01 Oct क्या पुलिस कन्फेशन एनएसए हिरासत का आधार बन सकता है? सुप्रीम कोर्ट का फैसला समझाया गया
✎ सर्वोच्च न्यायालय ने दोहराया है कि निवारक निरोध एक असाधारण उपाय है और हिरासत में लिया गया इकबालिया बयान अपने आप में NSA के तहत निरोध का आधार नहीं हो सकता, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान, कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्यप्रणाली; सरकार की नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय। | GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा से संबंधित विषय।
- Prelims: निवारक निरोध (Preventive Detention), राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA), अनुच्छेद 22, बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus), भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act), न्यायिक समीक्षा (Judicial Review)
- Essay: भारत में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राज्य की सुरक्षा के बीच संतुलन, निवारक निरोध कानूनों का दुरुपयोग और संवैधानिक सुरक्षा उपाय
त्वरित पुनरावृत्ति: सर्वोच्च न्यायालय ने दोहराया है कि निवारक निरोध एक असाधारण उपाय है और हिरासत में लिया गया इकबालिया बयान अपने आप में NSA के तहत निरोध का आधार नहीं हो सकता, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय ने संभल हिंसा मामले के एक आरोपी मुल्ला अफरोज की राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत निवारक निरोध (Preventive Detention) को रद्द कर दिया। न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया और कहा कि हिरासत में लिया गया इकबालिया बयान (custodial confession) अपने आप में निवारक निरोध को उचित नहीं ठहरा सकता। न्यायालय ने यह भी पाया कि संबंधित अधिकारियों द्वारा भरोसा की गई अन्य सामग्री भी निरोध आदेश को बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं थी। यह निर्णय व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राज्य की सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करने के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
पृष्ठभूमि
- नवंबर 2024 में संभल की शाही जामा मस्जिद के सर्वेक्षण के दौरान हिंसा भड़क उठी, जिसमें चार लोगों की मौत हो गई।
- पुलिस ने मुल्ला अफरोज को हिंसा का ‘मुख्य सूत्रधार’ बताया और 54 दिनों के बाद उसे गिरफ्तार किया, हालांकि उसका नाम पहली FIR में नहीं था।
- पुलिस ने दावा किया कि हिरासत में रहते हुए अफरोज ने एक इकबालिया बयान दिया, जिससे .32 बोर की पिस्तौल बरामद हुई। अफरोज ने आरोप लगाया कि यह बयान ‘यातना और जान से मारने की धमकी’ के तहत लिया गया था।
- सितंबर 2025 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उसे एक आपराधिक मामले में जमानत दे दी। इसके एक महीने बाद, संभल के जिला मजिस्ट्रेट ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 की धारा 3(2) के तहत अफरोज को निवारक निरोध में रखने का आदेश दिया।
- नवंबर 2025 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इस निरोध आदेश की पुष्टि की, जिसे जून 2026 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी बरकरार रखा।
- अफरोज ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया, यह तर्क देते हुए कि उसे प्रासंगिक सामग्री प्रदान नहीं की गई थी और कथित इकबालिया बयान यातना के माध्यम से प्राप्त किया गया था।
- सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि ‘प्रक्रिया को ही दंड बना दिया गया था’ क्योंकि अफरोज को सभी आपराधिक मामलों में जमानत मिलने के बावजूद हिरासत में रखा गया था।
राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) और निवारक निरोध क्या है?
- राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (National Security Act – NSA), 1980, भारत में एक शक्तिशाली कानून है जो सरकार को किसी व्यक्ति को कुछ निश्चित परिस्थितियों में निवारक निरोध (Preventive Detention) में रखने का अधिकार देता है।
- निवारक निरोध का अर्थ है किसी व्यक्ति को भविष्य में अपराध करने से रोकने के उद्देश्य से बिना किसी मुकदमे के हिरासत में लेना। यह आपराधिक न्याय प्रणाली के सामान्य सिद्धांत से भिन्न है, जहाँ किसी व्यक्ति को अपराध करने के बाद दंडित किया जाता है।
- संविधान का अनुच्छेद 22 निवारक निरोध से संबंधित प्रावधानों को निर्धारित करता है, जिसमें निरोध के आधारों की सूचना देने का अधिकार, प्रतिनिधित्व करने का अवसर और तीन महीने से अधिक के निरोध के लिए सलाहकार बोर्ड की आवश्यकता शामिल है।
- NSA की धारा 3(2) राज्य सरकार को किसी व्यक्ति को निरोध में रखने की अनुमति देती है यदि वह संतुष्ट है कि ऐसा निरोध ‘राज्य की सुरक्षा के प्रतिकूल किसी भी तरीके से कार्य करने से’ या ‘सार्वजनिक व्यवस्था के रखरखाव के प्रतिकूल किसी भी तरीके से कार्य करने से’ या ‘समुदाय के लिए आवश्यक आपूर्ति और सेवाओं के रखरखाव के प्रतिकूल किसी भी तरीके से कार्य करने से’ रोकने के लिए आवश्यक है।
- पुलिस हिरासत में दिया गया इकबालिया बयान तब तक अस्वीकार्य है जब तक कि वह मजिस्ट्रेट की तत्काल उपस्थिति में न दिया गया हो।
- सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में दोहराया कि निवारक निरोध को ‘अत्यंत सावधानी के साथ और केवल दुर्लभतम मामलों में ही लागू किया जाना चाहिए’।
- न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि हिरासत में लिया गया इकबालिया बयान अपने आप में निवारक निरोध को उचित नहीं ठहरा सकता।
- यह निर्णय निवारक निरोध कानूनों के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा पर जोर देता है और न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के महत्व को रेखांकित करता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| निवारक निरोध (Preventive Detention) | राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या आवश्यक सेवाओं के रखरखाव के लिए व्यक्तियों को बिना मुकदमे के हिरासत में लेने की अनुमति देता है। |
| पुलिस हिरासत में इकबालिया बयान | भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) के तहत पुलिस अधिकारी के सामने दिया गया इकबालिया बयान अभियुक्त के खिलाफ साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं होता है। |
| न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) | सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों को निवारक निरोध आदेशों की वैधता की जांच करने का अधिकार है, ताकि नागरिक स्वतंत्रता का हनन न हो। |
| व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार | संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण) और अनुच्छेद 22 (कुछ मामलों में गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण) के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकार। |
| कानून के शासन का सिद्धांत | यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है और सभी सरकारी कार्रवाइयां कानून के दायरे में होनी चाहिए। |
महत्व
कानूनी और संवैधानिक महत्व
- सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय निवारक निरोध कानूनों के दुरुपयोग को रोकने में महत्वपूर्ण है, विशेषकर जब व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रश्न उठता है।
- यह ‘प्रक्रिया ही दंड बन जाती है’ (process was made the punishment) की अवधारणा को रेखांकित करता है, जहाँ व्यक्ति को आपराधिक मामलों में जमानत मिलने के बाद भी हिरासत में रखा जाता है।
- यह फैसला पुलिस हिरासत में दिए गए इकबालिया बयानों की साक्ष्य के रूप में स्वीकार्यता की सीमाओं को पुनः स्थापित करता है, जो भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023) के प्रावधानों के अनुरूप है।
शासन और प्रशासन पर प्रभाव
- यह राज्य सरकारों और जिला मजिस्ट्रेटों को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (National Security Act – NSA) जैसे कठोर कानूनों को लागू करते समय अत्यधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता पर बल देता है।
- यह निर्णय अधिकारियों को निवारक निरोध आदेश पारित करते समय ठोस और कानूनी रूप से स्वीकार्य सामग्री पर निर्भर रहने के लिए प्रोत्साहित करेगा, न कि संदिग्ध या अपर्याप्त साक्ष्यों पर।
नागरिक स्वतंत्रता और मानवाधिकार
- यह नागरिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम करता है, यह सुनिश्चित करता है कि राज्य की सुरक्षा के नाम पर व्यक्तियों के अधिकारों का अनुचित हनन न हो।
