02 Nov जीएसएलवी-एफ18 मिशन: इसरो के लिए बड़ी राहत, जानिए पूरा घटनाक्रम
✎ नाविक (NavIC) का मूल तंत्र सात उपग्रहों पर आधारित है और उसकी सेवा की निरंतरता के लिए सक्रिय उपग्रहों की पूर्ण संख्या तथा स्वदेशी परमाणु घड़ी का विश्वसनीय होना अनिवार्य है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, प्रक्षेपण यान, नौवहन उपग्रह तंत्र और स्वदेशी विकास) | GS Paper III — अर्थव्यवस्था (केंद्रीय बजट, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण और उच्च-तकनीक क्षेत्र में निवेश) | GS Paper II — शासन (संसदीय स्थायी समिति की भूमिका, विभागीय समन्वय और अंतरिक्ष गतिविधियों का नियामक ढाँचा)
- Prelims: GSLV (भू-स्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान — Geosynchronous Satellite Launch Vehicle) और PSLV (ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान) के उपयोग का अंतर, नाविक (Navigation with Indian Constellation) — भारत का क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह तंत्र और इसकी सेवा सीमा, IRNSS और NVS श्रेणी के उपग्रहों में अंतर, नौवहन में परमाणु घड़ी (Atomic Clock) की भूमिका, IN-SPACe — अंतरिक्ष गतिविधियों के संवर्धन और प्राधिकरण हेतु राष्ट्रीय एजेंसी, भारतीय अंतरिक्ष नीति, 2023 के प्रमुख प्रावधान, बाह्य अंतरिक्ष संधि, 1967 और दायित्व अभिसमय, 1972, इलेक्ट्रॉनिक्स घटक विनिर्माण योजना (ECMS) और सेमीकंडक्टर प्रयोगशाला (SCL)
- Essay: आत्मनिर्भरता और अंतरिक्ष क्षेत्र: सार्वजनिक संस्थानों और निजी भागीदारी का संतुलन, वैज्ञानिक उपलब्धि बनाम संस्थागत क्षमता: संसाधन, मानव बल और दीर्घकालिक योजना का प्रश्न
त्वरित पुनरावृत्ति: नाविक (NavIC) का मूल तंत्र सात उपग्रहों पर आधारित है और उसकी सेवा की निरंतरता के लिए सक्रिय उपग्रहों की पूर्ण संख्या तथा स्वदेशी परमाणु घड़ी का विश्वसनीय होना अनिवार्य है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
ISRO ने GSLV-F18 मिशन के माध्यम से NVS-03 उपग्रह को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया है और उपग्रह की स्थिति स्वस्थ बताई गई है। पिछले लगभग डेढ़ वर्ष में PSLV की दो प्रक्षेपण विफलताओं के कारण संगठन की गतिविधियाँ बाधित रहीं, और यह मिशन 2026 का केवल दूसरा सफल प्रक्षेपण है। चूँकि PSLV और GSLV की कुछ डिज़ाइन समानताएँ हैं, इसलिए इस सफलता को प्रक्षेपण विश्वसनीयता की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। NVS-03 को अंतिम कक्षीय स्थिति में स्थापित और चालू किए जाने पर नाविक (NavIC) तंत्र की उस कमी की भरपाई होगी जो लगभग छह महीनों से बनी हुई थी। इसी संदर्भ में संपादकीय ने संसाधनों, मानव बल, घटक आपूर्ति, नौवहन तंत्र के लिए अलग संचालक, बजट में वृद्धि और राष्ट्रीय अंतरिक्ष कानून की आवश्यकता पर ध्यान दिलाया है।
पृष्ठभूमि
