02 Nov होर्मुज जलडमरूमध्य: ईरान की शर्तों पर अमेरिका का रुख

✎ होर्मुज जलसंधि फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ने वाला विश्व का प्रमुख ऊर्जा मार्ग है, इसलिए इसकी बाधा सीधे वैश्विक तेल-LNG आपूर्ति और भारत की ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित करती है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — अंतरराष्ट्रीय संबंध (पश्चिम एशिया, भारत के हित और कूटनीति) | GS Paper III — अर्थव्यवस्था (ऊर्जा सुरक्षा, कच्चे तेल और LNG की आपूर्ति, मुद्रास्फीति पर प्रभाव) | GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा (समुद्री सुरक्षा के संदर्भ में, केवल संक्षेप में)
- Prelims: होर्मुज जलसंधि (Strait of Hormuz) की भौगोलिक स्थिति: फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी को जोड़ती है, मुसंदम प्रायद्वीप (Musandam Peninsula) और ओमान का तट, संयुक्त राष्ट्र समुद्री विधि सम्मेलन, 1982 (UNCLOS) में पारगमन मार्ग (Transit Passage) का प्रावधान, बाब-अल-मंडेब जलसंधि (Bab-el-Mandeb) और स्वेज़ नहर का सामरिक महत्व, भारतीय सामरिक पेट्रोलियम भंडार (Indian Strategic Petroleum Reserves) और ऊर्जा सुरक्षा, मलक्का जलसंधि (Strait of Malacca) की तुलना: दोनों पर वैश्विक ऊर्जा व्यापार की निर्भरता
- Essay: जब समुद्री मार्ग संघर्ष का केंद्र बने, तब वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा कैसे सुनिश्चित हो?, आर्थिक शृंखलाओं की भेद्यता: एक संकीर्ण जलमार्ग विश्व अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित करता है
त्वरित पुनरावृत्ति: होर्मुज जलसंधि फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ने वाला विश्व का प्रमुख ऊर्जा मार्ग है, इसलिए इसकी बाधा सीधे वैश्विक तेल-LNG आपूर्ति और भारत की ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित करती है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने बताया कि यदि अमेरिका ईरान की वैध माँगों को स्वीकार करता है, तो होर्मुज जलसंधि को दो दिनों के भीतर फिर से खोला जा सकता है। उन्होंने कहा कि इसका आधार वह सात-सूत्री योजना है जो ईरान ने सितंबर में प्रस्तुत की थी और जिसके क्रियान्वयन की अवधि ईरान ने घटाकर दो दिन कर दी है। बघाई के अनुसार, जब तक अमेरिका अपनी नौसैनिक नाकाबंदी समाप्त नहीं करता और ईरान की माँगों पर विचार नहीं करता, तब तक कोई समझौता नहीं होगा। सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के दौरान यह योजना मध्यस्थों के माध्यम से अमेरिका के सामने रखी गई थी। समाचार रिपोर्टों के अनुसार, दोनों पक्षों के बीच इस प्रस्ताव पर संदेशों का आदान-प्रदान जारी है। यह समाचार इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि होर्मुज जलसंधि विश्व के तेल और LNG व्यापार का एक प्रमुख मार्ग है, इसलिए इसकी बाधा का प्रभाव वैश्विक ऊर्जा बाज़ार और आयातक देशों तक पहुँचता है।
पृष्ठभूमि
- भौगोलिक स्थिति: होर्मुज जलसंधि फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ती है। इसके उत्तरी तट पर ईरान और दक्षिणी तट पर ओमान तथा संयुक्त अरब अमीरात स्थित हैं। सबसे संकरे बिंदु पर इसकी चौड़ाई लगभग 33 किलोमीटर है, जबकि नौवहन के लिए प्रत्येक दिशा में लगभग तीन किलोमीटर चौड़े गलियारे निर्धारित हैं।
