27 Oct जलवायु न्याय: नेपाल को मिला 21.6 मिलियन डॉलर, जानिए क्या है इसका महत्व और चुनौतियाँ
✎ हानि और क्षति कोष (FLD) क्षतिपूर्ति के सिद्धांत पर आधारित है, दान पर नहीं; इसकी सबसे बड़ी चुनौती प्रतिज्ञाओं की कमी और अनुदान-वितरण में विलंब है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — अंतरराष्ट्रीय संबंध (जलवायु वार्ता, UNFCCC और COP की प्रक्रिया, विकसित तथा विकासशील देशों के बीच उत्तरदायित्व का प्रश्न) | GS Paper III — पर्यावरण और आपदा प्रबंधन (जलवायु परिवर्तन, जलवायु वित्त, हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर-जनित आपदाएँ, आपदा के बाद पुनर्निर्माण)
- Prelims: हानि और क्षति कोष (FLD) — COP27 (2022) में स्थापित, 2023 में परिचालित, जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ़्रेमवर्क सम्मेलन (UNFCCC), पक्षकारों का सम्मेलन (COP) और COP31 का आयोजन स्थल (अंतल्या, तुर्की), हानि और क्षति की अवधारणा और वारसा अंतरराष्ट्रीय तंत्र (Warsaw International Mechanism), 2013, पेरिस समझौता और उसका अनुच्छेद 8 (हानि और क्षति से संबंधित प्रावधान), साझा किंतु विभेदित उत्तरदायित्व और संबंधित क्षमताएँ (CBDR-RC) का सिद्धांत, जलवायु वित्त और जलवायु अनुकूलन तथा शमन में अंतर, हिमालयी क्षेत्र: हिमस्खलन और अचानक बाढ़ (flash flood) जैसी आपदाएँ
- Essay: जलवायु न्याय की अवधारणा में क्षतिपूर्ति, दान से भिन्न क्यों है? हानि और क्षति कोष की सीमाओं के संदर्भ में विवेचना कीजिए।, आपदा-प्रभावित देशों को जलवायु क्षतिपूर्ति में विलंब क्यों घातक है? त्वरित और पूर्वानुमेय वित्तीय तंत्र की आवश्यकता पर चर्चा कीजिए।
त्वरित पुनरावृत्ति: हानि और क्षति कोष (FLD) क्षतिपूर्ति के सिद्धांत पर आधारित है, दान पर नहीं; इसकी सबसे बड़ी चुनौती प्रतिज्ञाओं की कमी और अनुदान-वितरण में विलंब है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
नेपाल में ग्लेशियर-जनित हिम-चट्टान (ice-and-rock) हिमस्खलन से आई अचानक बाढ़ के लगभग दो महीने बाद, हानि और क्षति कोष (FLD) ने नेपाल को 21.6 मिलियन डॉलर का अनुदान स्वीकृत किया है। यह किसी आपदा-प्रभावित देश के लिए कोष द्वारा दिया गया पहला अनुदान है। इस घटना ने अनुदान वितरण में होने वाले विलंब, कोष के सीमित संसाधनों और विकसित देशों की इस आशंका को फिर से केंद्र में ला दिया है कि ऐसी व्यवस्था अन्य देशों के लिए स्थायी प्रतिमान न बन जाए। अगला बड़ा मंच COP31 है, जो 9 नवंबर से तुर्की के अंतल्या में आरंभ होगा और जिसके एजेंडे में सबसे अधिक प्रभावित देशों की क्षतिपूर्ति शामिल है।
पृष्ठभूमि
- हानि और क्षति की अवधारणा को अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ता में लगभग तीन दशकों के अभियान के बाद मान्यता मिली, जिसे सबसे संवेदनशील देशों ने आगे बढ़ाया। वारसा अंतरराष्ट्रीय तंत्र (2013) इस दिशा में पहला संस्थागत कदम था।
- पेरिस समझौता (2015) के अनुच्छेद 8 में हानि और क्षति को स्वीकार किया गया, परंतु इसे उत्तरदायित्व या दायित्व से जोड़ने पर विकसित और विकासशील देशों में मतभेद बना रहा।
- FLD की स्थापना COP27 (मिस्र, 2022) में हुई और इसे 2023 में परिचालन में लाया गया। इसका आधार ‘क्षतिपूर्ति’ है, न कि परोपकारी सहायता।
- नेपाल के मामले में आवेदन की खिड़की जून में बंद हो चुकी थी और उस समय 119 देशों के दावे लंबित थे। विकसित देशों ने इसे ‘कतार तोड़ने’ का मामला बताया और अनुदान को अपवाद के रूप में स्वीकृत किया।
- कोष के पास प्रतिज्ञाएँ (pledges) लगभग 822 मिलियन डॉलर की हैं, जो लंबित दावों के लगभग एक-तिहाई के बराबर है। सीमित संसाधन कोष की प्रभावशीलता को सीधे प्रभावित करते हैं।
हानि और क्षति कोष (FLD) क्या है?
