राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग: मेडिकल शिक्षा नियमों में संदिग्ध वापसी

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग: मेडिकल शिक्षा नियमों में संदिग्ध वापसी

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग: मेडिकल शिक्षा नियमों में संदिग्ध वापसी

NMC द्वारा MSMER निरस्तीकरण के प्रभावMSMER (निरस्त)MARB (प्रचलित)दंडात्मक प्रावधानसंकाय/प्रशासकों पर ₹5 लाख तककेवल संस्थानों पर ₹1 करोड़ तकमूल्यांकन तंत्रसमानांतर तंत्र (MARB से टकराव)MARB द्वारा हीअपील अवधि15 दिन60 दिन (NMC अधिनियम)पारदर्शिताMARB रिपोर्टें सार्वजनिक नहींप्रश्नचिह्नलक्ष्यफर्जी संकाय/मरीज़ों पर रोकसंस्थागत मानकों पर
NMC द्वारा MSMER निरस्तीकरण के प्रभाव

✎ NMC द्वारा MSMER-2023 का निरस्तीकरण यह संकेत देता है कि नियामक सरलीकरण और प्रवर्तन-क्षमता के बीच संतुलन बनाना, तथा संस्थागत दंड के साथ व्यक्तिगत जवाबदेही और सार्वजनिक पारदर्शिता सुनिश्चित करना, चिकित्सा शिक्षा शासन की मूल कसौटी…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — शासन एवं संविधान (Governance and Polity): वैधानिक नियामक संस्थाएँ, प्रत्यायोजित विधायन और RTI के तहत पारदर्शिता  |  GS Paper II — स्वास्थ्य (Health): चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता, मानक और भ्रष्टाचार-रोधी उपाय
  • Prelims: राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम, 2019 (National Medical Commission Act, 2019), चिकित्सा मूल्यांकन एवं रेटिंग बोर्ड (MARB), भारतीय चिकित्सा परिषद (Medical Council of India) और उसका प्रतिस्थापन, सूची III (समवर्ती सूची) की प्रविष्टि 25 में चिकित्सा शिक्षा का उल्लेख, सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 4 (स्वप्रेरित प्रकटीकरण), केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) की भूमिका, ‘घोस्ट फैकल्टी’ और ‘घोस्ट पेशेंट’ जैसी अनियमितताएँ, प्रत्यायोजित विधायन (Delegated Legislation) के रूप में विनियम
  • Essay: नियामक संस्थाओं में दंडात्मक शक्ति और संस्थागत ईमानदारी: कठोरता बनाम सरलीकरण, पारदर्शिता का अधिकार और उच्च शिक्षा में भ्रष्टाचार: कानून से व्यवहार तक की दूरी

त्वरित पुनरावृत्ति: NMC द्वारा MSMER-2023 का निरस्तीकरण यह संकेत देता है कि नियामक सरलीकरण और प्रवर्तन-क्षमता के बीच संतुलन बनाना, तथा संस्थागत दंड के साथ व्यक्तिगत जवाबदेही और सार्वजनिक पारदर्शिता सुनिश्चित करना, चिकित्सा शिक्षा शासन की मूल कसौटी है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) ने वर्ष 2023 के चिकित्सा शिक्षा के मानकों के रखरखाव से संबंधित विनियम, अर्थात MSMER, को निरस्त और वापस ले लिया है। इससे मेडिकल कॉलेजों में शैक्षिक मानकों और अवसंरचना से जुड़े दंडात्मक प्रावधान कमज़ोर हुए हैं। MSMER में झूठी सूचना देने पर संकाय सदस्यों और प्रशासकों पर ₹5 लाख तक के जुर्माने का प्रावधान था, जिसे फर्जी संकाय और फर्जी मरीज़ जैसी अनियमितताओं पर रोक के रूप में सराहा गया था। आयोग का तर्क है कि इस विनियम में मूल्यांकन के लिए समानांतर तंत्र था, जो MARB के अधिकार-क्षेत्र से टकराता है। फिर भी इसके निरस्तीकरण का स्पष्ट कारण सामने नहीं आया है। MARB अब भी संस्थानों पर ₹1 करोड़ तक का जुर्माना लगा सकता है। साथ ही अपील-अवधि (15 दिन) और NMC अधिनियम की 60 दिन की अवधि के बीच संभावित टकराव, तथा MARB की रिपोर्टें सार्वजनिक न होने के मामले ने नियामक पारदर्शिता पर प्रश्न खड़े किए हैं।

