14 Oct दिल्ली हाईकोर्ट ने वेबसाइट निलंबन पर MeitY-NIXI से जवाब तलब किया
✎ NIXI .IN डोमेन की रजिस्ट्री चलाती है; 'serverHOLD' में पंजीकरण रहता है पर वेबसाइट अप्राप्य हो जाती है; दिल्ली उच्च न्यायालय के नोटिस ने प्रश्न उठाया है कि क्या बिना सुनवाई और बदलते कारणों पर यह निलंबन अनुच्छेद 19(1)(a), नैसर्गिक…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — शासन: नियामक संस्थाएँ, पारदर्शिता और जवाबदेही | GS Paper II — भारतीय संविधान: मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 19, 21), न्यायिक समीक्षा और रिट क्षेत्राधिकार | GS Paper III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी: इंटरनेट अवसंरचना, साइबर शासन और सूचना प्रौद्योगिकी विधि
- Prelims: राष्ट्रीय इंटरनेट एक्सचेंज ऑफ इंडिया (NIXI), इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY), .IN रजिस्ट्री और डोमेन नाम प्रणाली (DNS), serverHOLD स्थिति, प्रतीक-चिह्न और नाम (अनुचित प्रयोग प्रतिषेध) अधिनियम, 1950, अनुच्छेद 19(1)(a) और अनुच्छेद 19(2), पूर्व प्रतिबंध (Prior Restraint), नैसर्गिक न्याय (audi alteram partem), अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020), अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट याचिका
- Essay: डिजिटल युग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: इंटरनेट अवसंरचना के नियामक और नागरिक अधिकारों का संतुलन, प्रक्रियागत निष्पक्षता ही सुशासन की कसौटी: बिना सुनवाई की गई प्रशासनिक कार्रवाई और विधि का शासन
त्वरित पुनरावृत्ति: NIXI .IN डोमेन की रजिस्ट्री चलाती है; ‘serverHOLD’ में पंजीकरण रहता है पर वेबसाइट अप्राप्य हो जाती है; दिल्ली उच्च न्यायालय के नोटिस ने प्रश्न उठाया है कि क्या बिना सुनवाई और बदलते कारणों पर यह निलंबन अनुच्छेद 19(1)(a), नैसर्गिक न्याय और प्रतीक-चिह्न अधिनियम, 1950 की कसौटी पर टिकता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
दिल्ली उच्च न्यायालय ने 14 अक्टूबर 2026 (बुधवार) को राष्ट्रीय इंटरनेट एक्सचेंज ऑफ इंडिया (NIXI) और इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) को नोटिस जारी किया। यह नोटिस दिल्ली निवासी श्रीराम विश्वनाथन की याचिका पर जारी हुआ, जिसमें उन्होंने वेबसाइट chalosansad.in के निलंबन को चुनौती दी है। यह वेबसाइट NEET-UG प्रश्नपत्र लीक के विरोध में 20 जुलाई को आयोजित ‘चलो संसद’ मार्च की पूर्व-तैयारी को सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर दर्ज करती थी। याचिकाकर्ता के अनुसार 22 जुलाई को डोमेन ‘serverHOLD’ स्थिति में डाल दिया गया, जिससे वेबसाइट खुलना बंद हो गई, जबकि पंजीकरण सक्रिय रहा। NIXI ने समय-समय पर अलग-अलग कारण बताए: पंजीकरण-पते का आधार से मेल न खाना, डोमेन में ‘critical keyword’ होना, .IN डोमेन नाम नीति ढाँचा, 2004 के अंतर्गत संवैधानिक प्राधिकारों के नाम आरक्षित होना, और अंत में प्रतीक-चिह्न अधिनियम के अंतर्गत ‘colourable imitation’। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह राजनीतिक अभिव्यक्ति पर ‘पूर्व प्रतिबंध’ है और निलंबन से पहले उन्हें सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया। वेबसाइट अब मिरर साइट chalosansad.com पर उपलब्ध है।
