन के लिए विदेशी मुद्रा सामान्यतः उपलब्ध रहती है, जबकि पूंजी खाते में प्रवाह पर चयनित नियंत्रण लागू होते हैं।
- असंभव त्रयी के अनुसार कोई देश एक साथ स्वतंत्र मौद्रिक नीति, स्थिर विनिमय दर और पूंजी की पूर्ण गतिशीलता प्राप्त नहीं कर सकता। भारत इसी संतुलन के बीच नीति बनाता है।
- FDI दीर्घकालिक और अपेक्षाकृत स्थिर होता है, जबकि FPI अल्पकालिक और अधिक अस्थिर माना जाता है; इसलिए बाहरी पूंजी की संरचना विनिमय दर की स्थिरता को प्रभावित करती है।
- नीति-संवाद का महत्व: बाज़ार विश्वसनीय, सुसंगत और पूर्वानुमेय नीति चाहता है। परस्पर विरोधी संकेत जोखिम-प्रीमियम बढ़ाकर पूंजी प्रवाह को और कमजोर कर सकते हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| रुपये में गिरावट: पिछले 12 महीनों में डॉलर के मुकाबले रुपया लगभग 7 प्रतिशत गिरकर 88.84 से 94.95 पर पहुँच गया | आयात महँगा होता है और आयातित मुद्रास्फीति (Imported Inflation) का दबाव बढ़ता है |
| आयात लागत पर प्रभाव: 100 डॉलर प्रति बैरल कच्चे तेल की लागत 8,884 रुपये से बढ़कर 9,495 रुपये हो गई | ऊर्जा आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्था में चालू खाता घाटा और व्यापार घाटा बढ़ने का खतरा रहता है |
| विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) का उपयोग: RBI ने डॉलर बेचकर रुपया खरीदा | बाजार में अल्पकालिक स्थिरता लाने का सीधा साधन, परंतु भंडार सीमित संसाधन है |
| प्रमुख नीतिगत दर में वृद्धि | रुपया-आधारित परिसंपत्तियों को विदेशी निवेशकों के लिए आकर्षक बनाकर पूंजी प्रवाह को प्रोत्साहित करने का प्रयास |
| प्रेषण नियंत्रण का प्रस्ताव: 2025-26 में LRS के अंतर्गत लगभग 29 अरब डॉलर का प्रेषण हुआ | डॉलर की माँग के एक बड़े स्रोत पर नियंत्रण करने का विकल्प, जिसका प्रत्यक्ष असर रुपये पर पड़ सकता है |
| वैश्विक कारक: कच्चे तेल का 115 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाना, दो युद्ध और अमेरिकी सरकारी बॉन्ड यील्ड में वृद्धि | उभरती अर्थव्यवस्थाओं से पूंजी का बाहर जाना और डॉलर का आकर्षक बनना, जिससे भारत की नीतिगत गुंजाइश सीमित होती है |
महत्व
आर्थिक
- रुपये की गिरावट से कच्चे तेल, सोने और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे आयात की लागत बढ़ती है, जिससे आयातित मुद्रास्फीति का खतरा बढ़ता है
- विदेश यात्रा और विदेशी शिक्षा महँगी होने से सेवा-व्यापार और परिवारों के बजट पर दबाव पड़ता है
- चालू खाता घाटे का प्रबंधन भुगतान संतुलन (Balance of Payments) की स्थिरता से सीधे जुड़ा है
मौद्रिक और वित्तीय
- विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप और नीतिगत दर का निर्णय, दोनों का उद्देश्य मुद्रा विनिमय दर की अस्थिरता को सीमित करना है
- विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) और विदेशी संस्थागत निवेश (FPI) दोनों पर वैश्विक पूंजी की अस्थिरता का असर पड़ता है
- पूंजी खाते के नियंत्रण और बाजार-आधारित समाधान के बीच संतुलन नीति-निर्माण की मुख्य चुनौती बनता है
संस्थागत और नियामकीय