पृष्ठभूमि

  • भारत में चिकित्सा शिक्षा का नियमन पहले भारतीय चिकित्सा परिषद (Medical Council of India) द्वारा होता था, जिसकी संरचना और कार्यप्रणाली की आलोचना के बाद राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम, 2019 के माध्यम से राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) की स्थापना हुई।
  • चिकित्सा शिक्षा ‘समवर्ती सूची’ का विषय है, जबकि सार्वजनिक स्वास्थ्य मुख्यतः ‘राज्य सूची’ का विषय है। इसलिए मानक निर्धारण में केंद्र और राज्यों की भूमिकाएँ आपस में जुड़ी रहती हैं।
  • NMC अपने विनियम प्रत्यायोजित विधायन के रूप में बनाता है। इन्हें लागू करने से पहले कानूनी वैधता और प्रक्रिया का पालन आवश्यक होता है।
  • मेडिकल कॉलेजों में फर्जी संकाय (ghost faculty) और फर्जी मरीज़ों के माध्यम से निरीक्षण और मान्यता प्रक्रिया को प्रभावित करने की शिकायतें लंबे समय से सामने आती रही हैं।
  • सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत सार्वजनिक प्राधिकरणों को कुछ सूचनाएँ स्वप्रेरित रूप से प्रकाशित करनी होती हैं। केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) इस दायित्व के पालन की निगरानी करता है।

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) क्या है?

  • राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग एक वैधानिक निकाय है, जिसकी स्थापना राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम, 2019 के तहत हुई है।
  • इसका उद्देश्य चिकित्सा शिक्षा में उच्च मानक सुनिश्चित करना, चिकित्सा संस्थानों को मान्यता देना और चिकित्सा पेशे के नैतिक एवं पंजीकरण संबंधी मानकों का नियमन करना है।
  • NMC के अंतर्गत चार स्वायत्त बोर्ड कार्य करते हैं: स्नातक चिकित्सा शिक्षा बोर्ड (UGMEB), स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा बोर्ड (PGMEB), चिकित्सा मूल्यांकन एवं रेटिंग बोर्ड (MARB) और नैतिकता एवं चिकित्सा पंजीकरण बोर्ड (EMRB)।
  • MARB का मुख्य कार्य चिकित्सा संस्थानों का मूल्यांकन और रेटिंग करना है। विनियमों के अनुसार उसे संस्थानों पर वित्तीय दंड लगाने और अपनी वार्षिक मूल्यांकन रिपोर्ट प्रकाशित करने की जिम्मेदारी दी गई है।
  • NMC के विनियम प्रत्यायोजित विधायन हैं। इनका उद्देश्य अधिनियम के प्रावधानों को विस्तार से लागू करना है, न कि अधिनियम के मूल सिद्धांतों को बदलना।
  • दंड का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि संस्थानों पर दंड और व्यक्तियों (संकाय सदस्यों) पर दंड अलग-अलग प्रभाव डालते हैं। व्यक्तिगत दंड जवाबदेही को प्रत्यक्ष बनाता है।
  • सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत नियामक संस्थाओं से अपेक्षा है कि वे अपने मूल्यांकन और निर्णय से जुड़ी जानकारी जनता के लिए उपलब्ध कराएँ।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (National Medical Commission) द्वारा 2023 के चिकित्सा शिक्षा मानक रखरखाव विनियम (MSMER) को अधिसूचना से हटाना चिकित्सा महाविद्यालयों के शैक्षणिक मानकों और ढाँचागत आवश्यकताओं से जुड़े दंडात्मक प्रावधानों का दायरा घटा है
MSMER के अंतर्गत संकाय और प्रशासकों पर झूठी सूचना देने के लिए ₹5 लाख तक का अर्थदंड व्यक्तिगत स्तर पर जवाबदेही तय करने वाला प्रावधान अब इस विनियम के हटने से समाप्त हो गया है
चिकित्सा मूल्यांकन एवं रेटिंग बोर्ड (MARB) द्वारा संस्थानों पर ₹1 करोड़ तक के अर्थदंड का अधिकार संस्थागत स्तर पर दंड की शक्ति 2023 के स्थापना एवं मूल्यांकन विनियमों के अंतर्गत बनी हुई है
‘घोस्ट फैकल्टी’ और ‘घोस्ट पेशेंट’ जैसी अनियमितताएँ चिकित्सा शिक्षा में गहराई तक फैले भ्रष्टाचार और कदाचार की पहचान और रोकथाम का मुख्य आधार था
स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा विनियम, 2023 में व्यक्तिगत संकाय सदस्यों पर अर्थदंड का प्रावधान स्नातकोत्तर महाविद्यालयों में व्यक्तिगत दायित्व का ढाँचा अभी भी लागू है
अपील की समय-सीमा: MARB विनियमों में 15 दिन बनाम राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम में 60 दिन दंडात्मक कार्रवाई में विधिक विवाद और विलंब की आशंका उत्पन्न होती है

