31 Oct मुख्यमंत्री 2 नवंबर को महिला नीति शिखर सम्मेलन का करेंगे उद्घाटन
✎ महिला नीति का प्रभावी होना संवैधानिक प्रावधानों (अनुच्छेद 14 और 15(3)), सहभागी नीति-निर्माण, लिंग बजट और क्रियान्वयन की निगरानी पर निर्भर करता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — शासन, सामाजिक न्याय एवं संविधान (महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान, राज्य द्वारा नीति-निर्माण की प्रक्रिया) | GS Paper I — भारतीय समाज (लैंगिक भूमिकाएँ और महिलाओं की सामाजिक स्थिति) | GS Paper III — अर्थव्यवस्था (महिला उद्यमिता और रोज़गार-वित्तीय समावेशन)
- Prelims: अनुच्छेद 15(3) — महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष उपबंध, अनुच्छेद 243D — पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षण, 106वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2023 (नारी शक्ति वंदन अधिनियम), राष्ट्रीय महिला नीति, 2001, कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 (POSH Act), कुदुम्बश्री (Kudumbashree) — केरल का राज्य गरीबी उन्मूलन एवं सामुदायिक नेटवर्क मिशन, लिंग बजट (Gender Budgeting) — भारत में 2005-06 से लागू, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 — साइबर अपराध से संबंधित प्रावधान
- Essay: नीति-निर्माण में सहभागी लोकतंत्र: महिलाओं की भागीदारी से समावेशी शासन कैसे संभव है?, डिजिटल युग में महिला सुरक्षा: तकनीक, कानून और सामाजिक जागरूकता की भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: महिला नीति का प्रभावी होना संवैधानिक प्रावधानों (अनुच्छेद 14 और 15(3)), सहभागी नीति-निर्माण, लिंग बजट और क्रियान्वयन की निगरानी पर निर्भर करता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केरल के मुख्यमंत्री 2 नवंबर को राजधानी तिरुवनंतपुरम में दो-दिवसीय महिला नीति शिखर सम्मेलन ‘Her Summit 2026’ का उद्घाटन करेंगे। यह आयोजन मकालकोप्पम योजना के अंतर्गत किया जा रहा है। महिला एवं बाल विकास मंत्री के अनुसार राज्य सरकार का लक्ष्य अगले वर्ष 8 मार्च, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस, पर नई महिला नीति की घोषणा करना है। प्रस्तावित नीति का उद्देश्य महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सशक्तीकरण को बढ़ाना तथा समान, सुरक्षित और प्रगतिशील समाज की स्थापना करना है। सम्मेलन में पाँच प्रमुख विषयों पर चर्चा होगी: रोज़गार, वित्तीय सशक्तीकरण और उद्यमिता; राजनीतिक प्रतिनिधित्व और नेतृत्व; शिक्षा, स्वास्थ्य और मानसिक कल्याण; महिला सुरक्षा और कानून; तथा साइबर सुरक्षा।
पृष्ठभूमि
- भारत में महिलाओं के लिए विशेष उपबंध संविधान में निहित हैं। अनुच्छेद 14 समानता की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 15(3) राज्य को महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष व्यवस्था बनाने की शक्ति देता है। नीति-निर्माण में यही संवैधानिक आधार प्रमुख है।
- राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय महिला नीति, 2001 ने महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक भागीदारी और निर्णय-प्रक्रिया में सहभागिता को लक्ष्य बनाया था। राज्य अपनी परिस्थितियों के अनुसार अलग नीतियाँ बनाने के लिए स्वतंत्र हैं।
- स्थानीय स्वशासन में महिलाओं की भागीदारी को 73वें संविधान संशोधन (1992) द्वारा संस्थागत रूप दिया गया, जिसमें पंचायतों और नगरपालिकाओं में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गईं। 106वें संविधान संशोधन, 2023 द्वारा लोकसभा और विधानसभाओं में भी महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान किया गया।
- केरल में सामाजिक विकास और महिला भागीदारी की लंबी परंपरा रही है। कुदुम्बश्री मिशन (1998) के माध्यम से गरीब परिवारों की महिलाएँ स्वयं सहायता समूहों और सामुदायिक संगठनों में संगठित हुईं, जिससे उद्यमिता और सामूहिक निर्णय की क्षमता विकसित हुई।
- महिला सुरक्षा के क्षेत्र में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से संरक्षण के लिए POSH अधिनियम, 2013 लागू है, जबकि साइबर अपराधों से निपटने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 और उसके संशोधन प्रासंगिक हैं। डिजिटल माध्यमों पर उत्पीड़न के बढ़ने से साइबर सुरक्षा नीति का महत्व बढ़ा है।
महिला नीति क्या है और इसका शासन में क्या महत्व है?
