दिल्ली वायु प्रदूषण: GRAP से परे व्यापक समाधान की आवश्यकता

दिल्ली वायु प्रदूषण: GRAP से परे व्यापक समाधान की आवश्यकता

पराली दहन निगरानीध्रुवीय उपग्रह (जैसे MODIS)भू-स्थिर उपग्रह (जैसे KOMPSAT-2A)पुनरावृत्तिसीमितलगातारसटीकताकम अनुमानितसटीककवरेजआग का वास्तविक समय छूट सकता हैउसी क्षेत्र को लगातार देखता है
पराली दहन निगरानी

✎ दिल्ली का शीतकालीन वायु प्रदूषण स्थानीय वाहनों के साथ-साथ पराली दहन, मौसम और ENSO जैसी जलवायु परिघटनाओं से तय होता है, इसलिए GRAP अल्पकालिक आपातकालीन उपाय है, जबकि स्थायी समाधान के लिए एयरशेड-आधारित क्षेत्रीय नियोजन और सटीक…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III — पर्यावरण (वायु प्रदूषण, प्रदूषण नियंत्रण तंत्र, जलवायु परिवर्तन)  |  सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (दूरसंवेदन उपग्रह और उनके अनुप्रयोग)  |  सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — शासन (सांविधिक निकाय, केंद्र-राज्य एवं अंतर-राज्य समन्वय)  |  सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र I — भूगोल (ENSO जैसी जलवायु परिघटनाएँ और उनका प्रभाव)
  • Prelims: क्रमिक अनुक्रिया कार्य योजना (GRAP) के चरण और उनका AQI से संबंध, वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) और उसका गठन अधिनियम, 2021, PM2.5 और PM10 में अंतर (कणों का आकार और स्वास्थ्य पर प्रभाव), एल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) और भारतीय मानसून व शीतकालीन मौसम पर प्रभाव, एयरशेड (Airshed) आधारित प्रदूषण शमन की अवधारणा, भू-स्थिर उपग्रह (Geostationary Satellite) बनाम ध्रुवीय कक्षा वाले उपग्रह, राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) और इसका आधार वर्ष, भारत स्टेज (BS) उत्सर्जन मानक और प्रदूषण जाँच प्रमाणपत्र (PUC)
  • Essay: वायु प्रदूषण की चुनौती: विज्ञान-आधारित नीति और आपातकालीन उपायों की सीमाएँ, जलवायु परिवर्तनशीलता के दौर में शहरी पर्यावरण प्रबंधन और क्षेत्रीय सहयोग

त्वरित पुनरावृत्ति: दिल्ली का शीतकालीन वायु प्रदूषण स्थानीय वाहनों के साथ-साथ पराली दहन, मौसम और ENSO जैसी जलवायु परिघटनाओं से तय होता है, इसलिए GRAP अल्पकालिक आपातकालीन उपाय है, जबकि स्थायी समाधान के लिए एयरशेड-आधारित क्षेत्रीय नियोजन और सटीक उत्सर्जन आँकड़े आवश्यक हैं।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

दिल्ली की शीतकालीन कार्य योजना 1 नवंबर से लागू हुई, जिसमें BS-IV से नीचे के मानक वाले बाहरी वाहनों के प्रवेश पर रोक, ‘नो PUCC, नो फ्यूल’ नीति और निर्माण गतिविधियों पर प्रतिबंध जैसे उपाय शामिल हैं। फिर भी पहले ही दिन वायु गुणवत्ता ‘बहुत खराब’ श्रेणी में पहुँच गई। लेख के अनुसार प्रदूषण का मौसम इस वर्ष लगभग दो सप्ताह देर से शुरू हुआ, जिसके लिए धीमी हवाओं, चक्रवात अर्नब से जुड़ी वर्षा और संभावित सुपर एल नीनो की भूमिका बताई गई है। लेख दो मुख्य बातों पर बल देता है: पहला, GRAP जैसे अल्पकालिक उपायों पर निर्भरता छोड़कर एयरशेड-आधारित शमन की ओर बढ़ना, और दूसरा, पराली दहन की गणना के लिए नासा के MODIS आँकड़ों की सीमाओं को पहचानकर कोरियाई उपग्रह KOMPSAT-2A जैसे भू-स्थिर स्रोतों से प्राप्त सटीक आँकड़ों का उपयोग करना। NIAS के मॉडल के अनुसार दिल्ली के PM2.5 भार में लगभग 20 प्रतिशत योगदान पराली दहन का आँका गया है।

