02 Nov अल नीनो का कृषि व खाद्य मुद्रास्फीति पर प्रभाव: नीतिगत चुनौतियाँ
✎ अल नीनो से मानसून में कमी उर्वरक की मांग और उत्पादकता को घटाती है, जिससे खाद्य मुद्रास्फीति का जोखिम बढ़ता है, और इसके अल्पकालिक उपाय शुल्क-मुक्त आयात तथा दीर्घकालिक उपाय अनुदान व्यवस्था के पुनर्गठन में निहित हैं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III — अर्थव्यवस्था (कृषि, खाद्य प्रबंधन, मुद्रास्फीति, अनुदान और राजकोषीय नीति) | सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III — पर्यावरण एवं आपदा प्रबंधन (जलवायु परिवर्तन, अल नीनो, सूखा) | सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — शासन (सरकारी योजनाएँ, हस्तक्षेप और उनका मूल्यांकन)
- Prelims: अल नीनो (El Niño) और ENSO (El Niño-Southern Oscillation), दक्षिण-पश्चिम मानसून और उसके अखिल भारतीय वर्षा-विचलन, यूरिया और उसका नियंत्रित खुदरा मूल्य, पोषक तत्व आधारित अनुदान (Nutrient Based Subsidy), उर्वरक नियंत्रण आदेश, 1985 (Fertiliser Control Order, 1985), आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 (Essential Commodities Act, 1955), मूल सीमा शुल्क (Basic Customs Duty) और शुल्क-मुक्त आयात, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (Consumer Price Index) में खाद्य वर्ग का भार
- Essay: जलवायु परिवर्तन के दौर में खाद्य सुरक्षा और कृषि की स्थिरता, अनुदान व्यवस्था का पुनर्गठन: दक्षता, वित्तीय प्राथमिकताएँ और सामाजिक सुरक्षा का संतुलन
त्वरित पुनरावृत्ति: अल नीनो से मानसून में कमी उर्वरक की मांग और उत्पादकता को घटाती है, जिससे खाद्य मुद्रास्फीति का जोखिम बढ़ता है, और इसके अल्पकालिक उपाय शुल्क-मुक्त आयात तथा दीर्घकालिक उपाय अनुदान व्यवस्था के पुनर्गठन में निहित हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
अप्रैल-सितंबर में सभी उर्वरकों की बिक्री 2025 की इसी अवधि की तुलना में घटी है, जिसमें सबसे अधिक प्रयुक्त और सबसे सस्ता उर्वरक यूरिया भी शामिल है। उत्पादन और आयात बढ़ने के बावजूद बिक्री में कमी किसानों की कम मांग का संकेत है, जो अल नीनो से जुड़ी शुष्क मौसम परिस्थितियों का परिणाम है। दक्षिण-पश्चिम मानसून (जून-सितंबर) में अखिल भारतीय वर्षा सामान्य से 12.6 प्रतिशत कम रही, और अक्टूबर में 31.4 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई। इससे खरीफ उत्पादकता और रबी की बुवाई पर दबाव की आशंका है, और खाद्य मुद्रास्फीति के बढ़ने का जोखिम भी बना है। इन परिस्थितियों में सरकार के सामने तत्काल उपाय के रूप में दालों, कच्ची चीनी और कपास के शुल्क-मुक्त आयात की छूट 31 मार्च तक देने तथा दीर्घकाल में अनुदान व्यवस्था और वित्तीय प्राथमिकताओं के पुनर्गठन पर विचार का सुझाव दिया गया है।
पृष्ठभूमि
- अल नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय पूर्वी क्षेत्र में सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने से जुड़ी जलवायु घटना है। यह ENSO का गर्म चरण है, जिसका भारतीय मानसून पर प्रतिकूल प्रभाव प्रायः देखा जाता है।