- ऊर्जा व्यापार में महत्व: विश्व के समुद्री मार्ग से होने वाले कच्चे तेल के व्यापार का बड़ा हिस्सा और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) का महत्वपूर्ण अंश इसी मार्ग से गुजरता है। इसी कारण इसे विश्व के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में गिना जाता है।
- भारत पर प्रभाव: भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का बड़ा भाग आयात करता है, और खाड़ी देशों से LNG तथा कच्चे तेल का आयात भारत की ऊर्जा सुरक्षा का मुख्य आधार है। इसलिए इस मार्ग की स्थिति सीधे भारत के आयात-व्यय, परिवहन लागत और घरेलू ईंधन कीमतों को प्रभावित करती है।
- ऐतिहासिक संदर्भ: 1980-88 के ईरान-इराक युद्ध के दौरान खाड़ी में तेल टैंकरों पर हमले हुए, जिन्हें टैंकर युद्ध (Tanker War) के नाम से जाना जाता है। इससे यह स्पष्ट हुआ कि इस क्षेत्र में नौवहन की सुरक्षा विश्व अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ी है।
- वर्तमान घटनाक्रम: समाचार रिपोर्टों के अनुसार, 28 फरवरी को इज़राइल और अमेरिका ने ईरान के शहरों पर संयुक्त हमले किए, जिसके बाद ईरान ने होर्मुज जलसंधि पर अपना नियंत्रण कड़ा किया। इसी पृष्ठभूमि में वर्तमान वार्ता और नाकाबंदी का प्रश्न सामने है।
होर्मुज जलसंधि क्या है?
- होर्मुज जलसंधि फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ने वाला संकरा समुद्री मार्ग है।
- यह फारस की खाड़ी के देशों, विशेषकर इराक, कुवैत, सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात और ईरान से तेल और LNG के निर्यात का प्रमुख मार्ग है।
- इसका सबसे संकरा भाग लगभग 33 किलोमीटर चौड़ा है, इसलिए छोटे व्यवधान का भी व्यापक प्रभाव पड़ता है।
- समुद्री विधि के अंतर्गत संयुक्त राष्ट्र समुद्री विधि सम्मेलन, 1982 (UNCLOS) में अंतरराष्ट्रीय जलसंधियों में पारगमन मार्ग (Transit Passage) का प्रावधान है, जिसके अनुसार जहाज़ों को बिना किसी रुकावट के गुजरने का अधिकार माना जाता है। ईरान इस सम्मेलन का पक्षकार नहीं है, फिर भी इस सिद्धांत की प्रयोज्यता पर अंतरराष्ट्रीय चर्चा होती रही है।
- इस जलसंधि के बंद होने या उसमें बाधा आने से कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता, बीमा और ढुलाई लागत में वृद्धि, तथा आपूर्ति शृंखला में विलंब जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
- आयातक देश अपने भंडार, वैकल्पिक मार्गों और आपूर्तिकर्ताओं के विविधीकरण के माध्यम से ऐसे झटकों से बचाव करते हैं।
- संकट-समाधान में मध्यस्थ देशों की भूमिका, संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर कूटनीति, और नौवहन सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग महत्वपूर्ण होते हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की भौगोलिक स्थिति | यह फ़ारस की खाड़ी (Persian Gulf) को ओमान की खाड़ी (Gulf of Oman) और अरब सागर से जोड़ता है। फ़ारस की खाड़ी से निकलने वाले समुद्री तेल व्यापार का यह एकमात्र प्रमुख समुद्री मार्ग है, इसलिए इसे वैश्विक ऊर्जा गलियारा कहा जाता है। |
| ऊर्जा निर्यात में भूमिका | इस मार्ग से खाड़ी के प्रमुख उत्पादक देशों का कच्चा तेल (Crude Oil) और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों तक पहुँचती है। अतः इसकी स्थिति का असर वैश्विक ऊर्जा कीमतों और आपूर्ति पर सीधा पड़ता है। |