पृष्ठभूमि

  • दिल्ली-NCR में वायु प्रदूषण का स्वरूप मौसमी है: शीत ऋतु में कम हवा की गति और तापीय प्रतिलोमन (Temperature Inversion) के कारण प्रदूषक ज़मीन के पास जमा हो जाते हैं।
  • वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) के गठन के लिए संसद ने वर्ष 2021 में अधिनियम पारित किया, जिसके तहत आयोग को NCR और समीपवर्ती क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता सुधार के लिए निर्देश जारी करने की शक्ति दी गई।
  • पराली दहन पंजाब और हरियाणा में धान की कटाई के बाद होता है; इसका धुआँ हवा की दिशा के अनुसार दिल्ली तक पहुँचता है, इसलिए यह अंतर-राज्य समस्या है।
  • भारत में वाहन उत्सर्जन मानक BS श्रेणी के तहत तय होते हैं और वाहनों की जाँच हेतु प्रदूषण जाँच प्रमाणपत्र (PUC) की व्यवस्था है।
  • राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) वर्ष 2019 में आरंभ हुआ, जो शहरों में PM10 और PM2.5 सांद्रता में कमी के लिए दीर्घकालिक, क्षेत्र-आधारित लक्ष्य रखता है।
  • उपग्रह आधारित पराली दहन निगरानी में ध्रुवीय उपग्रहों की पुनरावृत्ति सीमित होती है, जबकि भू-स्थिर उपग्रह उसी क्षेत्र को लगातार देख सकते हैं।

क्रमिक अनुक्रिया कार्य योजना (GRAP) क्या है?

  • GRAP वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) की श्रेणियों के आधार पर तय चरणबद्ध आपातकालीन उपायों की प्रणाली है, जो दिल्ली-NCR में वायु प्रदूषण के गंभीर स्तर पर लागू होती है।
  • इसकी शुरुआत वर्ष 2017 में पर्यावरण प्रदूषण (नियंत्रण एवं शमन) प्राधिकरण (EPCA) की पहल से हुई और बाद में उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के अनुसार इसका विस्तार हुआ।
  • AQI के बढ़ते स्तर के साथ उपाय कठोर होते जाते हैं, जैसे निर्माण गतिविधियों पर रोक, कुछ वाहनों पर प्रतिबंध और औद्योगिक गतिविधियों का नियंत्रण।
  • GRAP मूलतः अल्पकालिक आपातकालीन उपाय है; यह उत्सर्जन स्रोतों के दीर्घकालिक शमन, जैसे पराली प्रबंधन, परिवहन सुधार और ऊर्जा-स्वच्छता का विकल्प नहीं है।
  • CAQM NCR में GRAP के कार्यान्वयन का समन्वय करता है और संबंधित राज्य सरकारों को निर्देश देता है, जिससे यह एक अंतर-राज्य शासन तंत्र है।
  • PM2.5 वे महीन कण हैं जिनका व्यास लगभग 2.5 माइक्रोन या उससे कम होता है और ये फेफड़ों में गहराई तक पहुँचते हैं; PM10 अपेक्षाकृत मोटे कण हैं।
  • एयरशेड वह भौगोलिक इकाई है जहाँ समान मौसम और साझा उत्सर्जन स्रोत प्रदूषकों के संचय का कारण बनते हैं, इसलिए इसके आधार पर राज्य-सीमाओं से परे समन्वित शमन आवश्यक माना जाता है।
  • भू-स्थिर उपग्रह पृथ्वी के सापेक्ष स्थिर स्थिति में रहकर एक ही क्षेत्र का लगातार अवलोकन करते हैं, जबकि ध्रुवीय उपग्रह निश्चित समय पर सीमित पुनरावृत्ति के साथ गुजरते हैं।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
वायुक्षेत्र आधारित शमन (Airshed-based Mitigation) प्रदूषण को केवल दिल्ली की प्रशासनिक सीमा में देखने के बजाय उस भौगोलिक वायुक्षेत्र के स्तर पर समझना और नियंत्रित करना, जिसमें हवा और प्रदूषक एक साथ आते-जाते हैं। इससे पड़ोसी राज्यों के उत्सर्जन स्रोत भी नीति के दायरे में आते हैं।
ग्रैप (GRAP: Graded Response Action Plan) वायु गुणवत्ता सूचकांक (Air Quality Index, AQI) की स्थिति के अनुसार चरणबद्ध कार्रवाई का ढाँचा। यह आपात स्थिति में अल्पकालिक राहत देता है, पर मूल स्रोतों में स्थायी कमी नहीं ला सकता।
शीतकालीन कार्य योजना (Winter Action Plan) 1 नवंबर से लागू योजना, जिसमें BS-IV मानक से कम के दिल्ली-पंजीकृत वाहनों के प्रवेश पर रोक, “No PUC, No Fuel” नीति और निर्माण कार्यों पर प्रतिबंध शामिल हैं। यह पूर्व-निवारक उपायों और आपात उपायों दोनों का मिश्रण है।
मौसमी कारक (Meteorological Factors) धीमी हवाएँ और विलंबित, अपेक्षाकृत गर्म शीत ऋतु प्रदूषकों के जमाव को बढ़ाती हैं। इस वर्ष ये कारक शीत ऋतु में प्रदूषण-काल की शुरुआत को लगभग दो सप्ताह टाल गए।
उपग्रह आधारित पराली निगरानी NASA के MODIS सेंसर सीमित समय पर गुजरते हैं, इसलिए दोपहर बाद की आग छूट जाती है। दक्षिण कोरिया का भू-स्थिर उपग्रह KOMPSAT-2A (AMI) लगातार निगरानी करता है और आग की संख्या आधिकारिक अनुमानों से कहीं अधिक दिखाता है।
उत्सर्जन मॉडलिंग (Emission Modelling) NIAS के मॉडल में पराली जलाने से होने वाले अतिरिक्त उत्सर्जन को शामिल करने पर 1 नवंबर को PM2.5 में आई अचानक वृद्धि दोबारा बनती है। मॉडल के अनुसार दिल्ली के PM2.5 भार में लगभग 20 प्रतिशत योगदान पराली जलाने का है।

