चक्रवात अरनब: तटीय राज्यों में ‘जीवन की शून्य हानि’ सुनिश्चित करने की तैयारी

चक्रवात अरनब: तटीय राज्यों में ‘जीवन की शून्य हानि’ सुनिश्चित करने की तैयारी

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चक्रवात अरनब: बचाव प्रक्रिया

✎ चक्रवात से जनहानि घटाने का मूल सूत्र है समय पर पूर्व चेतावनी, समय पर निकासी और सुरक्षित आश्रय-स्थल, जिसे आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 का ढाँचा और राज्य-केंद्र समन्वय संभव बनाते हैं।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — आपदा प्रबंधन (Disaster Management)  |  GS Paper III — पर्यावरण एवं भौगोलिक परिघटनाएँ (Environment and Geographical Phenomena)  |  GS Paper II — शासन और केंद्र-राज्य समन्वय (Governance and Centre-State Coordination)
  • Prelims: भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और चक्रवात का वर्गीकरण, चक्रवात की उत्पत्ति के लिए अनुकूल दशाएँ (उष्ण समुद्री सतह, कोरियोलिस बल), आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA), राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF), राज्य आपदा प्रतिक्रिया निधि (SDRF), राष्ट्रीय संकट प्रबंधन समिति (NCMC) और कैबिनेट सचिव की भूमिका, सेंडाई आपदा जोखिम न्यूनीकरण ढाँचा (Sendai Framework)
  • Essay: आपदा जोखिम न्यूनीकरण में समुदाय की भूमिका और ‘शून्य जनहानि’ का लक्ष्य, सूचना-आधारित पूर्व चेतावनी और केंद्र-राज्य समन्वय: भारत के आपदा प्रबंधन की चुनौतियाँ

त्वरित पुनरावृत्ति: चक्रवात से जनहानि घटाने का मूल सूत्र है समय पर पूर्व चेतावनी, समय पर निकासी और सुरक्षित आश्रय-स्थल, जिसे आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 का ढाँचा और राज्य-केंद्र समन्वय संभव बनाते हैं।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

बंगाल की खाड़ी के मध्य-पूर्वी भाग में बना गहरा अवदाब (Deep Depression) तीव्र होकर ‘अर्नब’ नामक चक्रवाती तूफ़ान में बदल गया है, जिसके अत्यंत गंभीर चक्रवात के रूप में आंध्र प्रदेश और यनम तट के बापटला और विशाखापत्तनम के बीच स्थलपात (Landfall) की संभावना जताई गई है। IMD के अनुसार 28 अक्टूबर को दोपहर तक इसकी अधिकतम स्थायी हवाएँ 115–125 किमी/घंटा और झोंके 140 किमी/घंटा तक पहुँच सकती हैं। इसी को देखते हुए ओडिशा और आंध्र प्रदेश ने स्कूल बंद किए, समुद्र में मछली पकड़ने पर रोक लगाई और बचाव दल तैयार रखे। ओडिशा ने दक्षिणी ज़िलों में स्कूल, कॉलेज और आंगनवाड़ी केंद्र बंद कर दिए तथा कर्मचारियों की छुट्टियाँ रद्द कीं। नई दिल्ली में राष्ट्रीय संकट प्रबंधन समिति (NCMC) की बैठक में कैबिनेट सचिव ने आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और पुदुचेरी के साथ पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में भी अलर्ट का निर्देश दिया, क्योंकि वहाँ भारी वर्षा का अनुमान था। सेना, नौसेना, वायुसेना और भारतीय तटरक्षक बल के बचाव दल तथा NDRF की अतिरिक्त टीमें तैयार रखी गईं। इस घटना का अध्ययन यह समझने के लिए उपयोगी है कि पूर्व चेतावनी, निकासी और राज्य-केंद्र समन्वय मिलकर जनहानि कैसे घटाते हैं।