- PSLV की दो प्रक्षेपण विफलताओं के बाद ISRO के कार्यक्रम की गति धीमी रही; GSLV-F18 की सफलता को उस अवधि के बाद की पुनर्बहाली के रूप में देखा जा रहा है।
- नाविक का पहली पीढ़ी का IRNSS तंत्र आयातित परमाणु घड़ियों पर निर्भर था। नई NVS श्रृंखला के उपग्रहों में कम से कम एक स्वदेशी परमाणु घड़ी लगाई जा रही है, जो संसद की विज्ञान और प्रौद्योगिकी संबंधी स्थायी समिति की सिफ़ारिशों और क्वांटम समय-निर्धारण में भारतीय निवेश के अनुरूप है।
- संसदीय स्थायी समिति ने ISRO के कार्यक्रमों में खरीद संबंधी बाधाओं, विशिष्ट घटकों की अनुपलब्धता और समय-सीमा पर विक्रेताओं की तैयारी में कमी की ओर संकेत किया था।
- 2020 के अंतरिक्ष क्षेत्र सुधारों के बाद निजी भागीदारी के लिए द्वार खुले; IN-SPACe की स्थापना और भारतीय अंतरिक्ष नीति, 2023 इस व्यवस्था के प्रमुख आधार हैं।
- संपादकीय के अनुसार 2026-27 में अंतरिक्ष विभाग के लिए ₹13,705.6 करोड़ का प्रावधान है, जबकि प्रक्षेपण यान निर्माण, उपग्रह प्रतिस्थापन और भर्ती के लिए 2027-28 के केंद्रीय बजट में लगभग ₹17,000 करोड़ के आवंटन का सुझाव दिया गया है।
नाविक (NavIC) और इससे जुड़ी अंतरिक्ष व्यवस्था क्या है?
- नाविक (Navigation with Indian Constellation) भारत का स्वतंत्र क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह तंत्र है, जो भारतीय उपमहाद्वीप और उसके आसपास के लगभग 1,500 किलोमीटर के क्षेत्र में स्थिति और समय संबंधी सेवाएँ देता है।
- इस तंत्र की मूल संरचना में सात उपग्रह निर्धारित हैं, जिनमें तीन भू-स्थिर और चार भू-समकालिक झुकी कक्षा में होते हैं। किसी एक सक्रिय उपग्रह की कमी भी प्राथमिक नौवहन उद्देश्य को प्रभावित करती है।
- नाविक दो प्रकार की सेवाएँ देता है: सभी उपयोगकर्ताओं के लिए मानक स्थिति सेवा (SPS) और अधिकृत उपयोगकर्ताओं के लिए प्रतिबंधित सेवा (RS)।
- नौवहन में परमाणु घड़ी सटीक समय संकेत देती है, क्योंकि दूरी की गणना सिग्नल के आने-जाने के समय पर आधारित होती है। इसलिए घड़ी की सटीकता और उसका स्वदेशी उत्पादन रणनीतिक महत्व रखता है।
- GSLV भारी उपग्रहों को भू-स्थिर स्थानांतरण कक्षा तक ले जाने में सक्षम है, जबकि PSLV मुख्यतः निम्न पृथ्वी कक्षा के उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए जाना जाता है। दोनों यानों के डिज़ाइन में कुछ समान प्रणालियाँ हैं।
- ISRO अंतरिक्ष विभाग (Department of Space) के अधीन कार्य करता है। संपादकीय के अनुसार नाविक के संचालन के लिए अलग समर्पित संचालक की आवश्यकता है, ताकि ISRO अपने मूल अनुसंधान और विकास दायित्वों पर केंद्रित रह सके।
- अंतरिक्ष गतिविधियों के लिए भारत में अभी कोई समग्र राष्ट्रीय अंतरिक्ष अधिनियम नहीं है। निजी भागीदारी, प्राधिकरण और दायित्व (Liability) से जुड़े प्रश्नों के लिए बाह्य अंतरिक्ष संधि, 1967 और दायित्व अभिसमय, 1972 जैसे अंतरराष्ट्रीय ढाँचे प्रासंगिक हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता (Feature) | महत्त्व (Significance) |