| पारगमन का कानूनी आधार | समुद्र का विधि संबंधी संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCLOS) के भाग III में अंतरराष्ट्रीय नौवहन में प्रयुक्त होने वाले जलडमरूमध्यों के लिए पारगमन मार्ग (Transit Passage) का प्रावधान है। इसमें जहाजों और विमानों को बिना अवरोध गुजरने का अधिकार माना गया है। |
| संघर्ष की पृष्ठभूमि | 28 फ़रवरी को इज़रायल और अमेरिका द्वारा ईरान के शहरों पर संयुक्त हमलों के बाद ईरान ने क्षेत्र में अपने और अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाकर मिसाइल और ड्रोन हमले किए तथा होर्मुज पर अपनी पकड़ बढ़ाई। इससे इस मार्ग से नौवहन प्रभावित हुआ। |
| मध्यस्थों के माध्यम से वार्ता | ईरान ने 22 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा (UN General Assembly) के 81वें सत्र के दौरान मध्यस्थों के ज़रिए सात-सूत्रीय योजना अमेरिका तक पहुँचाई। यह अप्रत्यक्ष कूटनीति के संवाद का आधार है। |
महत्व
ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से महत्व
- वैश्विक तेल और LNG आपूर्ति के एक बड़े भाग का मार्ग होने से इस जलडमरूमध्य की स्थिति सीधे कच्चे तेल और गैस की कीमतों को प्रभावित करती है।
- भारत सहित तेल आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं के लिए आपूर्ति में व्यवधान से आयात लागत और मुद्रास्फीति (Inflation) का दबाव बढ़ सकता है।
- आपूर्ति सुरक्षित रखने के लिए आयात स्रोतों और मार्गों में विविधता लाना नीतिगत प्राथमिकता बन जाती है।
भू-राजनीतिक और सामरिक महत्व
- यह क्षेत्र अमेरिका, ईरान, इज़रायल और खाड़ी देशों के सामरिक हितों के केंद्र में है, इसलिए यहाँ की घटनाएँ बहुपक्षीय कूटनीति की परीक्षा बन जाती हैं।
- संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर मध्यस्थता और संवाद की प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के व्यापक ढाँचे से जुड़ी है।
अंतरराष्ट्रीय विधि और नौवहन की स्वतंत्रता
- UNCLOS के पारगमन मार्ग के प्रावधान का अर्थ है कि अंतरराष्ट्रीय नौवहन के लिए जलडमरूमध्य खुले रहें, चाहे क्षेत्रीय देश की नीतियाँ कुछ भी हों।
- नौवहन पर प्रतिबंध या नाकेबंदी जैसी स्थितियाँ समुद्री कानून के सिद्धांतों और व्यापार की निरंतरता पर प्रश्न उठाती हैं।
चुनौतियाँ
1. नौवहन और व्यापार मार्ग में बाधा
- जलडमरूमध्य में नौवहन बाधित होने से तेल और LNG के जहाज़ों की आवाजाही घटती है, जिससे आपूर्ति शृंखला पर दबाव आता है।
- बीमा लागत और माल भाड़े में वृद्धि होती है, जिसका असर अंतिम उपभोक्ता तक पहुँचता है।
यूपीएससी लिंक: GS-III: अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति शृंखला प्रबंधन
2. नौसैनिक नाकेबंदी और समुद्री कानून का प्रश्न
- ईरान की शर्त है कि अमेरिका अपनी नौसैनिक नाकेबंदी समाप्त करे, जबकि नौवहन की स्वतंत्रता UNCLOS के पारगमन मार्ग के सिद्धांत से जुड़ी है।
- जलडमरूमध्य पर नियंत्रण और नौवहन की स्वतंत्रता के बीच संतुलन अंतरराष्ट्रीय विधि की व्याख्या का विषय बन जाता है।
यूपीएससी लिंक: GS-II: अंतरराष्ट्रीय संबंध और अंतरराष्ट्रीय संधियाँ; GS-II: भारत के हित और विदेश नीति
3. अप्रत्यक्ष कूटनीति की सीमाएँ
- मध्यस्थों के माध्यम से संदेश भेजने की प्रक्रिया में समय लगता है और शर्तों की व्याख्या अलग-अलग होने से गलतफ़हमी की संभावना रहती है।
- सात-सूत्रीय योजना की अवधि को घटाकर दो दिन करने का दावा होने के बावजूद सहमति के लिए दोनों पक्षों के बीच विश्वास की कमी बनी रहती है।
यूपीएससी लिंक: GS-II: अंतरराष्ट्रीय संगठन और शांति-स्थापना में उनकी भूमिका; संयुक्त राष्ट्र की भूमिका
