08 Oct आरबीआई की रेपो दर वृद्धि: क्या आखिरी नहीं, और आगे क्या होगा? एक्सप्लेनर
✎ भारतीय रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (MPC) मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने और आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए रेपो दर जैसे उपकरणों का उपयोग करती है, जिसका सीधा प्रभाव ऋण दरों और समग्र आर्थिक मांग पर पड़ता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — अर्थव्यवस्था
- Prelims: रेपो दर, मौद्रिक नीति समिति (MPC), मुद्रास्फीति, मांग-जनित मुद्रास्फीति, ब्याज दरें, कैलिब्रेटेड टाइटनिंग, तरलता समायोजन सुविधा (LAF), उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI), राजकोषीय नीति
- Essay: मुद्रास्फीति नियंत्रण और आर्थिक संवृद्धि के बीच संतुलन की चुनौती, केंद्रीय बैंकों की भूमिका: आर्थिक स्थिरता के संरक्षक
त्वरित पुनरावृत्ति: भारतीय रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (MPC) मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने और आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए रेपो दर जैसे उपकरणों का उपयोग करती है, जिसका सीधा प्रभाव ऋण दरों और समग्र आर्थिक मांग पर पड़ता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने हाल ही में अपनी प्रमुख नीतिगत दर, रेपो दर (Repo Rate) में 25 आधार अंकों (basis points) की वृद्धि की है, जो तीन वर्षों से अधिक समय में पहली वृद्धि है। यह संकेत देता है कि केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति (Inflation) के दबाव को नियंत्रित करने के लिए अपनी मौद्रिक नीति (Monetary Policy) को और सख्त कर सकता है। अर्थशास्त्रियों और बैंकरों का अनुमान है कि आने वाले समय में रेपो दर में 50-75 आधार अंकों की और वृद्धि हो सकती है, जिससे ऋणों पर ब्याज दरें बढ़ेंगी और अर्थव्यवस्था में मांग की स्थिति प्रभावित हो सकती है।
पृष्ठभूमि
- मुद्रास्फीति नियंत्रण भारतीय रिज़र्व बैंक का प्राथमिक जनादेश है, जिसे सरकार द्वारा 4% (+/- 2%) के लक्ष्य के साथ निर्धारित किया गया है।
- रेपो दर वह दर है जिस पर RBI वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक ऋण देता है। इसमें वृद्धि से बैंकों के लिए धन महंगा हो जाता है, जिसका असर अंततः उपभोक्ताओं और व्यवसायों के लिए ऋण दरों पर पड़ता है।
- मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee – MPC) RBI की मौद्रिक नीति निर्धारित करने के लिए जिम्मेदार है। इसमें छह सदस्य होते हैं – तीन RBI से और तीन केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त।
- ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ (Calibrated Tightening) का अर्थ है कि केंद्रीय बैंक आवश्यकतानुसार दरों में वृद्धि करेगा, लेकिन दर में कटौती की संभावना कम है। यह एक सख्त मौद्रिक रुख का संकेत है।
- बढ़ती ब्याज दरें ऋणों को महंगा बनाती हैं, जिससे उपभोक्ता मांग और निवेश में कमी आ सकती है, जो मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने में मदद करता है, लेकिन आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) को भी धीमा कर सकता है।
- वर्तमान में, वैश्विक और घरेलू दोनों कारकों के कारण मुद्रास्फीति का दबाव बना हुआ है, जिसमें आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि और मजबूत घरेलू मांग शामिल हैं।
मौद्रिक नीति और इसके उपकरण
- मौद्रिक नीति केंद्रीय बैंक द्वारा अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति और ऋण की उपलब्धता को नियंत्रित करने के लिए उपयोग किए जाने वाले उपायों का एक समूह है। इसका मुख्य उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखना और आर्थिक संवृद्धि को बढ़ावा देना है।
- रेपो दर (Repo Rate): यह वह दर है जिस पर वाणिज्यिक बैंक अपनी अल्पकालिक जरूरतों को पूरा करने के लिए RBI से धन उधार लेते हैं। यह मौद्रिक नीति का एक प्रमुख उपकरण है।
- रिवर्स रेपो दर (Reverse Repo Rate): यह वह दर है जिस पर RBI वाणिज्यिक बैंकों से धन उधार लेता है। इसका उपयोग बाजार में अतिरिक्त तरलता (liquidity) को अवशोषित करने के लिए किया जाता है।