महत्व

नियामक और प्रशासनिक

  • नियामक ढाँचे में दोहराव (overlap) कम करने का तर्क दिया गया है, क्योंकि MSMER में दिए गए समानांतर मूल्यांकन तंत्र MARB के कार्यक्षेत्र से टकराते थे।
  • राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम, 2019 के अंतर्गत बनी स्वायत्त बोर्ड व्यवस्था में शक्तियों का स्पष्ट विभाजन आवश्यक है, ताकि एक ही विषय पर अलग-अलग निकाय अलग निर्णय न दें।
  • यदि दंड की शक्तियाँ MARB और स्नातकोत्तर विनियमों में पहले से मौजूद हैं, तो नियम-पुस्तिका का सरलीकरण प्रशासनिक बोझ घटा सकता है।

शैक्षणिक गुणवत्ता और मानक

  • चिकित्सा सीटों की संख्या बढ़ने के साथ न्यूनतम शैक्षणिक और ढाँचागत मानकों की निगरानी का महत्व बढ़ गया है।
  • फर्जी संकाय और फर्जी मरीज़ों जैसी प्रथाएँ सीधे प्रशिक्षण की गुणवत्ता और भावी चिकित्सकों की योग्यता को प्रभावित करती हैं।
  • दंड का प्रभावी होना निरोधक (deterrent) प्रभाव पर निर्भर करता है; कमज़ोर दंड से अनुपालन की संस्कृति कमज़ोर होती है।

पारदर्शिता और जवाबदेही

  • सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत केंद्रीय सूचना आयोग के समक्ष हुई कार्यवाही से यह प्रश्न उठा कि MARB की गतिविधियाँ कितनी सार्वजनिक हैं।
  • MARB के 2023 विनियम वार्षिक मूल्यांकन परिणाम प्रकाशित करने का दायित्व देते हैं; इसका पालन जनविश्वास के लिए आवश्यक है।
  • नियामक निर्णयों के कारणों और रिकॉर्ड की उपलब्धता से प्रशासनिक पारदर्शिता और लोक-उत्तरदायित्व सुदृढ़ होते हैं।

चुनौतियाँ

1. व्यक्तिगत दायित्व का कमज़ोर होना

  • MSMER हटने से झूठी सूचना देने पर संकाय और प्रशासकों पर ₹5 लाख तक का व्यक्तिगत दंड समाप्त हो गया है।
  • MARB और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग केवल संस्थानों को दंडित कर सकते हैं, जिससे दंड का भार व्यक्तियों से हटकर संस्था पर चला जाता है।
  • संस्थाओं पर अर्थदंड को कई बार व्यवसाय-लागत की तरह लिया जाता है, जिससे अनुपालन का प्रोत्साहन कम होता है।

2. अपील समय-सीमा में असंगति

  • MARB विनियमों में 15 दिन की अपील अवधि है, जबकि राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम में 60 दिन की अवधि उल्लिखित है।
  • दोनों अवधियों के बीच टकराव से अपील के अधिकार और दंडात्मक कार्रवाई की गति दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
  • विधिक विवाद बढ़ने पर कार्रवाई में विलंब और न्यायालयीय हस्तक्षेप की संभावना बढ़ती है।

3. सूचना और पारदर्शिता की कमी

  • केंद्रीय सूचना आयोग की कार्यवाही में बताया गया कि 2024 में MARB के मूल्यांकन और रेटिंग को औपचारिक रूप से न होने की बात कही गई।
  • संशोधित उत्तर में संबंधित रिपोर्टों का रिकॉर्ड न होने की बात सामने आई, जिससे नियामक रिकॉर्ड-प्रबंधन पर प्रश्न उठते हैं।
  • वार्षिक मूल्यांकन परिणामों का सार्वजनिक प्रकाशन विनियमों में अनिवार्य होने के बावजूद इसकी पुष्टि नहीं होती।