- भारत में खाद्य मुद्रास्फीति जुलाई 2023 से दिसंबर 2024 के बीच औसतन 8.5 प्रतिशत से ऊपर रही थी, और इसका मुख्य कारण भी लंबा और तीव्र अल नीनो माना गया था।
- उर्वरक क्षेत्र में यूरिया की बिक्री कीमत सरकार द्वारा नियंत्रित है, जबकि फॉस्फेटिक और पोटाशिक उर्वरकों के लिए पोषक तत्व आधारित अनुदान व्यवस्था लागू है। इस व्यवस्था में अनुदान का आधार उर्वरक की पोषक मात्रा है।
- खाद्य वस्तुओं के आयात-शुल्क में परिवर्तन घरेलू कीमतों को प्रभावित करता है। दालें, खाद्य तेल और कपास जैसी वस्तुओं में घरेलू उत्पादन की कमी को आयात से संतुलित किया जाता है।
- जलवायु परिवर्तन और भू-राजनीतिक तनाव को अब अपवाद के बजाय सामान्य परिस्थिति मानकर नीति बनाने की आवश्यकता पर विशेषज्ञ जोर देते हैं। इससे जल, उर्वरक और ऊर्जा के कुशल उपयोग की ओर झुकाव बढ़ता है।
उर्वरक अनुदान और खाद्य मुद्रास्फीति प्रबंधन क्या है?
- उर्वरक (Fertiliser) पौधों को नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश जैसे पोषक तत्व देते हैं। यूरिया नाइट्रोजन का सबसे अधिक प्रयुक्त स्रोत है।
- उर्वरक नियंत्रण आदेश, 1985 (Fertiliser Control Order, 1985) उर्वरकों के उत्पादन, आयात, गुणवत्ता और वितरण को नियंत्रित करता है। यह आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 (Essential Commodities Act, 1955) के अंतर्गत आता है।
- यूरिया की खुदरा कीमत सरकार द्वारा निर्धारित रहती है, और कंपनियों या आयातकों को दिया जाने वाला अनुदान इस कीमत के अंतर को पूरा करता है।
- पोषक तत्व आधारित अनुदान में फॉस्फेटिक और पोटाशिक उर्वरकों पर पोषक तत्व की मात्रा के आधार पर अनुदान दिया जाता है, जबकि कीमतें काफी हद तक कंपनियाँ तय करती हैं।
- उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (Consumer Price Index) में खाद्य और पेय वर्ग का महत्वपूर्ण भार है, इसलिए मौसमी आपूर्ति झटकों का प्रभाव खुदरा मुद्रास्फीति पर शीघ्र दिखता है।
- मूल सीमा शुल्क (Basic Customs Duty) में अल्पकालिक कमी या शुल्क-मुक्त खिड़की से आयातकों को लंबी अवधि के अनुबंध करने का भरोसा मिलता है, जिससे घरेलू आपूर्ति की कमी की भरपाई हो सके।
- मानसून की कमी से मिट्टी की नमी घटती है, जिससे किसान उर्वरक का उपयोग कम कर सकते हैं। इसका असर अंततः उत्पादकता पर पड़ता है, भले ही बोया गया क्षेत्रफल पूरी तरह न घटे।
- दीर्घकालिक उपायों में जलवायु-स्मार्ट प्रजनन, सिंचाई और उर्वरक के कुशल उपयोग तथा अनुदान व्यवस्था के पुनर्गठन पर बल दिया जाता है।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| उर्वरक बिक्री में गिरावट | अप्रैल-सितंबर 2026 में सभी उर्वरकों की बिक्री 2025 की इसी अवधि की तुलना में कम रही, और यूरिया भी इससे अछूता नहीं रहा। उत्पादन और आयात अधिक होने के बावजूद बिक्री का घटना किसानों की कम मांग का संकेत है। |
