सुप्रीम कोर्ट ने जंतर मंतर हिंसा की जांच हेतु उच्च स्तरीय समिति का गठन किया

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सुप्रीम कोर्ट ने जंतर मंतर हिंसा की जांच हेतु उच्च स्तरीय समिति का गठन किया

उच्चतम न्यायालय द्वारा HPEC गठन प्रक्रियाहिंसा घटनाजंतर-मंतर व अन्यन्यायालय हस्तक्षेपअनुच्छेद 32HPEC गठनअनुच्छेद 142स्वतंत्र जांचतथ्यों का पता लगानारिपोर्ट प्रस्तुतनिष्कर्ष व सिफारिशें
उच्चतम न्यायालय द्वारा HPEC गठन प्रक्रिया

✎ सर्वोच्च न्यायालय अनुच्छेद 32 और 142 के अंतर्गत स्वतंत्र जाँच समिति गठित कर सकता है, जबकि शांतिपूर्ण सभा का अधिकार (अनुच्छेद 19(1)(b)) लोक व्यवस्था के हित में युक्तियुक्त निर्बंधनों (अनुच्छेद 19(3)) के अधीन है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — राजव्यवस्था (Polity): न्यायपालिका, मौलिक अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था  |  GS Paper II — शासन (Governance): जाँच तंत्र और उत्तरदायित्व
  • Prelims: अनुच्छेद 32 (Article 32) और सर्वोच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता, अनुच्छेद 142 (Article 142) — पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने की शक्ति, अनुच्छेद 19(1)(a) व 19(1)(b) — वाक् एवं अभिव्यक्ति तथा शांतिपूर्ण सभा का अधिकार, अनुच्छेद 19(3) — युक्तियुक्त निर्बंधन, सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि 1 — लोक व्यवस्था (Public Order), जाँच आयोग अधिनियम, 1952 (Commissions of Inquiry Act, 1952), न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) और जाँच समिति का अंतर, जंतर-मंतर: दिल्ली में निर्धारित प्रदर्शन स्थल
  • Essay: लोकतंत्र में विरोध का अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन, हिंसा की स्वतंत्र जाँच: न्याय, जवाबदेही और विश्वास का प्रश्न

त्वरित पुनरावृत्ति: सर्वोच्च न्यायालय अनुच्छेद 32 और 142 के अंतर्गत स्वतंत्र जाँच समिति गठित कर सकता है, जबकि शांतिपूर्ण सभा का अधिकार (अनुच्छेद 19(1)(b)) लोक व्यवस्था के हित में युक्तियुक्त निर्बंधनों (अनुच्छेद 19(3)) के अधीन है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय ने जंतर-मंतर, दिल्ली में तथा दिल्ली के बाहर के स्थानों पर हुई हिंसा से जुड़े सभी पहलुओं की जाँच के लिए उच्चाधिकार प्राप्त जाँच समिति (High Powered Enquiry Committee — HPEC) गठित की है। यह कदम इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि जाँच का दायरा एक ही स्थल तक सीमित न रहकर कई स्थानों की घटनाओं तक फैला है। प्रेस विज्ञप्ति में समिति के गठन की सूचना दी गई है, किंतु घटनाओं का विस्तृत विवरण, समिति की समय-सीमा और सदस्यों के नाम जैसे ब्योरे इस इनपुट में उपलब्ध नहीं हैं; परीक्षा की दृष्टि से इस समाचार का मूल बिंदु न्यायालय द्वारा स्वतंत्र जाँच समिति के गठन की प्रक्रिया और उसकी संवैधानिक आधारभूमि है।

