04 Nov भारत-कनाडा प्रथम रक्षा संवाद: सुरक्षा चुनौतियों पर सहयोग
✎ भारत-कनाडा रक्षा संवाद द्विपक्षीय रक्षा सहयोग को संस्थागत रूप देने का पहला औपचारिक मंच है, जो हिंद-प्रशांत साझेदारी और रक्षा कूटनीति से जुड़ा है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — अंतरराष्ट्रीय संबंध (भारत और प्रमुख देशों के साथ द्विपक्षीय समूह, हिंद-प्रशांत क्षेत्र) | सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III — आंतरिक सुरक्षा और रक्षा (रक्षा सहयोग और सैन्य कूटनीति की भूमिका)
- Prelims: भारत-कनाडा रक्षा संवाद (India-Canada Defence Dialogue), रक्षा संवाद की संस्थागत प्रकृति और द्विपक्षीय रक्षा सहयोग, संघ सूची की प्रविष्टि 1 — भारत की रक्षा (Union List, Entry 1), हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र की अवधारणा, एक्ट ईस्ट नीति (Act East Policy), नाटो (NATO) और जी-7 (G7) की सदस्यता में कनाडा की स्थिति, रक्षा मंत्रालय की अंतरराष्ट्रीय सहयोग से संबंधित भूमिका
- Essay: बदलते वैश्विक परिदृश्य में मध्यम शक्तियों के साथ रक्षा सहयोग: अवसर और चुनौतियाँ, रक्षा कूटनीति (Defence Diplomacy) अंतरराष्ट्रीय शांति और सहयोग का साधन कैसे बनती है
त्वरित पुनरावृत्ति: भारत-कनाडा रक्षा संवाद द्विपक्षीय रक्षा सहयोग को संस्थागत रूप देने का पहला औपचारिक मंच है, जो हिंद-प्रशांत साझेदारी और रक्षा कूटनीति से जुड़ा है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
भारत और कनाडा ने अपना पहला रक्षा संवाद (Defence Dialogue) आयोजित किया। ऐसे संवाद द्विपक्षीय रक्षा संबंधों को संस्थागत रूप देने के लिए बनाए जाते हैं, जिनमें दोनों देशों के रक्षा प्रतिष्ठान नीतिगत विचार-विमर्श, सुरक्षा परिदृश्य के साझा आकलन और सहयोग के संभावित क्षेत्रों की पहचान करते हैं। यह आयोजन भारत की उस व्यापक नीति से भी जुड़ता है जिसमें वह अपने रक्षा-सहयोग ढाँचे को विभिन्न साझेदार देशों के साथ विस्तृत करता रहा है। यूपीएससी की दृष्टि से इस समाचार का महत्व इस बात में है कि रक्षा संवाद किस प्रकार द्विपक्षीय सहयोग की संरचना का हिस्सा बनता है।
पृष्ठभूमि
- रक्षा संवाद द्विपक्षीय सहयोग का एक औपचारिक मंच है, जिसमें सरकारें नियमित बैठकों के माध्यम से सुरक्षा हितों, रक्षा नीति और सैन्य सहयोग पर विचार करती हैं। भारत कई देशों के साथ ऐसे संवाद और संयुक्त कार्य समूह चलाता है।
- भारत की रक्षा नीति में स्वदेशीकरण, रक्षा उत्पादन और रक्षा निर्यात को प्रोत्साहन देने पर बल दिया गया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय रक्षा सहयोग का दायरा बढ़ा है।
- कनाडा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बढ़ाने को अपनी विदेश और सुरक्षा नीति का हिस्सा मानता है, और उसने इस क्षेत्र के लिए अलग से रणनीति घोषित की है।
- भारत की हिंद-प्रशांत अवधारणा और एक्ट ईस्ट नीति समुद्री सुरक्षा, नौवहन की स्वतंत्रता और क्षेत्रीय स्थिरता पर केंद्रित हैं, जिनमें बहुपक्षीय तथा द्विपक्षीय दोनों स्तरों पर सहयोग होता है।
- रक्षा मामले संविधान की सातवीं अनुसूची की संघ सूची के अंतर्गत आते हैं, इसलिए रक्षा नीति और अंतरराष्ट्रीय रक्षा समझौते केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में होते हैं।
रक्षा संवाद (Defence Dialogue) क्या है?