- नकद आरक्षित अनुपात (Cash Reserve Ratio – CRR): यह वाणिज्यिक बैंकों द्वारा RBI के पास रखी जाने वाली कुल जमा का एक निश्चित प्रतिशत है, जिस पर उन्हें कोई ब्याज नहीं मिलता।
- सांविधिक तरलता अनुपात (Statutory Liquidity Ratio – SLR): यह वाणिज्यिक बैंकों द्वारा अपनी शुद्ध मांग और सावधि देनदारियों का एक निश्चित प्रतिशत तरल संपत्तियों (जैसे नकद, सोना, सरकारी प्रतिभूतियां) के रूप में बनाए रखने की आवश्यकता है।
- खुले बाजार के परिचालन (Open Market Operations – OMO): इसमें RBI द्वारा सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद और बिक्री शामिल है, जिसका उपयोग बाजार में तरलता को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है।
- सीमांत स्थायी सुविधा (Marginal Standing Facility – MSF): यह अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के लिए आपातकालीन स्थिति में RBI से ओवरनाइट ऋण लेने की सुविधा है, जब अंतर-बैंक तरलता पूरी तरह से सूख जाती है।
- मौद्रिक नीति समिति (MPC) भारत में मौद्रिक नीति निर्धारण के लिए जिम्मेदार है। यह मुद्रास्फीति लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए नीतिगत दरें निर्धारित करती है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| रेपो दर में वृद्धि | मुद्रास्फीति (Inflation) को नियंत्रित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा मौद्रिक नीति (Monetary Policy) को सख्त करने का संकेत। |
| मौद्रिक रुख में बदलाव | ‘तटस्थ’ (Neutral) से ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ (Calibrated Tightening) की ओर बदलाव दर्शाता है कि RBI मुद्रास्फीति के दबाव को कम करने के लिए और कदम उठा सकता है। |
| ब्याज दरों में वृद्धि | ऋणों पर ब्याज दरें बढ़ेंगी, जिससे अर्थव्यवस्था में मांग की स्थिति प्रभावित हो सकती है। |
| मुद्रास्फीति नियंत्रण को प्राथमिकता | RBI ने आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) और ऋण मांग की तात्कालिक चिंताओं पर मुद्रास्फीति नियंत्रण को प्राथमिकता दी है। |
| भविष्य में और बढ़ोतरी की संभावना | बैंकर्स और अर्थशास्त्री आने वाली समीक्षाओं में नीतिगत दर में 50-75 आधार अंकों (Basis Points) की और वृद्धि की उम्मीद कर रहे हैं। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- मुद्रास्फीति पर नियंत्रण: रेपो दर में वृद्धि का प्राथमिक उद्देश्य अर्थव्यवस्था में बढ़ती मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना है, जो वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में वृद्धि को दर्शाता है।
- मांग में कमी: उच्च ब्याज दरें ऋणों को महंगा बनाती हैं, जिससे उपभोक्ता मांग और निवेश में कमी आ सकती है, जो मुद्रास्फीति को कम करने में सहायक है।
- वित्तीय स्थिरता: मौद्रिक नीति को सख्त करके, RBI वित्तीय प्रणाली में स्थिरता बनाए रखने और अत्यधिक ऋण संचय को रोकने का प्रयास करता है।
नीतिगत महत्व
- RBI की स्वायत्तता: यह निर्णय मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee – MPC) की स्वायत्तता को दर्शाता है, जो आर्थिक स्थितियों के आधार पर स्वतंत्र रूप से निर्णय लेती है।
- भविष्य की नीतिगत दिशा: ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ का रुख यह स्पष्ट करता है कि RBI भविष्य में भी मुद्रास्फीति के आंकड़ों और आर्थिक विकास के आधार पर नीतिगत दर में बदलाव कर सकता है।
- अंतर्राष्ट्रीय कारकों का प्रभाव: वैश्विक अस्थिरता, जैसे पश्चिम एशिया संघर्ष और अल नीनो (El Nino) की स्थिति, नीतिगत निर्णयों को प्रभावित कर रही है, जो RBI के दृष्टिकोण में परिलक्षित होता है।
सामाजिक प्रभाव
- ऋणधारकों पर बोझ: उच्च ब्याज दरें मौजूदा ऋणों पर मासिक किस्त (EMI) को बढ़ा देंगी, जिससे परिवारों और व्यवसायों पर वित्तीय बोझ बढ़ेगा।
- निवेश पर प्रभाव: व्यवसायों के लिए कार्यशील पूंजी (Working Capital) महंगी हो जाएगी, जिससे नए निवेश और विस्तार योजनाओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