- हानि और क्षति कोष UNFCCC के अंतर्गत एक वित्तीय व्यवस्था है, जो जलवायु परिवर्तन से होने वाली ऐसी हानियों की भरपाई के लिए बनी है जिन्हें शमन या अनुकूलन के उपायों से पूरी तरह रोका नहीं जा सकता।
- इसकी स्थापना COP27 में हुई और इसे 2023 में परिचालित किया गया। यह कोष पेरिस समझौते के तहत गठित व्यवस्थाओं से अलग, किंतु उसी वार्ता-ढाँचे का हिस्सा है।
- इसका मूल सिद्धांत क्षतिपूर्ति है, परोपकार नहीं। यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे ऐतिहासिक उत्तरदायित्व का प्रश्न जुड़ा है।
- कोष का संचालन वित्तीय प्रतिज्ञाओं और स्वैच्छिक योगदान पर निर्भर है; इसलिए प्रतिज्ञाओं और वास्तविक दावों के बीच का अंतर इसकी मुख्य चुनौती है।
- विकासशील और अत्यधिक संवेदनशील देश, जैसे छोटे द्वीपीय राष्ट्र और कम विकसित देश, इसके प्रमुख लाभार्थी माने जाते हैं।
- हानि और क्षति के मामलों में अनुदान का त्वरित वितरण इसलिए आवश्यक है, क्योंकि विलंब से पुनर्निर्माण की लागत बढ़ती है और आवश्यक सेवाओं की बहाली धीमी होती है।
- नेपाल के मामले में पूर्वानुमान यह है कि आपदा के बाद पुनर्निर्माण की आवश्यकता लगभग 5 अरब डॉलर आँकी गई है, जबकि 21.6 मिलियन डॉलर का अनुदान उसकी तुलना में बहुत सीमित है।
- यह कोष जलवायु वित्त के व्यापक ढाँचे का हिस्सा है, जिसमें शमन और अनुकूलन के लिए चल रही वित्तीय व्यवस्थाएँ भी शामिल हैं; किंतु हानि और क्षति इन दोनों से भिन्न श्रेणी है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| हानि और क्षति कोष (Fund for Loss and Damage – FLD) | जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से हुई क्षति की भरपाई के लिए बना वित्तीय तंत्र, जिसे जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र रूपरेखा सम्मेलन (UNFCCC) के अंतर्गत स्थापित किया गया है। |
| स्थापना और परिचालन | COP27 (2022) में स्थापित, और 2023 में परिचालन आरंभ। यह लगभग तीन दशक लंबे अभियान का परिणाम है, जिसे सबसे अधिक संवेदनशील देशों ने चलाया। |
| सिद्धांत: क्षतिपूर्ति, दान नहीं | कोष का आधार जलवायु न्याय (Climate Justice) का वह सिद्धांत है, जिसके अनुसार जलवायु संकट से सर्वाधिक प्रभावित देशों को क्षतिपूर्ति का अधिकार है। यह मानवीय सहायता से भिन्न है। |
| नेपाल को पहला अनुदान | नेपाल को 21.6 मिलियन डॉलर का अनुदान मिला। यह कोष द्वारा किसी आपदा-प्रभावित देश के लिए स्वीकृत पहला अनुदान है। इस अनुदान और पुनर्निर्माण आवश्यकता (लगभग 5 बिलियन डॉलर) के बीच बड़ा अंतर है। |
| वित्तीय स्थिति | कोष को 822 मिलियन डॉलर की प्रतिज्ञाएँ प्राप्त हुई हैं, जो लंबित दावों के लगभग एक-तिहाई के बराबर है। इससे कोष की क्षमता सीमित है। |
| नेपाल की आपदा का स्वरूप | हिमस्खलन से उत्पन्न आकस्मिक बाढ़ (Flash Flood) ने भोटेकोशी और त्रिशूली नदी प्रणालियों को प्रभावित किया। इसमें 1,400 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई और कम से कम 10 प्रतिशत जलविद्युत सुविधाएँ नष्ट हुईं। नेपाल का वैश्विक उत्सर्जन में हिस्सा लगभग 0.1 प्रतिशत है। |
महत्व
पर्यावरणीय और मानवीय
