चुनाव आयोग: कैसे बना एक सदस्य से तीन सदस्यीय निकाय, जानें इतिहास और कारण

चुनाव आयोग: कैसे बना एक सदस्य से तीन सदस्यीय निकाय, जानें इतिहास और कारण

चुनाव आयोग: कैसे बना एक सदस्य से तीन सदस्यीय निकाय, जानें इतिहास और कारण

चुनाव आयोग: कैसे बना एक सदस्य से तीन सदस्यीय निकाय, जानें इतिहास और कारण — चुनाव आयोग का स्थापना और सदस्य संख्या में बदलाव
आरेख: चुनाव आयोग का स्थापना और सदस्य संख्या में बदलाव

✎ भारत निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक निकाय है जो अनुच्छेद 324 के तहत स्थापित है, जिसमें एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो निर्वाचन आयुक्त होते हैं, जो भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करते हैं।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान – ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और आधारभूत संरचना  |  GS Paper II — संघ एवं राज्यों के कार्य और उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ, स्थानीय स्तर तक शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा उसकी चुनौतियाँ  |  GS Paper II — विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्तियाँ और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व
  • Prelims: भारत निर्वाचन आयोग, मुख्य निर्वाचन आयुक्त, निर्वाचन आयुक्त, अनुच्छेद 324, संवैधानिक निकाय, राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति, पद से हटाना
  • Essay: भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव: चुनौतियाँ और समाधान, संवैधानिक निकायों की स्वायत्तता और उनकी भूमिका

त्वरित पुनरावृत्ति: भारत निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक निकाय है जो अनुच्छेद 324 के तहत स्थापित है, जिसमें एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो निर्वाचन आयुक्त होते हैं, जो भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करते हैं।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

इस संदर्भ में, भारत के निर्वाचन आयोग (Election Commission of India – ECI) की स्थापना, उसकी संरचना और एक बहु-सदस्यीय निकाय के रूप में उसके विकास पर चर्चा महत्वपूर्ण हो गई है। यह आयोग भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था है, और इसकी कार्यप्रणाली तथा स्वायत्तता हमेशा से सार्वजनिक बहस का विषय रही है।

पृष्ठभूमि

  • भारत निर्वाचन आयोग की स्थापना 25 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान के अनुसार की गई थी।
  • संविधान ने इसे संसद, राज्य विधानसभाओं, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति प्रदान की है।
  • मूल रूप से, आयोग में केवल एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त होता था।
  • वर्ष 1989 में, 9वें लोकसभा चुनावों से पहले, आयोग को बहु-सदस्यीय बनाने का निर्णय लिया गया और दो अतिरिक्त निर्वाचन आयुक्तों के पद सृजित किए गए।
  • यह विस्तार तत्कालीन सरकार और मुख्य निर्वाचन आयुक्त के बीच मतभेदों की पृष्ठभूमि में हुआ था।
  • वर्ष 1990 में इसे फिर से एक-सदस्यीय निकाय बना दिया गया, लेकिन 1993 में इसे पुनः तीन-सदस्यीय निकाय में बदल दिया गया, जो वर्तमान में भी जारी है।

भारत निर्वाचन आयोग क्या है?

  • यह भारत में संघ और राज्य सरकारों के लिए चुनाव प्रक्रियाओं का संचालन, निर्देशन और नियंत्रण करता है, जिसमें राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव भी शामिल हैं।
  • वर्तमान में, आयोग में एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो निर्वाचन आयुक्त होते हैं।
  • मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
  • इनका कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक होता है, जो भी पहले हो।
  • मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों का दर्जा, वेतन और भत्ते सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के समान होते हैं।
  • मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसी प्रक्रिया और आधार पर पद से हटाया जा सकता है जैसे सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है, अर्थात् संसद द्वारा महाभियोग के माध्यम से।
  • संविधान का अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग के सदस्यों की संख्या का उल्लेख नहीं करता है, बल्कि यह राष्ट्रपति को समय-समय पर इसे निर्धारित करने का अधिकार देता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
स्थायी संवैधानिक निकाय भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए संविधान द्वारा स्थापित।
बहु-सदस्यीय निकाय मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और दो चुनाव आयुक्त (ECs) शामिल होते हैं, जो निर्णय लेने में सामूहिक जिम्मेदारी और विविधता लाते हैं।
नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, जो कार्यकारी से इसकी स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है।
कार्यकाल की सुरक्षा CEC को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान प्रक्रिया से ही हटाया जा सकता है, जो पद की स्वतंत्रता और गरिमा बनाए रखता है।
समान दर्जा और वेतन CEC और ECs को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के समान दर्जा, वेतन और भत्ते मिलते हैं, जो उनके पद की उच्चता को दर्शाता है।