पृष्ठभूमि

  • जंतर-मंतर दिल्ली में शांतिपूर्ण प्रदर्शन और धरना देने का एक प्रमुख स्थल है, जहाँ विभिन्न समूह अपनी माँगें रखते हैं। ऐसे स्थलों पर कानून-व्यवस्था बनाए रखना दिल्ली पुलिस की जिम्मेदारी है।
  • सार्वजनिक व्यवस्था और पुलिस राज्य सूची के विषय हैं, किंतु दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र होने के कारण इसके प्रशासनिक ढाँचे की अपनी विशिष्टता है।
  • भारत में हिंसा या बड़े सार्वजनिक उपद्रव की जाँच सामान्यतः सरकार द्वारा जाँच आयोग अधिनियम, 1952 के अंतर्गत गठित आयोगों या न्यायिक आयोगों से कराई जाती है।
  • सर्वोच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु अनुच्छेद 32 के अंतर्गत कार्रवाई कर सकता है, और अनुच्छेद 142 के अंतर्गत पूर्ण न्याय हेतु आवश्यक आदेश दे सकता है।
  • स्वतंत्र और निष्पक्ष जाँच द्वारा पुलिस कार्रवाई, प्रशासनिक चूक और जन-असंतोष के कारणों का निष्पक्ष निर्धारण लोकतांत्रिक जवाबदेही के लिए आवश्यक माना जाता है।

उच्चाधिकार प्राप्त जाँच समिति (HPEC) क्या है?

  • उच्चाधिकार प्राप्त जाँच समिति एक विशेष तथ्यान्वेषी और जाँच निकाय है, जिसे किसी गंभीर घटना के सभी पहलुओं की गहन छानबीन के लिए गठित किया जाता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ऐसी समिति का गठन उसकी रिट अधिकारिता (अनुच्छेद 32) और पूर्ण न्याय की शक्ति (अनुच्छेद 142) से जुड़ा माना जाता है।
  • जाँच आयोग अधिनियम, 1952 के अंतर्गत आयोगों का गठन सामान्यतः केंद्र या राज्य सरकार करती है; न्यायालय द्वारा गठित समिति का आधार और प्रक्रिया न्यायिक आदेश पर निर्भर करती है।
  • जाँच आयोग अधिनियम, 1952 की धारा 5 के अनुसार आयोगों को सिविल न्यायालय की कुछ शक्तियाँ, जैसे गवाहों को बुलाना और दस्तावेज माँगना, प्राप्त होती हैं।
  • शांतिपूर्ण सभा का अधिकार अनुच्छेद 19(1)(b) में निहित है, जिस पर अनुच्छेद 19(3) के अंतर्गत लोक व्यवस्था के हित में युक्तियुक्त निर्बंधन लगाए जा सकते हैं।
  • लोक व्यवस्था बनाए रखना राज्य का दायित्व है, और जब प्रदर्शन हिंसक हो जाते हैं तो अधिकार और व्यवस्था के बीच संतुलन का प्रश्न उठता है।
  • तथ्यान्वेषी समिति का मुख्य कार्य तथ्यों का निर्धारण और सिफारिशें देना है; दंडात्मक निर्णय सक्षम न्यायालय या प्राधिकरण द्वारा ही लिए जाते हैं।
  • न्यायिक समीक्षा के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय प्रशासनिक और पुलिस कार्रवाई की संवैधानिकता तथा निष्पक्षता की जाँच कर सकता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
गठनकर्ता संस्था उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) ने उच्च-शक्ति जांच समिति (High Powered Enquiry Committee – HPEC) का गठन किया है, इसलिए इसका अधिकार न्यायालय के आदेश से आता है, न कि किसी सामान्य प्रशासनिक आदेश से।
जांच का विषय जंतर मंतर (नई दिल्ली) तथा दिल्ली के बाहर हुई हिंसा की घटनाओं के सभी पहलुओं की जांच करना। जांच का दायरा व्यापक है, जिसमें घटना के कारण, क्रम और उसके लिए जिम्मेदार परिस्थितियाँ शामिल हो सकती हैं।
जांच का उद्देश्य तथ्यों का निष्पक्ष और स्वतंत्र निर्धारण करना, ताकि घटना से संबंधित विवादों पर विश्वसनीय आधार बन सके और न्यायिक निर्णय तथ्य-आधारित हो।
कार्यप्रणाली का स्वरूप यह एक अस्थायी और विशिष्ट उद्देश्य वाली समिति है। इसका कार्य किसी स्थायी आयोग की तरह नहीं, बल्कि एक निश्चित जांच पूरी करने तक सीमित है।
प्रशासनिक प्रभाव पुलिस, प्रशासन और संबंधित एजेंसियों की भूमिका की जांच से लोक व्यवस्था बनाए रखने के तरीकों की समीक्षा का अवसर बनता है।

