11 Oct सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में सीजेपी प्रदर्शन पर केंद्र को दिए निर्देश, जानिए पूरा मामला
✎ विरोध प्रदर्शन का अधिकार भारतीय नागरिकों का मौलिक अधिकार है, जो अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) से प्राप्त होता है, लेकिन यह अनुच्छेद 19(2) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था सहित कुछ उचित प्रतिबंधों के अधीन है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और मूल संरचना। | GS Paper II — संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व; संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ; स्थानीय स्तर पर शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा उसकी चुनौतियाँ। | GS Paper II — विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये सरकारी नीतियाँ और हस्तक्षेप तथा उनके अभिकल्पन और कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।
- Prelims: विरोध प्रदर्शन का अधिकार, अनुच्छेद 19(1)(a), अनुच्छेद 19(1)(b), अनुच्छेद 19(2), सार्वजनिक व्यवस्था, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), धारा 163 BNSS, दिल्ली मेट्रो, इंटरनेट सेवाएँ, सर्वोच्च न्यायालय
- Essay: लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन का अधिकार: संतुलन और सीमाएँ।, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच सामंजस्य।
त्वरित पुनरावृत्ति: विरोध प्रदर्शन का अधिकार भारतीय नागरिकों का मौलिक अधिकार है, जो अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) से प्राप्त होता है, लेकिन यह अनुच्छेद 19(2) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था सहित कुछ उचित प्रतिबंधों के अधीन है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में दिल्ली में ‘कॉकक्रोच जनता पार्टी’ (CJP) द्वारा चुनावी रोल (electoral rolls) के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) में कथित अनियमितताओं के विरोध में बुलाए गए प्रदर्शनों के बीच रेलवे और मेट्रो सेवाओं को सामान्य रूप से संचालित रखने तथा इंटरनेट सेवाओं को बाधित न करने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने यह भी कहा कि प्रतिबंध संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था की शर्तों के अधीन होने चाहिए। यह हस्तक्षेप विरोध प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता के बीच संतुलन स्थापित करने के महत्त्व को रेखांकित करता है।
पृष्ठभूमि
- CJP द्वारा चुनावी रोल में कथित अनियमितताओं को लेकर विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया गया था, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की गई थी।
- प्रदर्शनों के दौरान, दिल्ली में आवाजाही पर प्रतिबंध लगाए गए और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू की गई।
- कई प्रदर्शनकारियों और विपक्षी नेताओं को हिरासत में लिया गया, जिससे शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार के हनन के आरोप लगे।
- सर्वोच्च न्यायालय ने इन प्रतिबंधों और विरोध प्रदर्शन के अधिकार को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की।
- न्यायालय ने केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि दिल्ली मेट्रो और रेलवे सेवाएँ सामान्य रूप से चलें और इंटरनेट सेवाएँ बाधित न हों।
- न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि प्रतिबंध अनुच्छेद 19(2) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था की शर्तों के अनुरूप होने चाहिए।
विरोध प्रदर्शन का अधिकार और संवैधानिक प्रावधान
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) सभी नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (freedom of speech and expression) का अधिकार प्रदान करता है।
- अनुच्छेद 19(1)(b) नागरिकों को शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के इकट्ठा होने (to assemble peaceably and without arms) का अधिकार देता है। ये दोनों अधिकार मिलकर विरोध प्रदर्शन के अधिकार का आधार बनते हैं।
- हालांकि, ये अधिकार पूर्ण नहीं हैं और अनुच्छेद 19(2) के तहत इन पर उचित प्रतिबंध (reasonable restrictions) लगाए जा सकते हैं।
- अनुच्छेद 19(2) के तहत प्रतिबंधों में भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था (public order), शालीनता या नैतिकता, न्यायालय की अवमानना, मानहानि या किसी अपराध के लिये उकसाना शामिल हैं।
- सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना सरकार का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है, लेकिन इसे नागरिकों के मौलिक अधिकारों का अनुचित रूप से दमन करने के बहाने के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
- सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों में विरोध प्रदर्शन के अधिकार को लोकतंत्र का एक अभिन्न अंग माना है, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि यह अधिकार दूसरों के अधिकारों और सार्वजनिक जीवन को बाधित नहीं कर सकता।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका होने पर कुछ क्षेत्रों में लोगों के इकट्ठा होने पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार देती है।
- इंटरनेट सेवाओं का निलंबन भी सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के आधार पर किया जा सकता है, लेकिन इस पर भी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित उचित प्रक्रिया और आनुपातिकता के सिद्धांतों का पालन करना आवश्यक है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| विरोध प्रदर्शन का अधिकार | यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) और 19(1)(बी) के तहत एक मौलिक अधिकार है, जो नागरिकों को शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठा होने और अपनी बात रखने की स्वतंत्रता देता है। |
| सार्वजनिक व्यवस्था | अनुच्छेद 19(2) के तहत, विरोध प्रदर्शन के अधिकार पर ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ के आधार पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, ताकि शांति और सुरक्षा बनी रहे। |
| न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) | उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने विरोध प्रदर्शनों से संबंधित प्रतिबंधों की वैधता की समीक्षा की, जो न्यायपालिका की संवैधानिक भूमिका को दर्शाता है। |
| धारा 163, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita – BNSS) | यह सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका पर प्रतिबंधात्मक आदेश जारी करने की शक्ति प्रदान करती है, जिसका उपयोग विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए किया जा सकता है। |
| आवश्यक सेवाओं का संचालन | उच्चतम न्यायालय ने मेट्रो और रेलवे सेवाओं को सामान्य रूप से चलाने का निर्देश दिया, जो विरोध प्रदर्शनों के दौरान आम जनता को होने वाली असुविधा को कम करने के लिए महत्वपूर्ण है। |
महत्व
लोकतांत्रिक महत्व
- विरोध प्रदर्शन का अधिकार एक जीवंत लोकतंत्र का आधार है, जो नागरिकों को सरकार की नीतियों या कार्यों के प्रति अपनी असहमति व्यक्त करने का अवसर देता है।
- न्यायपालिका की सक्रिय भूमिका यह सुनिश्चित करती है कि विरोध के अधिकार का प्रयोग करते समय नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन न हो, और राज्य द्वारा लगाए गए प्रतिबंध उचित हों।
शासन और कानून-व्यवस्था
- विरोध प्रदर्शनों के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य की जिम्मेदारी है, जिसके लिए उचित प्रतिबंध और निवारक उपाय आवश्यक हैं।
- उच्चतम न्यायालय का निर्देश सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता पर बल देता है।
सामाजिक-आर्थिक प्रभाव
- विरोध प्रदर्शनों के कारण आवश्यक सेवाओं (जैसे परिवहन और इंटरनेट) में व्यवधान से आम जनता को भारी असुविधा हो सकती है और आर्थिक गतिविधियाँ प्रभावित हो सकती हैं।
- न्यायालय का हस्तक्षेप यह सुनिश्चित करता है कि विरोध प्रदर्शनों के कारण समाज के बड़े वर्ग को अनावश्यक कठिनाइयों का सामना न करना पड़े।
चुनौतियाँ
1. विरोध के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन
- यह निर्धारित करना एक चुनौती है कि विरोध प्रदर्शन के अधिकार का प्रयोग कहाँ समाप्त होता है और सार्वजनिक व्यवस्था को बनाए रखने की आवश्यकता कहाँ से शुरू होती है।
- राज्य को यह सुनिश्चित करना होता है कि प्रतिबंध मनमाने न हों और अनुच्छेद 19(2) के तहत निर्धारित ‘उचित प्रतिबंधों’ की कसौटी पर खरे उतरें।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान – मौलिक अधिकार, राज्य के नीति निदेशक तत्व और मौलिक कर्तव्य
2. पुलिस बल का प्रयोग और मानवाधिकार
- विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस द्वारा बल के प्रयोग की सीमा और मानवाधिकारों का सम्मान सुनिश्चित करना एक संवेदनशील मुद्दा है।
- निवारक गिरफ्तारियों (preventive arrests) और आंदोलन पर प्रतिबंधों की वैधता की अक्सर न्यायिक जांच की जाती है।
यूपीएससी लिंक: शासन – पारदर्शिता और जवाबदेही, मानवाधिकार