- हानि और क्षति कोष यह मान्यता देता है कि जलवायु आपदाओं से होने वाला नुकसान केवल शमन (Mitigation) और अनुकूलन (Adaptation) से पूरी तरह नहीं रोका जा सकता।
- आपदा के बाद समय पर अनुदान मिलने से प्रभावित समुदायों की कठिनाइयाँ कम होती हैं और आवश्यक सेवाएँ जल्दी बहाल होती हैं।
- पुनर्निर्माण में देरी से लागत बढ़ती है, इसलिए त्वरित वित्तीय सहायता आर्थिक दृष्टि से भी आवश्यक है।
आर्थिक
- जलविद्युत सुविधाओं का नुकसान नेपाल की ऊर्जा आपूर्ति और निर्यात आय दोनों को प्रभावित करता है। छोटी और निर्धन अर्थव्यवस्थाओं के लिए ऐसे झटके बजट पर गंभीर दबाव डालते हैं।
- पुनर्निर्माण की अनुमानित आवश्यकता बड़ी होने से यह स्पष्ट होता है कि आपदा-उपरांत वित्तीय ढाँचे का आकार वास्तविक जरूरतों के अनुरूप होना चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और शासन
- यह कोष जलवायु वार्ताओं में विकसित और विकासशील देशों के बीच उत्तरदायित्व के प्रश्न से जुड़ा है। इसी कारण विकसित देश इसे सावधानी से आगे बढ़ाते हैं।
- COP31 (एंटाल्या, तुर्की, 9 नवंबर से) के एजेंडे में इस कोष की कमियाँ और जलवायु क्षतिपूर्ति प्रमुख विषय होंगे।
- पेरिस समझौते (2015) का अनुच्छेद 8 हानि और क्षति को एक अलग विषय के रूप में मान्यता देता है, जिससे कोष की नीतिगत पृष्ठभूमि जुड़ती है।
चुनौतियाँ
1. प्रक्रियागत विलंब
- नेपाल का आवेदन कोष की आवेदन-विंडो बंद होने के बाद आया, और उस समय 119 देशों के दावे स्वीकृति की प्रतीक्षा में थे।
- आपातकालीन स्थितियों के लिए कोई स्थायी त्वरित-प्रतिक्रिया (Rapid Response) तंत्र न होने से निर्णय में समय लगता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ और उनकी कार्यप्रणाली
2. वित्तीय अपर्याप्तता
- 822 मिलियन डॉलर की प्रतिज्ञाएँ लंबित दावों के लगभग एक-तिहाई के बराबर हैं, जिससे अधिकांश दावे अधूरे रह जाते हैं।
- प्रतिज्ञा और वास्तविक भुगतान के बीच का अंतर कोष की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: अंतरराष्ट्रीय वित्त और जलवायु वित्तपोषण
3. उत्तरदायित्व बनाम दान का विवाद
- हानि और क्षति कोष में उत्तरदायित्व का प्रश्न जुड़ा होने से विकसित देश इसे मानवीय सहायता की तरह सीमित रखना चाहते हैं।
- ‘अपवाद, मिसाल नहीं’ की शर्त से यह संकेत मिलता है कि स्थायी दायित्व पर सहमति अभी सीमित है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: भारत और विश्व के संदर्भ में विकसित तथा विकासशील देशों की भूमिका
4. निर्धन देशों की वित्तीय संवेदनशीलता
- सीमित बजट वाले देश अचानक हुए नुकसान को अपने संसाधनों से सहन नहीं कर पाते, इसलिए उन्हें समय पर सहायता की सबसे अधिक आवश्यकता होती है।
- आपदा के बाद कर्ज़ और पुनर्निर्माण का बोझ विकास की गति को धीमा करता है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: आपदा प्रबंधन और आर्थिक विकास पर उसका प्रभाव
5. जलवायु जोखिम का बढ़ता स्वरूप
- हिमनदों और चट्टानों के खिसकने जैसी घटनाएँ हिमालयी क्षेत्र में अधिक बार हो रही हैं, जिससे आकस्मिक बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है।