- महिला नीति सरकार का वह नीतिगत दस्तावेज़ है जिसमें महिलाओं के विकास, सुरक्षा और अधिकारों से संबंधित लक्ष्य, रणनीतियाँ और कार्ययोजना तय की जाती है।
- लैंगिक समानता (Gender Equality) का अर्थ है कि महिलाओं और पुरुषों को अवसर, संसाधन और अधिकार समान रूप से मिलें; जबकि महिला सशक्तीकरण (Women Empowerment) में उन्हें निर्णय लेने की क्षमता और नियंत्रण भी शामिल है।
- नीति-निर्माण में सहभागी प्रक्रिया, जैसे शिखर सम्मेलन और परामर्श, नीति को ज़मीनी आवश्यकताओं से जोड़ती है और पारदर्शिता बढ़ाती है।
- नीति के पाँच स्तंभ (रोज़गार-वित्त, राजनीतिक नेतृत्व, शिक्षा-स्वास्थ्य, सुरक्षा-कानून, साइबर सुरक्षा) दिखाते हैं कि महिला विकास बहुआयामी है और केवल कल्याणकारी योजनाओं तक सीमित नहीं है।
- लिंग बजट (Gender Budgeting) के माध्यम से सरकारी व्यय का मूल्यांकन महिलाओं पर पड़ने वाले प्रभाव के आधार पर किया जाता है, जिससे नीति और बजट के बीच संबंध मज़बूत होता है।
- राज्य महिला आयोग जैसी संस्थाएँ महिलाओं से जुड़ी शिकायतों और नीतिगत सुझावों पर कार्य करती हैं, जिससे नीति के क्रियान्वयन की निगरानी संभव होती है।
- महिला नीति की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके लक्ष्य मापनीय हों, बजट से जुड़े हों और समय-सीमा के भीतर लागू किए जाएँ।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्त्व |
|---|---|
| आयोजन का स्वरूप | ‘हर समिट 2026’ (Her Summit 2026) दो दिवसीय नीति-सम्मेलन है, जो 2 नवंबर को राज्य की राजधानी में मुख्यमंत्री द्वारा उद्घाटित होगा। यह राज्य स्तर पर नीति-निर्माण से पहले परामर्श की प्रक्रिया है। |
| प्रस्तावित नीति का उद्देश्य | नई महिला नीति का लक्ष्य महिलाओं का सामाजिक, वित्तीय और राजनीतिक महिला सशक्तिकरण है, ताकि समानता, सुरक्षा और प्रगतिशील समाज की दिशा में काम हो सके। |
| पाँच चर्चा-क्षेत्र | रोजगार और उद्यमिता, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और नेतृत्व, शिक्षा-स्वास्थ्य-मनोवैज्ञानिक कल्याण, महिला सुरक्षा और कानून, तथा साइबर सुरक्षा। ये क्षेत्र बहु-आयामी नीति-ढाँचे की रूपरेखा बताते हैं। |
| समय-सारणी | नीति की घोषणा अगले वर्ष 8 मार्च (अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस) को प्रस्तावित है। इससे नीति-निर्माण के लिए निश्चित समय-सीमा तय होती है। |
| संबंधित योजना | सम्मेलन को मकालकोप्पम योजना (Makalkoppam Scheme) के अंतर्गत आयोजित किया जा रहा है, जिससे नीति-परामर्श को मौजूदा योजनागत ढाँचे से जोड़ा गया है। |
महत्व
सामाजिक एवं मानव विकास
- शिक्षा, स्वास्थ्य और मनोवैज्ञानिक कल्याण को एक ही नीति-ढाँचे में रखना समग्र दृष्टिकोण को दर्शाता है। इससे लैंगिक विकास के सूचकांकों में सुधार की संभावना बढ़ती है।
- संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य 5 (SDG 5: Gender Equality) की प्राप्ति की दिशा में राज्य-स्तरीय नीति का योगदान होता है।
आर्थिक एवं रोजगार
- रोजगार, वित्तीय समावेशन और उद्यमिता पर चर्चा से महिला श्रम-बल भागीदारी बढ़ाने की रणनीति बन सकती है।
- महिला उद्यमियों के लिए ऋण, कौशल और बाज़ार तक पहुँच जैसे पहलू आर्थिक संवृद्धि में योगदान देते हैं।
शासन एवं लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व
- राजनीतिक प्रतिनिधित्व और नेतृत्व पर चर्चा पंचायती राज और स्थानीय निकायों में महिलाओं की वास्तविक भूमिका को मज़बूत करने से जुड़ती है।