|---|---|
| GSLV-F18 मिशन | इसरो का सफल प्रक्षेपण; 2026 में दूसरा सफल प्रक्षेपण, जिससे प्रक्षेपण-क्रम की निरंतरता बहाल होने का संकेत मिलता है |
| NVS-03 उपग्रह | NavIC समूह में छह माह से कम रही कार्यात्मक कमी की भरपाई का माध्यम; अंतिम कक्षीय स्थान पर स्थापित होने और कमीशन होने पर सेवा क्षमता पूर्ण होगी |
| NavIC (Navigation with Indian Constellation) | भारत के भूभाग और आसपास के क्षेत्र में स्वतंत्र (स्वदेशी) स्थिति-निर्धारण सेवा प्रदान करने की प्रणाली |
| द्वितीय पीढ़ी के NVS उपग्रह | कम से कम एक स्वदेश-निर्मित परमाणु घड़ी (Atomic Clock) से युक्त; प्रथम पीढ़ी के IRNSS उपग्रहों की आयातित घड़ियों से भिन्न |
| PSLV के दो प्रक्षेपण विफल | PSLV और GSLV के कुछ डिज़ाइन पहलू समान होने से विफलताओं का प्रभाव GSLV पर भी पड़ा, जिससे प्रक्षेपण-क्षमता पर सामूहिक प्रश्न उठा |
| परमाणु घड़ी और क्वांटम समय-निर्धारण में निवेश | संसदीय स्थायी समिति (Parliamentary Standing Committee) की सिफ़ारिशों के अनुरूप स्वदेशी उच्च-सटीकता वाले समय-मानक की दिशा में कदम |
महत्व
सामरिक (Strategic)
- NavIC से नागरिक और सैन्य, दोनों प्रकार की स्थिति-निर्धारण सेवाओं में विदेशी उपग्रह-प्रणालियों पर निर्भरता घटती है
- स्वतंत्र स्थिति-निर्धारण क्षमता सीमावर्ती और समुद्री क्षेत्रों में नौवहन और निगरानी के लिए महत्त्वपूर्ण है
तकनीकी (Technological)
- स्वदेशी परमाणु घड़ी का उपयोग उच्च-सटीकता वाले समय-मानक और क्वांटम समय-निर्धारण में भारत की क्षमता को आगे बढ़ाता है
- विशेषीकृत घटकों के स्वदेशीकरण से अंतरिक्ष-क्षेत्र की आपूर्ति-श्रृंखला सुदृढ़ होती है
आर्थिक (Economic)
- नेविगेशन सेवाएँ परिवहन, कृषि, आपदा प्रबंधन और दूरसंचार जैसे क्षेत्रों में डाउनस्ट्रीम आर्थिक गतिविधियों का आधार बनती हैं
- इलेक्ट्रॉनिक घटक और सेमीकंडक्टर संबंधी क्षमता निर्माण से घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहन मिल सकता है
शासन और संस्थागत (Governance and Institutional)
- इसरो पर बढ़ते मिशन-दायित्व के बीच संसाधन-आवंटन और कार्यबल की पर्याप्तता का प्रश्न नीति-निर्माण के केंद्र में आता है
- समर्पित संचालक (Operator) की स्थापना से इसरो अपने मूल मिशन पर केंद्रित रह सकता है
चुनौतियाँ
1. प्रक्षेपण विश्वसनीयता और कार्य-निरंतरता की चुनौती
- PSLV की दो विफलताओं के कारण पिछले लगभग 18 माह बाधित रहे और 2026 में केवल दो सफल प्रक्षेपण हुए
- समान डिज़ाइन-पहलुओं वाले प्रक्षेपण यानों में विफलता का प्रभाव एक से अधिक कार्यक्रमों पर पड़ता है, जिससे जोखिम-प्रबंधन और गुणवत्ता-आश्वासन की भूमिका बढ़ जाती है
यूपीएससी लिंक: GS-III: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी – अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत की उपलब्धियाँ