महत्व

संवैधानिक और न्यायिक

  • उच्चतम न्यायालय द्वारा जांच समिति का गठन संवैधानिक उपचारों के अधिकार (अनुच्छेद 32) के अंतर्गत उसकी भूमिका को रेखांकित करता है।
  • पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने की शक्ति (अनुच्छेद 142) के माध्यम से न्यायालय तथ्य-खोज के लिए विशेष निकाय बना सकता है।
  • न्यायिक समीक्षा के संदर्भ में यह दिखाता है कि न्यायालय राज्य और प्रशासन की कार्रवाइयों के तथ्यात्मक पक्ष की स्वतंत्र जांच करा सकता है।

मौलिक अधिकार और लोक व्यवस्था

  • शांतिपूर्ण सभा का अधिकार (अनुच्छेद 19(1)(ख)) और वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(क)) लोकतंत्र के मूल स्तंभ हैं।
  • इन अधिकारों पर लोक व्यवस्था के आधार पर युक्तियुक्त निर्बंधन (अनुच्छेद 19(3)) लगाए जा सकते हैं, परंतु हिंसा की स्थिति में उनकी सीमा और वैधता की जांच आवश्यक हो जाती है।
  • जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) के संरक्षण की दृष्टि से जन-सुरक्षा और शासन की जवाबदेही का प्रश्न भी इसी जांच से जुड़ता है।

शासन और जवाबदेही

  • सार्वजनिक सभाओं के दौरान हिंसा होने पर पुलिस और प्रशासन की प्रतिक्रिया की स्वतंत्र समीक्षा से जवाबदेही का ढांचा मजबूत होता है।
  • निष्पक्ष जांच से संस्थागत विश्वास बढ़ता है, जो कानून-व्यवस्था से जुड़े प्रशासन की वैधता के लिए आवश्यक है।

चुनौतियाँ

1. जांच की स्वतंत्रता और निष्पक्षता

  • जांच समिति की संरचना और उसके सदस्यों की स्वतंत्रता यह तय करती है कि निष्कर्षों पर विभिन्न पक्षों का भरोसा बना रहेगा या नहीं।
  • जिन संस्थाओं की कार्यवाही की जांच हो रही है, उनसे सूचना प्राप्त करने में व्यावहारिक बाधाएँ आ सकती हैं।

2. अधिकार और सुरक्षा के बीच संतुलन

  • शांतिपूर्ण सभा का अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था की रक्षा के बीच संतुलन बनाना एक जटिल प्रश्न है।
  • विरोध-प्रदर्शनों के दौरान बल प्रयोग के मानकों पर स्पष्टता न होने से भविष्य में भी विवाद उत्पन्न हो सकते हैं।

3. दिल्ली की विशिष्ट प्रशासनिक स्थिति

  • दिल्ली एक केंद्रशासित प्रदेश है, जहाँ पुलिस और लोक व्यवस्था से संबंधित विषय राज्य सरकार के पूर्ण नियंत्रण में नहीं होते (अनुच्छेद 239क क और अनुच्छेद 239क के अंतर्गत विशेष व्यवस्था)।
  • इससे जिम्मेदारी के विभाजन और समन्वय की व्याख्या करनी पड़ती है, जो जांच के निष्कर्षों की व्याख्या को भी प्रभावित कर सकती है।