4. चिकित्सा शिक्षा में अनुपालन की समस्या

  • चिकित्सा महाविद्यालयों में अनुपालन की कमी आम है और इसे प्रारंभिक स्तर पर रोकने की व्यवस्था कमज़ोर रही है।
  • सीटों की संख्या बढ़ने के साथ निगरानी का दायरा बढ़ा है, परंतु पारदर्शिता में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है।
  • भ्रष्टाचार और कदाचार की गहराई के कारण केवल नियम-संशोधन पर्याप्त नहीं हैं; प्रवर्तन क्षमता आवश्यक है।

5. नियामक ढाँचे में अधिकार-क्षेत्र का टकराव

  • राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग द्वारा MSMER के समानांतर मूल्यांकन तंत्र को MARB के अधिकार-क्षेत्र में हस्तक्षेप माना गया।
  • एक ही विषय पर कई निकायों की शक्तियाँ होने से निर्णय में अस्पष्टता और समन्वय की कमी उत्पन्न हो सकती है।
  • विनियम हटाने का कारण स्पष्ट न होने से नीति-निर्माण की तर्कसंगतता पर प्रश्न उठते हैं।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

समस्या चिंता
व्यक्तिगत दंड का अभाव संकाय और प्रशासकों पर झूठी सूचना देने का जोखिम कम होने से अनुपालन कमज़ोर हो सकता है
अपील की असंगत समय-सीमा 15 दिन और 60 दिन की अवधि के बीच टकराव से विधिक विवाद और कार्रवाई में विलंब
मूल्यांकन परिणामों का अप्रकाशन MARB द्वारा वार्षिक परिणाम प्रकाशित न होने से जनविश्वास और निगरानी प्रभावित
रिकॉर्ड का अभाव सूचना के अधिकार की कार्यवाही में मूल्यांकन रिपोर्टों का रिकॉर्ड न मिलना नियामक जवाबदेही पर प्रश्न
अधिकार-क्षेत्र का अस्पष्टता एक ही कार्य पर कई बोर्डों की भूमिका से समन्वय और निर्णय में भ्रम
निरोधक प्रभाव में कमी संस्थानों पर दंड अक्सर अनुपालन से सस्ता पड़ने पर अनियमितता बनी रह सकती है

आगे की राह

  • MSMER हटाने के कारणों को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करते हुए एक लिखित नीति-तर्क जारी किया जाए।
  • MARB और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के बीच अधिकार-क्षेत्र का स्पष्ट सीमांकन किया जाए, ताकि समानांतर तंत्र से बचा जा सके।
  • अपील की समय-सीमा को एक समान करके विधिक अस्पष्टता दूर की जाए।
  • स्नातकोत्तर विनियमों की तरह व्यक्तिगत दायित्व के प्रावधान अन्य स्तरों पर भी सुनिश्चित किए जाएँ, जहाँ संकाय और प्रशासक प्रत्यक्ष रूप से उत्तरदायी हों।
  • MARB के वार्षिक मूल्यांकन परिणाम और मानक प्रपत्र समयबद्ध रूप से सार्वजनिक किए जाएँ।
  • सूचना के अधिकार के अंतर्गत माँगे गए रिकॉर्ड के संधारण और प्रबंधन के लिए आंतरिक प्रक्रिया मज़बूत की जाए।
  • फर्जी संकाय और फर्जी मरीज़ों जैसी अनियमितताओं की पहचान हेतु स्वतंत्र सत्यापन और डेटा-आधारित निगरानी व्यवस्था विकसित की जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (National Medical Commission) · चिकित्सा शिक्षा मानक अनुरक्षण विनियम, 2023 (MSMER) · चिकित्सा मूल्यांकन एवं श्रेणीकरण बोर्ड (MARB) · प्रत्यायोजित विधायन (Delegated Legislation) · अत्यधिक प्रत्यायोजन (Excessive Delegation) · समवर्ती सूची (Concurrent List) और चिकित्सा शिक्षा · सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 और सक्रिय प्रकटीकरण · काल्पनिक संकाय सदस्य (Ghost Faculty) और काल्पनिक मरीज़ (Ghost Patients) · संस्थागत बनाम व्यक्तिगत उत्तरदायित्व · नियामक विनियमन (Regulatory Regulation) और शासन में पारदर्शिता