- जलविद्युत जैसे ढाँचे जलवायु जोखिम के प्रति संवेदनशील हैं, इसलिए उनकी सुरक्षा और लचीलापन महत्वपूर्ण है।
यूपीएससी लिंक: GS-1: हिमालयी भूगोल और प्राकृतिक आपदाएँ; GS-3: आपदा प्रबंधन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| समस्या | चिंता |
|---|---|
| दावों का बैकलॉग | 119 देशों के दावे लंबित होने से प्राथमिकता तय करना कठिन है और निर्धन देशों की सहायता में देरी होती है। |
| कोष की अपर्याप्तता | 822 मिलियन डॉलर की प्रतिज्ञाएँ लंबित दावों के एक-तिहाई के बराबर हैं, जिससे कोष की प्रभावशीलता सीमित है। |
| स्थायी त्वरित-प्रतिक्रिया तंत्र का अभाव | विकसित देशों की शर्त के कारण आपात स्थिति के लिए नियमित प्रावधान नहीं बन पाया है। |
| उत्तरदायित्व का प्रश्न | क्षतिपूर्ति को उत्तरदायित्व से जोड़ने पर विकसित देशों की सहमति कठिन होती है। |
| आवश्यकता और अनुदान में अंतर | नेपाल की पुनर्निर्माण आवश्यकता लगभग 5 बिलियन डॉलर है, जबकि अनुदान इससे बहुत कम है। |
आगे की राह
- आपदा के बाद अनुदान के लिए समय-सीमा और स्पष्ट प्रक्रिया तय की जाए, ताकि दावों की प्रतीक्षा अवधि कम हो।
- आपात स्थिति के लिए स्थायी त्वरित-प्रतिक्रिया तंत्र बनाया जाए, जिससे हर बार अपवाद की शर्त न लगानी पड़े।
- कोष की प्रतिज्ञाओं को नियमित और अनुमानित योगदान में बदला जाए, ताकि लंबित दावों के अनुरूप संसाधन उपलब्ध हों।
- निर्धन और अत्यधिक संवेदनशील देशों की प्राथमिकता तय करने के लिए पारदर्शी मानदंड अपनाए जाएँ।
- आपदा-पूर्व तैयारी और आपदा-उपरांत पुनर्निर्माण की योजनाओं को जोड़ा जाए, ताकि नुकसान और लागत दोनों घटें।
- हिमालयी देशों में आकस्मिक बाढ़ की प्रारंभिक चेतावनी और जोखिम मानचित्रण को सुदृढ़ किया जाए।
- COP31 में हानि और क्षति कोष के संचालन, वित्तपोषण और प्रतिज्ञाओं के पालन पर स्पष्ट निर्णय लिए जाएँ।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
हानि और क्षति (Loss and Damage) · जलवायु न्याय (Climate Justice) · प्रतिकर बनाम दान का सिद्धांत · सामान्य किंतु विभेदित उत्तरदायित्व एवं संबंधित क्षमताएँ (Common but Differentiated Responsibilities and Respective Capabilities – CBDR-RC) · प्रदूषक भुगतान सिद्धांत (Polluter Pays Principle) · पेरिस समझौता (Paris Agreement) का अनुच्छेद 8 · वारसॉ अंतरराष्ट्रीय तंत्र (Warsaw International Mechanism) · हानि और क्षति के प्रत्युत्तर हेतु कोष (Fund for responding to Loss and Damage – FRLD) · हरित जलवायु कोष (Green Climate Fund – GCF) · जलवायु वित्त (Climate Finance) · आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 (Disaster Management Act, 2005) · आपदा प्रतिक्रिया कोष (State Disaster Response Fund – SDRF)
अवधारणा प्रवाह