| मानसून में कमी | दक्षिण-पश्चिम मानसून (जून-सितंबर) में वर्षा सामान्य से 12.6 प्रतिशत कम रही। दक्षिण भारत, मराठवाड़ा, विदर्भ, सौराष्ट्र-कच्छ, राजस्थान, बिहार और पूर्वोत्तर राज्यों में कमी विशेष रूप से दर्ज की गई। |
| अल नीनो की तीव्रता | अक्टूबर में वर्षा में 31.4 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई। वैश्विक मौसम एजेंसियों के अनुसार मजबूत से अति-मजबूत अल नीनो जनवरी-मार्च तक बना रह सकता है और अप्रैल-मई 2027 तक कमजोर पड़ने की संभावना है। |
| रबी फसल पर प्रभाव | मिट्टी में नमी कम होने से रबी बुवाई पर दबाव है। अल नीनो के कारण सर्दियाँ सामान्य से गर्म रहने की प्रवृत्ति से बुवाई के क्षेत्रफल और उपज, दोनों पर असर पड़ने की आशंका है। |
| खाद्य मुद्रास्फीति में वृद्धि | अप्रैल से सितंबर के बीच खाद्य मुद्रास्फीति 4.2 प्रतिशत से बढ़कर 7.7 प्रतिशत से ऊपर पहुँच गई। पिछली प्रमुख अवधि (जुलाई 2023 से दिसंबर 2024) में इसका औसत 8.5 प्रतिशत से अधिक था। |
महत्व
कृषि एवं खाद्य सुरक्षा
- उर्वरक उपयोग घटने से फसल उपज पर सीधा असर पड़ सकता है, जिससे खाद्य उत्पादन की स्थिरता प्रभावित होती है।
- मानसून की कमी और अल नीनो का प्रभाव यह दर्शाता है कि जल-उपलब्धता के बिना उर्वरक का प्रभावी उपयोग संभव नहीं है।
- रबी फसलों पर आशंका से खाद्यान्न और दालों की घरेलू आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है।
आर्थिक एवं मौद्रिक
- खाद्य मुद्रास्फीति में तेज़ वृद्धि से उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर दबाव बनता है और रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति के सामने चुनौती खड़ी होती है।
- रिज़र्व बैंक का मुद्रास्फीति लक्ष्य 4 प्रतिशत (±2 प्रतिशत की सहनशीलता सीमा) है। 7.7 प्रतिशत का स्तर इस ऊपरी सीमा से अधिक है।
- ग्रामीण आय और मांग पर असर पड़ने से समग्र आर्थिक संवृद्धि की गति भी धीमी हो सकती है।
राजकोषीय एवं नीतिगत
- उर्वरक अनुदान का बढ़ता बोझ और सीमा शुल्क में कटौती से होने वाला राजस्व नुकसान, दोनों राजकोषीय घाटे के प्रबंधन को प्रभावित करते हैं।
- आयात शुल्क में अस्थायी छूट एक अल्पकालिक उपाय है, जबकि दीर्घकालिक समाधान के लिए अनुदान ढाँचे का पुनर्गठन आवश्यक है।
चुनौतियाँ
1. अनुदान व्यवस्था की अकुशलता
- उर्वरक अनुदान का ढाँचा वर्तमान में अकुशल माना गया है, जिसमें संसाधनों के उपयोग में मितव्ययिता कम है।
- अनुदान का लाभ सही लक्ष्य तक पहुँचने और उर्वरकों के संतुलित उपयोग को प्रोत्साहित करने में सीमित रहा है।
- अनुदान सुधार को राजनीतिक रूप से संवेदनशील माना गया है, इसलिए नीति-परिवर्तन में समय और सहमति दोनों की आवश्यकता है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक एवं आर्थिक विकास; भारतीय अर्थव्यवस्था में राजकोषीय नीति और अनुदान
2. जलवायु परिवर्तन को अस्थायी जोखिम मानना
- नीति-निर्माण अभी भी अल नीनो जैसे जलवायु झटकों को अस्थायी जोखिम मानता है, जबकि इन्हें अब सामान्य परिस्थिति के रूप में लेने की आवश्यकता है।
- जलवायु-अनुकूल प्रजनन और जल-कुशल सिंचाई में निवेश पर्याप्त नहीं है।