महत्व

पर्यावरणीय एवं जलवायु

  • वायु प्रदूषण की प्रकृति अब केवल स्थानीय उत्सर्जन का प्रश्न नहीं रही; जलवायु परिवर्तन और ENSO जैसे वैश्विक दोलन भी इसकी तीव्रता तय कर रहे हैं।
  • PM2.5 जैसे सूक्ष्म कणों के स्रोतों की सही पहचान से ही कण-उत्सर्जन में टिकाऊ कमी संभव है।

स्वास्थ्य एवं सामाजिक

  • “बहुत खराब” वायु गुणवत्ता श्वसन रोगों और हृदय-संबंधी जोखिमों को बढ़ाती है, विशेषकर बच्चों, बुज़ुर्गों और कमज़ोर आय-वर्ग में।
  • आपातकालीन प्रतिबंधों से दैनिक आजीविका, परिवहन और निर्माण मज़दूरों पर सीधा असर पड़ता है, इसलिए नीति में सामाजिक संतुलन ज़रूरी है।

शासन एवं संघीय समन्वय

  • दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे पड़ोसी राज्यों के बीच समन्वय के बिना वायुक्षेत्र आधारित नीति लागू नहीं हो सकती।
  • पराली जलाने जैसे मुद्दे पर कृषि, पर्यावरण और परिवहन विभागों के बीच नीतिगत तालमेल आवश्यक है।

वैज्ञानिक एवं तकनीकी

  • भू-स्थिर उपग्रह, वायु गुणवत्ता मॉडलिंग और वास्तविक-समय निगरानी नीति-निर्माण को तथ्य-आधारित बनाते हैं।
  • सटीक उत्सर्जन सूची (Emission Inventory) के बिना लक्ष्य निर्धारण और प्रभाव-मूल्यांकन दोनों कमज़ोर रहते हैं।

चुनौतियाँ

1. मौसम और जलवायु की अनिश्चितता

  • धीमी हवाएँ और विलंबित शीत ऋतु प्रदूषण के जमाव को एक साथ प्रभावित करती हैं, इसलिए मौसम-आधारित पूर्वानुमान पर अधिक निर्भरता बढ़ रही है।
  • ENSO और चक्रवात जैसी घटनाएँ मौसम-चक्र बदल रही हैं, जिससे पारंपरिक कार्य-कैलेंडर अप्रभावी हो सकते हैं।

2. पराली जलाने के आँकड़ों की विश्वसनीयता

  • MODIS जैसे निम्न-कक्षीय उपग्रह दिन के सीमित समय में ही गुज़रते हैं, इसलिए दोपहर बाद की आग का बड़ा हिस्सा दर्ज नहीं होता।
  • पिछले कुछ वर्षों में अधिकांश पराली-घटनाएँ 3 बजे के बाद होने की रिपोर्ट है, जबकि 2021 में यह अनुपात बहुत कम था; इससे पुराने आँकड़ों की तुलना भ्रामक हो सकती है।