- विदेशी मुद्रा से जुड़े लेन-देन का नियमन विदेशी मुद्रा विनिमय अधिनियम, 1999 (Foreign Exchange Management Act, 1999) के ढाँचे में होता है
- RBI के नीति-प्रस्ताव और केंद्र सरकार के वक्तव्यों के बीच समन्वय न होने से बाजार में अनिश्चितता बढ़ती है
- बाजार नियामक और नीति-निर्माता के बीच स्पष्ट भूमिका-विभाजन पारदर्शिता के लिए आवश्यक है
वैश्विक और सामरिक
- कच्चे तेल की ऊँची कीमतें और भू-राजनीतिक तनाव भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आयात निर्भरता को उजागर करते हैं
- प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की राजकोषीय उधारी और ब्याज दर नीति से वैश्विक पूंजी की दिशा बदलती है
- विनिर्माण, दुर्लभ मृदा खनिज और बैटरी जैसे क्षेत्रों में आपूर्ति-श्रृंखला पर निर्भरता व्यापार संतुलन को प्रभावित करती है
चुनौतियाँ
1. विरोधाभासी नीतिगत संकेत
- प्रस्तावित प्रेषण-नियंत्रण और यह कहना कि हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं, परस्पर विरोधी संदेश देते हैं
- इससे बाजार में घबराहट बढ़ती है और अटकलों को बल मिलता है
- स्पष्ट और विश्वसनीय संचार की कमी नीति की प्रभावशीलता को कम करती है
यूपीएससी लिंक: GS-3: अर्थव्यवस्था – मौद्रिक नीति और वित्तीय बाजार
2. प्रेषण सीमा बनाम उदारीकरण की नीति
- LRS की सीमा 2,50,000 डॉलर से घटाकर 50,000 डॉलर करने का प्रस्ताव पूंजी खाते के उदारीकरण की दिशा के विपरीत है
- आवासीय व्यक्तियों पर प्रतिबंध से निवेश, शिक्षा और परिवार-सहायता जैसे वैध उद्देश्य भी प्रभावित होते हैं
- अत्यधिक कठोर उपाय बाजार में अविश्वास और काले धन के प्रवाह जैसे जोखिम पैदा कर सकते हैं
यूपीएससी लिंक: GS-3: अर्थव्यवस्था – विदेशी निवेश और पूंजी खाता परिवर्तनीयता
3. ऊर्जा और आयात पर निर्भरता
- कच्चे तेल की कीमत 115 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर होने से चालू खाता घाटे पर सीधा दबाव है
- ईंधन की खपत में कटौती का आह्वान अल्पकालिक उपाय है, संरचनात्मक समाधान नहीं
- आयात-आधारित अर्थव्यवस्था में मुद्रा और मुद्रास्फीति का संबंध जटिल होता है
यूपीएससी लिंक: GS-3: ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर उसका प्रभाव
4. वैश्विक पूंजी की अस्थिरता
- वैश्विक वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता के कारण विदेशी निवेशक तुरंत निवेश के लिए आगे नहीं आ रहे
- मजबूत मूलभूत आर्थिक संकेतक भी FDI और FPI प्रवाह की गारंटी नहीं होते
- अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बढ़ने से डॉलर की ओर पूंजी का झुकाव बढ़ता है
यूपीएससी लिंक: GS-3: अर्थव्यवस्था – वैश्विक घटनाक्रम और भारत पर प्रभाव
5. विदेशी मुद्रा भंडार के उपयोग की सीमा
- भंडार से डॉलर बेचना केवल अल्पकालिक सहारा देता है और यह संसाधन सीमित है
- बाजार की अपेक्षा बदले बिना हस्तक्षेप का प्रभाव टिकाऊ नहीं होता
- नीतिगत दर बढ़ाने के बावजूद बाजार का रुपये में गिरावट पर दाँव बना रहा
यूपीएससी लिंक: GS-3: अर्थव्यवस्था – भुगतान संतुलन और विदेशी मुद्रा प्रबंधन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| नीतिगत संचार | केंद्र और RBI के संकेतों में अंतर से बाजार का भरोसा घटता है |
