07 Oct COP31 में भारत का पर्यावरण संरक्षण पर जोर: समझौतों को लागू करने की पुकार
✎ यह आयोजन वैश्विक जलवायु कार्रवाई के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जहाँ भारत जैसे प्रमुख विकासशील देश अपनी भूमिका को स्पष्ट कर रहा है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — International Relations | GS Paper III — Environment, Climate Change
- Prelims: COP31, पेरिस समझौता, जलवायु परिवर्तन, अनुच्छेद 51(ग), राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना, कार्बन बाज़ार, जलवायु न्याय, अनुकूलन एवं शमन
- Essay: जलवायु परिवर्तन: वैश्विक चुनौती और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व, सतत विकास और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग
यह खबर चर्चा में क्यों?
यह आयोजन वैश्विक जलवायु कार्रवाई के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जहाँ भारत जैसे प्रमुख विकासशील देश अपनी भूमिका को स्पष्ट कर रहा है।
पृष्ठभूमि
- पेरिस समझौता (2015) वैश्विक तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 2°C से नीचे रखने तथा प्रयासों को 1.5°C तक सीमित करने का लक्ष्य रखता है।
- इस समझौते के अंतर्गत देशों ने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs — Nationally Determined Contributions) प्रस्तुत किए हैं, जिनमें उत्सर्जन में कमी, अनुकूलन और वित्तीय सहायता शामिल हैं।
- भारत ने अपने NDCs में वर्ष 2030 तक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की उत्सर्जन तीव्रता में 45% तक कमी लाने तथा 2070 तक ‘शुद्ध-शून्य उत्सर्जन’ प्राप्त करने का संकल्प व्यक्त किया है।
- COP (Conference of Parties) संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क सम्मेलन (UNFCCC) के सदस्य देशों की वार्षिक बैठक है, जहाँ जलवायु परिवर्तन से संबंधित नीतियों और समझौतों पर चर्चा होती है।
- भारत ने पेरिस समझौते के अनुच्छेद 6 के अंतर्गत कार्बन बाज़ार के विकास में सक्रिय भूमिका निभाई है, जिसका उद्देश्य उत्सर्जन में कमी के प्रयासों को बढ़ावा देना है।
- वर्तमान में वैश्विक उत्सर्जन में कमी की गति अपर्याप्त है, जिसके कारण COP31 में कार्यान्वयन की तीव्रता पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
COP31 और पेरिस समझौता: प्रमुख तत्व
- पेरिस समझौता (2015) का मुख्य उद्देश्य वैश्विक तापमान वृद्धि को नियंत्रित करना है, जिसके लिए देशों को अपने NDCs प्रस्तुत करने तथा उन्हें समय-समय पर अपडेट करने की आवश्यकता है।
- भारत ने अपने राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC) के अंतर्गत विभिन्न पहलें शुरू की हैं, जिनमें नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता और वन संरक्षण शामिल हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| पेरिस समझौते का कार्यान्वयन | वैश्विक जलवायु लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सदस्य देशों द्वारा की गई प्रतिबद्धताओं को पूरा करना आवश्यक है। |
| प्रतिबद्धताओं को पूरा करना | विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों को जलवायु वित्त (Climate Finance) और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (Technology Transfer) प्रदान करने की प्रतिबद्धताओं को पूरा करना महत्वपूर्ण है। |
| कार्यान्वयन में तेजी लाना | जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों को देखते हुए, पेरिस समझौते के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए त्वरित और प्रभावी कार्रवाई की आवश्यकता है। |
| अंतरों को पाटना | राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (Nationally Determined Contributions – NDCs) और वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लक्ष्य के बीच के अंतर को कम करना। |
| COP31 का फोकस | भारत का यह आग्रह कि COP31 को केवल चर्चा के बजाय ठोस कार्रवाई और कार्यान्वयन पर केंद्रित होना चाहिए। |
महत्व
पर्यावरण