2. आपूर्ति-श्रृंखला और खरीद की बाधाएँ
- विशेषीकृत घटकों की उपलब्धता और विक्रेताओं की समय-सीमा पर तैयारी में कठिनाई की ओर संसदीय स्थायी समिति ने ध्यान दिलाया है
- SAC द्वारा 2025 के अनुरोध-प्रस्ताव (Request for Proposals) में लगभग दो वर्ष की लीड टाइम का उल्लेख है, जो NavIC जैसे समयबद्ध कार्यक्रमों के लिए बाधक है
यूपीएससी लिंक: GS-III: अर्थव्यवस्था – औद्योगिक नीति और आपूर्ति-श्रृंखला सुदृढ़ीकरण
3. बजटीय और मानव-संसाधन सीमाएँ
- अंतरिक्ष विभाग के लिए 2026-27 में ₹13,705.6 करोड़ का आवंटन है; प्रस्तावित वृद्धि प्रक्षेपण यान निर्माण, उपग्रह प्रतिस्थापन और भर्ती पर केंद्रित होनी चाहिए
- अपर्याप्त कार्यबल और सीमित आवंटन के कारण मिशनों की योजना अनिश्चित रहती है
यूपीएससी लिंक: GS-III: अर्थव्यवस्था – केंद्रीय बजट और सार्वजनिक व्यय प्रबंधन
4. NavIC का परिचालन और प्रबंधन ढाँचा
- NavIC के लिए समर्पित संचालक (Dedicated Operator) न होने से इसरो को सेवा-संचालन और मिशन-विकास दोनों का भार उठाना पड़ता है
- सेवा-प्रदाता और उपयोगकर्ता के बीच स्पष्ट उत्तरदायित्व-ढाँचे के अभाव में सेवा-गुणवत्ता की जवाबदेही कमज़ोर रहती है
यूपीएससी लिंक: GS-III: अंतरिक्ष, संचार और आपदा प्रबंधन में सरकारी भूमिका
5. निजी भागीदारी हेतु विधिक ढाँचे की कमी
- निजी क्षेत्र की भागीदारी को नियंत्रित करने वाला राष्ट्रीय अंतरिक्ष विधान अभी आवश्यक माना जा रहा है
- दायित्व (Liability) के निर्धारण, लाइसेंसिंग और विवाद-समाधान के स्पष्ट नियमों के अभाव में निवेशकों का विश्वास सीमित रह सकता है
यूपीएससी लिंक: GS-II: शासन – नियामक ढाँचा और विधायी प्रक्रिया
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा (Issue) | चिंता (Concern) |
|---|---|
| प्रक्षेपण क्षमता | दो PSLV विफलताओं के बाद 2026 में सीमित सफल प्रक्षेपण, जिससे मिशन-क्रम अनियमित है |
| NavIC की उपलब्धता | एक उपग्रह की कमी से लगभग छह माह तक पूर्ण सेवा-क्षमता बाधित रही |
| खरीद और लीड टाइम | विशेषीकृत घटकों और विक्रेता-तैयारी में विलंब; लगभग दो वर्ष का लीड टाइम |
| बजटीय समर्थन | 2026-27 का आवंटन ₹13,705.6 करोड़; 2027-28 में लगभग ₹17,000 करोड़ की माँग |
| परिचालन जवाबदेही | NavIC के लिए समर्पित संचालक का अभाव; इसरो पर परिचालन और विकास का दोहरा भार |
| विधिक ढाँचा | निजी भागीदारी, दायित्व और अंतरिक्ष-गतिविधियों के नियमन हेतु राष्ट्रीय अंतरिक्ष विधान की अनुपस्थिति |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- इलेक्ट्रॉनिक घटक विनिर्माण योजना (Electronics Component Manufacturing Scheme)
- सेमीकंडक्टर प्रयोगशाला आधुनिकीकरण कार्यक्रम (Modernisation of Semiconductor Laboratory Programme)
आगे की राह
- NVS-03 का सफल कक्षीय स्थापन और कमीशनिंग सुनिश्चित कर NavIC की सेवा-क्षमता को पूर्ण स्तर पर लाना
