COP31 में भारत का तीन स्तंभों वाला जलवायु दृष्टिकोण: अनुकूलन, शमन और साधन

COP31 में भारत का तीन स्तंभों वाला जलवायु दृष्टिकोण: अनुकूलन, शमन और साधन

COP31 में भारत का तीन स्तंभों वाला जलवायु दृष्टिकोण: अनुकूलन, शमन और साधन

जलवायु कार्रवाई के तीन स्तंभअनुकूलनशमनपरिभाषामौजूदा प्रभावों के अनुसार समायोजनग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमीउद्देश्यजलवायु प्रभावों से निपटनाग्लोबल वार्मिंग को सीमित करनाउदाहरणबाढ़ प्रतिरोधी बुनियादी ढांचानवीकरणीय ऊर्जा अपनानाआवश्यक संसाधनस्थानीय क्षमता निर्माणतकनीकी नवाचारअंतर्राष्ट्रीय सहयोगजलवायु वित्ततकनीकी हस्तांतरण
जलवायु कार्रवाई के तीन स्तंभ

✎ जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अनुकूलन, शमन और कार्यान्वयन के साधनों पर समान ध्यान देना आवश्यक है, जिसमें विकासशील देशों के लिए पर्याप्त जलवायु वित्त और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण महत्वपूर्ण है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — पर्यावरण और पारिस्थितिकी  |  GS Paper II — अंतर्राष्ट्रीय संबंध
  • Prelims: COP31, जलवायु परिवर्तन, अनुकूलन, शमन, कार्यान्वयन के साधन, जलवायु वित्त, हरित जलवायु कोष, पेरिस समझौता
  • Essay: जलवायु परिवर्तन से निपटने में वैश्विक सहयोग की चुनौतियाँ और अवसर, विकासशील देशों के लिए जलवायु न्याय का महत्व

त्वरित पुनरावृत्ति: जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अनुकूलन, शमन और कार्यान्वयन के साधनों पर समान ध्यान देना आवश्यक है, जिसमें विकासशील देशों के लिए पर्याप्त जलवायु वित्त और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण महत्वपूर्ण है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

भारत ने आगामी COP31 (कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज) से पहले आयोजित बैठक में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अनुकूलन (Adaptation), शमन (Mitigation) और कार्यान्वयन के साधनों (Means of Implementation) पर समान ध्यान देने का आह्वान किया है। भारत ने इस बात पर जोर दिया कि जलवायु कार्रवाई के इन तीनों स्तंभों को संतुलित तरीके से आगे बढ़ाना आवश्यक है, विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए पर्याप्त जलवायु वित्त (Climate Finance) और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (Technology Transfer) सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है।

पृष्ठभूमि

  • जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक चुनौती है, जिसके प्रभावों को कम करने और उनसे निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग आवश्यक है।
  • COP संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) के तहत निर्णय लेने वाला सर्वोच्च निकाय है, जो हर साल मिलता है।
  • पेरिस समझौता (Paris Agreement) (2015) जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए एक ऐतिहासिक अंतर्राष्ट्रीय संधि है, जिसका लक्ष्य वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 2°C से काफी नीचे और 1.5°C तक सीमित रखना है।
  • अनुकूलन का अर्थ है जलवायु परिवर्तन के मौजूदा या अपेक्षित प्रभावों के अनुसार समायोजन करना, जबकि शमन का अर्थ है ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना।
  • कार्यान्वयन के साधन में जलवायु वित्त, प्रौद्योगिकी विकास और हस्तांतरण, और क्षमता निर्माण शामिल हैं, जो विकासशील देशों को जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करते हैं।
  • विकासशील देश अक्सर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, लेकिन उनके पास अनुकूलन और शमन के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं होते हैं, इसलिए उन्हें विकसित देशों से समर्थन की आवश्यकता होती है।

जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में अनुकूलन, शमन और कार्यान्वयन के साधन