पृष्ठभूमि
- इंटरनेट पर प्रत्येक वेबसाइट का पता डोमेन नाम प्रणाली (DNS) से संचालित होता है। देशीय शीर्ष-स्तरीय डोमेन (ccTLD) .IN का प्रबंधन NIXI करता है। यह इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा अधिकृत एक गैर-लाभकारी कंपनी है, इसलिए इसके निर्णयों की न्यायिक समीक्षा का प्रश्न प्रासंगिक हो जाता है।
- NIXI के अंतर्गत .IN रजिस्ट्री के अलावा भारतीय इंटरनेट एक्सचेंज नोड और IRINN (भारतीय इंटरनेट पता-संख्या प्रबंधन) भी संचालित होते हैं। ये भारत में इंटरनेट ट्रैफ़िक के घरेलू आदान-प्रदान और अवसंरचना को सुदृढ़ करते हैं।
- ‘serverHOLD’ रजिस्ट्री-स्तर की एक स्थिति है। इसमें डोमेन का पंजीकरण बना रहता है, परंतु उसे DNS में हल (resolve) नहीं किया जाता, इसलिए वेबसाइट व्यावहारिक रूप से अप्राप्य हो जाती है। इसलिए यह प्रभावी रूप से सामग्री-अवरोधन जैसा परिणाम देती है।
- प्रतीक-चिह्न और नाम (अनुचित प्रयोग प्रतिषेध) अधिनियम, 1950 अनुसूची में निर्दिष्ट नामों और प्रतीकों के, केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति के बिना, व्यापार, कारोबार, पेशे या व्यवसाय में तथा पेटेंट या डिज़ाइन के शीर्षक में प्रयोग को प्रतिबंधित करता है। इसका उद्देश्य सरकार या राष्ट्रीय महत्त्व के नामों के भ्रामक व्यावसायिक उपयोग को रोकना है।
- अनुच्छेद 19(1)(a) वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। सर्वोच्च न्यायालय ने अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020) में माना कि इंटरनेट के माध्यम से अभिव्यक्ति इस अधिकार का भाग है और इस पर प्रतिबंध आनुपातिकता की कसौटी पर खरे उतरने चाहिए। श्रेया सिंघल (2015) में न्यायालय ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66A रद्द की थी।
- प्रशासनिक विधि में किसी व्यक्ति के अधिकारों को प्रभावित करने वाली कार्रवाई से पहले सुनवाई का अवसर देना नैसर्गिक न्याय का अंग है। साथ ही, कार्रवाई के कारण सुसंगत और लिखित होने चाहिए, ताकि मनमानी का संदेह न रहे।
डोमेन नाम प्रशासन और NIXI की भूमिका: क्या है यह विषय?
- डोमेन नाम (Domain Name): इंटरनेट पर किसी वेबसाइट की पहचान कराने वाला पढ़ने योग्य पता। DNS इसे संख्यात्मक IP पते में बदलता है। रजिस्ट्री डोमेन-नामों का केंद्रीय अभिलेख रखती है और रजिस्ट्रार पंजीकरण करते हैं।
- NIXI की स्थिति: यह कंपनी अधिनियम के अंतर्गत गठित गैर-लाभकारी कंपनी है और .IN रजिस्ट्री का संचालन करती है। यह MeitY के अधीन कार्य करती है और .IN डोमेन नाम नीति ढाँचा तथा .IN विवाद समाधान नीति (INDRP) के अनुसार चलती है। INDRP के अंतर्गत विवाद मुख्यतः मध्यस्थता से सुलझाए जाते हैं।
- आरक्षित नाम सूची: .IN नीति के अंतर्गत संवैधानिक प्राधिकारों और कुछ पदों से संबंधित नाम आरक्षित हो सकते हैं। इस मामले में याचिकाकर्ता का तर्क है कि ‘sansad’ सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आरक्षित सूची में नहीं है, जबकि NIXI इसे आरक्षित श्रेणी की भावना के अंतर्गत मानती है। नियम की स्पष्टता और प्रकाशन यहाँ मुख्य विवाद-बिंदु है।