- सूखे की बार-बार आवृत्ति से किसानों की उत्पादन-जोखिम क्षमता घटती है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण एवं आपदा प्रबंधन; जलवायु परिवर्तन के कृषि पर प्रभाव
3. खाद्य मुद्रास्फीति और मौद्रिक नीति का संतुलन
- आपूर्ति-जनित मुद्रास्फीति को ब्याज दरों से नियंत्रित करना सीमित प्रभावी है, क्योंकि समस्या की जड़ उत्पादन में कमी है।
- दालों, खाद्य तेलों और चीनी जैसी वस्तुओं की कीमतें एक साथ दबाव में आने से उपभोक्ता बजट पर असर बढ़ता है।
- उच्च मुद्रास्फीति कम आय वाले परिवारों को सबसे अधिक प्रभावित करती है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय अर्थव्यवस्था; मुद्रास्फीति, मौद्रिक नीति और रिज़र्व बैंक की भूमिका
4. आयात-निर्भरता और घरेलू किसान हित का द्वंद्व
- शुल्क-मुक्त आयात से उपभोक्ताओं को राहत मिलती है, परंतु घरेलू उत्पादक किसानों के मूल्य पर दबाव आ सकता है।
- आयात नीति को अल्पकालिक घरेलू कमी और दीर्घकालिक किसान हित के बीच संतुलित करना आवश्यक है।
- पाम तेल और सोयाबीन तेल जैसे वस्तुओं में शुल्क कटौती से तिलहन उत्पादकों की प्रतिस्पर्धा क्षमता प्रभावित हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और कृषि व्यापार नीति; खाद्य सुरक्षा
5. उर्वरक उपयोग की दक्षता
- उर्वरकों के असंतुलित उपयोग से मृदा स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक असर पड़ता है।
- जल, उर्वरक, ऊर्जा और अन्य दुर्लभ संसाधनों का कुशल उपयोग किसानों के लिए अभी व्यावहारिक रूप से कठिन है।
- सूक्ष्म सिंचाई और मृदा परीक्षण आधारित पोषण प्रबंधन का विस्तार अभी सीमित है।
यूपीएससी लिंक: कृषि एवं संसाधन प्रबंधन; मृदा स्वास्थ्य और सतत कृषि
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| अनुदान ढाँचा | अकुशल एवं असंतुलित अनुदान व्यवस्था से राजकोषीय संसाधनों का प्रभावी उपयोग नहीं हो पाता |
| जलवायु जोखिम | अल नीनो जैसे चक्र को अस्थायी जोखिम मानने से दीर्घकालिक तैयारी कमजोर रहती है |
| खाद्य मुद्रास्फीति | 7.7 प्रतिशत की दर रिज़र्व बैंक की 6 प्रतिशत की ऊपरी सहनशीलता सीमा से अधिक है |
| आयात शुल्क नीति | शुल्क-मुक्त आयात से उपभोक्ता राहत मिलती है, पर घरेलू किसानों के मूल्य पर असर पड़ सकता है |
| उर्वरक दक्षता | असंतुलित और अत्यधिक उपयोग से मृदा स्वास्थ्य और जल-संसाधन दोनों पर दबाव बढ़ता है |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- पोषक तत्व आधारित अनुदान योजना (Nutrient Based Subsidy – NBS)
- यूरिया अनुदान व्यवस्था (Urea Subsidy Scheme)
आगे की राह
- अल नीनो और जलवायु परिवर्तन को अस्थायी जोखिम के बजाय आधारभूत परिस्थिति मानकर कृषि नियोजन किया जाए।
- दालों, खाद्य तेलों, चीनी और कपास के लिए आयात शुल्क में अल्पकालिक छूट दी जाए, ताकि घरेलू कमी की भरपाई हो सके।
- आयातकों को अनुबंध करने में विश्वास मिले, इसके लिए शुल्क-मुक्त अवधि पूर्व-घोषित और पारदर्शी हो।
- जलवायु-अनुकूल प्रजनन और सूखा-सहिष्णु बीज किस्मों के अनुसंधान में निवेश बढ़ाया जाए।