- PSLV और GSLV के समान डिज़ाइन-पहलुओं की स्वतंत्र समीक्षा कर विफलता-विश्लेषण और सुधारात्मक उपायों को प्रक्रिया का हिस्सा बनाना
- इलेक्ट्रॉनिक घटक विनिर्माण योजना और सेमीकंडक्टर प्रयोगशाला आधुनिकीकरण कार्यक्रम को विशेषीकृत अंतरिक्ष-घटकों की आपूर्ति हेतु उन्मुख करना
- विशेषीकृत घटकों की योग्यता-परीक्षण (Qualification Test) के लिए पाँच से सात वर्षीय कार्यक्रम को समयबद्ध निगरानी के साथ लागू करना
- लीड टाइम घटाने हेतु विक्रेता-विकास और दीर्घकालिक अनुबंध-नीति अपनाना
- अंतरिक्ष विभाग के बजट में प्रक्षेपण यान निर्माण, उपग्रह प्रतिस्थापन और कार्यबल-भर्ती हेतु पर्याप्त वृद्धि पर विचार करना
- NavIC के लिए समर्पित संचालक की स्थापना कर इसरो को मिशन-विकास पर केंद्रित रखना
- निजी भागीदारी, दायित्व और लाइसेंसिंग हेतु राष्ट्रीय अंतरिक्ष विधान पर संसदीय परामर्श के साथ कार्य करना
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
नेविगेशन विथ इंडियन कॉन्स्टेलेशन (NavIC) · IRNSS और NVS उपग्रह श्रृंखला · परमाणु घड़ी (Atomic Clock) और क्वांटम समय-निर्धारण · संसदीय स्थायी समिति (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी) · अंतरिक्ष विधि और दायित्व (Liability) · IN-SPACe और निजी भागीदारी · भारतीय अंतरिक्ष नीति, 2023 · इलेक्ट्रॉनिक्स घटक विनिर्माण योजना (Electronics Component Manufacturing Scheme) · आपूर्ति शृंखला में स्वदेशी घटक · अंतरिक्ष विभाग का बजट आवंटन · प्रक्षेपण यान की विश्वसनीयता · मानव-संसाधन और संस्थागत क्षमता
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 112’, ‘note’: ‘वार्षिक वित्तीय विवरण; अंतरिक्ष विभाग का बजट आवंटन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 246’, ‘note’: ‘संघ सूची के विषयों पर संसद की विधायी शक्ति’}
अवधारणा प्रवाह
PSLV की दो विफलताओं से प्रक्षेपण-क्रम बाधित और समान डिज़ाइन वाले GSLV पर असर → GSLV-F18 के सफल प्रक्षेपण से NVS-03 उपग्रह कक्षा में स्थापित → NavIC समूह में एक उपग्रह की कमी पूरी होने से स्वतंत्र स्थिति-निर्धारण सेवा की बहाली की संभावना → स्वदेशी परमाणु घड़ी और घटक-आपूर्ति की सीमाएँ दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं → लीड टाइम और बजट की कमी से भविष्य के मिशनों की नियमितता पर प्रश्न → विशेषीकृत घटक-नीतियों, बजट वृद्धि और कार्यबल-सुदृढ़ीकरण से मिशन-क्रम स्थिर होने की दिशा
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. NavIC भारतीय उपमहाद्वीप पर स्वतंत्र (standalone) स्थिति-निर्धारण सेवाएँ प्रदान करता है।
2. प्रथम पीढ़ी के IRNSS उपग्रहों में स्वदेश निर्मित परमाणु घड़ियाँ लगी थीं।