- रक्षा संवाद दो देशों के रक्षा प्रतिष्ठानों के बीच नियमित और संरचित विचार-विमर्श का मंच है, जिसका उद्देश्य परस्पर विश्वास और समझ बढ़ाना है।
- इसमें आमतौर पर सुरक्षा परिदृश्य का साझा आकलन, रक्षा नीति के मुद्दे, सैन्य प्रशिक्षण और क्षमता-निर्माण, तथा रक्षा उद्योग में सहयोग जैसे विषय उठाए जाते हैं।
- संवाद से प्राप्त सहमतियाँ आमतौर पर संयुक्त वक्तव्य, समझौता ज्ञापन या भविष्य के कार्य-समूहों के रूप में आगे बढ़ती हैं।
- भारत में रक्षा से संबंधित अंतरराष्ट्रीय सहयोग का समन्वय रक्षा मंत्रालय और विदेश मंत्रालय के बीच होता है, क्योंकि विदेश संबंध संघ सूची की प्रविष्टि 10 के अंतर्गत आते हैं।
- रक्षा सहयोग के इस रूप को रक्षा कूटनीति (Defence Diplomacy) कहा जाता है, जिसमें सैन्य संबंधों के माध्यम से राजनयिक संबंधों को सुदृढ़ किया जाता है।
- ऐसे संवाद विश्वास-निर्माण के उपाय के रूप में भी देखे जाते हैं, क्योंकि इनसे गलतफहमी कम होती है और आपसी संपर्क के नियमित माध्यम बनते हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| आयोजन का स्वरूप | भारत और कनाडा के बीच हुआ यह पहला रक्षा संवाद (Defence Dialogue) है, जो दोनों देशों के रक्षा और सुरक्षा तंत्र के बीच औपचारिक द्विपक्षीय संस्थागत संवाद की नई शुरुआत है। |
| संस्थागत प्रकृति | रक्षा संवाद एक मंच है जिसमें नीतिगत विचार-विमर्श, रक्षा सहयोग की प्राथमिकताओं और भविष्य की कार्ययोजना पर चर्चा होती है। यह किसी बाध्यकारी संधि से अलग, परामर्श और समन्वय का तंत्र है। |
| भौगोलिक और रणनीतिक संदर्भ | कनाडा की हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) रणनीति और भारत की हिंद-प्रशांत नीति, दोनों में समुद्री सुरक्षा और नियम-आधारित व्यवस्था के प्रति साझा रुचि इस संवाद का व्यापक आधार बन सकती है। |
| राजनयिक महत्व | रक्षा संवाद द्विपक्षीय संबंधों के विस्तार का एक क्षेत्रीय आयाम है। इससे आर्थिक, ऊर्जा और प्रौद्योगिकी सहयोग के साथ सुरक्षा सहयोग को भी संस्थागत रूप मिलता है। |
| सहयोग के संभावित क्षेत्र | रक्षा उद्योग, प्रशिक्षण, समुद्री सुरक्षा, आपदा प्रबंधन और संयुक्त अभ्यास जैसे विषय सामान्यतः ऐसे संवादों के एजेंडा में आते हैं। इस विशेष संवाद के निर्णयों का विवरण स्रोत में उपलब्ध नहीं है। |
महत्व
रणनीतिक (Strategic)
- हिंद-प्रशांत क्षेत्र में नियम-आधारित व्यवस्था, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के प्रति दोनों देशों की साझा चिंता को संस्थागत मंच मिलता है।
- भारत की रक्षा कूटनीति का विस्तार उन देशों तक होता है जिनके साथ सुरक्षा सहयोग की औपचारिक संरचना अभी विकसित हो रही है।
कूटनीतिक (Diplomatic)
- पहले संवाद की शुरुआत से द्विपक्षीय संबंधों में विश्वास निर्माण और नियमित उच्च-स्तरीय संपर्क की परंपरा आगे बढ़ती है।
- रक्षा मामलों पर नियमित संवाद से दोनों देशों के बीच गलतफहमी कम करने और नीतिगत पूर्वानुमेयता बढ़ाने में मदद मिलती है।
आर्थिक एवं तकनीकी (Economic and Technological)
- रक्षा उत्पादन और रक्षा प्रौद्योगिकी में सहयोग की संभावना भारत की आत्मनिर्भर भारत पहल की दिशा से मेल खाती है, परंतु इसकी ठोस रूपरेखा स्रोत में नहीं है।
- सह-उत्पादन और तकनीक हस्तांतरण जैसे विषय भविष्य के संवादों में चर्चा का विषय बन सकते हैं।
चुनौतियाँ
1. विश्वास और राजनयिक निरंतरता
- हाल के वर्षों में द्विपक्षीय संबंधों में आए उतार-चढ़ाव से किसी भी नए संस्थागत तंत्र की दीर्घकालिक निरंतरता पर प्रश्न उठते हैं।