3. ग्रैप पर अत्यधिक निर्भरता

  • ग्रैप आपात स्थिति में प्रतिबंध लगाने का साधन है; यह प्रदूषण के मूल स्रोतों को समाप्त नहीं करता।
  • बार-बार लागू होने वाले अस्थायी उपाय नागरिकों के बीच नीतिगत थकान और अनुपालन में कमी पैदा कर सकते हैं।

4. अंतर-राज्यीय समन्वय की कमी

  • दिल्ली-एनसीआर का वायुक्षेत्र कई राज्यों में फैला है, जबकि प्रवर्तन और कृषि नीति राज्यों के अधिकार-क्षेत्र में आती है।
  • ट्रैफिक जाम और सीमा-जाँच जैसी प्रवर्तन कार्रवाई पड़ोसी राज्यों की आवाजाही और अर्थव्यवस्था पर भी असर डालती है।

5. स्रोत-आधारित उपायों का सीमित कार्यान्वयन

  • वाहन, निर्माण-धूल, औद्योगिक उत्सर्जन और घरेलू ईंधन, सभी स्रोतों पर एक साथ और लगातार कार्य आवश्यक है।
  • PUC और BS-IV जैसे मानकों का प्रभावी प्रवर्तन तभी संभव है जब जाँच-व्यवस्था और डेटा-प्रणाली मज़बूत हों।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
मौसम-आधारित अनिश्चितता धीमी हवाएँ और विलंबित शीत ऋतु पूर्वानुमान को कठिन बनाती हैं, जिससे कार्य-योजना का समय गलत हो सकता है।
पराली आँकड़ों में अंतर MODIS और भू-स्थिर उपग्रह के आँकड़ों में बड़ा अंतर है, जिससे नीति-लक्ष्य अविश्वसनीय आधार पर बन सकते हैं।
ग्रैप की सीमा आपातकालीन प्रतिबंध मूल स्रोतों को समाप्त नहीं करते; स्थायी सुधार के लिए दीर्घकालिक उपाय आवश्यक हैं।
अंतर-राज्यीय समन्वय वायुक्षेत्र कई राज्यों में फैला है, पर नीति और प्रवर्तन अलग-अलग अधिकार-क्षेत्रों में बँटे हैं।
प्रवर्तन की क्षमता BS-IV, PUC और निर्माण-नियमों का पालन जाँच-तंत्र और डिजिटल निगरानी पर निर्भर है।
आर्थिक-सामाजिक प्रभाव प्रतिबंधों से परिवहन, निर्माण और दैनिक मज़दूरी पर असर पड़ता है, जिसके लिए संतुलित संक्रमण-नीति आवश्यक है।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (National Clean Air Programme)

आगे की राह

  • दिल्ली-एनसीआर के लिए वायुक्षेत्र आधारित योजना बनाई जाए, जिसमें पड़ोसी राज्यों के उत्सर्जन स्रोत भी शामिल हों।
  • पराली जलाने की निगरानी के लिए भू-स्थिर उपग्रह डेटा को राष्ट्रीय आँकड़ा-प्रणाली में समाहित किया जाए और निम्न-कक्षीय उपग्रह आँकड़ों के साथ उनकी तुलना की जाए।
  • उत्सर्जन सूची को नियमित रूप से अद्यतन किया जाए, ताकि स्रोत-वार योगदान के आधार पर लक्ष्य तय हों।
  • ग्रैप को आपातकालीन उपायों तक सीमित रखते हुए मूल स्रोतों पर दीर्घकालिक कार्य-योजना बनाई जाए।
  • पराली के वैकल्पिक उपयोग, मशीनों की उपलब्धता और किसानों को प्रोत्साहन जैसे उपायों से फसल-अवशेष प्रबंधन को व्यावहारिक बनाया जाए।
  • मौसम-पूर्वानुमान को वायु गुणवत्ता पूर्वानुमान से जोड़ा जाए, ताकि प्रतिबंध और प्रवर्तन समय से पहले सक्रिय हो सकें।
  • PUC, BS-IV और निर्माण-नियमों के प्रवर्तन के लिए डिजिटल निगरानी और पारदर्शी आँकड़ा-प्रणाली विकसित की जाए।
  • राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के लक्ष्यों को शहर-स्तरीय कार्य-योजनाओं और राज्य-स्तरीय क्रियान्वयन से जोड़ा जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) · वायुक्षेत्र-आधारित शमन (Airshed-based Mitigation) · वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (Commission for Air Quality Management, CAQM) · राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (National Clean Air Programme, NCAP) · सूक्ष्म कण पदार्थ (PM2.5) · पराली जलाना (Stubble Burning) · एल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) · तापीय प्रतिलोमन (Temperature Inversion) · उत्सर्जन सूची (Emission Inventory) · भूस्थिर उपग्रह (Geostationary Satellite) · अनुच्छेद 21 (Article 21) · केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Central Pollution Control Board, CPCB)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 21: स्वच्छ वायु को जीवन के अधिकार का हिस्सा माना गया
  • अनुच्छेद 48A: राज्य का पर्यावरण संरक्षण का दायित्व
  • अनुच्छेद 51A(g): नागरिकों का प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा का कर्तव्य
  • अनुच्छेद 246: विधायी शक्तियों का केंद्र-राज्य विभाजन