महत्व

लोकतांत्रिक महत्व

  • चुनाव आयोग (Election Commission of India – ECI) भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण संवैधानिक निकाय है।
  • यह संसद, राज्य विधानमंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण के लिए जिम्मेदार है।

संवैधानिक स्वायत्तता

  • संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत स्थापित, ECI को कार्यकारी हस्तक्षेप से स्वतंत्रता प्रदान की गई है, जो इसकी निष्पक्षता के लिए आवश्यक है।
  • मुख्य चुनाव आयुक्त (Chief Election Commissioner – CEC) को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान प्रक्रिया से ही हटाया जा सकता है, जिससे उनके कार्यकाल की सुरक्षा सुनिश्चित होती है।

संस्थागत विकास

  • ECI का एक-सदस्यीय निकाय से बहु-सदस्यीय निकाय में परिवर्तन (1989 और 1993 में) निर्णय लेने में अधिक विचार-विमर्श और सामूहिक जिम्मेदारी सुनिश्चित करने के लिए किया गया था।
  • यह परिवर्तन चुनाव प्रक्रिया की जटिलताओं और आयोग पर बढ़ते कार्यभार को दर्शाता है, जिसके लिए अधिक सदस्यों की आवश्यकता महसूस की गई।

चुनौतियाँ

1. नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता

  • चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में सरकार की भूमिका पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं, जिससे आयोग की निष्पक्षता पर संदेह पैदा हो सकता है।
  • एक अधिक पारदर्शी और परामर्शपूर्ण नियुक्ति प्रक्रिया की आवश्यकता है जो सभी हितधारकों का विश्वास जीत सके।

2. आयोग की स्वतंत्रता

  • चुनाव आयुक्तों को हटाने की प्रक्रिया CEC के समान नहीं है, जिससे उनकी कार्यकाल की सुरक्षा और स्वतंत्रता पर सवाल उठते हैं।
  • सभी चुनाव आयुक्तों के लिए समान संवैधानिक सुरक्षा उपायों की आवश्यकता है।

3. बढ़ता कार्यभार और संसाधन

  • भारत में चुनावों का पैमाना और जटिलता लगातार बढ़ रही है, जिससे आयोग पर भारी कार्यभार पड़ता है।
  • आयोग को पर्याप्त वित्तीय और मानव संसाधन उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण है ताकि वह अपने कर्तव्यों का प्रभावी ढंग से पालन कर सके।

4. राजनीतिक हस्तक्षेप का खतरा

  • चुनाव आयोग के निर्णयों पर राजनीतिक दलों द्वारा अक्सर सवाल उठाए जाते हैं, जिससे आयोग की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
  • आयोग को अपनी निष्पक्षता और स्वायत्तता बनाए रखने के लिए बाहरी दबावों का सामना करना पड़ता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कार्यकारी के अत्यधिक प्रभाव के कारण निष्पक्षता पर संभावित प्रभाव।
चुनाव आयुक्तों को हटाने की प्रक्रिया CEC और अन्य ECs के बीच कार्यकाल की सुरक्षा में असमानता।
आयोग का वित्तपोषण सरकार पर निर्भरता से संभावित रूप से स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है।
चुनावों में धन बल का प्रयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने में आयोग के लिए चुनौती।
आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन उल्लंघनों पर प्रभावी ढंग से कार्रवाई करने में आयोग की क्षमता।

आगे की राह

  • चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक कॉलेजियम प्रणाली (Collegium System) स्थापित की जाए, जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल हों, ताकि पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके।
  • मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को हटाने की प्रक्रिया में समानता लाई जाए, ताकि सभी सदस्यों को समान कार्यकाल सुरक्षा मिल सके।
  • चुनाव आयोग को अपना बजट स्वयं तैयार करने और संसद के प्रति जवाबदेह होने की स्वायत्तता दी जाए, ताकि वित्तीय स्वतंत्रता सुनिश्चित हो सके।
  • चुनाव आयोग को आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों में त्वरित और प्रभावी कार्रवाई करने के लिए अधिक शक्तियां प्रदान की जाएं।
  • चुनाव सुधारों पर निरंतर विचार-विमर्श और कार्यान्वयन किया जाए, जिसमें चुनाव वित्तपोषण में पारदर्शिता और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों पर अंकुश लगाना शामिल है।
  • चुनाव आयोग के कर्मचारियों के लिए प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों को मजबूत किया जाए ताकि वे बदलती चुनावी चुनौतियों का सामना कर सकें।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

भारत निर्वाचन आयोग · संवैधानिक निकाय · अनुच्छेद 324 · मुख्य निर्वाचन आयुक्त · बहु-सदस्यीय निकाय · स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव · नियुक्ति प्रक्रिया · कार्यकाल · निष्कासन प्रक्रिया · निर्वाचन सुधार