- सूक्ष्म सिंचाई, मृदा परीक्षण और संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन के माध्यम से किसानों की संसाधन-दक्षता बढ़ाई जाए।
- उर्वरक अनुदान ढाँचे का पुनर्गठन कर उसे परिणाम-आधारित और राजकोषीय रूप से टिकाऊ बनाया जाए।
- खाद्य मुद्रास्फीति की निगरानी के लिए आपूर्ति-पक्ष के संकेतकों, जैसे मानसून और मृदा नमी, को नीति-समन्वय में शामिल किया जाए।
- केंद्र और राज्यों के बीच कृषि, व्यापार और खाद्य आपूर्ति से संबंधित नीतियों में समन्वय सुदृढ़ किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
एल नीनो प्रभाव · खाद्य मुद्रास्फीति · उर्वरक बिक्री में गिरावट · मानसून की कमी · कृषि उत्पादकता · जलवायु परिवर्तन · राजकोषीय प्राथमिकताएँ · सब्सिडी व्यवस्था · रबी फसलें · खरीफ फसलें · आयात शुल्क · खाद्य सुरक्षा
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 246 (सातवीं अनुसूची): सीमा शुल्क संघ का विषय
- अनुच्छेद 266(3): संचित निधि से अनुदान हेतु विधि-सम्मत विनियोजन
- अनुच्छेद 47: पोषण स्तर और जन-स्वास्थ्य का कर्तव्य
- अनुच्छेद 48: कृषि का आधुनिक एवं वैज्ञानिक संगठन
अवधारणा प्रवाह
अल नीनो के कारण दक्षिण-पश्चिम मानसून में वर्षा सामान्य से कम होती है। → मिट्टी में नमी घटने से किसानों की उर्वरक मांग और उपयोग घटता है। → उर्वरक बिक्री में गिरावट से फसल उपज पर दबाव आता है, विशेषकर रबी फसलों में। → आपूर्ति में कमी और उत्पादन-जोखिम से खाद्य कीमतें बढ़ती हैं और खाद्य मुद्रास्फीति ऊपर जाती है। → सरकार अल्पकाल में आयात शुल्क में छूट जैसे उपाय करती है। → दीर्घकाल में जलवायु-अनुकूल कृषि और अनुदान ढाँचे के पुनर्गठन की आवश्यकता बनती है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. एल नीनो (El Niño) प्रशांत महासागर में सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने की घटना है, जो वैश्विक मौसम पैटर्न को प्रभावित करती है।
2. भारत में एल नीनो का प्रभाव सामान्यतः कमजोर मानसून और सूखे की स्थिति से जुड़ा होता है।
3. उर्वरक सब्सिडी भारत में किसानों को सस्ती दरों पर उर्वरक उपलब्ध कराने के लिए एक महत्वपूर्ण नीतिगत उपकरण है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। एल नीनो भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के तापमान में आवधिक वृद्धि को संदर्भित करता है, जिससे वैश्विक मौसम पैटर्न में बदलाव आता है। कथन 2 सही है। भारत में एल नीनो का संबंध अक्सर कमजोर दक्षिण-पश्चिम मानसून और सूखे की स्थिति से होता है, जिससे कृषि उत्पादन प्रभावित होता है। कथन 3 सही है। भारत सरकार किसानों को उर्वरक की लागत वहन करने में मदद करने और कृषि उत्पादकता को बढ़ावा देने के लिए उर्वरक सब्सिडी प्रदान करती है।
Q2. अभिकथन (A): हाल ही में भारत में उर्वरक की बिक्री में गिरावट देखी गई है, भले ही उत्पादन और आयात में वृद्धि हुई है।
कारण (R): एल नीनो (El Niño) प्रेरित शुष्क मौसम की स्थिति और अपर्याप्त मानसून वर्षा के कारण किसानों की मांग कम हो गई है।