  • अनुकूलन (Adaptation): इसका तात्पर्य जलवायु परिवर्तन के वास्तविक या अपेक्षित प्रभावों के प्रति समायोजन करना है। इसमें ऐसे उपाय शामिल हैं जो समाजों और पारिस्थितिक तंत्रों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अधिक लचीला बनाते हैं, जैसे बाढ़ सुरक्षा में सुधार, सूखा प्रतिरोधी फसलों का विकास, और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियाँ।
  • शमन (Mitigation): यह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने या उन्हें वायुमंडल से हटाने के प्रयासों को संदर्भित करता है। इसमें जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना, नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देना, ऊर्जा दक्षता में सुधार करना और वनीकरण जैसे उपाय शामिल हैं।
  • कार्यान्वयन के साधन (Means of Implementation): ये वे उपकरण और तंत्र हैं जो देशों को, विशेष रूप से विकासशील देशों को, उनके जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने में सक्षम बनाते हैं। इसमें मुख्य रूप से जलवायु वित्त, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और क्षमता निर्माण शामिल हैं।
  • जलवायु वित्त (Climate Finance): यह स्थानीय, राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय वित्तपोषण को संदर्भित करता है जो जलवायु परिवर्तन के शमन और अनुकूलन कार्यों का समर्थन करता है। विकसित देशों ने विकासशील देशों को प्रति वर्ष 100 बिलियन डॉलर प्रदान करने का वादा किया है, लेकिन यह लक्ष्य अभी तक पूरी तरह से प्राप्त नहीं हुआ है।
  • प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (Technology Transfer): इसमें जलवायु-अनुकूल प्रौद्योगिकियों और ज्ञान को विकसित से विकासशील देशों में स्थानांतरित करना शामिल है, ताकि वे अपने उत्सर्जन को कम कर सकें और जलवायु प्रभावों के अनुकूल हो सकें।
  • क्षमता निर्माण (Capacity Building): यह विकासशील देशों में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए आवश्यक ज्ञान, कौशल और संस्थागत क्षमताओं को विकसित करने में मदद करता है।
  • भारत का रुख: भारत लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि जलवायु परिवर्तन की ऐतिहासिक जिम्मेदारी विकसित देशों की है और उन्हें विकासशील देशों को पर्याप्त वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करनी चाहिए ताकि वे अपने जलवायु लक्ष्यों को पूरा कर सकें।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
अनुकूलन (Adaptation) जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने और उन्हें कम करने के लिए समुदायों और प्रणालियों की क्षमता बढ़ाना। यह विशेष रूप से कमजोर देशों के लिए महत्वपूर्ण है।
शमन (Mitigation) ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने और जलवायु परिवर्तन के मूल कारणों को संबोधित करने के प्रयास। इसमें नवीकरणीय ऊर्जा को अपनाना और ऊर्जा दक्षता में सुधार शामिल है।
कार्यान्वयन के साधन (Means of Implementation) जलवायु कार्रवाई के लिए आवश्यक वित्तीय, तकनीकी और क्षमता-निर्माण सहायता प्रदान करना। विकासशील देशों के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण है।
समान ध्यान भारत का यह आह्वान कि अनुकूलन, शमन और कार्यान्वयन के साधनों को समान प्राथमिकता दी जाए, ताकि जलवायु परिवर्तन से समग्र रूप से निपटा जा सके और विकासशील देशों की चिंताओं को दूर किया जा सके।
COP31 की तैयारी यह प्री-COP31 बैठक आगामी COP31 शिखर सम्मेलन के लिए एजेंडा निर्धारित करने और सदस्य देशों के बीच आम सहमति बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

महत्व

पर्यावरणीय महत्व

  • जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए एक संतुलित दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है, जहां शमन के साथ-साथ अनुकूलन भी आवश्यक है, विशेषकर उन क्षेत्रों के लिए जो पहले से ही जलवायु प्रभावों का सामना कर रहे हैं।
  • ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी लाने और वैश्विक तापमान वृद्धि को सीमित करने के प्रयासों को बल देता है, जो पेरिस समझौते के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण है।

आर्थिक महत्व

  • विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन और शमन के लिए आवश्यक वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करने पर जोर देता है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिरता और विकास सुनिश्चित हो सके।
  • स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों और जलवायु-लचीले बुनियादी ढांचे में निवेश को बढ़ावा देता है, जो नई आर्थिक अवसरों का सृजन कर सकता है और दीर्घकालिक आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) को बढ़ावा दे सकता है।

रणनीतिक महत्व

  • भारत की वैश्विक जलवायु नेतृत्व की भूमिका को मजबूत करता है, जो विकासशील देशों की चिंताओं और जरूरतों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और बहुपक्षीय वार्ताओं को बढ़ावा देता है, जो जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौती से निपटने के लिए आवश्यक है।

सामाजिक महत्व

  • जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से सबसे कमजोर समुदायों की रक्षा करने पर जोर देता है, जिससे खाद्य सुरक्षा, जल सुरक्षा और आजीविका की स्थिरता सुनिश्चित होती है।
  • जलवायु न्याय (Climate Justice) के सिद्धांत को बढ़ावा देता है, जिसके तहत ऐतिहासिक रूप से कम उत्सर्जन करने वाले विकासशील देशों को जलवायु कार्रवाई के लिए समर्थन मिलना चाहिए।

चुनौतियाँ

1. वित्तपोषण की कमी

  • विकासशील देशों को अनुकूलन और शमन प्रयासों के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधनों की भारी कमी का सामना करना पड़ता है।
  • विकसित देशों द्वारा जलवायु वित्त (Climate Finance) प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में लगातार देरी और अपर्याप्तता एक बड़ी चुनौती है।