- यह न्यायपालिका की भूमिका को मजबूत करता है, जो कार्यपालिका के मनमाने कृत्यों के खिलाफ नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करती है।
चुनौतियाँ
1. निवारक निरोध कानूनों का दुरुपयोग
- राज्य सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के नाम पर व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करने के लिए इन कानूनों का दुरुपयोग किया जा सकता है।
- अक्सर, इन कानूनों का उपयोग उन व्यक्तियों को हिरासत में रखने के लिए किया जाता है जिन्हें सामान्य आपराधिक कानूनों के तहत जमानत मिल चुकी होती है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान: मौलिक अधिकार, कार्यपालिका
2. पुलिस हिरासत में इकबालिया बयान की स्वीकार्यता
- पुलिस हिरासत में दिए गए बयानों को अक्सर दबाव या यातना के तहत प्राप्त किया जाता है, जिससे उनकी विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाती है।
- कानून स्पष्ट रूप से पुलिस अधिकारी के सामने दिए गए इकबालिया बयान को साक्ष्य के रूप में अस्वीकार्य मानता है, लेकिन व्यवहार में इसका उल्लंघन होता है।
यूपीएससी लिंक: आपराधिक न्याय प्रणाली, साक्ष्य कानून
3. न्यायिक समीक्षा की प्रभावशीलता
- निवारक निरोध आदेशों को चुनौती देने की प्रक्रिया लंबी और जटिल हो सकती है, जिससे व्यक्ति लंबे समय तक हिरासत में रह सकता है।
- न्यायालयों को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे कार्यपालिका के ‘संतुष्टि’ के दावे की गहन जांच करें, न कि केवल औपचारिकता पूरी करें।
यूपीएससी लिंक: न्यायपालिका की संरचना और कार्यप्रणाली
4. राज्य और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन
- राज्य को सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा बनाए रखने की आवश्यकता है, लेकिन यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार की कीमत पर नहीं होना चाहिए।
- यह संतुलन बनाए रखना एक सतत चुनौती है, जिसके लिए सतर्क न्यायिक निगरानी की आवश्यकता होती है।
यूपीएससी लिंक: संविधान: मौलिक अधिकार, राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| पुलिस इकबालिया बयान | भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत स्वीकार्य नहीं, फिर भी निवारक निरोध के आधार के रूप में उपयोग। |
| अघोषित सीसीटीवी फुटेज | अभियुक्त को उपलब्ध न कराई गई सामग्री पर भरोसा करना, जो निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांत का उल्लंघन है। |
| जमानत के बाद भी हिरासत | आपराधिक मामलों में जमानत मिलने के बावजूद NSA के तहत हिरासत में रखना, ‘प्रक्रिया ही दंड’ बन जाती है। |
| पर्याप्त सामग्री का अभाव | निरोध आदेश पारित करने के लिए पर्याप्त और कानूनी रूप से टिकाऊ सामग्री का न होना। |
| अधिकारियों पर 10 लाख का जुर्माना | राज्य मशीनरी द्वारा नागरिक स्वतंत्रता के उल्लंघन पर न्यायपालिका की गंभीर प्रतिक्रिया। |
आगे की राह
- निवारक निरोध कानूनों के उपयोग की सख्त निगरानी की जाए ताकि उनके दुरुपयोग को रोका जा सके।
- पुलिस हिरासत में दिए गए इकबालिया बयानों को साक्ष्य के रूप में स्वीकार न करने के कानूनी प्रावधानों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए।
- निरोध आदेश पारित करने वाले अधिकारियों को कानूनी प्रावधानों और सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों के बारे में नियमित प्रशिक्षण दिया जाए।
- न्यायिक समीक्षा प्रक्रिया को मजबूत और त्वरित किया जाए ताकि निवारक निरोध के मामलों में नागरिक स्वतंत्रता का शीघ्र संरक्षण हो सके।
- राज्य और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए एक स्पष्ट नीतिगत ढांचा विकसित किया जाए।
- अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि निरोध आदेश के आधार पर सभी प्रासंगिक सामग्री अभियुक्त को उपलब्ध कराई जाए, ताकि उसे अपना बचाव करने का अवसर मिल सके।
- नागरिक समाज और मानवाधिकार संगठनों को निवारक निरोध कानूनों के तहत होने वाले उल्लंघनों पर नजर रखने और उन्हें उजागर करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
निवारक निरोध · राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) · व्यक्तिगत स्वतंत्रता · न्यायिक समीक्षा · पुलिस हिरासत · इकबालिया बयान · भारतीय साक्ष्य अधिनियम · अनुच्छेद 22 · संवैधानिक सुरक्षा उपाय · कानून का शासन
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 22’, ‘note’: ‘गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण’}
अवधारणा प्रवाह
संभल हिंसा के दौरान गिरफ्तारी → पुलिस हिरासत में कथित इकबालिया बयान → आपराधिक मामलों में जमानत मिलना → NSA के तहत निवारक निरोध आदेश जारी → उच्च न्यायालय द्वारा निरोध आदेश को बरकरार रखना → सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निरोध आदेश रद्द करना