उपरोक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
- A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सही है, लेकिन R गलत है।
- A गलत है, लेकिन R सही है।
उत्तर: A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि समाचार रिपोर्ट में उर्वरक बिक्री में गिरावट का उल्लेख किया गया है। कारण (R) भी सही है क्योंकि यह गिरावट एल नीनो के कारण शुष्क मौसम और अपर्याप्त मानसून वर्षा से जुड़ी है, जिससे किसानों की मांग कम हो गई है। कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या करता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ एल नीनो (El Niño) के कारण भारत में उर्वरक की बिक्री में गिरावट और खाद्य मुद्रास्फीति के बढ़ते जोखिम पर चर्चा कीजिए। इस संदर्भ में, सरकार द्वारा अपनाई जा सकने वाली अल्पकालिक और दीर्घकालिक रणनीतियों का विश्लेषण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** एल नीनो के प्रभाव और हाल ही में उर्वरक बिक्री में गिरावट तथा खाद्य मुद्रास्फीति के बढ़ते जोखिम का संक्षिप्त परिचय।
2. **एल नीनो का प्रभाव:**
* कमजोर दक्षिण-पश्चिम मानसून (जून-सितंबर) और अक्टूबर में वर्षा की कमी।
* मराठवाड़ा, विदर्भ, सौराष्ट्र, कच्छ, राजस्थान, बिहार और पूर्वोत्तर राज्यों में महत्वपूर्ण कमी।
* किसानों की मांग में कमी के कारण उर्वरक की बिक्री में गिरावट (यूरिया सहित)।
* खरीफ और रबी दोनों फसलों की पैदावार पर संभावित नकारात्मक प्रभाव।
* गर्मी में वृद्धि से रबी की बुवाई और पैदावार पर असर।
3. **खाद्य मुद्रास्फीति पर प्रभाव:**
* अप्रैल से सितंबर के बीच उपभोक्ता खाद्य मुद्रास्फीति में वृद्धि (4.2% से 7.7% से अधिक)।
* पिछली एल नीनो घटनाओं से तुलना, ‘सुपर स्ट्रॉन्ग’ एल नीनो का उल्लेख।
4. **अल्पकालिक रणनीतियाँ (तत्काल विकल्प):**
* दालों (मसूर, चना, पीली मटर), कच्ची चीनी और कपास के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति (31 मार्च तक)।
* कच्चे पाम और सोयाबीन तेल पर मूल सीमा शुल्क (Basic Customs Duty) को समाप्त करने पर विचार।
* आयातकों को बड़ी मात्रा में वस्तुओं का अनुबंध करने के लिए विस्तारित शून्य/कम शुल्क विंडो।
5. **दीर्घकालिक रणनीतियाँ (नीतिगत उपाय):**
* जलवायु परिवर्तन और भू-राजनीतिक तनाव को ‘डिफ़ॉल्ट’ वास्तविकताओं के रूप में स्वीकार करना।
* जलवायु-स्मार्ट प्रजनन (climate-smart breeding) में अधिक निवेश।
* किसानों को पानी, उर्वरक, ऊर्जा और अन्य दुर्लभ संसाधनों का अधिक कुशल उपयोगकर्ता बनाना।
* वर्तमान अक्षम सब्सिडी व्यवस्था और राजकोषीय प्राथमिकताओं का पुनर्गठन।
6. **निष्कर्ष:** खाद्य सुरक्षा और कृषि स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए व्यापक और समन्वित नीतिगत दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल।
स्रोत: The Indian Express
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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