पृष्ठभूमि

  • बंगाल की खाड़ी भारत के सबसे सक्रिय चक्रवात-उत्पत्ति क्षेत्रों में है। यहाँ चक्रवात प्रायः मानसून-पूर्व (अप्रैल–मई) और मानसून-पश्चात (अक्टूबर–दिसंबर) मौसम में अधिक बनते हैं, और ओडिशा, आंध्र प्रदेश व पश्चिम बंगाल सर्वाधिक प्रभावित तट हैं।
  • वर्ष 1999 के ओडिशा सुपर साइक्लोन में आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार लगभग दस हज़ार लोगों की मृत्यु हुई थी। इस त्रासदी के बाद ओडिशा ने चक्रवात-आश्रय स्थल, तटीय सुरक्षा और सामुदायिक निकासी को प्राथमिकता देते हुए अपने आपदा प्रबंधन तंत्र को सुदृढ़ किया।
  • आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत राष्ट्रीय स्तर पर NDMA, राज्य स्तर पर राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) और ज़िला स्तर पर ज़िला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) का ढाँचा बना। NDRF की स्थापना भी इसी अधिनियम के अंतर्गत हुई।
  • चक्रवात की पूर्व चेतावनी IMD जारी करता है और चेतावनी का प्रसार चक्रवात चेतावनी प्रसार प्रणाली (CWDS) जैसे माध्यमों से राज्य प्रशासन तक होता है। इसका उद्देश्य अंतिम व्यक्ति तक समय पर सूचना पहुँचाना है।
  • सेंडाई आपदा जोखिम न्यूनीकरण ढाँचा (2015–2030), जिसका भारत भी हस्ताक्षरकर्ता है, आपदा से होने वाली मृत्यु-दर घटाने को प्राथमिक लक्ष्य बनाता है। ‘शून्य जनहानि’ इसी भावना का व्यावहारिक रूप है, यद्यपि यह कोई कानूनी बाध्यता नहीं, बल्कि नीतिगत आकांक्षा है।

चक्रवात और आपदा प्रबंधन का ढाँचा क्या है?