- रक्षा संवाद को तभी प्रभावी माना जाएगा जब वह नियमित अंतराल पर आयोजित हो और उसके निर्णयों का अनुवर्ती पालन हो।
यूपीएससी लिंक: GS-2: भारत के विदेश संबंध; द्विपक्षीय समझौते और मंच
2. रक्षा प्रौद्योगिकी और निर्यात नियंत्रण
- संवेदनशील रक्षा प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण पर अंतरराष्ट्रीय निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाएँ और राष्ट्रीय सुरक्षा विचार प्रभावी रहते हैं।
- सह-उत्पादन और प्रौद्योगिकी साझेदारी में सुरक्षा, बौद्धिक संपदा और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े जटिल प्रश्न सामने आते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-3: रक्षा प्रौद्योगिकी; आंतरिक सुरक्षा; आत्मनिर्भरता
3. भौगोलिक दूरी और सामरिक प्राथमिकताओं में अंतर
- भारत और कनाडा के सुरक्षा हित भौगोलिक रूप से भिन्न हैं। भारत के लिए पड़ोस और उत्तरी सीमा प्राथमिक हैं, जबकि कनाडा का ध्यान उत्तरी अमेरिका और यूरोप के सुरक्षा ढाँचे (जैसे NATO) पर अधिक रहता है।
- इन प्राथमिकताओं के अंतर से संयुक्त अभ्यास और दीर्घकालिक योजना का दायरा सीमित हो सकता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: भारत का पड़ोस और वैश्विक शक्ति-संतुलन; GS-2: अंतरराष्ट्रीय संगठन
4. अंतरसंचालनीयता (Interoperability) की सीमाएँ
- सैन्य उपकरणों, प्रशिक्षण मानकों और प्रक्रियाओं में भिन्नता से संयुक्त अभियानों में समन्वय कठिन हो सकता है।
- आपसी सहयोग को गहरा करने के लिए नियमित प्रशिक्षण और मानकीकरण की आवश्यकता होगी।
यूपीएससी लिंक: GS-3: आंतरिक सुरक्षा और सुरक्षा बलों की क्षमता-वृद्धि
5. बहुपक्षीय हितों का संतुलन
- हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत और कनाडा दोनों की बड़ी शक्तियों के साथ आर्थिक और सुरक्षा संबंध जटिल हैं, इसलिए साझेदारी को अन्य संबंधों के साथ संतुलित रखना आवश्यक होगा।
- रक्षा सहयोग को व्यापक आर्थिक और व्यापार संबंधों के साथ जोड़ने पर नीतिगत सामंजस्य की चुनौती सामने आती है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: भारत की विदेश नीति; बहुपक्षवाद और क्षेत्रीय संगठन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| संबंधों की निरंतरता | पिछले उतार-चढ़ाव के बीच संवाद की नियमितता और दीर्घकालिक प्रतिबद्धता पर संदेह बना रह सकता है। |
| प्रौद्योगिकी हस्तांतरण | संवेदनशील तकनीक पर निर्यात नियंत्रण और सुरक्षा शर्तें सहयोग की गति सीमित कर सकती हैं। |
| भौगोलिक प्राथमिकताएँ | भारत का मुख्य ध्यान पड़ोस पर और कनाडा का यूरोप-उत्तरी अमेरिका पर होने से सहयोग का दायरा सीमित रह सकता है। |
| अंतरसंचालनीयता | अलग प्रशिक्षण मानकों और उपकरणों से संयुक्त अभ्यास में तकनीकी बाधाएँ आ सकती हैं। |
| आर्थिक हितों का संतुलन | रक्षा सहयोग को व्यापार और ऊर्जा संबंधों के साथ संतुलित करना नीतिगत चुनौती है। |
आगे की राह
- रक्षा संवाद को वार्षिक या नियमित अंतराल पर आयोजित करने की स्थायी व्यवस्था बनाई जाए, ताकि द्विपक्षीय सहयोग में निरंतरता रहे।
- पहले संवाद में तय किए गए निर्णयों की समीक्षा के लिए एक अनुवर्ती तंत्र (Follow-up Mechanism) बनाया जाए।
- समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और आपदा प्रबंधन जैसे अपेक्षाकृत कम विवादास्पद क्षेत्रों से व्यावहारिक सहयोग शुरू किया जाए।
- संयुक्त प्रशिक्षण और अभ्यास के माध्यम से सैन्य प्रक्रियाओं और मानकों में अंतरसंचालनीयता बढ़ाई जाए।
- रक्षा उद्योग और प्रौद्योगिकी सहयोग के लिए स्पष्ट निर्यात नियंत्रण और सुरक्षा प्रोटोकॉल पर पारस्परिक समझ विकसित की जाए।