- प्रतीक-चिह्न अधिनियम का तर्क: NIXI के अनुसार ‘sansad’ का प्रयोग ‘colourable imitation’ है। ‘Colourable imitation’ का आशय ऐसी नक़ल से है जो पूर्ण प्रतिलिपि न होते हुए भी भ्रम उत्पन्न कर सके। न्यायालय को यह देखना होगा कि अधिनियम की अनुसूची में ‘sansad’ आता है या नहीं, और क्या एक गैर-व्यावसायिक सूचना-अभिलेख ‘trade, business, calling or profession’ की श्रेणी में आता है।
- कारणों की असंगति: याचिकाकर्ता के अनुसार NIXI ने क्रमशः पता-विसंगति, ‘critical keyword’, आरक्षित नाम और प्रतीक-चिह्न अधिनियम का आश्रय लिया। बदलते कारण प्रशासनिक कार्रवाई की तर्कसंगतता (reasonableness) पर प्रश्न उठाते हैं। न्यायालय में कार्रवाई को उसके मूल आदेश में दिए गए कारणों पर ही परखा जाता है, बाद में जोड़े गए कारणों पर नहीं।
- संवैधानिक प्रश्न: क्या डोमेन का निलंबन अनुच्छेद 19(1)(a) पर प्रतिबंध है, और क्या यह अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत विधि द्वारा समर्थित युक्तियुक्त निर्बंधन है? वैध प्रतिबंध के लिए ‘विधि का अधिकार’, वैध उद्देश्य और आनुपातिकता आवश्यक हैं (पुट्टस्वामी, 2017 में प्रतिपादित कसौटी)।
- ‘पूर्व प्रतिबंध’ की अवधारणा: अभिव्यक्ति के प्रकाशन से पहले या उसे रोककर लगाया गया प्रतिबंध, जिसे न्यायालय संदेह की दृष्टि से देखते हैं। ब्रिज भूषण बनाम दिल्ली राज्य (1950) में पूर्व-सेंसरशिप को असंवैधानिक ठहराया गया था।
- न्यायिक उपचार: उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट जारी कर सकता है। निजी रूप से गठित होने पर भी, सार्वजनिक कर्तव्य निभाने वाली या सरकार द्वारा अधिकृत संस्था पर रिट-क्षेत्राधिकार का प्रश्न उठ सकता है। इस मामले में न्यायालय का अंतिम निर्णय अभी शेष है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| राष्ट्रीय इंटरनेट एक्सचेंज ऑफ इंडिया (NIXI) | इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) द्वारा अधिकृत गैर-लाभकारी कंपनी। यह .IN डोमेन नाम का पंजीकरण-तंत्र (Registry) चलाती है। इसकी निर्णय-प्रक्रिया की निष्पक्षता सीधे डिजिटल अभिव्यक्ति से जुड़ी है। |
| serverHOLD स्थिति | इसमें डोमेन नाम का पंजीकरण बना रहता है, परंतु वेबसाइट खुलना बंद हो जाती है। प्रभाव में यह सामग्री को हटाने जैसा है, पर इसे केवल ‘तकनीकी निलंबन’ कहा जाता है। |
| .IN डोमेन नाम नीति ढाँचा, 2004 | संवैधानिक प्राधिकारियों से संबंधित नामों को आरक्षित करता है। याचिकाकर्ता के अनुसार ‘sansad’ सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आरक्षित सूची में नहीं है। नीति की स्पष्टता और प्रकाशित सूची का महत्व यहीं से उभरता है। |
| प्रतीक और नाम (अनुचित प्रयोग प्रतिषेध) अधिनियम, 1950 | अनुसूची में दिए नामों और प्रतीकों का, केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति के बिना, व्यापार, कारोबार, पेशे आदि में या उनकी ‘कूटरचित अनुकृति’ (Colourable Imitation) के रूप में प्रयोग निषिद्ध है। प्रश्न यह है कि एक गैर-व्यावसायिक सूचना-पृष्ठ पर यह कैसे लागू होगा। |