जलवायु परिवर्तन से चरम मौसमी घटनाएँ और हिमालयी आपदाएँ बढ़ती हैं। → नेपाल में हिमस्खलन से आकस्मिक बाढ़ आती है, जिसमें जीवन, बुनियादी ढाँचा और जलविद्युत सुविधाएँ प्रभावित होती हैं। → नेपाल हानि और क्षति कोष में जलवायु न्याय के आधार पर अनुदान का आवेदन करता है। → आवेदन-विंडो बंद होने और लंबित दावों के कारण स्वीकृति में विलंब होता है; विकसित देश इसे अपवाद के रूप में स्वीकार करते हैं। → सीमित प्रतिज्ञाओं (822 मिलियन डॉलर) के कारण अनुदान पुनर्निर्माण आवश्यकता से बहुत कम रहता है। → विलंब और अपर्याप्तता से पुनर्निर्माण की लागत बढ़ती है और जलवायु न्याय का सिद्धांत कमजोर होता है। → COP31 में इन कमियों को दूर करने के लिए कोष के सुधार पर विचार होगा।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. हानि और क्षति के प्रत्युत्तर हेतु कोष (Fund for responding to Loss and Damage – FRLD) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसकी स्थापना जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क अभिसमय (UNFCCC) के COP27 में हुई थी।
2. इसे वर्ष 2023 में परिचालन में लाया गया।
3. यह क्योटो प्रोटोकॉल के अंतर्गत गठित एक अनुकूलन वित्त तंत्र है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: इसकी स्थापना वर्ष 2022 में COP27 (शर्म अल-शेख़) में हुई। कथन 2 सही है: इसे COP28 (दुबई, 2023) में परिचालन में लाया गया। कथन 3 गलत है: क्योटो प्रोटोकॉल के अंतर्गत अनुकूलन कोष (Adaptation Fund) है, जबकि FRLD हानि और क्षति के लिए बनाया गया है, जो अनुकूलन से अलग विषय है।
Q2. निम्नलिखित अभिकथन (A) और कारण (R) पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): विकासशील देश हानि और क्षति के लिए अलग वित्तीय व्यवस्था की माँग करते हैं।
कारण (R): हानि और क्षति उन प्रतिकूल प्रभावों को दर्शाती है जिनसे शमन और अनुकूलन के उपायों द्वारा पूरी तरह नहीं बचा जा सकता।
उपर्युक्त के संदर्भ में सही उत्तर चुनिए:
- (a) A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है
- (b) A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
- (c) A सही है, किंतु R गलत है
- (d) A गलत है, किंतु R सही है
उत्तर: (a) A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है — अभिकथन और कारण दोनों सही हैं। पेरिस समझौते का अनुच्छेद 8 हानि और क्षति को शमन व अनुकूलन से अलग विषय के रूप में मान्यता देता है, इसलिए शमन और अनुकूलन से न बचे जा सकने वाले नुकसान के लिए अलग वित्तीय व्यवस्था की माँग स्वाभाविक है।
Q3. निम्नलिखित सूचियों का सही मिलान कीजिए:
सूची I (कोष/तंत्र):
1. अनुकूलन कोष (Adaptation Fund)
2. हरित जलवायु कोष (Green Climate Fund)
3. वारसॉ अंतरराष्ट्रीय तंत्र (Warsaw International Mechanism for Loss and Damage)
4. हानि और क्षति के प्रत्युत्तर हेतु कोष (FRLD)
सूची II (स्थापना का संदर्भ):
A. COP19, वारसॉ (2013)
B. COP16, कैनकुन (2010)
C. क्योटो प्रोटोकॉल के अंतर्गत (2001, COP7 मराकेश)
D. COP27, शर्म अल-शेख़ (2022)
सही कूट चुनिए:
- (a) 1-C, 2-B, 3-A, 4-D
- (b) 1-B, 2-C, 3-A, 4-D
- (c) 1-C, 2-A, 3-B, 4-D
- (d) 1-C, 2-B, 3-D, 4-A
