20 Jul न्यायिक जवाबदेही और कॉलेजियम प्रणाली: क्या हैं प्रमुख चुनौतियां?
भारतीय संविधान ने विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया है। न्यायपालिका को संविधान का संरक्षक और नागरिकों के मौलिक अधिकारों का रक्षक माना गया है। लेकिन जब न्यायपालिका खुद सवालों के घेरे में आती है, तो एक प्राचीन लैटिन उक्ति बरबस याद आ जाती है— “Quis custodiet ipsos custodes?” (अर्थात: पहरेदारों पर पहरा कौन रखेगा?)
हाल ही में (2025-2026), भ्रष्टाचार और कदाचार के आरोपों से घिरे इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक पूर्व न्यायाधीश (जस्टिस यशवंत वर्मा) द्वारा महाभियोग की जांच पूरी होने से पहले ही इस्तीफा देने के मामले ने इस बहस को फिर से ज्वलंत कर दिया है कि क्या इस्तीफा देकर न्यायाधीश अपनी जवाबदेही से बच सकते हैं।
यह लेख भारत में न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायिक जवाबदेही के बीच के तनावपूर्ण संबंधों, कॉलेजियम प्रणाली की खामियों और भविष्य के सुधारों का गहन विश्लेषण करता है।
1. न्यायिक स्वतंत्रता बनाम न्यायिक जवाबदेही का संवैधानिक द्वंद्व
भारत में न्यायिक स्वतंत्रता को संविधान की ‘मूल संरचना’ का हिस्सा माना गया है (केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, 1973)। न्यायपालिका को स्वतंत्र रखना इसलिए आवश्यक है ताकि वह बिना किसी राजनीतिक या कार्यकारी दबाव के निष्पक्ष न्याय दे सके।
संविधान में न्यायिक स्वतंत्रता के प्रावधान:
कार्यकाल की सुरक्षा : अनुच्छेद 124(4) और 217 के तहत किसी भी न्यायाधीश को केवल ‘साबित कदाचार’ या ‘अक्षमता’ के आधार पर जटिल संसदीय महाभियोग द्वारा ही हटाया जा सकता है।
संसदीय चर्चा पर रोक: अनुच्छेद 121 और 211 के तहत संसद या राज्य विधानसभाओं में किसी न्यायाधीश के आचरण पर तब तक चर्चा नहीं की जा सकती, जब तक कि उसे हटाने का प्रस्ताव विचाराधीन न हो।
संचित निधि पर भारित व्यय: न्यायाधीशों का वेतन और भत्ते भारत की संचित निधि से दिए जाते हैं, जिस पर संसद में मतदान नहीं होता।
जवाबदेही की आवश्यकता क्यों?
स्वतंत्रता का अर्थ निरंकुशता नहीं है। एक लोकतांत्रिक गणराज्य में कोई भी संस्था जनता के प्रति जवाबदेही से मुक्त नहीं हो सकती। जब न्यायाधीशों की नियुक्ति, स्थानांतरण या उनके आचरण में पारदर्शिता का अभाव होता है, तो न्यायपालिका से जनता का विश्वास उठने लगता है, जो लोकतंत्र के लिए घातक है।
2. कॉलेजियम प्रणाली: पारदर्शिता का सबसे बड़ा संकट
भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहां ‘न्यायाधीश ही न्यायाधीशों की नियुक्ति करते हैं’। यह व्यवस्था संविधान में मूल रूप से नहीं थी, बल्कि यह न्यायपालिका द्वारा स्वयं निर्मित (Extra-constitutional) है।
कॉलेजियम का विकास
प्रथम न्यायाधीश मामला (1981): सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश (CJI) की सलाह को कार्यकारी सरकार ठोस कारणों से खारिज कर सकती है। (यहाँ कार्यपालिका हावी रही)।
द्वितीय (1993) और तृतीय न्यायाधीश मामला (1998): न्यायपालिका ने सत्ता पलटते हुए कहा कि नियुक्ति में CJI और वरिष्ठ न्यायाधीशों के ‘कॉलेजियम’ की राय अंतिम और बाध्यकारी होगी।