- आर्थिक संवृद्धि पर संभावित प्रभाव: मांग में कमी और निवेश में गिरावट से अल्पकालिक आर्थिक संवृद्धि धीमी हो सकती है, हालांकि यह मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक है।
चुनौतियाँ
1. मुद्रास्फीति और संवृद्धि के बीच संतुलन
- RBI को मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने और आर्थिक संवृद्धि को बनाए रखने के बीच एक नाजुक संतुलन बनाना होगा। अत्यधिक सख्त मौद्रिक नीति संवृद्धि को बाधित कर सकती है।
- उच्च ब्याज दरें निवेश और उपभोक्ता खर्च को कम कर सकती हैं, जिससे आर्थिक मंदी का खतरा बढ़ सकता है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: मौद्रिक नीति, मुद्रास्फीति
2. वैश्विक अनिश्चितताएं
- पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष और अल नीनो जैसी वैश्विक घटनाएं कच्चे तेल की कीमतों और कृषि उत्पादन को प्रभावित कर सकती हैं, जिससे मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ सकता है।
- वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान भी घरेलू कीमतों को प्रभावित कर सकता है, जिससे RBI के लिए मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।
यूपीएससी लिंक: अंतर्राष्ट्रीय संबंध: वैश्विक आर्थिक प्रभाव
3. ऋण लागत में वृद्धि का प्रभाव
- उच्च ब्याज दरें घरों और व्यवसायों के लिए ऋण लागत बढ़ाती हैं, जिससे उनकी खर्च करने और निवेश करने की क्षमता कम हो जाती है।
- यह विशेष रूप से उन छोटे और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है जो अपनी कार्यशील पूंजी के लिए ऋण पर निर्भर करते हैं।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: ऋण बाजार, वित्तीय समावेशन
4. मांग में कमी का जोखिम
- लगातार दर वृद्धि से अर्थव्यवस्था में समग्र मांग में उल्लेखनीय कमी आ सकती है, जिससे उत्पादन और रोजगार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
- RBI को यह सुनिश्चित करना होगा कि मांग में कमी इतनी अधिक न हो कि वह आर्थिक संवृद्धि को गंभीर रूप से प्रभावित करे।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: समष्टि अर्थशास्त्र, मांग प्रबंधन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| उच्च मुद्रास्फीति | उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति (Purchasing Power) कम करती है और आर्थिक अनिश्चितता बढ़ाती है। |
| आर्थिक संवृद्धि पर प्रभाव | उच्च ब्याज दरें निवेश और उपभोक्ता मांग को कम कर सकती हैं, जिससे संवृद्धि धीमी हो सकती है। |
| ऋणधारकों पर बोझ | बढ़ती EMI और ऋण लागत से परिवारों और व्यवसायों पर वित्तीय दबाव बढ़ता है। |
| वैश्विक अस्थिरता | भू-राजनीतिक तनाव और जलवायु संबंधी घटनाएं मुद्रास्फीति के दबाव को बढ़ा सकती हैं। |
| मौद्रिक नीति की प्रभावशीलता | बाहरी कारकों के कारण मौद्रिक नीति के अपेक्षित परिणाम प्राप्त करने में चुनौतियां। |
आगे की राह
- RBI को मुद्रास्फीति के आंकड़ों, आर्थिक संवृद्धि और वैश्विक कारकों की बारीकी से निगरानी जारी रखनी चाहिए ताकि नीतिगत निर्णयों को अनुकूलित किया जा सके।
- सरकार को आपूर्ति-पक्ष के मुद्दों को संबोधित करने के लिए राजकोषीय उपायों (Fiscal Measures) पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जैसे कि आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना और आपूर्ति श्रृंखला बाधाओं को दूर करना।
- लक्षित समर्थन प्रदान किया जाना चाहिए, विशेष रूप से छोटे व्यवसायों और कमजोर वर्गों के लिए, जो उच्च ब्याज दरों और बढ़ती लागत से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।
- दीर्घकालिक मुद्रास्फीति नियंत्रण के लिए संरचनात्मक सुधारों (Structural Reforms) को बढ़ावा देना, जैसे कृषि उत्पादकता में सुधार और लॉजिस्टिक्स लागत को कम करना।
- वित्तीय साक्षरता (Financial Literacy) को बढ़ावा देना ताकि ऋणधारक उच्च ब्याज दर के माहौल में अपने वित्त का बेहतर प्रबंधन कर सकें।
- अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करना ताकि वैश्विक आर्थिक झटकों के प्रभावों को कम किया जा सके और एक स्थिर आर्थिक वातावरण बनाया जा सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