| प्रेषण नियंत्रण | कठोर सीमा वैध लेन-देन को प्रभावित कर सकती है और उदारीकरण की नीति से टकराती है |
| आयात लागत | कच्चे तेल और सोने की ऊँची कीमतें मुद्रास्फीति और व्यापार घाटे को बढ़ाती हैं |
| पूंजी प्रवाह | वैश्विक अनिश्चितता के कारण FDI और FPI प्रवाह अनिश्चित रहता है |
| भंडार का दबाव | डॉलर बिक्री से भंडार घटता है, जिससे भविष्य के झटकों से निपटने की क्षमता कम होती है |
| बाहरी झटके | युद्ध, व्यापार तनाव और अमेरिकी ब्याज दरें भारत के नियंत्रण से बाहर हैं |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- उदारीकृत प्रेषण योजना (Liberalised Remittance Scheme) – LRS
आगे की राह
- केंद्र सरकार और RBI के बीच नीतिगत समन्वय स्थापित कर एक स्पष्ट और सुसंगत अल्पकालिक रणनीति घोषित की जाए
- प्रस्तावित प्रतिबंधों को अस्थायी, लक्षित और पारदर्शी प्रक्रिया से गुजारा जाए, ताकि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे वैध उद्देश्य प्रभावित न हों
- विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) को आकर्षित करने के लिए विनिर्माण और आपूर्ति-श्रृंखला से जुड़े क्षेत्रों में नियामकीय बाधाएँ कम की जाएँ
- कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाने हेतु ऊर्जा दक्षता, वैकल्पिक स्रोत और नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार किया जाए
- आयात के स्रोतों और व्यापार साझेदारों में विविधता लाकर बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशीलता कम की जाए
- विदेशी मुद्रा भंडार के उपयोग के साथ बाजार की अपेक्षाओं को प्रबंधित करने के लिए नियमित और तथ्य-आधारित संचार अपनाया जाए
- पूंजी खाता नीति की समय-समय पर समीक्षा कर उसे वैश्विक परिस्थितियों और घरेलू आवश्यकताओं के अनुरूप रखा जाए
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
मूल्यह्रास (Depreciation) और विनिमय दर प्रबंधन · प्रबंधित तैरती विनिमय दर (Managed Floating Exchange Rate) · विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) · पूंजी खाता परिवर्तनीयता (Capital Account Convertibility) · उदारीकृत प्रेषण योजना (Liberalised Remittance Scheme) · विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999 (Foreign Exchange Management Act, 1999) · असंभव त्रिकोण (Impossible Trinity) · चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) · पूंजी प्रवाह प्रबंधन उपाय (Capital Flow Management Measures) · तारापोर समिति (Tarapore Committee) · मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee) · विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (Foreign Portfolio Investment)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 246 एवं सातवीं अनुसूची, संघ सूची की प्रविष्टि 36 – विदेशी मुद्रा पर संघीय विधायी शक्ति
अवधारणा प्रवाह