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA), 1980 के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने का अधिकार देता है यदि वे संतुष्ट हैं कि ऐसा करना राज्य की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के रखरखाव के लिए आवश्यक है।
2. अधिनियम के तहत हिरासत में लिए गए व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है।
3. हिरासत में लिए गए व्यक्ति को हिरासत के आधार के बारे में सूचित किया जाना चाहिए, सिवाय उन मामलों के जहाँ सार्वजनिक हित में ऐसा करना अनुपयुक्त माना जाता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। NSA केंद्र और राज्य सरकारों को राज्य की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के रखरखाव के लिए निवारक निरोध का अधिकार देता है। कथन 2 गलत है। NSA के तहत हिरासत में लिए गए व्यक्ति को अनुच्छेद 22(2) के तहत 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने का संवैधानिक अधिकार नहीं मिलता है, क्योंकि यह निवारक निरोध कानून है। कथन 3 सही है। हिरासत में लिए गए व्यक्ति को हिरासत के आधारों के बारे में सूचित किया जाना चाहिए, सिवाय उन मामलों के जहाँ सार्वजनिक हित में ऐसा करना अनुपयुक्त माना जाता है।
Q2. अभिकथन (A): भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 23 के अनुसार, पुलिस अधिकारी को दिया गया कोई भी इकबालिया बयान अभियुक्त के खिलाफ साबित नहीं किया जा सकता है।
कारण (R): यह प्रावधान पुलिस हिरासत में यातना और जबरदस्ती से प्राप्त बयानों को रोकने के लिए है, ताकि न्याय के सिद्धांतों को बनाए रखा जा सके।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 23 (जो भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 25 का स्थान लेती है) स्पष्ट रूप से कहती है कि पुलिस अधिकारी को दिया गया कोई भी इकबालिया बयान अभियुक्त के खिलाफ साबित नहीं किया जा सकता है। कारण (R) भी सही है और यह अभिकथन की सही व्याख्या करता है। यह प्रावधान पुलिस द्वारा बलपूर्वक या यातना के माध्यम से इकबालिया बयान प्राप्त करने से रोकने के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय है, जिससे निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित होती है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ निवारक निरोध (Preventive Detention) की अवधारणा की व्याख्या कीजिए और राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए संवैधानिक और न्यायिक सुरक्षा उपायों पर चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** निवारक निरोध की परिभाषा और उद्देश्य।
2. **संवैधानिक प्रावधान:** भारतीय संविधान के अनुच्छेद 22(3), 22(4), 22(5) और 22(6) का उल्लेख, जो निवारक निरोध से संबंधित हैं।
3. **राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA), 1980:** अधिनियम के मुख्य प्रावधान, विशेष रूप से धारा 3(2) जिसके तहत व्यक्तियों को हिरासत में लिया जा सकता है।
4. **दुरुपयोग की संभावना:** पुलिस हिरासत में दिए गए इकबालिया बयानों, अपर्याप्त सामग्री और जमानत मिलने के बाद भी हिरासत जारी रखने जैसे मुद्दों पर प्रकाश डालना।
5. **न्यायिक सुरक्षा उपाय:**
* **सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय:** संभल मामले में सर्वोच्च न्यायालय का हालिया निर्णय, जिसमें हिरासत के आधारों की अनुपस्थिति और इकबालिया बयानों पर निर्भरता को अस्वीकार किया गया।
* **न्यायिक समीक्षा की भूमिका:** न्यायालयों द्वारा निवारक निरोध आदेशों की वैधता की जांच, यह सुनिश्चित करना कि प्रक्रिया का पालन किया गया है और हिरासत मनमानी नहीं है।
* **’प्रक्रिया ही दंड बन गई’ सिद्धांत:** सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस बात पर जोर कि जमानत मिलने के बावजूद हिरासत जारी रखना व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन है।
6. **संवैधानिक सुरक्षा उपाय:**
* **सलाहकार बोर्ड (Advisory Board):** अनुच्छेद 22(4) के तहत सलाहकार बोर्ड की भूमिका।
* **हिरासत के आधारों की सूचना:** अनुच्छेद 22(5) के तहत हिरासत में लिए गए व्यक्ति को हिरासत के आधारों की सूचना देने का अधिकार।
* **अभ्यावेदन का अधिकार:** अनुच्छेद 22(5) के तहत हिरासत में लिए गए व्यक्ति को अपने अभ्यावेदन प्रस्तुत करने का अधिकार।
7. **निष्कर्ष:** निवारक निरोध और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर बल, कानून के शासन और संवैधानिक सिद्धांतों का सम्मान सुनिश्चित करना।
स्रोत: The Indian Express
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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