मौद्रिक नीति समिति · रेपो दर · मुद्रास्फीति नियंत्रण · आर्थिक संवृद्धि · ब्याज दरें · मांग की स्थिति · राजकोषीय नीति · तरलता समायोजन सुविधा · उपभोक्ता ऋण · निवेश पर प्रभाव · केंद्रीय बैंक की भूमिका · मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण
अवधारणा प्रवाह
उच्च मुद्रास्फीति का दबाव → RBI द्वारा रेपो दर में वृद्धि → बैंकों द्वारा ऋण ब्याज दरों में वृद्धि → अर्थव्यवस्था में ऋण मांग में कमी → कुल मांग में गिरावट → मुद्रास्फीति पर नियंत्रण का प्रयास
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) का प्राथमिक उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखना है, जबकि संवृद्धि के उद्देश्य को ध्यान में रखना है।
2. रेपो दर में वृद्धि से अर्थव्यवस्था में ऋण की लागत कम हो जाती है।
3. मौद्रिक नीति समिति में RBI के गवर्नर सहित कुल सात सदस्य होते हैं।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल एक — कथन 1 सही है। MPC का मुख्य उद्देश्य मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना है, लेकिन यह आर्थिक संवृद्धि को भी ध्यान में रखती है। कथन 2 गलत है। रेपो दर में वृद्धि से बैंकों के लिए RBI से उधार लेना महंगा हो जाता है, जिससे वे आगे ग्राहकों को अधिक ब्याज दरों पर ऋण देते हैं, जिससे ऋण की लागत बढ़ जाती है। कथन 3 गलत है। मौद्रिक नीति समिति में RBI के गवर्नर सहित कुल छह सदस्य होते हैं (तीन RBI से और तीन केंद्र सरकार द्वारा नामित)।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा उपकरण भारतीय रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति का हिस्सा नहीं है?
- रेपो दर
- रिवर्स रेपो दर
- खुले बाज़ार परिचालन (Open Market Operations – OMO)
- राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit)
उत्तर: राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) — रेपो दर, रिवर्स रेपो दर और खुले बाज़ार परिचालन सभी भारतीय रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति के उपकरण हैं, जिनका उपयोग तरलता (Liquidity) और मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। राजकोषीय घाटा सरकार की राजकोषीय नीति (Fiscal Policy) से संबंधित है, न कि RBI की मौद्रिक नीति से।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारतीय रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (MPC) के उद्देश्यों और कार्यप्रणाली का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। बढ़ती मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने में रेपो दर में वृद्धि के प्रभावों पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: मौद्रिक नीति समिति (MPC) का संक्षिप्त परिचय, इसकी स्थापना और प्राथमिक उद्देश्य (मूल्य स्थिरता)।
2. MPC के उद्देश्य: मूल्य स्थिरता (मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण) को प्राथमिकता देना, साथ ही संवृद्धि को ध्यान में रखना।
3. MPC की कार्यप्रणाली: संरचना (छह सदस्य), निर्णय लेने की प्रक्रिया (बहुमत से), वर्ष में कम से कम चार बैठकें।
4. आलोचनात्मक परीक्षण: MPC की स्वायत्तता, सरकार के साथ समन्वय, संवृद्धि बनाम मुद्रास्फीति के बीच संतुलन साधने की चुनौती, वैश्विक कारकों का प्रभाव।
5. रेपो दर में वृद्धि के प्रभाव:
क) मुद्रास्फीति नियंत्रण: ऋण महंगा होने से मांग में कमी, जिससे कीमतों पर दबाव कम होता है।
ख) आर्थिक संवृद्धि पर प्रभाव: निवेश और उपभोक्ता व्यय में कमी, संवृद्धि दर धीमी पड़ सकती है।
ग) ऋण की लागत: गृह ऋण, वाहन ऋण, व्यावसायिक ऋण पर EMI और ब्याज दरों में वृद्धि।
घ) बचत और निवेश: उच्च ब्याज दरें बचत को प्रोत्साहित कर सकती हैं, लेकिन निवेश को हतोत्साहित कर सकती हैं।
ङ) विनिमय दर पर प्रभाव: पूंजी प्रवाह को आकर्षित कर सकता है, जिससे रुपये को मजबूती मिल सकती है।
6. निष्कर्ष: मुद्रास्फीति नियंत्रण और संवृद्धि के बीच संतुलन बनाए रखने की जटिलता, केंद्रीय बैंक की भूमिका का महत्व।
स्रोत: The Indian Express
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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