4. भारत जैसे आयातक देशों पर आर्थिक प्रभाव
- खाड़ी क्षेत्र से तेल और गैस की आपूर्ति पर निर्भरता के कारण व्यवधान का सीधा असर राजकोषीय संतुलन और चालू खाता घाटे पर पड़ सकता है।
- ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव से मुद्रास्फीति और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर दबाव बनता है।
यूपीएससी लिंक: GS-III: भारतीय अर्थव्यवस्था, मुद्रास्फीति और बाह्य क्षेत्र; GS-III: ऊर्जा सुरक्षा
5. क्षेत्र में प्रवासी भारतीयों और व्यापारिक हितों की सुरक्षा
- खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय कार्यरत हैं, इसलिए क्षेत्रीय अस्थिरता का प्रभाव उनके रोज़गार और सुरक्षा पर पड़ता है।
- भारतीय नौवहन और व्यापारिक जहाज़ों के लिए मार्ग की सुरक्षा एक प्रशासनिक और कूटनीतिक चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: GS-II: भारत के प्रवासी और विदेश नीति; GS-III: आंतरिक सुरक्षा और समुद्री सुरक्षा
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| नौवहन में व्यवधान | तेल और LNG की आपूर्ति घटने से वैश्विक कीमतों में अस्थिरता और आयातक देशों में मुद्रास्फीति का दबाव। |
| नौसैनिक नाकेबंदी | नौवहन की स्वतंत्रता और UNCLOS के पारगमन सिद्धांत के बीच टकराव की आशंका। |
| वार्ता में अविश्वास | अप्रत्यक्ष मध्यस्थता में शर्तों की अलग-अलग व्याख्या से समाधान में देरी। |
| बीमा और माल भाड़ा | जोखिम बढ़ने से परिवहन लागत बढ़ती है, जिसका भार उपभोक्ताओं पर पड़ता है। |
| प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा | क्षेत्रीय तनाव में खाड़ी देशों में कार्यरत भारतीयों के रोज़गार और सुरक्षा पर असर। |
आगे की राह
- ऊर्जा आपूर्ति में विविधता लाने के लिए आयात स्रोतों और परिवहन मार्गों का विस्तार किया जाए, ताकि किसी एक मार्ग पर निर्भरता घटे।
- रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार क्षमता को बढ़ाकर अल्पकालिक व्यवधान से निपटने की तैयारी मज़बूत की जाए।
- नौवहन की स्वतंत्रता और UNCLOS के सिद्धांतों के पालन पर बहुपक्षीय मंचों पर संवाद को सशक्त किया जाए।
- संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों के माध्यम से तनाव-शमन और युद्धविराम की प्रक्रिया को प्रोत्साहित किया जाए।
- खाड़ी क्षेत्र में कार्यरत भारतीय नागरिकों और भारतीय नौवहन के लिए सुरक्षा और सूचना-तंत्र को सुदृढ़ किया जाए।
- आयातक देशों के बीच ऊर्जा आपूर्ति पर समन्वय और सूचना-साझेदारी बढ़ाई जाए।
- ऊर्जा कीमतों के झटकों से उपभोक्ताओं की रक्षा के लिए राजकोषीय और मौद्रिक उपायों की तैयारी रखी जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) · अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य (International Straits) · पारगमन मार्ग अधिकार (Transit Passage) · समुद्र के विधि पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCLOS) · ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) · सामरिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserves) · ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण (Diversification of Energy Sources) · समुद्री चोक पॉइंट (Maritime Chokepoints) · नौवहन की स्वतंत्रता (Freedom of Navigation) · एलएनजी (LNG) · संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UN Security Council) · मध्यस्थता द्वारा कूटनीति (Mediated Diplomacy)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 51: अंतरराष्ट्रीय विधि और संधि-बाध्यताओं के प्रति आदर का राज्य का नीति-निर्देश