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 47: जन स्वास्थ्य सुधार का राज्य का कर्तव्य
  • सातवीं अनुसूची, संघ सूची प्रविष्टि 66: उच्च शिक्षा मानकों का समन्वय और निर्धारण

अवधारणा प्रवाह

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग द्वारा 2023 के MSMER विनियमों को अधिसूचना से हटाना  →  व्यक्तिगत संकाय और प्रशासकों पर ₹5 लाख तक के दंड के प्रावधान का समाप्त होना  →  केवल संस्थानों पर दंड (MARB द्वारा ₹1 करोड़ तक) का शेष रहना  →  अपील की असंगत समय-सीमा (15 दिन बनाम 60 दिन) से विधिक विवाद की संभावना  →  मूल्यांकन परिणामों और रिकॉर्ड की अपर्याप्त सार्वजनिक उपलब्धता के कारण पारदर्शिता में कमी  →  निरोधक प्रभाव घटने से अनुपालन और जवाबदेही पर दीर्घकालिक प्रभाव

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम, 2019 के अंतर्गत राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग में चार स्वायत्त बोर्ड गठित किए गए हैं, जिनमें चिकित्सा मूल्यांकन एवं श्रेणीकरण बोर्ड भी सम्मिलित है।
2. चिकित्सा शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची (Concurrent List) की प्रविष्टि में आती है।
3. केंद्रीय सूचना आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत स्थापित एक संवैधानिक निकाय है।

उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम, 2019 के अंतर्गत चार स्वायत्त बोर्ड (स्नातक चिकित्सा शिक्षा बोर्ड, स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा बोर्ड, चिकित्सा मूल्यांकन एवं श्रेणीकरण बोर्ड तथा चिकित्सा नैतिकता एवं पंजीकरण बोर्ड) बने हैं। कथन 2 सही है: चिकित्सा शिक्षा समवर्ती सूची की प्रविष्टि 25 में आती है, जो सूची I की प्रविष्टि 63 से 66 के अधीन है। कथन 3 गलत है: केंद्रीय सूचना आयोग की स्थापना सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत हुई है, न कि अनुच्छेद 324 के अंतर्गत; अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग से संबंधित है।

Q2. कथन (A) और कारण (R) पर विचार कीजिए:
कथन (A): किसी संविधिक निकाय द्वारा बनाए गए विनियमों को उसी निकाय द्वारा, अपनी वैधानिक शक्तियों की सीमा में, वापस लिया जा सकता है।
कारण (R): प्रत्यायोजित विधायन मूल अधिनियम के अधीन होता है और उसकी वैधता उसी अधिनियम द्वारा प्रदत्त शक्तियों की सीमा पर निर्भर करती है।

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है
  2. (A) और (R) दोनों सही हैं, लेकिन (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है
  3. (A) सही है, परंतु (R) गलत है
  4. (A) गलत है, परंतु (R) सही है

उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है — प्रत्यायोजित विधायन का मूल सिद्धांत यह है कि वह मूल अधिनियम (Parent Act) की सीमाओं के भीतर रहता है, इसलिए उसी प्राधिकरण को, जिसे शक्ति प्रदत्त है, उसे संशोधित या निरस्त करने की शक्ति भी सामान्यतः होती है। अतः (R), (A) की सही व्याख्या करता है। यह सामान्य विधिक सिद्धांत है; किसी विशिष्ट विनियम की वैधता प्रत्येक मामले में अधिनियम के प्रावधानों पर निर्भर करती है।

Q3. निम्नलिखित सुमेलन (Match) पर विचार कीजिए:
सूची I (संस्था/निकाय): 1. चिकित्सा मूल्यांकन एवं श्रेणीकरण बोर्ड (MARB) 2. केंद्रीय सूचना आयोग 3. विधायी निकायों की प्रत्यायोजित विधान समिति (Committee on Subordinate Legislation)
सूची II (कार्य): (a) प्रत्यायोजित विधान (Subordinate Legislation) की संवीक्षा (b) सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत अपील सुनना (c) चिकित्सा महाविद्यालयों का मूल्यांकन और श्रेणीकरण

सही सुमेलन चुनिए:

  1. 1-(c), 2-(b), 3-(a)
  2. 1-(b), 2-(a), 3-(c)
  3. 1-(c), 2-(a), 3-(b)
  4. 1-(a), 2-(c), 3-(b)