3. शहरी गतिशीलता और आवश्यक सेवाओं पर प्रभाव
- बड़े शहरों में विरोध प्रदर्शनों से यातायात, मेट्रो और इंटरनेट जैसी आवश्यक सेवाओं में व्यवधान उत्पन्न होता है, जिससे लाखों नागरिकों का दैनिक जीवन प्रभावित होता है।
- इन सेवाओं को बाधित किए बिना विरोध प्रदर्शनों को समायोजित करने के लिए प्रभावी भीड़ प्रबंधन रणनीतियों की आवश्यकता है।
यूपीएससी लिंक: आंतरिक सुरक्षा – कानून और व्यवस्था
4. कानूनों का उचित क्रियान्वयन
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) जैसे नए कानूनों के तहत प्रतिबंधात्मक आदेशों का उचित और निष्पक्ष क्रियान्वयन सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है।
- इन कानूनों का दुरुपयोग न हो, यह सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक निगरानी आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान – संवैधानिक प्रावधान, कानून का शासन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| मौलिक अधिकारों का हनन | विरोध प्रदर्शन के अधिकार पर अनुचित प्रतिबंधों से नागरिकों के अभिव्यक्ति और सभा की स्वतंत्रता का हनन हो सकता है। |
| कानून-व्यवस्था का उल्लंघन | विरोध प्रदर्शनों के हिंसक होने या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की स्थिति में कानून-व्यवस्था बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है। |
| आवश्यक सेवाओं में व्यवधान | मेट्रो, रेलवे और इंटरनेट जैसी सेवाओं के बाधित होने से आम जनता को भारी असुविधा होती है और दैनिक जीवन प्रभावित होता है। |
| पुलिस बल का अत्यधिक उपयोग | विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित करने में पुलिस द्वारा अत्यधिक बल का प्रयोग मानवाधिकारों के उल्लंघन का कारण बन सकता है। |
| न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता | जब राज्य और नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन बिगड़ता है, तो न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ता है, जिससे प्रक्रिया में देरी हो सकती है। |
आगे की राह
- विरोध प्रदर्शनों के लिए निर्दिष्ट स्थानों का निर्धारण किया जाना चाहिए ताकि सार्वजनिक व्यवस्था और आवश्यक सेवाओं पर न्यूनतम प्रभाव पड़े।
- पुलिस को भीड़ नियंत्रण के लिए मानवाधिकारों का सम्मान करते हुए गैर-घातक तरीकों और प्रशिक्षण पर अधिक ध्यान देना चाहिए।
- विरोध प्रदर्शनों के आयोजकों और प्रशासन के बीच पूर्व-वार्ता और समन्वय स्थापित किया जाना चाहिए ताकि संभावित मुद्दों को हल किया जा सके।
- न्यायपालिका को मौलिक अधिकारों और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए अपनी निगरानी भूमिका को सक्रिय रूप से जारी रखना चाहिए।
- नागरिकों को अपने विरोध के अधिकार का प्रयोग करते समय कानून का पालन करने और सार्वजनिक संपत्ति का सम्मान करने के लिए जागरूक किया जाना चाहिए।
- सरकार को विरोध प्रदर्शनों के मूल कारणों को समझने और उनका समाधान करने के लिए एक प्रभावी संवाद तंत्र स्थापित करना चाहिए।
- आवश्यक सेवाओं (जैसे परिवहन और संचार) को बाधित किए बिना विरोध प्रदर्शनों को समायोजित करने के लिए तकनीकी समाधानों और वैकल्पिक मार्गों पर विचार किया जाना चाहिए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
विरोध का अधिकार · अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता · अनुच्छेद 19 · सार्वजनिक व्यवस्था · उचित प्रतिबंध · न्यायिक समीक्षा · पुलिस कार्रवाई · लोकतंत्र में विरोध · नागरिक अधिकार · अवरोधक आदेश
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 19(1)(ए)’, ‘note’: ‘वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 19(1)(बी)’, ‘note’: ‘शांतिपूर्ण और निरायुध सम्मेलन की स्वतंत्रता’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 19(2)’, ‘note’: ‘उपरोक्त अधिकारों पर उचित प्रतिबंध’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 32’, ‘note’: ‘संवैधानिक उपचारों का अधिकार’}
अवधारणा प्रवाह
नागरिकों द्वारा सरकार की नीतियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का आह्वान। → सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन द्वारा प्रतिबंधात्मक आदेश (जैसे धारा 163 BNSS)। → विरोध प्रदर्शनों के कारण आवश्यक सेवाओं (मेट्रो, इंटरनेट) में व्यवधान। → नागरिकों द्वारा मौलिक अधिकारों के हनन की शिकायत के साथ उच्चतम न्यायालय में याचिका। → उच्चतम न्यायालय द्वारा मौलिक अधिकारों और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन स्थापित करने का निर्देश। → आवश्यक सेवाओं को सामान्य रूप से संचालित रखने और प्रतिबंधों की समीक्षा का आदेश।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) सभी नागरिकों को शांतिपूर्ण और बिना हथियारों के इकट्ठा होने का अधिकार देता है।