- नीति-परामर्श में नागरिक समाज और विशेषज्ञों की भागीदारी से सहभागी शासन (Participatory Governance) का अभ्यास होता है।
विधिक एवं सुरक्षा आयाम
- महिला सुरक्षा और कानूनों पर विचार से मौजूदा विधियों के क्रियान्वयन की समीक्षा का अवसर मिलता है।
- साइबर सुरक्षा का समावेश डिजिटल युग में ऑनलाइन उत्पीड़न जैसी नई चुनौतियों की पहचान को दर्शाता है।
चुनौतियाँ
1. नीति-क्रियान्वयन का अंतर
- नीति की घोषणा और ज़मीनी क्रियान्वयन के बीच अक्सर अंतर रहता है। बजट आवंटन, संस्थागत समन्वय और निगरानी तंत्र की कमी इसे और बढ़ाती है।
- विभिन्न विभागों (शिक्षा, स्वास्थ्य, श्रम, गृह) के बीच समन्वय के बिना लक्ष्य अलग-अलग दिशाओं में बिखर सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: शासन में नीति-क्रियान्वयन और अभिशासन की चुनौतियाँ (GS-2)
2. लैंगिक डिजिटल विभाजन और साइबर जोखिम
- डिजिटल पहुँच में लैंगिक अंतर महिलाओं को ऑनलाइन सेवाओं और अवसरों से वंचित रख सकता है।
- ऑनलाइन उत्पीड़न, डीपफेक और साइबर ठगी जैसे खतरे महिलाओं की सुरक्षा के लिए नई चुनौती हैं, जिनके लिए तकनीकी और विधिक दोनों उपाय चाहिए।
यूपीएससी लिंक: साइबर सुरक्षा और डिजिटल शासन (GS-3)
3. रोजगार में लैंगिक असमानता
- कार्यस्थल पर वेतन असमानता, अनौपचारिक क्षेत्र में असुरक्षा और देखभाल-कार्य का असमान बोझ महिला श्रम-बल भागीदारी को सीमित करता है।
- उद्यमिता में पूंजी और बाज़ार तक सीमित पहुँच महिला उद्यमियों के लिए बाधा बनी रहती है।
यूपीएससी लिंक: रोजगार, श्रम कल्याण और समावेशी विकास (GS-2 और GS-3)
4. राजनीतिक प्रतिनिधित्व की सीमाएँ
- संवैधानिक आरक्षण के बावजूद निर्णय-प्रक्रिया में महिलाओं की वास्तविक भागीदारी और स्वतंत्र नेतृत्व अब भी चुनौतीपूर्ण है।
- प्रतिनिधियों के लिए प्रशिक्षण, संसाधन और सामाजिक स्वीकृति जैसे पहलू पर्याप्त नहीं होने से नेतृत्व का विकास धीमा रह सकता है।
यूपीएससी लिंक: स्थानीय शासन और संवैधानिक प्रावधान (GS-2)
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| नीति और क्रियान्वयन | घोषित लक्ष्यों को पूरा करने के लिए बजट, निगरानी और विभागीय समन्वय का स्पष्ट ढाँचा ज़रूरी है। |
| डिजिटल विभाजन | महिलाओं की डिजिटल पहुँच और डिजिटल साक्षरता में अंतर से साइबर सुरक्षा और ऑनलाइन सेवाओं का लाभ असमान रहता है। |
| कार्यस्थल सुरक्षा | कार्यस्थल पर उत्पीड़न की शिकायतों के निवारण और शिकायत-तंत्र की पहुँच पर सवाल बने रहते हैं। |
| आर्थिक असमानता | वेतन अंतर, अनौपचारिक रोजगार और उद्यमिता के लिए वित्त तक सीमित पहुँच आर्थिक सशक्तिकरण को सीमित करती है। |
| राजनीतिक नेतृत्व | निर्णय-स्तर पर महिलाओं की वास्तविक भागीदारी और प्रशिक्षण के अवसर पर्याप्त नहीं हैं। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- मकालकोप्पम योजना (Makalkoppam Scheme)
आगे की राह
- नीति में लक्ष्यों के साथ स्पष्ट संकेतक (Indicators) और समयबद्ध मूल्यांकन तंत्र जोड़े जाएँ, ताकि प्रगति मापी जा सके।
- पाँचों चर्चा-क्षेत्रों के बीच अंतर-विभागीय समन्वय के लिए एक नोडल एजेंसी और नियमित समीक्षा बैठकें तय की जाएँ।
- कार्यस्थल पर महिलाओं के उत्पीड़न से संबंधित कानून (POSH अधिनियम, 2013) के क्रियान्वयन, आंतरिक शिकायत समितियों और जागरूकता की नियमित जाँच हो।