2. प्रौद्योगिकी हस्तांतरण का अभाव

  • विकासशील देशों के पास अक्सर जलवायु-लचीली प्रौद्योगिकियों और स्वच्छ ऊर्जा समाधानों तक पहुंच नहीं होती है।
  • विकसित देशों से प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (Technology Transfer) की धीमी गति और उच्च लागत एक बाधा है।

3. क्षमता निर्माण की आवश्यकता

  • कई विकासशील देशों में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का आकलन करने, योजना बनाने और प्रभावी ढंग से प्रतिक्रिया देने के लिए संस्थागत और मानव क्षमता की कमी है।
  • प्रशिक्षण, शिक्षा और जागरूकता कार्यक्रमों की आवश्यकता है ताकि स्थानीय स्तर पर जलवायु कार्रवाई को मजबूत किया जा सके।

4. अनुकूलन और शमन के बीच संतुलन

  • अंतर्राष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं में अक्सर शमन पर अधिक ध्यान केंद्रित किया जाता है, जबकि अनुकूलन को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं मिलती है।
  • विकासशील देशों के लिए, अनुकूलन तत्काल आवश्यकता है, जबकि शमन एक दीर्घकालिक लक्ष्य है।

5. राष्ट्रीय हित और वैश्विक लक्ष्य

  • प्रत्येक देश के अपने राष्ट्रीय हित और विकास प्राथमिकताएं होती हैं, जो कभी-कभी वैश्विक जलवायु लक्ष्यों के साथ संघर्ष कर सकती हैं।
  • जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना कई देशों के लिए एक कठिन आर्थिक और राजनीतिक चुनौती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
जलवायु वित्त की कमी विकासशील देशों को अनुकूलन और शमन के लिए पर्याप्त धन नहीं मिल रहा है, जिससे उनकी जलवायु कार्रवाई बाधित हो रही है।
प्रौद्योगिकी पहुंच स्वच्छ और जलवायु-लचीली प्रौद्योगिकियों का हस्तांतरण धीमा है, जिससे विकासशील देशों की क्षमता सीमित हो रही है।
क्षमता निर्माण का अभाव जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए आवश्यक ज्ञान, कौशल और संस्थागत ढांचे की कमी है।
अनुकूलन पर कम ध्यान अंतर्राष्ट्रीय वार्ताओं में शमन पर अधिक जोर दिया जाता है, जबकि जलवायु प्रभावों से निपटने के लिए अनुकूलन की उपेक्षा की जाती है।
न्यायसंगत संक्रमण जीवाश्म ईंधन से दूर जाने से प्रभावित श्रमिकों और समुदायों के लिए एक न्यायसंगत और समावेशी संक्रमण सुनिश्चित करना।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (National Green Hydrogen Mission)
  • राष्ट्रीय सौर मिशन (National Solar Mission)
  • राष्ट्रीय पवन-सौर हाइब्रिड नीति (National Wind-Solar Hybrid Policy)
  • जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (National Action Plan on Climate Change – NAPCC)

आगे की राह

  • विकसित देशों को जलवायु वित्त के अपने वादों को पूरा करना चाहिए और अनुकूलन के लिए पर्याप्त और अनुमानित सहायता प्रदान करनी चाहिए।
  • जलवायु-लचीली प्रौद्योगिकियों का तेजी से हस्तांतरण और विकासशील देशों में उनके स्थानीयकरण को बढ़ावा देना चाहिए।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना करने के लिए विकासशील देशों की संस्थागत और मानव क्षमता को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
  • शमन और अनुकूलन प्रयासों के बीच एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, जिसमें दोनों को समान प्राथमिकता दी जाए।
  • हानि और क्षति (Loss and Damage) के लिए एक प्रभावी तंत्र स्थापित करना चाहिए, ताकि जलवायु परिवर्तन के अपरिहार्य प्रभावों से प्रभावित देशों की मदद की जा सके।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और बहुपक्षीय वार्ताओं को मजबूत करना चाहिए ताकि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए एक साझा और न्यायसंगत समाधान खोजा जा सके।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

जलवायु परिवर्तन · अनुकूलन · शमन · कार्यान्वयन के साधन · COP31 · राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) · जलवायु वित्त · हरित प्रौद्योगिकी हस्तांतरण · विकासशील देश · पर्यावरण संरक्षण

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 51 (क) (छ): पर्यावरण की रक्षा और सुधार
  • अनुच्छेद 48 (क): पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन

अवधारणा प्रवाह

जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव  →  अनुकूलन, शमन और कार्यान्वयन के साधनों की आवश्यकता  →  भारत द्वारा समान ध्यान का आह्वान  →  प्री-COP31 में चर्चा और आम सहमति  →  वैश्विक जलवायु कार्रवाई को बढ़ावा  →  विकासशील देशों की चिंताओं का समाधान