2. अनुच्छेद 19(2) सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या भारत की संप्रभुता और अखंडता के हित में इस अधिकार पर उचित प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है।
3. सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में विरोध प्रदर्शनों के दौरान रेलवे और मेट्रो सेवाओं को बाधित न करने का निर्देश दिया है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 गलत है। अनुच्छेद 19(1)(a) भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से संबंधित है, जबकि शांतिपूर्ण सभा का अधिकार अनुच्छेद 19(1)(b) में है। कथन 2 सही है, अनुच्छेद 19(2) में उल्लिखित आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। कथन 3 सही है, सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में विरोध प्रदर्शनों के दौरान आवश्यक सेवाओं को बाधित न करने का निर्देश दिया है।
Q2. अभिकथन (A): भारत में विरोध प्रदर्शन का अधिकार एक पूर्ण अधिकार नहीं है।
कारण (R): संविधान सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और भारत की संप्रभुता तथा अखंडता के हित में इस पर उचित प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि भारत में कोई भी मौलिक अधिकार पूर्ण नहीं है और उन पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। कारण (R) भी सही है और यह अभिकथन की सही व्याख्या करता है, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 19(2) और 19(3) में ऐसे प्रतिबंधों के आधार दिए गए हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में विरोध प्रदर्शन के अधिकार की संवैधानिक स्थिति का परीक्षण कीजिए। हाल के विरोध प्रदर्शनों के संदर्भ में, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने में राज्य के समक्ष आने वाली चुनौतियों पर चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर कंकाल:
1. **परिचय:** विरोध प्रदर्शन के अधिकार का संक्षिप्त परिचय, इसे एक जीवंत लोकतंत्र का अभिन्न अंग बताना।
2. **संवैधानिक स्थिति:**
* अनुच्छेद 19(1)(a): भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।
* अनुच्छेद 19(1)(b): शांतिपूर्ण और बिना हथियारों के इकट्ठा होने का अधिकार।
* अनुच्छेद 19(2) और 19(3): इन अधिकारों पर लगाए जा सकने वाले उचित प्रतिबंधों का उल्लेख (जैसे सार्वजनिक व्यवस्था, भारत की संप्रभुता और अखंडता, नैतिकता)।
* सर्वोच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण निर्णय (जैसे रामलीला मैदान मामला, मज़दूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ) का उल्लेख, जिसमें विरोध प्रदर्शन के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई है, लेकिन यह भी कहा गया है कि यह पूर्ण नहीं है।
3. **राज्य के समक्ष चुनौतियाँ:**
* **सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना:** विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिंसा, तोड़फोड़ या आवश्यक सेवाओं में बाधा की संभावना।
* **नागरिकों की असुविधा:** यातायात जाम, मेट्रो/रेल सेवाओं का निलंबन, इंटरनेट शटडाउन आदि से आम जनता को होने वाली परेशानी।
* **पुलिस कार्रवाई का संतुलन:** अत्यधिक बल प्रयोग और नागरिक स्वतंत्रता के उल्लंघन के आरोप बनाम कानून-व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता।
* **अवरोधक आदेशों का उपयोग:** धारा 144 जैसे प्रावधानों का उपयोग और उनके दुरुपयोग की आशंका।
* **सूचना का अधिकार और इंटरनेट सेवाएं:** विरोध प्रदर्शनों के दौरान इंटरनेट सेवाओं को बाधित करने का प्रभाव।
4. **संतुलन स्थापित करने के उपाय:**
* सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्देश (जैसे मेट्रो सेवाओं को बाधित न करना) का उल्लेख।
* राज्य द्वारा न्यूनतम बल का प्रयोग।
* विरोध प्रदर्शनों के लिए निर्दिष्ट स्थानों का निर्धारण।
* संवाद और मध्यस्थता के माध्यम से समाधान।
* न्यायिक समीक्षा की भूमिका।
5. **निष्कर्ष:** लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन के महत्व को रेखांकित करते हुए, राज्य और नागरिकों दोनों की जिम्मेदारियों पर बल देना ताकि अधिकारों का प्रयोग जिम्मेदारी से हो और सार्वजनिक हित सुरक्षित रहें।
स्रोत: The Indian Express
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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