- साइबर सुरक्षा के लिए महिलाओं को डिजिटल साक्षरता और ऑनलाइन शिकायत-निवारण की सरल पहुँच दी जाए, साथ ही सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के प्रावधानों की जानकारी फैलाई जाए।
- उद्यमिता के लिए ऋण, कौशल प्रशिक्षण और सरकारी खरीद में भागीदारी जैसे उपाय जोड़े जाएँ, ताकि आर्थिक सशक्तिकरण का आधार मज़बूत हो।
- स्थानीय निकायों की निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के लिए नेतृत्व-प्रशिक्षण और सहायता-तंत्र बने, जिससे प्रतिनिधित्व वास्तविक प्रभाव में बदले।
- राष्ट्रीय महिला नीति, 2001 (National Policy for the Empowerment of Women, 2001) के लक्ष्यों के साथ राज्य नीति की संगति जाँची जाए, ताकि नीतिगत निरंतरता बनी रहे।
- नीति-निर्माण में महिला संगठनों, शोधकर्ताओं और स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित हो, ताकि नीति जमीनी वास्तविकता पर आधारित हो।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
महिला सशक्तीकरण (Women Empowerment) · अनुच्छेद 15(3) और राज्य द्वारा विशेष उपबंध · पंचायती राज में महिला आरक्षण (अनुच्छेद 243D) · नारी शक्ति वंदन अधिनियम (Nari Shakti Vandan Adhiniyam), 2023 · राजनीतिक प्रतिनिधित्व और नेतृत्व · लैंगिक बजट (Gender Budgeting) · कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न अधिनियम, 2013 (POSH Act) · साइबर सुरक्षा और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 · राज्य नीति और गैर-न्यायोचित प्रकृति (अनुच्छेद 37) · कुदुंबश्री (Kudumbashree) मॉडल और स्थानीय शासन · लैंगिक न्याय और समावेशी आर्थिक संवृद्धि · राष्ट्रीय महिला सशक्तीकरण नीति, 2001
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 15(3) – महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष उपबंध की अनुमति
- अनुच्छेद 39(घ) – पुरुषों और महिलाओं के लिए समान वेतन का सिद्धांत
- अनुच्छेद 42 – कार्यस्थल पर न्यायोचित दशाएँ और मातृत्व सहायता
- अनुच्छेद 243घ – पंचायतों में महिलाओं के लिए स्थानों का आरक्षण
अवधारणा प्रवाह
संवैधानिक प्रावधान और राष्ट्रीय नीतिगत लक्ष्य (जैसे महिला सशक्तिकरण) राज्य को नीति-निर्माण की दिशा देते हैं। → राज्य सरकार मकालकोप्पम योजना के अंतर्गत सम्मेलन आयोजित कर पाँच प्रमुख क्षेत्रों पर परामर्श शुरू करती है। → सम्मेलन में रोजगार, प्रतिनिधित्व, शिक्षा-स्वास्थ्य, सुरक्षा और साइबर सुरक्षा पर विशेषज्ञों और हितधारकों के सुझाव एकत्र होते हैं। → सुझावों के आधार पर नई महिला नीति का प्रारूप तैयार होता है और उसकी कानूनी व वित्तीय व्यवहार्यता जाँची जाती है। → 8 मार्च (अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस) को नीति की घोषणा होती है। → नीति का क्रियान्वयन विभागीय समन्वय, बजट आवंटन और निगरानी तंत्र के माध्यम से होता है। → क्रियान्वयन के परिणाम मूल्यांकित होकर अगली नीति-समीक्षा और सुधारों का आधार बनते हैं।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान का अनुच्छेद 15(3) राज्य को महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष उपबंध बनाने की अनुमति देता है।
2. अनुच्छेद 243D पंचायतों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं के लिए स्थानों के आरक्षण से संबंधित है, जिसमें महिलाओं के लिए कम से कम एक-तिहाई स्थान आरक्षित होते हैं।
3. कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013 के अंतर्गत आंतरिक शिकायत समिति का गठन केवल सरकारी कार्यालयों के लिए अनिवार्य है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: अनुच्छेद 15(3) अनुच्छेद 15(1) के सामान्य भेदभाव-निषेध का अपवाद है। कथन 2 सही है: 73वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया अनुच्छेद 243D पंचायतों में महिलाओं के लिए न्यूनतम एक-तिहाई स्थान आरक्षित करता है। कथन 3 गलत है: 2013 के अधिनियम के अंतर्गत 10 या अधिक कर्मचारियों वाले निजी नियोक्ताओं सहित सभी कार्यस्थलों पर आंतरिक शिकायत समिति का गठन आवश्यक है।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?
अभिकथन (A): राज्य सरकारें महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए विशेष नीतियाँ और योजनाएँ बना सकती हैं।
कारण (R): संविधान का अनुच्छेद 15(3) राज्य को महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष उपबंध बनाने की अनुमति देता है।
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (A) सही है, परंतु (R) गलत है।
- (A) गलत है, परंतु (R) सही है।
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — अनुच्छेद 15(3) राज्य को महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष उपबंध करने की शक्ति देता है, इसलिए राज्य की महिला-केंद्रित नीतियों का संवैधानिक आधार यही है। नीति-निर्माण की शक्ति का आधार यही अनुच्छेद है, अतः (R) (A) की सही व्याख्या है। कार्यकारी नीतियाँ विधायी कानून के बिना भी बनाई जा सकती हैं।
Q3. निम्नलिखित सुमेलों पर विचार कीजिए:
सूची I (कानून/उपबंध)
A. सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000
B. कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न अधिनियम, 2013
C. संविधान का अनुच्छेद 243D
D. संविधान का अनुच्छेद 39(घ)
सूची II (विषय)
1. इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख और साइबर अपराध
2. कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से संरक्षण
3. पंचायतों में महिलाओं के लिए स्थानों का आरक्षण
4. पुरुषों और महिलाओं के लिए समान कार्य हेतु समान वेतन
सही सुमेलन चुनिए:
- A-1, B-2, C-3, D-4
- A-2, B-1, C-4, D-3
- A-1, B-3, C-2, D-4
- A-4, B-2, C-1, D-3
उत्तर: A-1, B-2, C-3, D-4 — सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों और साइबर अपराधों से संबंधित है (A-1)। POSH अधिनियम, 2013 कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से संरक्षण देता है (B-2)। अनुच्छेद 243D पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षण का उपबंध है (C-3)। अनुच्छेद 39(घ) राज्य नीति का निदेशक तत्व है, जो समान कार्य के लिए समान वेतन सुनिश्चित करने का निर्देश देता है (D-4)।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ राज्य स्तरीय महिला नीतियाँ सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सशक्तीकरण के संवैधानिक लक्ष्यों को किस सीमा तक आगे बढ़ाती हैं? इन नीतियों की गैर-न्यायोचित प्रकृति को ध्यान में रखते हुए आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि नीति को विधिक और संस्थागत समर्थन न मिलने पर महिला सशक्तीकरण के लक्ष्य पर क्या प्रभाव पड़ता है। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल उत्तर संरचना:
1. भूमिका: केरल सरकार की ‘Her Summit 2026’ के आधार पर महिला नीति का उल्लेख करें, जिसमें रोजगार और उद्यमिता, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, शिक्षा-स्वास्थ्य-मनोवैज्ञानिक कल्याण, महिला सुरक्षा एवं कानून तथा साइबर सुरक्षा, इन पाँच क्षेत्रों पर चर्चा का उल्लेख करें। नीति की घोषणा 8 मार्च (अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस) को प्रस्तावित है।