- पेरिस समझौते के लक्ष्यों को प्राप्त करने से वैश्विक तापमान वृद्धि को सीमित करने और जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों को कम करने में मदद मिलेगी।
- यह जैव विविधता (Biodiversity) के संरक्षण और पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) के संतुलन को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।
- नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) स्रोतों को बढ़ावा देने और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने की दिशा में प्रगति होगी।
आर्थिक
- जलवायु वित्त और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण से विकासशील देशों को हरित प्रौद्योगिकियों (Green Technologies) को अपनाने और सतत विकास (Sustainable Development) प्राप्त करने में सहायता मिलेगी।
- जलवायु-लचीली अर्थव्यवस्थाओं (Climate-Resilient Economies) का निर्माण होगा, जिससे चरम मौसमी घटनाओं से होने वाले आर्थिक नुकसान को कम किया जा सकेगा।
- हरित उद्योगों और रोजगारों के सृजन को बढ़ावा मिलेगा, जिससे आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) को गति मिलेगी।
रणनीतिक
- भारत का यह रुख वैश्विक जलवायु वार्ताओं में उसकी नेतृत्वकारी भूमिका को मजबूत करता है।
- यह विकसित और विकासशील देशों के बीच जलवायु कार्रवाई की जिम्मेदारी के साझा लेकिन विभेदित सिद्धांतों (Common but Differentiated Responsibilities – CBDR) को बनाए रखने में मदद करता है।
- अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और बहुपक्षीयता को बढ़ावा देता है, जो वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए आवश्यक है।
चुनौतियाँ
1. जलवायु वित्त की कमी
- विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों को प्रति वर्ष 100 अरब डॉलर प्रदान करने की प्रतिबद्धता अभी तक पूरी नहीं हुई है।
- जलवायु अनुकूलन (Climate Adaptation) और शमन (Mitigation) परियोजनाओं के लिए पर्याप्त वित्तपोषण की अनुपलब्धता।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण और पारिस्थितिकी, अंतर्राष्ट्रीय संबंध
2. प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में बाधाएँ
- विकासशील देशों के लिए उन्नत हरित प्रौद्योगिकियों तक पहुँच और उनके उपयोग में चुनौतियाँ।
- बौद्धिक संपदा अधिकार (Intellectual Property Rights) और उच्च लागत अक्सर प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में बाधा डालती है।
यूपीएससी लिंक: विज्ञान और प्रौद्योगिकी, अंतर्राष्ट्रीय संबंध
3. राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं का अपर्याप्त स्तर
- कई देशों के NDCs वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लक्ष्य के अनुरूप नहीं हैं।
- प्रतिबद्धताओं को बढ़ाने और उन्हें अधिक महत्वाकांक्षी बनाने की आवश्यकता है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण और पारिस्थितिकी, अंतर्राष्ट्रीय संबंध
4. कार्यान्वयन में धीमी गति
- जलवायु नीतियों और कार्यक्रमों को जमीनी स्तर पर लागू करने में नौकरशाही और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी।
- विभिन्न देशों में अलग-अलग प्राथमिकताएँ और क्षमताएँ कार्यान्वयन को प्रभावित करती हैं।
यूपीएससी लिंक: शासन, पर्यावरण और पारिस्थितिकी
5. वैश्विक एकजुटता का अभाव
- जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक समस्या है, लेकिन अक्सर राष्ट्रीय हित वैश्विक सहयोग पर हावी हो जाते हैं।
- जलवायु न्याय (Climate Justice) और ऐतिहासिक जिम्मेदारियों पर मतभेद।
यूपीएससी लिंक: अंतर्राष्ट्रीय संबंध, पर्यावरण और पारिस्थितिकी
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| जलवायु वित्त | विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों को प्रति वर्ष 100 अरब डॉलर की प्रतिबद्धता पूरी नहीं की गई है, जिससे जलवायु कार्रवाई बाधित हो रही है। |
| प्रौद्योगिकी पहुँच | हरित प्रौद्योगिकियों (जैसे नवीकरणीय ऊर्जा, कार्बन कैप्चर) तक विकासशील देशों की पहुँच सीमित है, जिससे उन्हें अपने उत्सर्जन लक्ष्य प्राप्त करने में कठिनाई होती है। |
| राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा | कई देशों के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिए पर्याप्त महत्वाकांक्षी नहीं हैं। |
| कार्यान्वयन अंतराल | पेरिस समझौते के तहत की गई प्रतिबद्धताओं और उनके वास्तविक कार्यान्वयन के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर है, जिससे वैश्विक लक्ष्य प्राप्त करना मुश्किल हो रहा है। |
| अनुकूलन की कमी | जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के बावजूद, अनुकूलन (Adaptation) उपायों के लिए पर्याप्त निवेश और ध्यान नहीं दिया जा रहा है, खासकर कमजोर देशों में। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (National Green Hydrogen Mission)
- राष्ट्रीय सौर मिशन (National Solar Mission)
- राष्ट्रीय पवन-सौर हाइब्रिड नीति (National Wind-Solar Hybrid Policy)
आगे की राह
- विकसित देशों को जलवायु वित्त के लिए अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करना चाहिए और विकासशील देशों को पर्याप्त वित्तीय सहायता प्रदान करनी चाहिए।
- हरित प्रौद्योगिकियों के हस्तांतरण को सुगम बनाना चाहिए, जिसमें बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित बाधाओं को दूर करना शामिल है।
- सभी देशों को अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) की महत्वाकांक्षा को बढ़ाना चाहिए और उन्हें 1.5 डिग्री सेल्सियस लक्ष्य के अनुरूप बनाना चाहिए।
- पेरिस समझौते के लक्ष्यों के कार्यान्वयन में तेजी लाने के लिए ठोस नीतियाँ और कार्य योजनाएँ विकसित की जानी चाहिए।
- जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन (Adaptation) उपायों पर अधिक ध्यान और निवेश की आवश्यकता है, खासकर सबसे कमजोर समुदायों के लिए।
- जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए वैश्विक सहयोग और बहुपक्षीय वार्ताओं को मजबूत किया जाना चाहिए।
- जलवायु न्याय के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए, ऐतिहासिक जिम्मेदारियों और क्षमता के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
COP31 · पेरिस समझौता · जलवायु परिवर्तन · राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) · जलवायु वित्त · अनुकूलन · शमन · हानि और क्षति · वैश्विक स्टॉकटेक · सतत विकास लक्ष्य
अवधारणा प्रवाह
भारत COP31 में पेरिस समझौते के कार्यान्वयन पर जोर देता है। → यह वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिए आवश्यक है। → इसके लिए जलवायु वित्त और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण महत्वपूर्ण हैं। → राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) को अधिक महत्वाकांक्षी बनाना होगा। → कार्यान्वयन में तेजी लाने और अंतरों को पाटने पर ध्यान केंद्रित करना होगा। → यह सतत विकास और जलवायु लचीलेपन को बढ़ावा देगा।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पेरिस समझौता (Paris Agreement) कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतर्राष्ट्रीय संधि है जो जलवायु परिवर्तन से संबंधित है।
2. यह समझौता 2015 में COP21 के दौरान अपनाया गया था।
3. राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (Nationally Determined Contributions – NDC) सभी देशों के लिए समान रूप से बाध्यकारी लक्ष्य निर्धारित करते हैं।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। पेरिस समझौता एक कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतर्राष्ट्रीय संधि है। कथन 2 भी सही है। इसे 2015 में COP21 में अपनाया गया था। कथन 3 गलत है। NDC प्रत्येक देश द्वारा स्वेच्छा से निर्धारित किए जाते हैं और वे समान नहीं होते, बल्कि राष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुसार भिन्न होते हैं।
Q2. अभिकथन (A): भारत COP31 में पेरिस समझौते के कार्यान्वयन में तेजी लाने पर जोर दे रहा है।