| निलंबन के कारणों में परिवर्तन | पंजीकरण-पते का आधार से मेल न खाना, फिर ‘महत्वपूर्ण कुंजीशब्द’, और अंत में प्रतीक अधिनियम का उल्लंघन — याचिकाकर्ता इन्हें ‘परस्पर असंगत औचित्य’ कहता है। प्रशासनिक कार्रवाई में कारणों की निरंतरता का प्रश्न यहीं उठता है। |
| दिल्ली उच्च न्यायालय का नोटिस | न्यायालय ने NIXI और MeitY को नोटिस जारी किया है। मामला विचाराधीन है, इसलिए आरोप याचिकाकर्ता के पक्ष के हैं और अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा है। |
महत्व
संवैधानिक और विधिक महत्व
- मामला अनुच्छेद 19(1)(क) के अंतर्गत वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 19(2) की ‘युक्तियुक्त निर्बंधन’ की कसौटी का है।
- याचिकाकर्ता ने ‘पूर्व-निर्बंध’ (Prior Restraint) का आरोप लगाया है। पूर्व-निर्बंध को सामान्यतः न्यायालय संदेह की दृष्टि से देखते हैं, क्योंकि इसमें अभिव्यक्ति प्रकाशन से पहले या बिना सुनवाई के रोक दी जाती है।
- सुनवाई के बिना निलंबन का प्रश्न नैसर्गिक न्याय (Natural Justice) के ‘सुनवाई का अवसर’ सिद्धांत और अनुच्छेद 14 के अंतर्गत मनमानेपन के निषेध से जुड़ता है।
- श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) और अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020) के निर्णय इस विषय में प्रासंगिक हैं। इनमें इंटरनेट पर अभिव्यक्ति को संरक्षण मिला और प्रतिबंधों के लिए आनुपातिकता (Proportionality) तथा कारण बताने की अपेक्षा रेखांकित की गई।
डिजिटल अभिशासन का महत्व
- डोमेन नाम की पंजीकरण संस्था इंटरनेट की ‘अवसंरचना-स्तरीय’ द्वारपाल है। उसका निलंबन-अधिकार सामग्री-स्तर के अवरोधन से भिन्न है, पर प्रभाव में समान हो सकता है।
- यदि पंजीकरण संस्था को विधिक प्रक्रिया के बिना डोमेन निलंबित करने की छूट मिले, तो सूचना-अधिनियम की अवरोधन-प्रक्रिया की सुरक्षा-व्यवस्था को दरकिनार करने का जोखिम रहता है।
- यह प्रकरण निजी प्रतीत होने वाली, किंतु सरकारी अधिकार से अधिकृत संस्थाओं की जवाबदेही का परीक्षण है।
लोकतांत्रिक और नागरिक-समाज का आयाम
- सार्वजनिक स्रोतों पर आधारित, गैर-व्यावसायिक अभिलेख नागरिक सहभागिता और सार्वजनिक स्मृति के संरक्षण का साधन हैं।
- वेबसाइट का ‘मिरर’ पते पर उपलब्ध होना दर्शाता है कि डोमेन-स्तर के प्रतिबंध की प्रभावशीलता सीमित है, जबकि मूल पते से जुड़े अधिकारों का प्रश्न बना रहता है।
- विरोध-प्रदर्शनों के दस्तावेज़ीकरण पर नियम-आधारित निष्पक्षता, चाहे विषय कोई भी हो, राज्य के प्रति विश्वास का आधार है।
प्रशासनिक विधि का महत्व
- कारण बदलते रहने पर ‘तर्कसंगत आदेश’ (Reasoned Order) का सिद्धांत प्रभावित होता है। प्राधिकारी को आदेश के समय दिए गए कारणों पर ही टिकना चाहिए, बाद में नए कारण जोड़कर आदेश का बचाव नहीं करना चाहिए।
- ‘कूटरचित अनुकृति’ जैसे अस्पष्ट पदों की व्याख्या में युक्तियुक्तता और उद्देश्य-आधारित अर्थान्वयन की कसौटी लागू होती है।
चुनौतियाँ
1. सुनवाई के बिना कार्रवाई
- याचिकाकर्ता के अनुसार निलंबन से पहले कोई सुनवाई नहीं हुई। इससे नैसर्गिक न्याय के उल्लंघन का आरोप बनता है।