2. संवैधानिक आधार: समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14, 15(1)); अनुच्छेद 15(3) द्वारा राज्य को विशेष उपबंध की शक्ति; अनुच्छेद 16 (लोक नियोजन में समान अवसर); राज्य नीति के निदेशक तत्व: अनुच्छेद 39(क) (जीविका के पर्याप्त साधन), 39(घ) (समान कार्य के लिए समान वेतन), अनुच्छेद 42 (कार्य की न्यायपूर्ण और मानवीय दशाएँ, प्रसूति सहायता)।
3. विधिक और संस्थागत ढाँचा: 73वें और 74वें संविधान संशोधन (1992) द्वारा अनुच्छेद 243D और 243T; नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 (106वाँ संविधान संशोधन, अनुच्छेद 330A और 332A) जिसका क्रियान्वयन जनगणना और परिसीमन से जुड़ा है; कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न अधिनियम, 2013 (Vishaka v. State of Rajasthan, 1997 के दिशानिर्देशों की परिणति); भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धाराएँ 74 से 78 (हमला, यौन उत्पीड़न, दृश्य-रतिक्रिया, पीछा करना); सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000; राष्ट्रीय महिला सशक्तीकरण नीति, 2001; भारत द्वारा CEDAW (1979) का अनुसमर्थन (1993)।
4. नीति बनाम कानून (केंद्रीय विवाद): नीति एक कार्यकारी दस्तावेज़ है, अतः उसके लक्ष्य न्यायालय में प्रवर्तनीय नहीं हैं (अनुच्छेद 37 के अनुसार निदेशक तत्व न्यायोचित नहीं हैं)। जबकि अनुच्छेद 15(3) और POSH अधिनियम जैसे उपाय प्रवर्तनीय हैं। मूल्यांकन में यह अंतर स्पष्ट कीजिए।
5. आर्थिक और सामाजिक आयाम: लैंगिक बजट (2005-06 से केंद्रीय बजट में लैंगिक बजट विवरण); कुदुंबश्री (केरल, 1998) जैसे स्थानीय स्वशासन और स्वयं सहायता समूह मॉडल; अमर्त्य सेन का क्षमता दृष्टिकोण (capability approach) और मार्था नुसबाम की क्षमता सूची; ‘मिसिंग वीमेन’ की समस्या; डिजिटल लैंगिक अंतराल और साइबर सुरक्षा।
6. विभिन्न दृष्टिकोण: (क) अधिकार-आधारित दृष्टिकोण: प्रवर्तनीय कानून आवश्यक; (ख) कल्याणकारी दृष्टिकोण: योजनाएँ और सेवाएँ पर्याप्त; (ग) सहभागी शासन: स्थानीय निकायों और नागरिक समाज की भूमिका। सर्वोत्तम परिणाम के लिए नीति, कानून और क्रियान्वयन क्षमता का संयोजन।
7. परिणाम वाला भाग: नीति को विधिक समर्थन न मिलने पर नीतियाँ सरकार-बदलने के साथ बदल सकती हैं, बजट आवंटन अनिश्चित रहता है और निगरानी कमजोर होती है। इसका समाधान स्थायी वैधानिक ढाँचा, स्वतंत्र निगरानी तंत्र (जैसे राज्य महिला आयोग) और साक्ष्य-आधारित मूल्यांकन है।
8. निष्कर्ष: संविधानिक लक्ष्य और नीति के बीच सेतु के रूप में विधि, बजट और संस्थागत क्षमता के एकीकरण पर बल।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
Related guides on our sites
- Best PSIR optional coaching for upsc
- Best PSIR optional teacher for upsc
- Best teacher of PSIR optional for upsc
- Best PSIR optional coaching in delhi for UPSC
- मुख्यमंत्री 2 नवंबर को महिला नीति शिखर सम्मेलन का करेंगे उद्घाटन - October 31, 2026
- Centre releases Rs 1.09 lakh crore tax devolution to states - October 31, 2026
- उत्तर पूर्वी चक्रवात अरनाब में आंध्र प्रदेश की ‘मन मित्र’ पहल क्यों है आदर्श मॉडल? - October 31, 2026

No Comments