  • चक्रवात निम्न दाब वाला एक बड़ा वायुमंडलीय तंत्र है, जिसे बनने के लिए लगभग 26–27 डिग्री सेल्सियस से अधिक समुद्री सतह तापमान, कोरियोलिस बल (जो भूमध्य रेखा से दूर होने पर प्रभावी होता है) और अनुकूल ऊर्ध्वाधर पवन-कतरन की आवश्यकता होती है।
  • IMD चक्रवात को उसकी स्थायी हवाओं की गति के आधार पर वर्गीकृत करता है: अवदाब, गहरा अवदाब, चक्रवाती तूफ़ान (लगभग 62–88 किमी/घंटा), गंभीर चक्रवाती तूफ़ान (89–117 किमी/घंटा), अति गंभीर चक्रवाती तूफ़ान (118–165 किमी/घंटा) तथा उससे ऊपर की श्रेणियाँ।
  • स्थलपात वह बिंदु है जहाँ चक्रवात समुद्र से तट पर पहुँचता है। जनहानि का सबसे बड़ा कारण प्रायः तटीय तूफ़ानी लहर (Storm Surge) और निचले इलाकों में जलभराव होता है, न कि केवल तेज़ हवाएँ।
  • आपदा प्रबंधन चक्र के चार चरण माने जाते हैं: शमन (Mitigation), तैयारी (Preparedness), प्रतिक्रिया (Response) और पुनर्वास-पुनर्निर्माण (Recovery and Reconstruction)। चक्रवात में तैयारी और प्रतिक्रिया चरण सबसे निर्णायक होते हैं।
  • NCMC एक उच्च-स्तरीय समन्वय तंत्र है, जिसकी अध्यक्षता कैबिनेट सचिव करते हैं। यह बड़े संकट में मंत्रालयों, राज्यों और सशस्त्र बलों के बीच समन्वय सुनिश्चित करती है।
  • NDRF केंद्र का विशेषज्ञ आपदा-प्रतिक्रिया बल है, जबकि ODRAF जैसे राज्य-बल राज्य सरकार के अधीन कार्य करते हैं। सेना, नौसेना, वायुसेना और तटरक्षक बल सिविल प्रशासन की सहायता (Aid to Civil Authority) के रूप में भूमिका निभाते हैं।
  • आपदा प्रबंधन मुख्यतः राज्य का प्रथम दायित्व है, जबकि केंद्र वित्तीय और तकनीकी सहायता देता है। SDRF जैसी निधियाँ राज्यों को तत्काल राहत और पुनर्वास के लिए उपलब्ध होती हैं।
  • निकासी, आश्रय-स्थल, कमज़ोर वर्गों (गर्भवती महिलाएँ, वरिष्ठ नागरिक, बच्चे और दिव्यांगजन) की विशेष व्यवस्था और मछुआरों के लिए मत्स्यन-प्रतिबंध, ये सभी उपाय जनहानि घटाने के व्यावहारिक साधन हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
चक्रवात की स्थिति बंगाल की खाड़ी के पूर्व-मध्य और दक्षिण-पूर्व भाग में बना गहरा अवदाब पश्चिम की ओर बढ़ा और तीव्र होकर चक्रवाती तूफ़ान ‘अर्नब’ बन गया। अनुमान है कि यह बापटला और विशाखापत्तनम के बीच आंध्र प्रदेश और यनम तट से टकराएगा।
पूर्वानुमानित तीव्रता भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (India Meteorological Department – IMD) के अनुसार 28 अक्तूबर तक अधिकतम सतत हवाएँ 115-125 किलोमीटर प्रति घंटा और झोंके 140 किलोमीटर प्रति घंटा तक होने का अनुमान है। इसे अति गंभीर चक्रवाती तूफ़ान की श्रेणी में रखा गया है।
निवारक उपाय ओडिशा में छह दक्षिणी ज़िलों में स्कूल, कॉलेज और आंगनवाड़ी केंद्र बंद किए गए। समुद्र में मछली पकड़ने पर रोक लगी और पहाड़ी, झरना व बांध क्षेत्रों में पर्यटकों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा।
उच्च-स्तरीय समन्वय राष्ट्रीय संकट प्रबंधन समिति (National Crisis Management Committee – NCMC) ने तैयारियों की समीक्षा की। राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (National Disaster Response Force – NDRF), थल सेना, नौसेना, वायु सेना और भारतीय तटरक्षक बल को तैनाती के लिए तैयार रखा गया।
प्रभावित क्षेत्रों का विस्तार आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और पुडुचेरी के साथ पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार को भी अलर्ट पर रखा गया, क्योंकि वहाँ भी भारी वर्षा की संभावना है।
नीति-लक्ष्य ‘शून्य जीवन-हानि’ और अवसंरचना तथा संपत्ति को न्यूनतम क्षति सुनिश्चित करना प्रमुख लक्ष्य है। क्षति होने पर आवश्यक सेवाओं की शीघ्र बहाली के निर्देश दिए गए हैं।

महत्व

मानवीय और सामाजिक

  • जीवन के अधिकार की रक्षा को प्राथमिकता देना, जो शून्य जीवन-हानि के लक्ष्य का आधार है।
  • कच्चे घरों और निचले इलाकों के निवासियों को आश्रय गृहों में पहले से स्थानांतरित करना।
  • गर्भवती महिलाओं, वरिष्ठ नागरिकों, बच्चों और दिव्यांगजनों के लिए विशेष व्यवस्था, जो आपदा में सर्वाधिक असुरक्षित होते हैं।

आर्थिक

  • मछली पकड़ने पर रोक से तटीय मछुआरा परिवारों की आजीविका पर अस्थायी दबाव पड़ता है।
  • कृषि विभाग द्वारा किसानों को फसल से संबंधित सलाह देना खाद्यान्न और कृषि-आय की हानि को सीमित करता है।
  • पर्यटन पर प्रतिबंध और अवसंरचना की संभावित क्षति का आर्थिक प्रभाव स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

प्रशासनिक और संस्थागत

  • राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (National Disaster Management Authority – NDMA) द्वारा स्थापित ढाँचे के अंतर्गत केंद्र और राज्य के बीच सामंजस्य।
  • राज्य आपदा मोचन बल (State Disaster Response Force – SDRF) और ओडिशा आपदा त्वरित कार्य बल (Odisha Disaster Rapid Action Force – ODRAF) की तैनाती।
  • मंत्रियों की तैनाती, नियंत्रण कक्षों की स्थापना और कर्मचारियों की छुट्टी रद्द करना, जिससे राहत एवं बचाव का समन्वय सुदृढ़ होता है।