- सातवीं अनुसूची, संघ सूची की प्रविष्टि 14: विदेशी देशों के साथ संधियाँ और करार करना
अवधारणा प्रवाह
इज़रायल और अमेरिका द्वारा 28 फ़रवरी को ईरान पर संयुक्त हमले। → ईरान द्वारा मिसाइल और ड्रोन हमलों के साथ होर्मुज जलडमरूमध्य पर पकड़ बढ़ाना। → जलडमरूमध्य में नौवहन और तेल-LNG आपूर्ति का बाधित होना। → आपूर्ति घटने से वैश्विक ऊर्जा कीमतों और माल भाड़े-बीमा लागत में वृद्धि। → सितंबर में ईरान की सात-सूत्रीय योजना, मध्यस्थों के माध्यम से अमेरिका तक पहुँचाई गई। → ईरान द्वारा अवधि घटाकर दो दिन करने का प्रस्ताव, जो अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी समाप्ति और उसकी वैध माँगों पर निर्भर। → सहमति होने पर जलडमरूमध्य खुलने और वार्ता-प्रक्रिया शुरू होने की संभावना।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. होर्मुज़ जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी (Persian Gulf) को ओमान की खाड़ी (Gulf of Oman) से जोड़ता है।
2. इसके उत्तरी तट पर ईरान और दक्षिणी तट पर ओमान का मुसंदम प्रायद्वीप स्थित है।
3. सऊदी अरब से होने वाले कच्चे तेल का निर्यात केवल होर्मुज़ जलडमरूमध्य से ही संभव है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- इनमें से कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: होर्मुज़ जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है, जो आगे अरब सागर से मिलती है। कथन 2 सही है: उत्तर में ईरान और दक्षिण में ओमान का मुसंदम प्रायद्वीप इसके किनारे हैं। कथन 3 गलत है: सऊदी अरब के पास लाल सागर के यानबू तक जाने वाली पूर्व-पश्चिम पाइपलाइन है, इसलिए निर्यात केवल होर्मुज़ पर निर्भर नहीं है।
Q2. निम्नलिखित में से सामरिक जलमार्गों (Straits) और उनके द्वारा जोड़े जाने वाले जल-क्षेत्रों का सुमेलन कीजिए:
कॉलम I
1. होर्मुज़ जलडमरूमध्य
2. मलक्का जलडमरूमध्य
3. बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य
4. बॉस्फोरस जलडमरूमध्य
कॉलम II
A. लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है
B. फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है
C. अंडमान सागर को दक्षिण चीन सागर से जोड़ता है
D. काला सागर को मारमरा सागर से जोड़ता है
- 1-A, 2-B, 3-C, 4-D
- 1-B, 2-A, 3-D, 4-C
- 1-B, 2-C, 3-A, 4-D
- 1-C, 2-B, 3-A, 4-D
उत्तर: 1-B, 2-C, 3-A, 4-D — होर्मुज़ (1) फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है, अतः 1-B। मलक्का (2) अंडमान सागर को दक्षिण चीन सागर से जोड़ता है, अतः 2-C। बाब-अल-मंदेब (3) लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है, अतः 3-A। बॉस्फोरस (4) काला सागर को मारमरा सागर से जोड़ता है, अतः 4-D।
Q3. कथन (A): वैश्विक समुद्री तेल व्यापार के बड़े हिस्से का होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुजरना कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों को संवेदनशील बना देता है।
कारण (R): इस मार्ग में आने वाला व्यवधान आपूर्ति को घटाकर अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कीमतों को प्रभावित कर सकता है।
उपर्युक्त के संदर्भ में सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है