चतुर्थ न्यायाधीश मामला (2015): संसद ने न्यायपालिका में जवाबदेही और पारदर्शिता लाने के लिए 99वां संविधान संशोधन पारित कर राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) बनाया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे “न्यायिक स्वतंत्रता में कार्यपालिका का हस्तक्षेप” मानते हुए असंवैधानिक घोषित कर दिया।
कॉलेजियम की वर्तमान कमियां:
अपारदर्शिता : नियुक्तियों और तबादलों का निर्णय बंद कमरों में होता है। इसकी कोई आधिकारिक ‘मिनट्स’ या चयन के मानदंड सार्वजनिक नहीं किए जाते हैं।
‘अंकल जज’ सिंड्रोम : विधि आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में इशारा किया था कि भाई-भतीजावाद हावी रहता है। कई बार उच्च न्यायालयों में ऐसे लोगों को नियुक्त किया जाता है जिनके रिश्तेदार पहले से न्यायपालिका में हैं।
वरिष्ठता की अनदेखी : कई बार वरिष्ठ जजों की अनदेखी कर कनिष्ठ जजों को सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत किया जाता है, जिसके कारण सार्वजनिक रूप से कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया जाता।
3. न्यायिक कदाचार और मौजूदा जवाबदेही तंत्र की विफलता
वर्तमान में न्यायाधीशों को उनके पद से हटाने या अनुशासित करने के लिए मौजूद तंत्र पूरी तरह से अप्रभावी साबित हुए हैं:
(a) महाभियोग प्रक्रिया
न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 (Judges Inquiry Act, 1968) के तहत महाभियोग की प्रक्रिया इतनी राजनीतिक और जटिल है कि आज तक भारत के इतिहास में किसी भी न्यायाधीश को महाभियोग द्वारा नहीं हटाया जा सका है।
जस्टिस वी. रामास्वामी (1993): जांच समिति ने उन्हें दोषी पाया, लेकिन लोकसभा में कांग्रेस पार्टी के वॉकआउट के कारण प्रस्ताव गिर गया।
जस्टिस पी.डी. दिनाकरन (2011) और जस्टिस यशवंत वर्मा (2025-26): जब महाभियोग की तलवार लटकी, तो इन न्यायाधीशों ने जांच पूरी होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया। इससे कानूनी शून्यता (Legal Vacuum) पैदा हो जाती है कि इस्तीफा देने के बाद जवाबदेही तय होगी या नहीं।
(b) इन-हाउस प्रोसीजर
सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों से निपटने के लिए एक ‘इन-हाउस’ प्रणाली बनाई थी। हालांकि, यह पूरी तरह से गुप्त है। शिकायतकर्ता को यह जानने का कोई अधिकार नहीं है कि उसकी शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई।
(c) अवमानना का हथियार
न्यायपालिका की आलोचना को अक्सर ‘अदालत की अवमानना’ (Contempt of Court) का नोटिस देकर दबा दिया जाता है। रचनात्मक आलोचना (Constructive Criticism) और अवमानना के बीच की बारीक रेखा को न्यायाधीश स्वयं तय करते हैं, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत— “Nemo judex in causa sua” (कोई भी व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता)— का उल्लंघन है।
4. विवाद के अन्य उभरते मुद्दे
विवाद का क्षेत्र मुख्य चिंताएँ
सेवानिवृत्ति के बाद की नियुक्तियां
सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट से रिटायर होने के तुरंत बाद जजों को राज्यपाल, राज्यसभा सांसद या ट्रिब्यूनल का अध्यक्ष बना दिया जाता है। इससे यह संदेह पैदा होता है कि क्या जज ने सरकार के पक्ष में फैसला किसी भविष्य के पद (Quid Pro Quo) के लालच में दिया था?