वैश्विक कारक: कच्चे तेल की ऊँची कीमत, युद्ध और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में वृद्धि से डॉलर आकर्षक हुआ → विदेशी पूंजी प्रवाह में कमी और आयात व प्रेषण के कारण डॉलर की माँग में वृद्धि → रुपये में गिरावट: डॉलर के मुकाबले 88.84 से 94.95 तक → आयात लागत बढ़ने से व्यापार घाटे और आयातित मुद्रास्फीति का दबाव → RBI का हस्तक्षेप: डॉलर बिक्री और प्रमुख नीतिगत दर में वृद्धि, फिर भी बाजार का दबाव बना रहा → प्रेषण-नियंत्रण का प्रस्ताव: LRS सीमा को 2,50,000 डॉलर से घटाकर 50,000 डॉलर करने का विचार → बाजार में अनिश्चितता: विरोधाभासी संकेतों के कारण स्पष्ट और विश्वसनीय संचार की आवश्यकता
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. प्रबंधित तैरती विनिमय दर प्रणाली में केंद्रीय बैंक बाज़ार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को सुचारु करने के लिए हस्तक्षेप कर सकता है, किंतु वह कोई निश्चित लक्ष्य-स्तर घोषित नहीं करता।
2. अन्य सभी स्थितियाँ समान रहने पर, घरेलू मुद्रा के मूल्यह्रास से कच्चे तेल जैसे आयात महँगे हो जाते हैं।
3. असंभव त्रिकोण के अनुसार कोई देश एक साथ निश्चित विनिमय दर, पूर्ण पूंजी गतिशीलता और पूर्णतः स्वतंत्र मौद्रिक नीति, तीनों प्राप्त कर सकता है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: प्रबंधित तैरती प्रणाली में बाज़ार शक्तियाँ दर तय करती हैं, पर केंद्रीय बैंक अस्थिरता कम करने हेतु हस्तक्षेप करता है। कथन 2 सही है: मुद्रा कमज़ोर होने पर आयात की घरेलू-मुद्रा लागत बढ़ जाती है। कथन 3 गलत है: असंभव त्रिकोण बताता है कि तीनों लक्ष्य एक साथ संभव नहीं, किसी दो को ही पूरी तरह साधा जा सकता है।
Q2. निम्नलिखित पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): मुद्रा के तीव्र मूल्यह्रास के समय केंद्रीय बैंक द्वारा नीतिगत ब्याज दर बढ़ाने से अल्पकाल में मुद्रा को सहारा मिल सकता है।
कारण (R): ऊँची घरेलू ब्याज दरें विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को घरेलू ऋण-प्रतिभूतियों की ओर आकर्षित कर सकती हैं।
उपर्युक्त के संदर्भ में, नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (A) सही है और (R) उसकी सही व्याख्या है
- (A) सही है, परंतु (R) (A) की सही व्याख्या नहीं है
- (A) सही है, परंतु (R) गलत है
- (A) गलत है, परंतु (R) सही है
उत्तर: (A) सही है और (R) उसकी सही व्याख्या है — अभिकथन सही है: ब्याज दर वृद्धि से पूंजी प्रवाह और मुद्रा की मांग बढ़ सकती है। कारण भी सही है और अभिकथन की व्याख्या करता है, क्योंकि ऊँचा प्रतिफल विदेशी निवेश को आकर्षित करता है। यह प्रभाव अल्पकालिक हो सकता है और इसका निर्धारण अन्य वैश्विक कारकों पर भी होता है।
Q3. निम्नलिखित सूचियों को सुमेलित कीजिए:
सूची I
A. विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999
B. मौद्रिक नीति समिति
C. तारापोर समिति
D. उदारीकृत प्रेषण योजना
सूची II
1. पूंजी खाता परिवर्तनीयता पर सिफारिशें
2. विदेशी मुद्रा से संबंधित लेन-देन का विनियमन
3. नीतिगत रेपो दर का निर्धारण
4. निवासी व्यक्तियों द्वारा विदेश में धन प्रेषण की वार्षिक सीमा के अंतर्गत सुविधा
सही सुमेलन चुनिए:
- A-2, B-3, C-1, D-4
- A-1, B-2, C-3, D-4
- A-2, B-1, C-3, D-4
- A-4, B-3, C-1, D-2