- त्रुटि सुधारने के बाद भी वेबसाइट बहाल नहीं हुई, जिससे उपचार-तंत्र की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: प्रशासनिक विधि; अनुच्छेद 14 और नैसर्गिक न्याय
2. नीति और सूची की अस्पष्टता
- ‘महत्वपूर्ण कुंजीशब्द’ जैसा पद बिना परिभाषा के प्रयुक्त हुआ और संबंधित शब्द की पहचान नहीं बताई गई।
- आरोप है कि प्रकाशित आरक्षित-सूची में संबंधित शब्द नहीं है। इससे पूर्वानुमेयता और नीति की पारदर्शिता कमज़ोर होती है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: पारदर्शिता, जवाबदेही और सुशासन
3. प्रतीक अधिनियम का दायरा
- अधिनियम की धारा का उद्देश्य व्यावसायिक दुरुपयोग और भ्रामक पहचान रोकना है। गैर-व्यावसायिक सूचना-पृष्ठ पर उसका लागू होना न्यायालय के निर्वचन का विषय है।
- ‘कूटरचित अनुकृति’ की विस्तृत व्याख्या से सामान्य शब्दों के प्रयोग पर भी अनुचित रोक लग सकती है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: कानूनों का निर्वचन; अनुच्छेद 19(2)
4. निजी या अर्ध-सरकारी संस्था की जवाबदेही
- NIXI गैर-लाभकारी कंपनी है, पर MeitY द्वारा अधिकृत है। इसलिए अनुच्छेद 12 के अंतर्गत ‘राज्य’ मानी जाने और अनुच्छेद 226 के अंतर्गत जवाबदेही का प्रश्न उठता है।
- निर्णय-स्तर पर स्वतंत्र समीक्षा या अपील-तंत्र का अभाव प्रक्रियागत कमी है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: संवैधानिक निकाय बनाम वैधानिक/अधिकृत संस्थाएँ; अनुच्छेद 12, 226
5. अवरोधन-प्रक्रिया की सुरक्षा-व्यवस्था को दरकिनार करने का जोखिम
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69क के अंतर्गत अवरोधन के लिए समीक्षा-समिति और लिखित कारण जैसी प्रक्रिया है।
- पंजीकरण-स्तर पर निलंबन इन सुरक्षा-उपायों के बिना भी प्रभावी अवरोधन का काम कर सकता है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: साइबर सुरक्षा और सूचना प्रौद्योगिकी विधि
6. पहचान-सत्यापन और अभिव्यक्ति में संतुलन
- सटीक पंजीकरण-विवरण की अपेक्षा धोखाधड़ी रोकने के लिए उचित है। परंतु तुरंत सुधार के बाद भी रोक बनी रहना अनुपातहीन हो सकता है।
- आधार से मिलान जैसी आवश्यकताओं का प्रयोग सामग्री-आधारित कार्रवाई के लिए आवरण न बने, यह सुनिश्चित करना आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: निजता, पहचान-सत्यापन और शासन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| पूर्व-निर्बंध | बिना सुनवाई के सामग्री तक पहुँच रोकना अनुच्छेद 19(1)(क) पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालता है। |
| बदलते कारण | तीन अलग औचित्य बताए जाने से निर्णय की विश्वसनीयता और तर्कसंगतता पर प्रश्न उठता है। |
| अपरिभाषित पद | ‘महत्वपूर्ण कुंजीशब्द’ और ‘कूटरचित अनुकृति’ की स्पष्ट सीमाओं का अभाव। |
| संस्था की विधिक स्थिति | अधिकृत गैर-लाभकारी कंपनी की न्यायिक समीक्षा-योग्यता और जवाबदेही। |
| वैकल्पिक प्रक्रिया | धारा 69क की सुरक्षा-व्यवस्था के बिना प्रभावी अवरोधन का जोखिम। |
| उपचार-तंत्र | त्रुटि-सुधार के बाद भी शीघ्र बहाली का स्पष्ट तंत्र न होना। |
आगे की राह