सुरक्षा और सामरिक

  • सशस्त्र बलों और भारतीय तटरक्षक बल की भूमिका समुद्री बचाव और राहत में निर्णायक होती है।
  • जहाजों और नावों को समय रहते तट या घाटों तक लाना समुद्री सुरक्षा का व्यावहारिक पक्ष है।

चुनौतियाँ

1. पूर्वानुमान की सटीकता और चेतावनी का अंतिम छोर

  • चक्रवात के स्थलपात का समय और स्थान बदल सकते हैं, जिससे तैयारी का आकलन कठिन होता है।
  • पूर्वानुमान सूचना को गाँव और टोले स्तर तक स्थानीय भाषा में पहुँचाना अब भी चुनौती है।
  • मौसम बुलेटिन को आम नागरिक के लिए समझने योग्य व्यावहारिक निर्देशों में बदलना आवश्यक है।

2. कच्चे घरों और निचले इलाकों की सुरक्षा

  • फूस के घरों में रहने वाले परिवारों के लिए पक्के आश्रय की उपलब्धता सीमित हो सकती है।
  • आश्रय गृहों में पेयजल, स्वच्छता और चिकित्सा सुविधा सुनिश्चित करना बड़ी चुनौती है।
  • निकासी के समय परिवारों का अपने पशुधन और संपत्ति के प्रति हिचकिचाना भी सामने आता है।

3. मछुआरा समुदाय की आजीविका

  • मछली पकड़ने पर रोक से दैनिक आय पर सीधा असर पड़ता है।
  • ऐसे परिवारों को तत्काल आर्थिक सहायता और वैकल्पिक रोज़गार उपलब्ध कराना आवश्यक है।
  • आजीविका हानि को आपदा क्षति के आकलन में शामिल करना नीतिगत रूप से महत्वपूर्ण है।

4. केंद्र, राज्य और ज़िला स्तर पर समन्वय

  • आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 (Disaster Management Act, 2005) के अंतर्गत कई एजेंसियों के बीच भूमिकाओं का स्पष्ट बँटवारा आवश्यक है।
  • पड़ोसी और अन्य राज्यों को अलर्ट देने में मंत्रालयों और IMD के बीच त्वरित सूचना-प्रवाह आवश्यक है।
  • सेना, तटरक्षक बल, NDRF और राज्य बलों के बीच परिचालन-समन्वय बनाए रखना चुनौतीपूर्ण है।

5. क्षति के बाद पुनर्स्थापना

  • बिजली, पेयजल, संचार और सड़क जैसी आवश्यक सेवाओं की शीघ्र बहाली एक बड़ी प्रशासनिक परीक्षा है।
  • क्षतिग्रस्त अवसंरचना के पुनर्निर्माण में लचीलापन (resilience) बढ़ाने की आवश्यकता होती है।
  • राहत से पुनर्वास तक का संक्रमण सुनिश्चित करना दीर्घकालिक नीति का विषय है।

6. बढ़ती तीव्रता का दीर्घकालिक संदर्भ

  • बंगाल की खाड़ी में तीव्र चक्रवातों की आवृत्ति और तीव्रता पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव की चर्चा होती रहती है।
  • समुद्री सतह के तापमान में वृद्धि चक्रवात की तीव्रता बढ़ाने में योगदान दे सकती है।
  • इस संदर्भ में तटीय नियोजन और चक्रवात-प्रतिरोधी निर्माण की भूमिका बढ़ जाती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
पूर्वानुमान की अनिश्चितता स्थलपात का समय और स्थान बदलने से तैयारी और निकासी के निर्णय कठिन हो जाते हैं।
असुरक्षित आवास फूस के घरों और निचले इलाकों में रहने वाले लोग सर्वाधिक जोखिम में होते हैं।
आजीविका पर प्रभाव मछली पकड़ने पर रोक और पर्यटन प्रतिबंध से तटीय परिवारों की आय घटती है।
बहु-एजेंसी समन्वय केंद्र, राज्य, ज़िला और सशस्त्र बलों के बीच सूचना और कार्य का सही बँटवारा आवश्यक है।
पुनर्स्थापना में देरी बिजली, पेयजल और संचार सेवाओं की बहाली में विलंब राहत कार्यों को धीमा करता है।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • राष्ट्रीय चक्रवात जोखिम न्यूनीकरण परियोजना (National Cyclone Risk Mitigation Project)