उत्तर: A-2, B-3, C-1, D-4 — FEMA, 1999 विदेशी मुद्रा लेन-देन को नियंत्रित करने वाला मूल विधान है (A-2)। मौद्रिक नीति समिति रेपो दर तय करती है, जो RBI अधिनियम, 1934 की धारा 45ZB के तहत गठित है (B-3)। तारापोर समिति ने पूंजी खाता परिवर्तनीयता पर सिफारिशें दीं (C-1)। LRS निवासी व्यक्तियों को निश्चित वार्षिक सीमा तक विदेश धन प्रेषण की अनुमति देती है (D-4)।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ रुपये के मूल्यह्रास को अक्सर बाहरी आघातों का परिणाम माना जाता है, किंतु पूंजी-खाता उपायों के माध्यम से उसे रोकने के प्रयासों की भी अपनी कीमत होती है। हाल की नीतिगत बहस के संदर्भ में, पूंजी प्रवाह को नियंत्रित करने वाले उपायों के उपयोग के गुण-दोषों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि यदि ऐसे प्रतिबंध नियमित साधन बन जाएँ, तो पूंजी खाता उदारीकरण की दीर्घकालिक नीति पर क्या प्रभाव पड़ेगा। (15 Marks)
रूपरेखा: MODEL-ANSWER SKELETON:
1. प्रारंभिक परिभाषा: मूल्यह्रास (Depreciation) बनाम अवमूल्यन (Devaluation) का अंतर; प्रबंधित तैरती विनिमय दर में बाज़ार दर तय करता है और RBI अस्थिरता घटाने हेतु हस्तक्षेप करता है।
2. मूल्यह्रास के कारण: (क) कच्चे तेल जैसे आयात का बढ़ता मूल्य और चालू खाता घाटे पर दबाव; (ख) अमेरिकी प्रतिफल अंतर के कारण पूंजी का बाहर जाना; (ग) वैश्विक भू-राजनीतिक अनिश्चितता से विदेशी पोर्टफोलियो निवेश में निकासी; (घ) घरेलू आर्थिक मूलभूत तत्वों की भूमिका, जो अल्पकाल में अकेले पर्याप्त नहीं होते।
3. RBI के उपकरण: डॉलर की बिक्री से विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग; तरलता का स्टरलाइज़ेशन; नीतिगत रेपो दर वृद्धि; और LRS जैसी प्रशासनिक सीमाएँ। प्रत्येक के लाभ और सीमाएँ स्पष्ट कीजिए।
4. पूंजी नियंत्रण के पक्ष में तर्क: अल्पकालिक संकट में बाज़ार को स्थिरता देना; भंडार की सुरक्षा; आयात-निर्भर अर्थव्यवस्था में अत्यधिक बहिर्वाह रोकना। IMF की 2012 की संस्थागत दृष्टि (Institutional View) के अनुसार पूंजी प्रवाह प्रबंधन उपाय अंतिम उपाय के रूप में अस्थायी और लक्षित होने चाहिए।
5. विपक्ष में तर्क: निवेशकों के भरोसे को ठेस; संकेत-प्रभाव (Signalling) से अनिश्चितता; अनौपचारिक व अवैध माध्यमों की ओर धकेलने का जोखिम; प्रवासी परिवारों पर प्रभाव; तथा असंभव त्रिकोण के अंतर्गत नीतिगत लचीलेपन का ह्रास।
6. पूंजी खाता परिवर्तनीयता की पृष्ठभूमि: तारापोर समिति (1997 और 2006) की सिफारिशें; FEMA, 1999 की धारा 6 के अंतर्गत पूंजी खाता लेन-देन पर RBI के नियम; LRS (2004 में आरंभ) का विकास।
7. दीर्घकालिक परिणाम: नियमित प्रतिबंधों से निवेश-विश्वास घटने, पूंजी प्रवाह की अनुमानिता में कमी और सुधार की विश्वसनीयता पर प्रश्न; दूसरी ओर उपायों को अस्थायी, पारदर्शी और सुनिश्चित समय-सीमा से बाँधने का मार्ग।
8. निष्कर्ष: संतुलित दृष्टिकोण—विदेशी मुद्रा भंडार की पर्याप्तता, मौद्रिक नीति और विनिमय दर के बीच समन्वय, तथा स्पष्ट संवाद (Credible Communication) पर बल।
स्रोत: The Indian Express
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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