4. जांच की समय-सीमा और साक्ष्य संग्रह

  • बड़े पैमाने की हिंसा से जुड़े साक्ष्य समय के साथ नष्ट हो सकते हैं, जिससे विश्वसनीय तथ्य जुटाना कठिन होता है।
  • व्यापक दायरे वाली जांच में समय पर रिपोर्ट देना एक व्यावहारिक चुनौती है।

5. पीड़ितों के अधिकार और क्षतिपूर्ति

  • हिंसा में प्रभावित व्यक्तियों के लिए न्याय, सुरक्षा और क्षतिपूर्ति का प्रश्न जांच के बाद भी महत्वपूर्ण बना रहता है।
  • जांच की रिपोर्ट के बाद उसकी सिफारिशों के कार्यान्वयन की व्यवस्था स्पष्ट होना आवश्यक है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
निष्पक्षता जांच समिति के निष्कर्षों पर विभिन्न पक्षों का भरोसा तभी बनेगा जब प्रक्रिया पारदर्शी और सभी पक्षों को सुनवाई का अवसर देने वाली हो।
साक्ष्य और सूचना घटना से जुड़े वीडियो, दस्तावेज़ और गवाहों के बयान समय पर सुरक्षित करना आवश्यक है, अन्यथा जांच की विश्वसनीयता घट सकती है।
अधिकार बनाम व्यवस्था शांतिपूर्ण सभा के अधिकार और लोक व्यवस्था की रक्षा के बीच की सीमा स्पष्ट न होने से प्रशासनिक निर्णयों पर प्रश्न उठते हैं।
समय-सीमा व्यापक दायरे की जांच में विलंब होने पर न्याय में देरी और जनता के असंतोष की आशंका रहती है।
जवाबदेही का निर्धारण किसी भी स्तर पर लापरवाही या अतिरेक पाए जाने पर उत्तरदायित्व तय करने की प्रक्रिया स्पष्ट होनी चाहिए।
सिफारिशों का क्रियान्वयन जांच रिपोर्ट की सिफारिशों को लागू करने के लिए संबंधित प्राधिकारियों की जिम्मेदारी और निगरानी तंत्र आवश्यक है।

आगे की राह

  • जांच समिति की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए उसके कार्यक्रम और प्रक्रिया की जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई जाए।
  • घटना से संबंधित साक्ष्यों के संरक्षण के लिए समयबद्ध और व्यवस्थित प्रणाली अपनाई जाए।
  • शांतिपूर्ण सभा के अधिकार और लोक व्यवस्था के बीच संतुलन के लिए स्पष्ट और सार्वजनिक दिशानिर्देश तैयार किए जाएँ।
  • सार्वजनिक सभाओं के प्रबंधन में पुलिस प्रशिक्षण और संवेदनशीलता पर जोर दिया जाए, ताकि बल प्रयोग न्यूनतम और आनुपातिक रहे।
  • जांच रिपोर्ट के निष्कर्षों और सिफारिशों के कार्यान्वयन की समय-सीमा तय की जाए और उसकी समीक्षा की व्यवस्था हो।
  • पीड़ितों के लिए सहायता, क्षतिपूर्ति और सुरक्षा की स्पष्ट प्रक्रिया सुनिश्चित की जाए।
  • दिल्ली जैसे केंद्रशासित प्रदेश में पुलिस, प्रशासन और स्थानीय निकायों के बीच समन्वय तंत्र को मजबूत किया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

उच्चाधिकार जाँच समिति (High Powered Enquiry Committee) · अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 142 · शांतिपूर्ण सभा का अधिकार और अनुच्छेद 19(3) · लोक व्यवस्था (Public Order) और राज्य सूची · जाँच आयोग अधिनियम, 1952 (Commissions of Inquiry Act, 1952) · पुलिस सुधार और प्रकाश सिंह मामला (2006) · न्यायिक समीक्षा और आनुपातिकता का सिद्धांत · मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग · शक्तियों का पृथक्करण (Separation of Powers) · सार्वजनिक जवाबदेही और न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाएँ

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 32: उच्चतम न्यायालय में संवैधानिक उपचार
  • अनुच्छेद 142: पूर्ण न्याय हेतु न्यायालय की शक्ति
  • अनुच्छेद 19(1)(ख): शांतिपूर्ण सभा का अधिकार
  • अनुच्छेद 19(3): लोक व्यवस्था के आधार पर निर्बंधन
  • अनुच्छेद 21: जीवन और स्वतंत्रता का संरक्षण

अवधारणा प्रवाह

सार्वजनिक सभाओं और प्रदर्शनों के दौरान जंतर मंतर तथा दिल्ली के बाहर हिंसा की घटनाएँ होती हैं।  →  घटनाओं के कारण और उनमें प्रशासनिक प्रतिक्रिया के बारे में व्यापक प्रश्न उठते हैं।  →  उच्चतम न्यायालय संवैधानिक शक्तियों के अंतर्गत उच्च-शक्ति जांच समिति (HPEC) का गठन करता है।  →  समिति सभी पक्षों से सूचना एकत्र कर तथ्यों की स्वतंत्र जांच करती है और रिपोर्ट तैयार करती है।  →  रिपोर्ट के निष्कर्षों और सिफारिशों के आधार पर न्यायालय, प्रशासन और संबंधित प्राधिकारी आगे की कार्रवाई तय करते हैं।  →  इससे लोक व्यवस्था, मौलिक अधिकारों और प्रशासनिक जवाबदेही के बीच संतुलन की नीति को दिशा मिलती है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. सर्वोच्च न्यायालय ने जंतर मंतर, दिल्ली तथा दिल्ली से बाहर के स्थानों पर हुई हिंसा की घटनाओं की सभी पहलुओं से जाँच के लिए एक उच्चाधिकार जाँच समिति गठित की है। इस संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान का अनुच्छेद 32 सर्वोच्च न्यायालय को मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट जारी करने की शक्ति प्रदान करता है।
2. संविधान का अनुच्छेद 142 सर्वोच्च न्यायालय को पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक आदेश पारित करने की शक्ति देता है।
3. जाँच आयोग अधिनियम, 1952 के अतिरिक्त किसी भी प्राधिकारी को सार्वजनिक महत्व के मामलों में जाँच समिति गठित करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है।

उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: अनुच्छेद 32 के अंतर्गत मूल अधिकारों के प्रवर्तन हेतु बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण, अधिकार पृच्छा और उत्प्रेषण रिट जारी की जा सकती हैं। कथन 2 सही है: अनुच्छेद 142 पूर्ण न्याय के लिए आवश्यक आदेश देने की शक्ति देता है। कथन 3 गलत है: जाँच आयोग अधिनियम, 1952 समुचित सरकार को आयोग गठित करने की शक्ति देता है, परंतु यह संवैधानिक न्यायालयों की अंतर्निहित और अनुच्छेद 142 से जुड़ी शक्तियों को समाप्त नहीं करता।

Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): शांतिपूर्ण और निरस्त्र सभा का अधिकार मूल अधिकार है, फिर भी यह असीमित नहीं है और लोक व्यवस्था के हित में उचित निर्बंधनों के अधीन है।
कारण (R): संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ख) शांतिपूर्ण और निरस्त्र सभा का अधिकार देता है, और अनुच्छेद 19(3) लोक व्यवस्था के आधार पर उचित निर्बंधन लगाने की अनुमति देता है।

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
  2. (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
  3. (A) सही है, परंतु (R) गलत है।
  4. (A) गलत है, परंतु (R) सही है।

उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — अभिकथन सही है, क्योंकि अनुच्छेद 19(1)(ख) का अधिकार अनुच्छेद 19(3) के अधीन है। कारण भी सही है और अभिकथन की सटीक व्याख्या करता है, क्योंकि उसी में निर्बंधन का आधार लोक व्यवस्था बताया गया है। इसलिए विकल्प (क) सही है।

Q3. भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची के अंतर्गत ‘लोक व्यवस्था’ (Public Order) किस सूची का विषय है?