कारण (R): भारत का मानना है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए वैश्विक प्रतिबद्धताओं को पूरा करना और अंतराल को कम करना आवश्यक है।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि भारत ने COP31 में पेरिस समझौते के कार्यान्वयन में तेजी लाने पर जोर दिया है। कारण (R) भी सही है क्योंकि भारत का यह रुख जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक प्रयासों में प्रतिबद्धताओं को पूरा करने और मौजूदा अंतरालों को भरने की आवश्यकता पर आधारित है। R, A की सही व्याख्या है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ पेरिस समझौते के प्रमुख उद्देश्यों और सिद्धांतों पर प्रकाश डालते हुए, COP31 में भारत द्वारा ‘अंतराल को पाटने, प्रतिबद्धताओं को पूरा करने और कार्यान्वयन में तेजी लाने’ पर दिए गए जोर का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** पेरिस समझौते (Paris Agreement) का संक्षिप्त परिचय (कब अपनाया गया, मुख्य उद्देश्य)।
2. **पेरिस समझौते के प्रमुख उद्देश्य:**
* वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 2°C से काफी नीचे रखना, और 1.5°C तक सीमित करने का प्रयास करना।
* जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों के अनुकूलन (Adaptation) की क्षमता बढ़ाना।
* निम्न ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और जलवायु-लचीले विकास की दिशा में वित्त प्रवाह को संगत बनाना।
3. **पेरिस समझौते के प्रमुख सिद्धांत:**
* राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (Nationally Determined Contributions – NDC) की अवधारणा।
* सामान्य लेकिन विभेदित जिम्मेदारियां और संबंधित क्षमताएं (Common But Differentiated Responsibilities and Respective Capabilities – CBDR-RC)।
* पारदर्शिता और जवाबदेही ढांचा।
* वैश्विक स्टॉकटेक (Global Stocktake) तंत्र।
4. **COP31 में भारत का जोर (‘अंतराल को पाटना, प्रतिबद्धताओं को पूरा करना और कार्यान्वयन में तेजी लाना’):**
* **अंतराल को पाटना:** विकसित और विकासशील देशों के बीच जलवायु वित्त (Climate Finance), प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और क्षमता निर्माण में मौजूदा अंतरों को संबोधित करना। विशेष रूप से 100 बिलियन डॉलर के जलवायु वित्त लक्ष्य को पूरा करने में विफलता।
* **प्रतिबद्धताओं को पूरा करना:** विकसित देशों द्वारा अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारियों के अनुरूप उत्सर्जन कटौती और वित्तीय सहायता की प्रतिबद्धताओं को पूरा करने की आवश्यकता। NDC लक्ष्यों को प्राप्त करने में प्रगति।
* **कार्यान्वयन में तेजी लाना:** शमन (Mitigation), अनुकूलन और हानि व क्षति (Loss and Damage) के लिए ठोस कार्रवाई और परियोजनाओं को गति देना। नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) और ऊर्जा दक्षता (Energy Efficiency) को बढ़ावा देना।
5. **आलोचनात्मक परीक्षण:**
* **सकारात्मक पक्ष:** भारत का रुख वैश्विक जलवायु न्याय (Climate Justice) और इक्विटी (Equity) के सिद्धांतों के अनुरूप है। यह विकसित देशों पर उनकी ऐतिहासिक जिम्मेदारियों को पूरा करने का दबाव डालता है। यह विकासशील देशों के लिए आवश्यक समर्थन की वकालत करता है।
* **चुनौतियाँ/सीमाएँ:** भारत स्वयं एक प्रमुख उत्सर्जक है और उसे भी अपने NDC लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए महत्वाकांक्षी कदम उठाने होंगे। वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक दबाव जलवायु कार्रवाई में बाधा डाल सकते हैं। विकसित देशों में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी।
* **आगे का रास्ता:** बहुपक्षीय सहयोग, नवीन वित्तपोषण तंत्र, प्रौद्योगिकी साझाकरण और सभी हितधारकों की भागीदारी की आवश्यकता।
6. **निष्कर्ष:** भारत का रुख एक संतुलित और न्यायसंगत जलवायु कार्रवाई की वकालत करता है, जो पेरिस समझौते के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके लिए सभी देशों को अपनी जिम्मेदारियों को ईमानदारी से निभाना होगा।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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