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अनुकूलन (Adaptation) का अर्थ जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना है।
2. शमन (Mitigation) का अर्थ जलवायु परिवर्तन के मौजूदा या अपेक्षित प्रभावों के प्रति समायोजन करना है।
3. कार्यान्वयन के साधन (Means of Implementation) में जलवायु वित्त, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और क्षमता निर्माण शामिल हैं।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल एक — कथन 1 गलत है। अनुकूलन का अर्थ जलवायु परिवर्तन के मौजूदा या अपेक्षित प्रभावों के प्रति समायोजन करना है। कथन 2 गलत है। शमन का अर्थ जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना है। कथन 3 सही है। कार्यान्वयन के साधन में जलवायु वित्त, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और क्षमता निर्माण शामिल हैं, जो विकासशील देशों को जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करते हैं।

Q2. भारत ने प्री-COP31 बैठक में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अनुकूलन, शमन और कार्यान्वयन के साधनों पर समान ध्यान देने का आह्वान किया है। इस संदर्भ में, ‘राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (Nationally Determined Contributions – NDC)’ शब्द का सबसे अच्छा वर्णन क्या है?

  1. यह विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों को प्रदान की जाने वाली वार्षिक जलवायु वित्त की राशि है।
  2. यह एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है जो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी लक्ष्य निर्धारित करता है।
  3. यह प्रत्येक देश द्वारा स्वेच्छा से निर्धारित जलवायु कार्रवाई योजना है, जिसमें उत्सर्जन में कमी के लक्ष्य और अनुकूलन उपाय शामिल हैं।
  4. यह एक तंत्र है जो जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले नुकसान और क्षति के लिए मुआवजा प्रदान करता है।

उत्तर: यह प्रत्येक देश द्वारा स्वेच्छा से निर्धारित जलवायु कार्रवाई योजना है, जिसमें उत्सर्जन में कमी के लक्ष्य और अनुकूलन उपाय शामिल हैं। — राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) पेरिस समझौते के तहत प्रत्येक देश द्वारा स्वेच्छा से निर्धारित जलवायु कार्रवाई योजना है। इसमें ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी के लक्ष्य, अनुकूलन उपाय और कार्यान्वयन के साधन शामिल हो सकते हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ जलवायु परिवर्तन से निपटने में अनुकूलन, शमन और कार्यान्वयन के साधनों के बीच संतुलन स्थापित करने की भारत की मांग का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इस संदर्भ में, विकासशील देशों के लिए ‘जलवायु न्याय’ के महत्व पर भी प्रकाश डालिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** जलवायु परिवर्तन की वैश्विक चुनौती और भारत की ‘अनुकूलन, शमन और कार्यान्वयन के साधन’ पर समान ध्यान देने की मांग का संक्षिप्त परिचय।
2. **अनुकूलन का महत्व:** भारत जैसे विकासशील देशों के लिए अनुकूलन की आवश्यकता (उदाहरण: कृषि, जल सुरक्षा, तटीय क्षेत्रों पर प्रभाव) और इसके लिए वित्तपोषण की कमी।
3. **शमन की भूमिका:** ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के वैश्विक प्रयासों में भारत का योगदान (उदाहरण: राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन, नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य) और ‘सामान्य लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों’ (Common But Differentiated Responsibilities – CBDR) के सिद्धांत पर जोर।
4. **कार्यान्वयन के साधनों की अनिवार्यता:** जलवायु वित्त (Climate Finance), प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (Technology Transfer) और क्षमता निर्माण (Capacity Building) की महत्वपूर्ण भूमिका, विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए। विकसित देशों की प्रतिबद्धताओं का उल्लेख।
5. **संतुलन की आवश्यकता:** तीनों घटकों पर समान ध्यान क्यों आवश्यक है, इसका विश्लेषण। केवल शमन पर ध्यान केंद्रित करने से विकासशील देशों पर पड़ने वाले अनुचित बोझ पर चर्चा।
6. **जलवायु न्याय (Climate Justice):** ऐतिहासिक उत्सर्जन, विकासशील देशों की भेद्यता और विकसित देशों की नैतिक जिम्मेदारी के संदर्भ में जलवायु न्याय की अवधारणा को परिभाषित करें। यह बताएं कि कैसे समान ध्यान की मांग जलवायु न्याय के सिद्धांत से जुड़ी है।
7. **निष्कर्ष:** भारत की मांग का वैश्विक जलवायु वार्ता पर प्रभाव और एक न्यायसंगत तथा प्रभावी वैश्विक प्रतिक्रिया के लिए इसका महत्व।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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