3. भारत में गैर-सरकारी संस्थाओं की अंतरिक्ष गतिविधियों को अधिकृत करने और उनकी निगरानी का कार्य IN-SPACe द्वारा किया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- इनमें से कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: NavIC भारत और उसकी सीमा से लगभग 1,500 किमी तक के क्षेत्र में स्थिति-निर्धारण सेवा देता है। कथन 2 गलत है: प्रथम पीढ़ी के IRNSS उपग्रहों में आयातित घड़ियाँ थीं, जबकि दूसरी पीढ़ी के NVS उपग्रहों में स्वदेशी परमाणु घड़ी को प्राथमिकता दी गई है। कथन 3 सही है: IN-SPACe गैर-सरकारी संस्थाओं की अंतरिक्ष गतिविधियों के लिए नोडल प्राधिकरण है। अतः उत्तर ‘केवल दो’ है।
Q2. अभिकथन (A): अंतरिक्ष संधि, 1967 के अंतर्गत प्रक्षेपण करने वाला राज्य अपनी अंतरिक्ष वस्तु द्वारा पहुँचाई गई क्षति के लिए अंतरराष्ट्रीय दायित्व वहन करता है।
कारण (R): दायित्व संबंधी अभिसमय, 1972 इस दायित्व के स्वरूप और क्षतिपूर्ति की प्रक्रिया को विस्तार से परिभाषित करता है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सही है, किंतु R गलत है।
- A गलत है, किंतु R सही है।
उत्तर: A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है। — अंतरिक्ष संधि, 1967 के अनुच्छेद VI और VII राज्य की राष्ट्रीय गतिविधियों के उत्तरदायित्व और प्रक्षेपक राज्य के दायित्व की व्यवस्था करते हैं। दायित्व अभिसमय, 1972 इसी अनुच्छेद VII को विस्तृत रूप देता है, जिसमें पृथ्वी की सतह पर हुई क्षति के लिए पूर्ण दायित्व (absolute liability) और अंतरिक्ष में हुई क्षति के लिए दोष-आधारित दायित्व (fault-based liability) का प्रावधान है। अतः R, A की सही व्याख्या है।
Q3. निम्नलिखित सुमेलित कीजिए:
सूची I (संस्था/योजना)
1. इलेक्ट्रॉनिक्स घटक विनिर्माण योजना
2. IN-SPACe
3. संसदीय स्थायी समिति (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी)
4. NSIL (NewSpace India Limited)
सूची II (कार्य)
A. गैर-सरकारी अंतरिक्ष गतिविधियों के लिए प्राधिकरण और पर्यवेक्षण
B. इलेक्ट्रॉनिक घटकों और उप-असेंबली के घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहन
C. ISRO की प्रौद्योगिकी और उत्पादों के वाणिज्यिक विपणन की इकाई
D. विज्ञान और प्रौद्योगिकी से जुड़े मंत्रालयों के कार्यक्रमों की संसदीय जाँच और प्रतिवेदन
सही सुमेलन चुनिए:
- 1-A, 2-B, 3-C, 4-D
- 1-B, 2-A, 3-D, 4-C
- 1-C, 2-D, 3-A, 4-B
- 1-D, 2-C, 3-B, 4-A
उत्तर: 1-B, 2-A, 3-D, 4-C — इलेक्ट्रॉनिक्स घटक विनिर्माण योजना (1) घरेलू घटक विनिर्माण को प्रोत्साहित करती है, इसलिए B। IN-SPACe (2) गैर-सरकारी अंतरिक्ष गतिविधियों का प्राधिकरण और पर्यवेक्षण करता है, इसलिए A। संसदीय स्थायी समिति (3) मंत्रालयों के कार्यक्रमों की जाँच कर प्रतिवेदन देती है, इसलिए D। NSIL (4) ISRO की प्रौद्योगिकी और सेवाओं के वाणिज्यिक पक्ष का कार्य करती है, इसलिए C। अतः सही सुमेलन 1-B, 2-A, 3-D, 4-C है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम तकनीकी रूप से सक्षम है, फिर भी हाल के वर्षों में प्रक्षेपण विफलताओं, मानव-संसाधन की कमी और सीमित वित्तीय आवंटन के कारण मिशनों की निरंतरता प्रभावित हुई है। इन संस्थागत और वित्तीय बाधाओं का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही यह भी बताइए कि क्या प्रस्तावित राष्ट्रीय अंतरिक्ष विधि, जिसमें निजी भागीदारी और दायित्व के प्रावधान हों, इन बाधाओं को दूर करने में सहायक हो सकती है। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल उत्तर-संरचना:
(1) भूमिका: NavIC के NVS-03 उपग्रह की स्थिति और GSLV-F18 की सफलता से आरंभ करें; पिछले 18 महीनों में PSLV की दो विफलताओं का उल्लेख करें और NavIC के लगभग छह महीने से एक उपग्रह कम होने की स्थिति बताएँ।
(2) संस्थागत ढाँचा: अंतरिक्ष विभाग (Department of Space) और उसके अधीन ISRO; NSIL (2019) का वाणिज्यिक पक्ष; IN-SPACe (2020) का नियामक और प्राधिकरण कार्य; भारतीय अंतरिक्ष नीति, 2023 में निजी क्षेत्र की भूमिका।
(3) बाधाओं का विश्लेषण: (क) आपूर्ति शृंखला: विशिष्ट घटकों की अनुपलब्धता, विक्रेता तत्परता, लगभग दो वर्ष का लीड टाइम (SAC के 2025 के RFP के अनुसार); संसदीय स्थायी समिति (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी) की प्रतिवेदन-सिफ़ारिशें। (ख) स्वदेशी परमाणु घड़ी: IRNSS में आयातित घड़ियों से NVS पीढ़ी में स्वदेशी घड़ी की ओर परिवर्तन, और क्वांटम समय-निर्धारण में निवेश। (ग) वित्त: 2026-27 में विभाग के लिए ₹13,705.6 करोड़ और संपादकीय द्वारा सुझाए गए 2027-28 के लगभग ₹17,000 करोड़ की तुलना; प्रक्षेपण यान विनिर्माण, उपग्रह प्रतिस्थापन और भर्ती पर बल। (घ) मानव-संसाधन: आवश्यक कार्यबल की कमी।
(4) नीतिगत उपाय: इलेक्ट्रॉनिक्स घटक विनिर्माण योजना और सेमीकंडक्टर प्रयोगशाला के आधुनिकीकरण का उपयोग; पाँच से सात वर्षीय विशेष घटक एवं अर्हता-परीक्षण कार्यक्रम; NavIC के लिए अलग परिचालक (operator) की आवश्यकता, ताकि ISRO मूल मिशन पर केंद्रित रहे।
(5) राष्ट्रीय अंतरिक्ष विधि की भूमिका: अंतरिक्ष संधि, 1967 के अनुच्छेद VI (राज्य का उत्तरदायित्व और गैर-सरकारी गतिविधियों पर पर्यवेक्षण) और अनुच्छेद VII (दायित्व); दायित्व अभिसमय, 1972; पंजीकरण अभिसमय, 1975; संघ सूची की प्रविष्टि 14 और अनुच्छेद 253 के अंतर्गत संसद की संधि-कार्यान्वयन की शक्ति; प्रस्तावित अंतरिक्ष गतिविधि विधेयक का मसौदा और उसमें अधिकृत निजी संस्थाओं के लिए बीमा व दायित्व सीमा।
(6) संतुलित दृष्टिकोण: (क) तर्क कि विधि से निजी भागीदारी बढ़ेगी और ISRO पर भार घटेगा; (ख) सामरिक एवं सुरक्षा संवेदनशीलता के कारण राज्य-नियंत्रण पर बल; (ग) वित्तीय आवंटन और मानव-संसाधन विधि से अधिक निर्णायक हैं, क्योंकि विधि अकेले कार्यबल या घटक-उपलब्धता नहीं बढ़ाती।
(7) निष्कर्ष: विधि आवश्यक किंतु पर्याप्त नहीं; स्वदेशी घटक, दीर्घकालिक बजट और कार्यबल-विकास के साथ विधिक ढाँचा मिलकर ही मिशन-निरंतरता सुनिश्चित कर सकते हैं।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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