- डोमेन निलंबन से पहले लिखित कारण-सहित सूचना और उत्तर देने के लिए उचित समय देना अनिवार्य प्रक्रिया बनाई जाए।
- आरक्षित नामों की सूची को सार्वजनिक, अद्यतन और स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाए, साथ ही ‘महत्वपूर्ण कुंजीशब्द’ जैसे पदों के मानदंड प्रकाशित हों।
- निलंबन-आदेश में एक ही, स्पष्ट विधिक आधार दर्ज हो; बाद में आधार बदलने पर नया नोटिस दिया जाए।
- पंजीकरण-विवरण की त्रुटि पर निलंबन से पहले सुधार का अवसर और सुधार के बाद समयबद्ध बहाली की व्यवस्था हो।
- NIXI के भीतर स्वतंत्र शिकायत-निवारण या अपील-तंत्र बने, जिसकी समयसीमा तय हो।
- प्रतीक और नाम (अनुचित प्रयोग प्रतिषेध) अधिनियम के प्रयोग पर मार्गदर्शक सिद्धांत बनें, जिनमें व्यावसायिक और गैर-व्यावसायिक प्रयोग का स्पष्ट भेद हो।
- अभिव्यक्ति को प्रभावित करने वाली हर कार्रवाई में आनुपातिकता की कसौटी — वैध उद्देश्य, आवश्यकता और न्यूनतम प्रतिबंधात्मक साधन — लागू की जाए।
- न्यायालय के निर्णय के अनुरूप MeitY डोमेन-शासन के लिए सुस्पष्ट दिशानिर्देश जारी करे।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
पूर्व-प्रतिबंध (Prior Restraint) · अनुच्छेद 19(1)(a) और अनुच्छेद 19(2) के युक्तियुक्त निर्बंध · नैसर्गिक न्याय और सुनवाई का अधिकार (audi alteram partem) · अनुच्छेद 14 और मनमानेपन का निषेध · अनुच्छेद 12 के अंतर्गत ‘राज्य’ और अनुच्छेद 226 की रिट अधिकारिता · डोमेन नाम प्रशासन और .IN रजिस्ट्री (NIXI) · प्रतीक और नाम (अनुचित प्रयोग प्रतिषेध) अधिनियम, 1950 – ‘कूटरचित अनुकृति’ (Colourable Imitation) · आनुपातिकता का सिद्धांत (Doctrine of Proportionality) · इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुराधा भसीन वाद, 2020) · तर्कसंगत एवं सकारण आदेश तथा पारदर्शिता · श्रेया सिंघल वाद, 2015 और ऑनलाइन अभिव्यक्ति पर अत्यधिक व्यापक निर्बंध · मनमाने निलंबन के विरुद्ध प्रक्रियात्मक सुरक्षोपाय
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 19(1)(क) — वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
- अनुच्छेद 19(2) — अभिव्यक्ति पर युक्तियुक्त निर्बंधन
- अनुच्छेद 14 — मनमानेपन का निषेध, समानता
- अनुच्छेद 12 — ‘राज्य’ की परिभाषा, संस्था की स्थिति
- अनुच्छेद 226 — उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता
अवधारणा प्रवाह
याचिकाकर्ता ने 19 जुलाई को ‘chalosansad.in’ पंजीकृत कर सार्वजनिक स्रोतों पर आधारित अभिलेख-पृष्ठ बनाया। → 22 जुलाई को पंजीकरण-पते और आधार में बेमेल के आधार पर डोमेन serverHOLD में डाला गया और साइट अगम्य हुई। → त्रुटि सुधारने के बाद भी बहाली नहीं हुई; ‘महत्वपूर्ण कुंजीशब्द’ का कारण बताया गया। → विधिक नोटिस के बाद NIXI ने डोमेन नीति ढाँचा, 2004 के आरक्षित नामों का कारण बताया, फिर प्रतीक अधिनियम का आधार दिया। → याचिकाकर्ता ने पूर्व-निर्बंध, सुनवाई के अभाव और असंगत औचित्य का आरोप लगाकर दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। → उच्च न्यायालय ने NIXI और MeitY को नोटिस जारी किया। → निर्णय से डोमेन-शासन में अभिव्यक्ति, प्रक्रिया और जवाबदेही के मानक स्पष्ट होंगे।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और इंटरनेट के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संरक्षण इंटरनेट माध्यम पर की गई अभिव्यक्ति को भी प्राप्त है।
2. अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत अभिव्यक्ति पर निर्बंध केवल विधि द्वारा या विधि के प्राधिकार के अधीन ही लगाए जा सकते हैं।
3. भारतीय न्यायशास्त्र में पूर्व-प्रतिबंध (Prior Restraint) को संवैधानिक रूप से वैध मानने की सामान्य उपधारणा है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: अनुराधा भसीन वाद (2020) में इंटरनेट के माध्यम से अभिव्यक्ति को अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत संरक्षित माना गया। कथन 2 सही है: अनुच्छेद 19(2) के निर्बंध विधि पर आधारित होने चाहिए, केवल कार्यपालक नीति या मनमाने आदेश पर नहीं। कथन 3 गलत है: पूर्व-प्रतिबंध के विरुद्ध अवैधता की प्रबल उपधारणा मानी जाती है।
Q2. अभिकथन (A): किसी वेबसाइट का डोमेन नाम बिना पूर्व सुनवाई के निलंबित कर देना नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के आधार पर न्यायालय में चुनौती योग्य हो सकता है।
कारण (R): सुनवाई का अवसर देने का सिद्धांत (audi alteram partem) अनुच्छेद 14 में निहित निष्पक्षता का अंग है और ऐसे प्रशासनिक कार्यों पर लागू होता है जिनके नागरिक परिणाम होते हैं।
निम्नलिखित में से सही उत्तर चुनिए:
- A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है
- A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
- A सही है, किंतु R गलत है
- A गलत है, किंतु R सही है
उत्तर: A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है — मेनका गांधी वाद (1978) के बाद अनुच्छेद 14 और 21 के अंतर्गत निष्पक्ष एवं न्यायसंगत प्रक्रिया की अपेक्षा स्थापित है। जिस प्रशासनिक कार्रवाई से किसी के अधिकारों या हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े, उसमें सामान्यतः सुनवाई आवश्यक है। इसलिए R, A की सही व्याख्या करता है।
Q3. राष्ट्रीय इंटरनेट एक्सचेंज ऑफ इंडिया (NIXI) के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?
- यह एक अलाभकारी कंपनी है, जिसकी स्थापना इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की पहल पर हुई और जो .IN डोमेन नाम के पंजीकरण का प्रबंधन करती है
- यह सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 द्वारा गठित एक संवैधानिक निकाय है
- यह भारतीय रिज़र्व बैंक के अधीन कार्यरत एक विनियामक प्राधिकरण है
- यह सभी अंतरराष्ट्रीय डोमेन नामों के पंजीकरण की वैश्विक एजेंसी है
उत्तर: यह एक अलाभकारी कंपनी है, जिसकी स्थापना इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की पहल पर हुई और जो .IN डोमेन नाम के पंजीकरण का प्रबंधन करती है — NIXI एक अलाभकारी कंपनी है, जो .IN रजिस्ट्री का संचालन करती है और भारत में इंटरनेट ट्रैफिक के आदान-प्रदान के लिए एक्सचेंज भी चलाती है। यह न तो संवैधानिक निकाय है और न RBI के अधीन। वैश्विक डोमेन समन्वय का कार्य ICANN करता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ बिना पूर्व सुनवाई के किसी वेबसाइट का डोमेन नाम निलंबित करना क्या अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत ‘पूर्व-प्रतिबंध’ की श्रेणी में आ सकता है? दिल्ली उच्च न्यायालय में विचाराधीन chalosansad.in प्रकरण के संदर्भ में परीक्षण कीजिए। साथ ही, डोमेन नाम प्रशासन में मनमाने निलंबन को रोकने के लिए आवश्यक सुरक्षोपाय सुझाइए। (15 Marks)