उत्तर: (a) 1-C, 2-B, 3-A, 4-D — अनुकूलन कोष क्योटो प्रोटोकॉल के अंतर्गत स्थापित हुआ (C)। हरित जलवायु कोष की स्थापना COP16 (कैनकुन, 2010) में हुई (B)। वारसॉ तंत्र COP19 (2013) में बना (A)। FRLD की स्थापना COP27 (2022) में हुई (D)।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ हानि और क्षति के प्रत्युत्तर हेतु कोष (FRLD) को जलवायु न्याय के सिद्धांत पर खड़ा किया गया है, जिसमें सहायता को प्रतिकर का अधिकार माना गया है, दान नहीं। फिर भी इसके अंतर्गत अनुदान स्वीकृति में विलंब और कोष की अपर्याप्तता देखी जा रही है। जलवायु न्याय की अवधारणा के संदर्भ में इस कोष की संरचनात्मक सीमाओं का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि यदि त्वरित वितरण के लिए स्थायी तीव्र-प्रतिक्रिया तंत्र विकसित नहीं किया गया, तो आपदा-प्रभावित विकासशील देशों की पुनर्निर्माण क्षमता पर क्या परिणाम होंगे? (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर संरचना (लगभग 250 शब्द):
1. भूमिका: नेपाल को FRLD से 21.6 मिलियन डॉलर का अनुदान मिलना, जबकि पुनर्निर्माण आवश्यकता लगभग 5 बिलियन डॉलर आँकी गई है। यह कोष की पहली देश-विशिष्ट स्वीकृति है।
2. जलवायु न्याय का वैधानिक-नैतिक आधार:
(क) UNFCCC, 1992 का अनुच्छेद 3.1: समता और सामान्य किंतु विभेदित उत्तरदायित्व एवं संबंधित क्षमताएँ (CBDR-RC)।
(ख) प्रदूषक भुगतान सिद्धांत बनाम दान का सिद्धांत: प्रतिकर और मानवीय सहायता में अंतर।
(ग) पेरिस समझौता, 2015 का अनुच्छेद 8: हानि और क्षति को शमन व अनुकूलन से अलग विषय के रूप में मान्यता।
3. संस्थागत विकास: वारसॉ अंतरराष्ट्रीय तंत्र (2013) से COP27 (2022) में FRLD की स्थापना और COP28 (2023) में परिचालन।
4. संरचनात्मक सीमाएँ (समालोचनात्मक परीक्षण):
(क) वित्तीय अपर्याप्तता: कुल प्रतिज्ञा लगभग 822 मिलियन डॉलर, जो लंबित दावों के लगभग एक-तिहाई के बराबर है; 119 देशों के दावे लंबित होने का उल्लेख।
(ख) विलंब और कतार-प्रबंधन: आवेदन-खिड़की का जून में बंद होना और विकसित देशों की ‘कतार में आगे बढ़ने’ की आपत्ति।
(ग) अपवाद बनाम स्थायी व्यवस्था: विकसित देशों द्वारा इसे मिसाल न मानने की शर्त।
(घ) उत्तरदायित्व का प्रश्न: विकसित देशों की मानवीय सहायता के प्रति इच्छा, किंतु ‘हानि और क्षति’ पर दायित्व-संबंधी आपत्तियाँ।
5. संतुलित दृष्टिकोण:
(क) विकासशील देशों का तर्क: त्वरित और पूर्वानुमेय वित्त, प्रतिकर का अधिकार।
(ख) विकसित देशों का तर्क: कानूनी दायित्व के विस्तार का भय, कोष का दायरा सीमित रखने की प्राथमिकता।
(ग) मध्य मार्ग: स्थायी तीव्र-प्रतिक्रिया खिड़की, पूर्व-निर्धारित मानदंड, और हरित जलवायु कोष जैसे मौजूदा वित्तीय तंत्रों से तालमेल।
6. परिणाम-विश्लेषण: विलंब से पुनर्निर्माण लागत बढ़ती है, आवश्यक सेवाओं (जलविद्युत, संचार, परिवहन) की बहाली धीमी होती है, और गरीब देशों के बजट पर अचानक दबाव बढ़ता है।
7. भारत के संदर्भ में तुलना: आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के अंतर्गत राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) जैसे घरेलू तंत्र और अंतरराष्ट्रीय कोष के बीच संस्थागत अंतर की चर्चा।
8. निष्कर्ष: जलवायु न्याय तभी सार्थक होगा जब प्रतिकर का सिद्धांत व्यावहारिक, पूर्वानुमेय और स्थायी वित्तीय व्यवस्था में बदले।
स्रोत: The Indian Express
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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