- रक्षा संवाद को व्यापार, शिक्षा और ऊर्जा संवाद जैसे अन्य द्विपक्षीय मंचों के साथ समन्वित किया जाए।
- हिंद-प्रशांत क्षेत्र के बहुपक्षीय मंचों पर दोनों देशों के समन्वय से नियम-आधारित व्यवस्था को मजबूत किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
रक्षा संवाद (Defence Dialogue) · रक्षा कूटनीति (Defence Diplomacy) · हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) · अनुच्छेद 73 (Article 73) और अनुच्छेद 253 (Article 253) · संधि-निर्माण की कार्यपालिका शक्ति (Executive Power in Treaty-making) · संस्थागत उदारवाद (Neoliberal Institutionalism) · शक्ति संतुलन (Balance of Power) · एक्ट ईस्ट नीति (Act East Policy) · कनाडा की हिंद-प्रशांत रणनीति, 2022 (Canada’s Indo-Pacific Strategy, 2022) · समुद्री सुरक्षा और संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून अभिसमय (UNCLOS) · रक्षा नियोजन (Defence Planning) · सैन्य कूटनीति का संस्थागतकरण (Institutionalisation of Defence Diplomacy)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 51: अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा का संवर्धन
- अनुच्छेद 73: संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार
- अनुच्छेद 246: सातवीं अनुसूची में संघ सूची के विषय
अवधारणा प्रवाह
दो देशों के बीच रक्षा और सुरक्षा सहयोग बढ़ाने की साझा आवश्यकता पहचानी गई। → पहले औपचारिक रक्षा संवाद (Defence Dialogue) के माध्यम से दोनों देशों की नीतिगत प्राथमिकताएँ साझा की गईं। → संवाद में सहयोग के संभावित क्षेत्रों पर विचार-विमर्श हुआ और भविष्य की कार्ययोजना पर चर्चा की गई। → संस्थागत संवाद से विश्वास निर्माण और नियमित द्विपक्षीय संपर्क की नींव मजबूत हुई। → यह नींव आगे चलकर संयुक्त अभ्यास, रक्षा प्रौद्योगिकी सहयोग और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समन्वय जैसे ठोस सहयोग में रूपांतरित हो सकती है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. कनाडा क्वाड (Quad) का सदस्य है।
2. कनाडा ‘फाइव आइज़’ (Five Eyes) खुफिया गठबंधन का सदस्य है।
3. भारत ‘फाइव आइज़’ (Five Eyes) गठबंधन का सदस्य है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल एक — कथन 2 सही है: फाइव आइज़ में अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड शामिल हैं। कथन 1 गलत है, क्योंकि क्वाड में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया सदस्य हैं, कनाडा नहीं। कथन 3 गलत है, क्योंकि भारत फाइव आइज़ का सदस्य नहीं है। अतः केवल एक कथन सही है।
Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
कथन (A): राज्य सूची के विषय पर भी संसद विधि बना सकती है, यदि उद्देश्य किसी अंतरराष्ट्रीय संधि या अभिसमय को प्रभावी बनाना हो।
कारण (R): अनुच्छेद 253 संसद को अंतरराष्ट्रीय संधियों और अभिसमयों को प्रभावी करने हेतु विधि बनाने की शक्ति प्रदान करता है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए।
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है
- (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है
- (A) सही है, परंतु (R) गलत है
- (A) गलत है, परंतु (R) सही है
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है — अनुच्छेद 253 संसद को अंतरराष्ट्रीय संधियों और अभिसमयों को लागू करने हेतु कानून बनाने की शक्ति देता है, भले ही विषय राज्य सूची में हो। अतः (A) और (R) दोनों सही हैं और (R) (A) की सही व्याख्या करता है। यह प्रावधान संधि-निर्माण की कार्यपालिका शक्ति (अनुच्छेद 73) से भिन्न है, जो संघ की कार्यपालिका को बाहरी मामलों में संधि करने का अधिकार देती है।