- (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है
- (A) सही है, परंतु (R) गलत है
- (A) गलत है, परंतु (R) सही है
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है — कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं। होर्मुज़ से होने वाले वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है, इसलिए इसमें व्यवधान होने पर आपूर्ति घटती है और कीमतें बढ़ती हैं। अतः (R), (A) की सही व्याख्या है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ होर्मुज़ जलडमरूमध्य जैसे सामरिक समुद्री मार्गों पर व्यवधान ने यह प्रश्न खड़ा किया है कि अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्यों में पारगमन की स्वतंत्रता और तटीय राज्यों की सुरक्षा चिंताओं में संतुलन कैसे बने। समुद्र के विधि पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCLOS) के अंतर्गत पारगमन मार्ग अधिकार के विधिक ढाँचे की समालोचनात्मक परीक्षा कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि ऊर्जा-आयातक देश के रूप में भारत अपनी अर्थव्यवस्था को ऐसे मार्गों के व्यवधानों से बचाने के लिए कौन-से उपाय अपना सकता है। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर संरचना: (1) भूगोल व संदर्भ: होर्मुज़ फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है। इसके सबसे संकरे भाग की चौड़ाई लगभग 40 किलोमीटर से कम है और यह तेल व एलएनजी निर्यात का प्रमुख मार्ग है। हाल के समाचार में ईरान ने अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी समाप्त करने और अपनी माँगों को संबोधित करने को शर्त बताया है; उत्तर में इसे केवल तथ्यात्मक रूप से रखें, किसी पक्ष को दोषी न ठहराएँ। (2) विधिक ढाँचा: UNCLOS भाग III (अनुच्छेद 37-44) के अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय नौवहन में प्रयुक्त जलडमरूमध्यों में पारगमन मार्ग अधिकार (अनुच्छेद 38) मिलता है, जो निर्दोष मार्ग (अनुच्छेद 17-19 के संदर्भ में) से भिन्न है; तटीय राज्य इसमें बाधा नहीं डाल सकते (अनुच्छेद 44)। भारत ने UNCLOS की पुष्टि (1995) की है। साथ में कॉर्फू चैनल वाद (ICJ, 1949) का उल्लेख करें, जिसमें जलडमरूमध्य में मार्ग के अधिकार और तटीय राज्य के दायित्वों पर विचार हुआ। अमेरिका और ईरान दोनों UNCLOS के पूर्ण पक्षकार नहीं हैं, इस पर विवाद-बिंदु के रूप में चर्चा करें। (3) संतुलन की बहस: नौवहन की स्वतंत्रता बनाम तटीय राज्य की सुरक्षा; सुरक्षा-आधारित प्रतिबंधों की वैधता; संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (अध्याय VII तथा अध्याय VI) और अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) की भूमिका; मध्यस्थता आधारित कूटनीति का मूल्यांकन। (4) भारत के लिए उपाय: सामरिक पेट्रोलियम भंडार (ISPRL, विशाखापत्तनम, मंगलूरु, पदूर) की भूमिका; कच्चे तेल के स्रोतों और मार्गों का विविधीकरण; एलएनजी आयात के अनुबंधों का विविधीकरण; भारतीय नौसेना द्वारा व्यापारिक जहाज़ों की सुरक्षा (जैसे 2019 का ऑपरेशन संकल्प) का उदाहरण; राजनयिक संवाद। (5) निष्कर्ष: विधिक अधिकार, सैन्य क्षमता और ऊर्जा-आपूर्ति विविधीकरण, तीनों के समन्वय से ही जोखिम कम होता है; स्वतंत्र व संतुलित निष्कर्ष दें।
स्रोत: orissapost.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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