  1. संघ सूची
  2. राज्य सूची
  3. समवर्ती सूची
  4. अवशिष्ट विषय

उत्तर: राज्य सूची — राज्य सूची की प्रविष्टि 1 में ‘लोक व्यवस्था’ (सशस्त्र बलों को छोड़कर) का उल्लेख है, इसलिए यह मुख्यतः राज्य का विषय है। पुलिस भी राज्य सूची की प्रविष्टि 2 में है। इसी कारण केंद्र की भूमिका सीमित और परिस्थिति-विशेष तक रहती है, जैसे अनुच्छेद 355 और केंद्रीय बलों की तैनाती।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित उच्चाधिकार जाँच समितियाँ सार्वजनिक हिंसा की घटनाओं में जवाबदेही सुनिश्चित करने का एक प्रभावी उपाय हैं। अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 142 के संदर्भ में इस प्रवृत्ति का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि लोक व्यवस्था राज्य का विषय होने पर केंद्र और राज्यों के बीच कौन-सा समन्वय शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के भीतर आवश्यक है। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर की संरचना: (1) भूमिका: जंतर मंतर और दिल्ली से बाहर की हिंसा की घटनाओं के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उच्चाधिकार जाँच समिति (High Powered Enquiry Committee) का गठन, और समीक्षा के लिए मूल प्रश्न। (2) संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 32 (मूल अधिकारों का प्रवर्तन और रिट क्षेत्राधिकार) तथा अनुच्छेद 142 (पूर्ण न्याय हेतु आदेश); अनुच्छेद 21 में जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा का संदर्भ; अनुच्छेद 19(1)(ख) और 19(3) के अंतर्गत शांतिपूर्ण सभा का अधिकार और लोक व्यवस्था पर उचित निर्बंधन। (3) विधिक ढाँचा: जाँच आयोग अधिनियम, 1952 की धारा 3 के अंतर्गत समुचित सरकार द्वारा आयोग गठन; न्यायालय द्वारा गठित समितियों की प्रकृति और उनकी सीमाएँ; मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्वप्रेरणा से जाँच की शक्ति; भारतीय न्याय संहिता, 2023 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 में गैरकानूनी जमाव तथा सार्वजनिक शांति से संबंधित प्रावधान। (4) न्यायिक दृष्टांत: अमित साहनी बनाम पुलिस आयुक्त (2020) में सार्वजनिक स्थलों पर अनिश्चितकालीन कब्जे पर न्यायालय की टिप्पणी; अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020) में आनुपातिकता के सिद्धांत की कसौटी। (5) प्रशासनिक सुधार: प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (2006) के पुलिस सुधार निर्देश और राज्य पुलिस प्राधिकरणों की स्वायत्तता; संघ-राज्य समन्वय, अनुच्छेद 355 का संदर्भ। (6) संतुलित दृष्टिकोण: पक्ष में—निष्पक्ष, स्वतंत्र जाँच, त्वरित जवाबदेही, नागरिक विश्वास; विपक्ष में—कार्यपालिका के कार्यक्षेत्र में न्यायिक हस्तक्षेप, शक्तियों के पृथक्करण पर प्रश्न, समिति की रिपोर्ट के अनुपालन की सीमा। (7) निष्कर्ष: जाँच को विधिक प्रक्रिया, पारदर्शिता और कार्यपालिका की संस्थागत जवाबदेही के साथ जोड़ने की आवश्यकता। नोट: समिति की अवधि और समय-सीमा का विवरण आदेश के पूर्ण पाठ से सत्यापित कीजिए।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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