अवधारणा प्रवाह

शीत ऋतु में धीमी हवाएँ और विलंबित, गर्म मौसम प्रदूषकों को सतह के पास जमा होने देते हैं।  →  पड़ोसी राज्यों में पराली जलाने से PM2.5 और अन्य प्रदूषक वायुक्षेत्र में जुड़ते हैं।  →  MODIS जैसे उपग्रह आग के वास्तविक समय को छूट जाते हैं, जिससे आधिकारिक आँकड़े कम अनुमानित होते हैं।  →  भू-स्थिर उपग्रह और NIAS मॉडल अतिरिक्त उत्सर्जन को पकड़ते हैं और दिल्ली के PM2.5 में योगदान का अनुमान देते हैं।  →  वायु गुणवत्ता सूचकांक बढ़ने पर ग्रैप के चरण लागू होते हैं और शीतकालीन कार्य योजना के उपाय सक्रिय होते हैं।  →  स्थायी सुधार के लिए वायुक्षेत्र आधारित, स्रोत-विशिष्ट और समन्वित दीर्घकालिक नीति आवश्यक है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग की स्थापना वर्ष 2021 में संसद द्वारा पारित अधिनियम के अंतर्गत की गई।
2. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और उससे सटे क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता से संबंधित आयोग के निर्देश संबंधित राज्य सरकारों के उन विषयों पर निर्देशों पर प्रभावी होते हैं।
3. संविधान के अनुच्छेद 48A के अंतर्गत पराली जलाने पर रोक लगाने के लिए आयोग की स्थापना की गई थी।

उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग अधिनियम, 2021 से अस्तित्व में आया। कथन 2 सही है: आयोग के निर्देश राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु गुणवत्ता से जुड़े विषयों पर राज्य सरकारों के निर्देशों पर प्रभावी माने गए हैं। कथन 3 गलत है: अनुच्छेद 48A राज्य के लिए पर्यावरण संरक्षण का नीति-निर्देशक तत्व है, यह किसी आयोग की स्थापना का स्रोत नहीं है।

Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
कथन (A): दिल्ली में शीत ऋतु में वायु प्रदूषण का स्तर प्रायः सबसे अधिक दर्ज किया जाता है।
कारण (R): कम पवन गति और तापीय प्रतिलोमन की स्थिति में प्रदूषक कणों का फैलाव सीमित हो जाता है और वे सतह के निकट जमा होते हैं।

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
  2. (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
  3. (A) सही है, किंतु (R) गलत है।
  4. (A) गलत है, किंतु (R) सही है।

उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — शीत ऋतु में पवन की गति घटने और सतह के निकट गर्म हवा की परत ठंडी हवा को दबाए रखने से तापीय प्रतिलोमन बनता है, जिससे प्रदूषक ऊपर नहीं उठ पाते। यही कारण है कि (R), (A) की सही व्याख्या है।

Q3. निम्नलिखित सूचियों का मिलान कीजिए:

सूची I (अवधारणा/साधन)
A. सूक्ष्म कण पदार्थ (PM2.5)
B. भूस्थिर उपग्रह
C. तापीय प्रतिलोमन
D. वायुक्षेत्र

सूची II (विवरण)
1. किसी स्थिर क्षेत्र का निरंतर अवलोकन करने वाला उपग्रह
2. 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम व्यास वाले वायुजनित कण
3. सतह के निकट ठंडी हवा के ऊपर गर्म हवा की परत का बनना
4. ऐसा भौगोलिक क्षेत्र जहाँ साझा मौसम विज्ञान और उत्सर्जन मिलकर वायु गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं

सही कूट का चयन कीजिए:

  1. A-2, B-1, C-3, D-4
  2. A-1, B-2, C-3, D-4
  3. A-2, B-1, C-4, D-3
  4. A-3, B-1, C-2, D-4

उत्तर: A-2, B-1, C-3, D-4 — PM2.5 के लिए 2.5 माइक्रोमीटर वाले कण (2); भूस्थिर उपग्रह निरंतर अवलोकन के लिए (1); तापीय प्रतिलोमन में गर्म हवा की परत ठंडी हवा को दबाती है (3); वायुक्षेत्र साझा मौसम और उत्सर्जन वाला भौगोलिक क्षेत्र है (4)।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) को दिल्ली के शीत-कालीन वायु प्रदूषण के लिए मुख्य उपाय मानना क्यों अपर्याप्त है? वायुक्षेत्र-आधारित शमन और उत्सर्जन आँकड़ों की विश्वसनीयता के संदर्भ में चर्चा कीजिए। साथ ही बताइए कि यदि पराली जलाने के उत्सर्जन का सही आकलन न हो, तो नीति-निर्माण और राज्यों के बीच समन्वय पर क्या परिणाम होंगे। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर संरचना (मॉडल-उत्तर कंकाल):
(1) भूमिका: दिल्ली में शीत-कालीन विंटर एक्शन प्लान (1 नवंबर से लागू) और उसकी अवधि में वायु गुणवत्ता का ‘बहुत खराब’ स्तर; GRAP की प्रकृति अल्पकालिक और प्रतिक्रियात्मक है।
(2) GRAP का संस्थागत ढाँचा: वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग अधिनियम, 2021 के अंतर्गत वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग द्वारा AQI स्तर के आधार पर चरणबद्ध उपाय; इसकी सीमाएँ, जैसे निर्माण-गतिविधि और वाहन-प्रतिबंध का अस्थायी प्रभाव।
(3) वायुक्षेत्र-आधारित दृष्टिकोण: प्रदूषण का स्रोत दिल्ली की सीमा से बाहर पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान तक फैला है; साझा मौसम-विज्ञान के कारण समन्वित योजना की आवश्यकता; राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के शहर-केंद्रित ढाँचे की सीमाएँ।
(4) उत्सर्जन आँकड़ों की समस्या: NASA के MODIS सेंसर का पास होने का समय (कई आग दर्ज न होना); 2024-25 में पंजाब में 90 प्रतिशत से अधिक घटनाएँ दोपहर 3 बजे के बाद, जबकि 2021 में 3 प्रतिशत से कम; दक्षिण कोरिया के KOMPSAT-2A के AMI (भूस्थिर उपग्रह) द्वारा अधिक आग-संख्या का संकेत; NIAS मॉडलिंग में दिल्ली के PM2.5 में लगभग 20 प्रतिशत योगदान का अनुमान (रिपोर्ट के अनुसार)।
(5) जलवायु कारक: एल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) के प्रभाव से मौसम में विलंब; तापीय प्रतिलोमन और पवन की गति का संतुलन।
(6) संवैधानिक और न्यायिक आयाम: अनुच्छेद 21 (स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार) — सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य (1991) का संदर्भ; अनुच्छेद 48A और मौलिक कर्तव्य अनुच्छेद 51A(g); एम.सी. मेहता वाद श्रृंखला का उल्लेख।
(7) विभिन्न मत: एक ओर अल्पकालिक उपायों से तत्काल जोखिम में कमी का तर्क; दूसरी ओर किसानों की आर्थिक विवशता, श्रमिकों और परिवहन पर प्रभाव तथा पराली प्रबंधन के विकल्प (इन-सीटू और एक्स-सीटू) की व्यावहारिकता।
(8) समाधान: विश्वसनीय उत्सर्जन सूची, उपग्रह और भू-आधारित निगरानी का समन्वय, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के डेटा की पारदर्शिता, राज्यों के बीच वायुक्षेत्र-स्तरीय योजना और दीर्घकालिक उत्सर्जन कटौती।
(9) निष्कर्ष: GRAP आपातकालीन ढाल है, स्थायी समाधान वायुक्षेत्र-आधारित नियोजन और विश्वसनीय आँकड़ों से ही संभव है।

स्रोत: The Indian Express


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