उत्तर: 1-(c), 2-(b), 3-(a) — चिकित्सा मूल्यांकन एवं श्रेणीकरण बोर्ड का कार्य चिकित्सा महाविद्यालयों और संस्थानों का मूल्यांकन व श्रेणीकरण करना है। केंद्रीय सूचना आयोग सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत द्वितीय अपील सुनता है। विधायी निकायों की प्रत्यायोजित विधान समिति अधीनस्थ विधान (विनियम, नियम, अधिसूचनाएँ) की संवीक्षा करती है। अतः 1-(c), 2-(b), 3-(a) सही है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ चिकित्सा शिक्षा का नियामक ढाँचा संसदीय अधिनियम और उसके अधीन बने विनियमों पर आधारित है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग द्वारा चिकित्सा शिक्षा मानक अनुरक्षण विनियम, 2023 को वापस लेने के संदर्भ में प्रत्यायोजित विधायन की भूमिका और उसकी सीमाओं का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि यदि दंडात्मक प्रावधान केवल संस्थानों तक सीमित रह जाएँ और काल्पनिक संकाय सदस्यों के विरुद्ध व्यक्तिगत दायित्व कमज़ोर पड़े, तो जवाबदेही और पारदर्शिता पर क्या प्रभाव पड़ेगा? (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल उत्तर संरचना:
1. भूमिका: चिकित्सा शिक्षा समवर्ती सूची की प्रविष्टि 25 में आती है, जो सूची I की प्रविष्टि 66 (मानक-निर्धारण) के अधीन है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम, 2019 ने भारतीय चिकित्सा परिषद अधिनियम, 1956 का स्थान लिया और चार स्वायत्त बोर्ड बनाए। MSMER 2023 में ₹5 लाख तक के दंड (काल्पनिक संकाय सदस्यों और मरीज़ों से संबंधित गलत सूचना पर) और ₹1 करोड़ तक के संस्थागत दंड की व्यवस्था का उल्लेख करें, जैसा कि स्रोत में है।
2. प्रत्यायोजित विधायन की वैधता: हमदर्द दवाखाना बनाम भारत संघ (1960) में सर्वोच्च न्यायालय ने अत्यधिक प्रत्यायोजन के सिद्धांत पर विचार किया; मूल अधिनियम में नीति-निर्धारण का सार होना चाहिए। दिल्ली लॉज़ एक्ट मामला (1951) में विधायी शक्ति के प्रत्यायोजन की सीमाओं का उल्लेख करें। मेडिकल कॉलेजों के मानक-निर्धारण पर मॉडर्न डेंटल कॉलेज (2016) में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का संक्षिप्त संदर्भ दें।
3. विनियम वापसी का विश्लेषण: (क) समर्थन पक्ष: विनियमों के दोहराव और MARB की शक्तियों से टकराव को दूर करना, नियामक सरलीकरण; (ख) आलोचना पक्ष: वापसी का कारण सार्वजनिक न होना, अपील-समयसीमा (15 दिन बनाम अधिनियम में 60 दिन) के विवाद की संभावना, और गैर-अनुपालन के प्रति निवारक प्रभाव का कमज़ोर होना।
4. पारदर्शिता का प्रश्न: सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 4 के अंतर्गत सक्रिय प्रकटीकरण; केंद्रीय सूचना आयोग के समक्ष स्रोत में उल्लिखित मामला (MARB की रिपोर्ट के अस्तित्व और प्रकटीकरण पर विरोधाभास) यह दिखाता है कि नियामक रिपोर्टों की सार्वजनिक उपलब्धता अनिवार्य है।
5. प्रभाव-विश्लेषण: संस्थागत दंड अकेले पर्याप्त नहीं; व्यक्तिगत दायित्व (संकाय और प्रशासकों पर) भय पैदा करता है, जबकि केवल संस्थागत दंड से सुधार की अपेक्षा ‘सहन करने’ का प्रोत्साहन बन सकता है। अनुच्छेद 21 (स्वास्थ्य से जुड़े सार्वजनिक हित) और अनुच्छेद 14 (मनमानी से बचाव) के संदर्भ में जवाबदेही का महत्व।
6. संतुलित निष्कर्ष: नियामक सरलीकरण और कठोर दंडात्मक ढाँचे के बीच संतुलन; सुझाव: कारण सार्वजनिक करना, अपील-समयसीमा का समन्वय, संसदीय समिति द्वारा अधीनस्थ विधान की संवीक्षा, और MARB की रिपोर्टों का नियमित प्रकाशन।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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