Q3. निम्नलिखित सुमेलन पर विचार कीजिए:
सूची I (संस्था)
A. रक्षा योजना समिति (Defence Planning Committee)
B. सैन्य मामलों का विभाग (Department of Military Affairs)
C. रक्षा खुफिया एजेंसी (Defence Intelligence Agency)
सूची II (विशेषता)
1. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की अध्यक्षता में गठित
2. रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत, जिसके सचिव पदेन चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ होते हैं
3. तीनों सेनाओं की खुफिया आवश्यकताओं के समन्वय हेतु रक्षा मंत्रालय के अधीन स्थापित
सही सुमेलन चुनिए।
- A-1, B-2, C-3
- A-2, B-1, C-3
- A-3, B-2, C-1
- A-1, B-3, C-2
उत्तर: A-1, B-2, C-3 — रक्षा योजना समिति की अध्यक्षता राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार करते हैं (A-1)। सैन्य मामलों का विभाग रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत है और उसके सचिव पदेन चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ होते हैं (B-2)। रक्षा खुफिया एजेंसी तीनों सेनाओं की खुफिया आवश्यकताओं के समन्वय हेतु 2019 में स्थापित की गई (C-3)।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत और कनाडा के बीच आयोजित पहले रक्षा संवाद को रक्षा कूटनीति के उस विस्तार के रूप में देखा जाता है, जिसमें सहयोग के संस्थागत तंत्र सीधे संधि-बद्ध गठबंधन के बजाय संवाद के माध्यम से विकसित किए जाते हैं। ऐसे संवादों की भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि क्या इस प्रकार के संवादों को बाध्यकारी रक्षा समझौतों में परिवर्तित करने पर संसदीय अनुमोदन आवश्यक होगा और ऐसा न होने पर संवैधानिक एवं नीतिगत क्या परिणाम हो सकते हैं। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल उत्तर संरचना: (1) भूमिका: प्रेस विज्ञप्ति के आधार पर भारत-कनाडा रक्षा संवाद का पहला आयोजन; रक्षा संवाद बनाम रक्षा समझौते की अवधारणात्मक भिन्नता स्पष्ट करें। (2) रक्षा संवाद की भूमिका: विश्वास-निर्माण, नीति-समन्वय, रक्षा उद्योग एवं प्रशिक्षण सहयोग, समुद्री सुरक्षा (UNCLOS, 1982 के ढांचे में) के संदर्भ में। हिंद-प्रशांत रणनीति के संदर्भ में कनाडा की हिंद-प्रशांत रणनीति (2022) और भारत की एक्ट ईस्ट नीति (2014 से) का तुलनात्मक संदर्भ दें। (3) सैद्धांतिक दृष्टिकोण: यथार्थवाद (केनेथ वॉल्ट्ज़ का शक्ति संतुलन) बनाम संस्थागत उदारवाद (रॉबर्ट कोहेन/कीओहेन का नव-उदारवादी संस्थावाद); कौटिल्य का मंडल सिद्धांत भी संदर्भ के रूप में जोड़ा जा सकता है। (4) संवैधानिक विश्लेषण: अनुच्छेद 73 के अंतर्गत संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार; संधि-निर्माण में कार्यपालिका की भूमिका; अनुच्छेद 253 के अंतर्गत संसद की विधायी शक्ति, जो तभी प्रासंगिक होती है जब संधि के लिए घरेलू विधि-परिवर्तन आवश्यक हो; संसदीय रक्षा समिति की निगरानी की भूमिका। (5) परिणाम वाला भाग: बाध्यकारी समझौते में बदलने पर विधायी अनुसमर्थन की आवश्यकता कब होगी और न होने पर लोकतांत्रिक जवाबदेही, पारदर्शिता तथा नीति की निरंतरता पर प्रभाव। (6) संतुलित निष्कर्ष: संवाद के लचीलेपन और जवाबदेही के बीच संतुलन; सरकार के बदलने पर नीति-निरंतरता का प्रश्न।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
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