आगे की राह

  • प्रभाव-आधारित पूर्वानुमान (Impact-based Forecasting) को अपनाकर यह बताया जाए कि किस क्षेत्र में कितना खतरा है, केवल हवा की गति नहीं।
  • चेतावनी संदेश को स्थानीय भाषाओं में मोबाइल, रेडियो और सामुदायिक माध्यमों से गाँव स्तर तक पहुँचाया जाए।
  • आश्रय गृहों के मानक तय किए जाएँ और उनमें पेयजल, शौचालय, चिकित्सा तथा विशेष आवश्यकता वाले व्यक्तियों की सुविधा सुनिश्चित हो।
  • मछुआरा परिवारों को मछली पकड़ने पर रोक की अवधि के दौरान तत्काल आर्थिक सहायता और वैकल्पिक आजीविका उपलब्ध कराई जाए।
  • चक्रवात-प्रतिरोधी पक्के आवास और तटीय क्षेत्रों में सुरक्षित भवनों के निर्माण को प्राथमिकता दी जाए।
  • स्थानीय स्तर पर सामुदायिक मॉक ड्रिल और स्वयंसेवी दलों का प्रशिक्षण नियमित रूप से कराया जाए।
  • राज्य आपदा मोचन निधि (State Disaster Response Fund) के उपयोग में त्वरित स्वीकृति और पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई जाए।
  • क्षति के बाद बिजली, पेयजल और सड़क की बहाली के लिए स्पष्ट समय-सीमा और निगरानी तंत्र बनाया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

चक्रवात प्रबंधन · राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण · भारत मौसम विज्ञान विभाग · आपदा जोखिम न्यूनीकरण · तटीय राज्य · पूर्व चेतावनी प्रणाली · राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल · राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल · शून्य जनहानि · जलवायु परिवर्तन अनुकूलन

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 21: जीवन के अधिकार का संरक्षण

अवधारणा प्रवाह

बंगाल की खाड़ी में निम्न दाब क्षेत्र से अवदाब और फिर गहरा अवदाब का गठन  →  गहरा अवदाब तीव्र होकर चक्रवाती तूफ़ान ‘अर्नब’ बनता है और IMD द्वारा बुलेटिन जारी होते हैं  →  स्थलपात के अनुमानित क्षेत्र के आधार पर NCMC की समीक्षा और राज्यों को अलर्ट  →  राज्यों द्वारा निवारक कदम: स्कूल बंद, मछली पकड़ने पर रोक और पर्यटन पर प्रतिबंध  →  NDRF, ODRAF, सशस्त्र बलों और तटरक्षक बल की तैनाती तथा निचले इलाकों से निकासी  →  स्थलपात के दौरान और बाद में बचाव, राहत और नियंत्रण कक्षों के माध्यम से समन्वय  →  क्षति का आकलन और आवश्यक सेवाओं की शीघ्र बहाली

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत में उष्णकटिबंधीय चक्रवात मुख्य रूप से बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में उत्पन्न होते हैं।
2. भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।
3. राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) गृह मंत्रालय के अधीन एक विशेष बल है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। भारत में उष्णकटिबंधीय चक्रवात मुख्य रूप से बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में उत्पन्न होते हैं, जिनमें से बंगाल की खाड़ी में अधिक चक्रवात आते हैं। कथन 2 सही है। IMD पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत एक प्रमुख एजेंसी है जो मौसम संबंधी अवलोकन, मौसम पूर्वानुमान और भूकंपीय निगरानी के लिए जिम्मेदार है। कथन 3 सही है। NDRF आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत गठित एक विशेष बल है जो गृह मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करता है।

Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा/से राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) का/के मुख्य कार्य है/हैं?
1. आपदा प्रबंधन के लिए नीतियां, योजनाएं और दिशानिर्देश तैयार करना।
2. आपदाओं से प्रभावित लोगों को तत्काल वित्तीय सहायता प्रदान करना।
3. आपदा प्रतिक्रिया के लिए विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के बीच समन्वय स्थापित करना।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

  1. केवल 1
  2. केवल 1 और 3
  3. केवल 2 और 3
  4. 1, 2 और 3

उत्तर: केवल 1 और 3 — NDMA का मुख्य कार्य आपदा प्रबंधन के लिए नीतियां, योजनाएं और दिशानिर्देश तैयार करना है (कथन 1 सही)। यह विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के बीच समन्वय स्थापित करता है (कथन 3 सही)। हालाँकि, तत्काल वित्तीय सहायता प्रदान करना मुख्य रूप से राज्य सरकारों और संबंधित राहत कोषों का कार्य है, NDMA का नहीं (कथन 2 गलत)।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत के तटीय क्षेत्रों में चक्रवातों के बढ़ते खतरे को देखते हुए, आपदा प्रबंधन में ‘शून्य जनहानि’ के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपनाई जाने वाली रणनीतियों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: भारत के तटीय क्षेत्रों में चक्रवातों की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि का संक्षिप्त उल्लेख करें और ‘शून्य जनहानि’ के लक्ष्य की प्रासंगिकता बताएं।
2. ‘शून्य जनहानि’ प्राप्त करने की रणनीतियाँ:
क. पूर्व चेतावनी प्रणाली: भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की भूमिका, डॉप्लर रडार, उपग्रह संचार, तटीय चेतावनी प्रणाली।
ख. सामुदायिक तैयारी और क्षमता निर्माण: जागरूकता कार्यक्रम, मॉक ड्रिल, स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण, स्थानीय समुदायों की भागीदारी।
ग. प्रभावी निकासी और आश्रय प्रबंधन: सुरक्षित आश्रयों की उपलब्धता, परिवहन व्यवस्था, कमजोर समूहों (गर्भवती महिलाएं, बुजुर्ग, दिव्यांग) के लिए विशेष प्रावधान।
घ. त्वरित प्रतिक्रिया और बचाव अभियान: राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF), राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF), सेना, नौसेना, वायु सेना और तटरक्षक बल की भूमिका, पूर्व-तैनाती।
ङ. आधारभूत संरचना का सुदृढ़ीकरण: चक्रवात-प्रतिरोधी भवनों का निर्माण, तटबंधों और मैंग्रोव वनों का संरक्षण।
च. अंतर-एजेंसी समन्वय: राष्ट्रीय संकट प्रबंधन समिति (NCMC), राज्य और जिला स्तर पर समन्वय समितियों की भूमिका।
3. समालोचनात्मक परीक्षण/चुनौतियाँ:
क. अंतिम मील तक चेतावनी का प्रसार: दूरदराज के क्षेत्रों और मछुआरा समुदायों तक प्रभावी संचार की चुनौतियाँ।
ख. जलवायु परिवर्तन के प्रभाव: चक्रवातों की अप्रत्याशित प्रकृति और तीव्रता में वृद्धि।
ग. वित्तीय और तकनीकी संसाधन: आपदा प्रबंधन के लिए पर्याप्त निवेश की आवश्यकता।
घ. शहरीकरण और तटीय अतिक्रमण: कमजोर आबादी का बढ़ता जोखिम।
ङ. पुनर्वास और पुनर्निर्माण की चुनौतियाँ: आवश्यक सेवाओं की त्वरित बहाली।
4. निष्कर्ष: ‘शून्य जनहानि’ के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एक बहु-आयामी, सतत और समावेशी दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल दें, जिसमें प्रौद्योगिकी, सामुदायिक भागीदारी और मजबूत संस्थागत तंत्र शामिल हों।

स्रोत: orissapost.com


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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