सूचना का अधिकार (RTI) 2019 में एक ऐतिहासिक फैसले (SC vs. Subhash Chandra Agarwal) में सीजेआई (CJI) कार्यालय को RTI के दायरे में लाया गया। लेकिन व्यवहार में, कॉलेजियम के निर्णयों को ‘गोपनीयता’ का हवाला देकर आज भी RTI से बाहर रखा जाता है।
मास्टर ऑफ रोस्टर CJI को यह विशेषाधिकार है कि वह तय करे कि कौन सा केस किस बेंच (खंडपीठ) के पास जाएगा। इसका मनमाना उपयोग राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों के नतीजों को प्रभावित कर सकता है।
5. आगे की राह: संतुलन कैसे स्थापित करें? (The Way Forward)
न्यायपालिका की स्वतंत्रता से समझौता किए बिना, उसकी जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित बहुआयामी सुधारों (Multi-dimensional Reforms) की तत्काल आवश्यकता है:
MoP (Memorandum of Procedure) को अंतिम रूप देना:
कॉलेजियम और सरकार के बीच न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए MoP को जल्द से जल्द संशोधित और लागू किया जाना चाहिए। इसमें नियुक्ति के मानदंड, खुफिया विभाग (IB) की रिपोर्ट की समय-सीमा और अस्वीकृति के कारण स्पष्ट होने चाहिए।
एक स्थायी और स्वतंत्र शिकायत आयोग :
महाभियोग जैसी दुर्लभ और जटिल प्रक्रिया के स्थान पर, एक स्थायी ‘न्यायिक मानक और शिकायत आयोग’ का गठन होना चाहिए। 2010 में ‘न्यायिक मानक और जवाबदेही विधेयक’ (Judicial Standards and Accountability Bill) लाया गया था, जो लैप्स हो गया। इसे नए स्वरूप में वापस लाया जाना चाहिए।
न्यायिक प्रदर्शन सूचकांक :
जजों के प्रमोशन के लिए एक वस्तुनिष्ठ डेटा-ड्रिवन प्रणाली होनी चाहिए। इसमें जज द्वारा निपटाए गए मामलों की संख्या, निर्णयों की गुणवत्ता और कार्य-संस्कृति का मूल्यांकन होना चाहिए, न कि केवल वरिष्ठता का।
सेवानिवृत्ति के बाद की नियुक्तियों पर ‘कूलिंग-ऑफ’ अवधि:
न्यायिक निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए, सेवानिवृत्ति के बाद किसी भी सरकारी या राजनीतिक पद को ग्रहण करने से पहले कम से कम 2 से 3 वर्ष की ‘कूलिंग-ऑफ अवधि’ (Cooling-off Period) अनिवार्य की जानी चाहिए।
विविधता और समावेश
:
न्यायपालिका को भारत के सामाजिक ताने-बाने का प्रतिनिधित्व करना चाहिए। महिलाओं, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यक समुदायों का उच्च न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए संस्थागत प्रयास होने चाहिए।
निष्कर्ष
प्रसिद्ध अमेरिकी न्यायविद् लुइस ब्रैंडिस (Louis Brandeis) ने कहा था— “सूरज की रोशनी सबसे अच्छी कीटाणुनाशक है” (Sunlight is the best disinfectant)। यह सिद्धांत भारतीय न्यायपालिका पर भी पूरी तरह लागू होता है।
न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायिक जवाबदेही एक-दूसरे के दुश्मन नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। अत्यधिक स्वतंत्रता बिना जवाबदेही के निरंकुशता को जन्म देती है, और अत्यधिक जवाबदेही बिना स्वतंत्रता के न्यायपालिका को सरकार के अधीन कर देती है।
समय आ गया है कि भारतीय न्यायपालिका स्वयं आगे आकर अपने भीतर सुधार करे। यदि न्यायपालिका खुद अपने घर को व्यवस्थित नहीं करेगी, तो कार्यपालिका या विधायिका को हस्तक्षेप करने का मौका मिलेगा, जो शक्ति पृथक्करण के लिए विनाशकारी होगा। एक पारदर्शी और जवाबदेह न्यायपालिका ही जनता के विश्वास की अंतिम धरोहर है।
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