रूपरेखा: भूमिका: प्रकरण के तथ्य संक्षेप में दें। chalosansad.in को 22 जुलाई को ‘serverHOLD’ में रखा गया। आरंभ में कारण पंजीकरणकर्ता के पते का आधार से न मिलना था, फिर ‘critical keyword’, फिर .IN नीति के आरक्षित नाम और अंत में प्रतीक और नाम (अनुचित प्रयोग प्रतिषेध) अधिनियम, 1950 की ‘कूटरचित अनुकृति’। कारणों में परिवर्तन पर भी ध्यान दिलाएँ।
भाग 1 – संवैधानिक विश्लेषण:
(क) अनुच्छेद 19(1)(a) में इंटरनेट के माध्यम से अभिव्यक्ति शामिल है (अनुराधा भसीन, 2020)। पूर्व-प्रतिबंध के विरुद्ध प्रबल उपधारणा है (ब्रिज भूषण, 1950; रोमेश थापर, 1950)।
(ख) अनुच्छेद 19(2) के निर्बंध विधि-सम्मत, उद्देश्य से संबद्ध और आनुपातिक होने चाहिए। श्रेया सिंघल (2015) में अस्पष्ट और अतिव्यापक निर्बंध अमान्य ठहराए गए। अनुच्छेद 19(6) के अंतर्गत कारोबारी नामों के नियमन और अभिव्यक्ति के प्रश्न में अंतर करें।
(ग) नैसर्गिक न्याय और अनुच्छेद 14: मनमानापन, सकारण आदेश और पूर्व सुनवाई (मेनका गांधी, 1978; ई.पी. रॉयप्पा, 1974)। आपात स्थिति में बाद में सुनवाई का तर्क रखें।
(घ) अधिकारिता: NIXI एक अलाभकारी कंपनी है, इसलिए अनुच्छेद 12 के ‘राज्य’ होने पर विवाद संभव है। पर सरकारी प्राधिकार, सार्वजनिक कार्य और MeitY के नियंत्रण के आधार पर अनुच्छेद 226 की रिट अधिकारिता का तर्क (अजय हासिया, 1981 के सरकारी नियंत्रण संबंधी परीक्षण)। साथ में MeitY भी प्रतिवादी है।
(ङ) प्रतिपक्षी तर्क: 1950 के अधिनियम की धारा 3 के अंतर्गत विशिष्ट नामों और चिह्नों का, ‘व्यापार, कारोबार, पेशे या वृत्ति’ हेतु और कूटरचित अनुकृति के रूप में, केंद्र की पूर्व अनुमति के बिना प्रयोग वर्जित है। इसका उद्देश्य जनता को भ्रम में पड़ने से बचाना है। पर याचिकाकर्ता का दावा है कि साइट गैर-व्यावसायिक और सार्वजनिक सूचना पर आधारित है, इसलिए अधिनियम का प्रयोग संदिग्ध है। संतुलित निष्कर्ष दें कि अंतिम निर्णय न्यायालय करेगा।
भाग 2 – सुरक्षोपाय:
(i) पूर्व लिखित नोटिस और उत्तर का अवसर। (ii) सकारण और एकल, स्पष्ट आधार वाला आदेश। (iii) आरक्षित नामों की सार्वजनिक, सटीक सूची। (iv) अपील या शिकायत निवारण की स्वतंत्र व्यवस्था और समय-सीमा। (v) आनुपातिकता, यानी पूर्ण निलंबन के बजाय सुधार का अवसर। (vi) निलंबन के आँकड़ों की पारदर्शिता रिपोर्ट। (vii) बहु-हितधारक परामर्श (ICANN की नीति-प्रक्रिया से तुलना)।
निष्कर्ष: सुरक्षा, पहचान-सत्यापन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन आवश्यक है। विधि-सम्मत प्रक्रिया ही डिजिटल लोकतंत्र में विश्वास बनाए रखेगी।
स्रोत: The Indian Express
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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