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 324: चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण
  • अनुच्छेद 327: संसद को चुनाव संबंधी कानून बनाने की शक्ति
  • अनुच्छेद 328: राज्य विधानमंडलों को चुनाव संबंधी कानून बनाने की शक्ति

अवधारणा प्रवाह

संविधान द्वारा चुनाव आयोग की स्थापना (25 जनवरी 1950)  →  प्रारंभ में एक-सदस्यीय निकाय के रूप में कार्य करना  →  बढ़ते चुनावी कार्यभार और राजनीतिक संदर्भ  →  1989 में दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति  →  1990 में आयोग का पुनः एक-सदस्यीय होना  →  1993 में स्थायी रूप से बहु-सदस्यीय निकाय बनना  →  आयोग की निर्णय लेने की प्रक्रिया में सामूहिक जिम्मेदारी और विविधता

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. भारत के निर्वाचन आयोग के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत का निर्वाचन आयोग एक स्थायी संवैधानिक निकाय है जिसकी स्थापना 25 जनवरी 1950 को हुई थी।
2. संविधान का अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग के सदस्यों की संख्या को स्पष्ट रूप से निर्धारित करता है।
3. मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और उनका दर्जा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के समान होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। भारत का निर्वाचन आयोग एक स्थायी संवैधानिक निकाय है और इसकी स्थापना 25 जनवरी 1950 को हुई थी। कथन 2 गलत है। अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग के सदस्यों की संख्या का उल्लेख नहीं करता है, बल्कि यह राष्ट्रपति को समय-समय पर इसे निर्धारित करने का अधिकार देता है। कथन 3 सही है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और उनका दर्जा, वेतन और भत्ते सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के समान होते हैं।

Q2. अभिकथन (A): मुख्य निर्वाचन आयुक्त को संसद द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान प्रक्रिया से ही पद से हटाया जा सकता है।
कारण (R): निर्वाचन आयोग के सभी सदस्यों को समान संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त है।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

  1. A और R दोनों सही हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है।
  2. A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A का सही स्पष्टीकरण नहीं है।
  3. A सही है, लेकिन R गलत है।
  4. A गलत है, लेकिन R सही है।

उत्तर: A सही है, लेकिन R गलत है। — अभिकथन (A) सही है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान प्रक्रिया से ही हटाया जा सकता है। कारण (R) गलत है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त को प्राप्त संवैधानिक सुरक्षा अन्य निर्वाचन आयुक्तों को प्राप्त नहीं है; अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत के निर्वाचन आयोग की संरचना और कार्यप्रणाली का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। यह भी चर्चा कीजिए कि एक सदस्यीय निकाय से बहु-सदस्यीय निकाय में इसके परिवर्तन ने इसकी स्वायत्तता और दक्षता को कैसे प्रभावित किया है। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India – ECI) को एक स्थायी संवैधानिक निकाय के रूप में परिभाषित करें, अनुच्छेद 324 का उल्लेख करें और इसके मुख्य कार्य (संसद, राज्य विधानमंडल, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण) बताएं।
2. संरचना: वर्तमान संरचना (मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो निर्वाचन आयुक्त), उनकी नियुक्ति (राष्ट्रपति द्वारा), कार्यकाल (6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक), दर्जा (सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के समान) और निष्कासन प्रक्रिया (मुख्य निर्वाचन आयुक्त के लिए संसदीय महाभियोग जैसी प्रक्रिया, अन्य आयुक्तों के लिए मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा) का विस्तृत वर्णन करें।
3. एक सदस्यीय से बहु-सदस्यीय निकाय में परिवर्तन: 1989 और 1993 के परिवर्तनों का ऐतिहासिक संदर्भ दें। 1989 में पहली बार दो अतिरिक्त आयुक्तों की नियुक्ति और फिर 1990 में एक सदस्यीय स्थिति में वापसी, तथा 1993 में स्थायी रूप से बहु-सदस्यीय निकाय बनने का उल्लेख करें।
4. स्वायत्तता और दक्षता पर प्रभाव: बहु-सदस्यीय निकाय के लाभ (निर्णय लेने में सामूहिक बुद्धिमत्ता, शक्ति का विकेंद्रीकरण, मुख्य निर्वाचन आयुक्त की शक्ति पर नियंत्रण, अधिक पारदर्शिता) और संभावित चुनौतियाँ (निर्णय लेने में देरी, आंतरिक मतभेद, मुख्य निर्वाचन आयुक्त की भूमिका का कमजोर होना) का विश्लेषण करें।
5. निष्कर्ष: निर्वाचन आयोग की महत्वपूर्ण भूमिका को दोहराते हुए, इसकी स्वायत्तता और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए आवश्यक उपायों पर संक्षिप्त टिप्पणी करें, जैसे नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार और सभी सदस्यों के लिए समान सुरक्षा की आवश्यकता।

स्रोत: The Indian Express


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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