08 Oct यूएनएफसीसीसी सीओपी31 में भारत ने क्या मांगी? जानिए प्रमुख मुद्दे
✎ भारत लचीलेपन, व्यावहारिकता और आपसी सम्मान के साथ महत्वाकांक्षी और संतुलित जलवायु परिणामों की वकालत कर रहा है, जो वैश्विक जलवायु न्याय और विकासशील देशों की चिंताओं को प्राथमिकता देता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS पेपर II — अंतर्राष्ट्रीय संबंध | GS पेपर III — पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी
- Prelims: UNFCCC, COP31, जलवायु परिवर्तन, पेरिस समझौता, राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs), जलवायु वित्त, हानि और क्षति
- Essay: जलवायु परिवर्तन से निपटने में भारत की भूमिका और चुनौतियाँ, वैश्विक जलवायु न्याय और विकासशील देशों की आकांक्षाएँ
त्वरित पुनरावृत्ति: भारत लचीलेपन, व्यावहारिकता और आपसी सम्मान के साथ महत्वाकांक्षी और संतुलित जलवायु परिणामों की वकालत कर रहा है, जो वैश्विक जलवायु न्याय और विकासशील देशों की चिंताओं को प्राथमिकता देता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
भारत ने महत्वाकांक्षी और संतुलित परिणाम सुरक्षित करने के लिए लचीलेपन, व्यावहारिकता और आपसी सम्मान का आह्वान किया है। यह आह्वान वैश्विक जलवायु कार्रवाई में सभी देशों, विशेषकर विकासशील देशों की चिंताओं और क्षमताओं को ध्यान में रखते हुए एक समावेशी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर बल देता है। भारत का मानना है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए एक सहयोगात्मक और न्यायसंगत ढाँचा आवश्यक है, जो ऐतिहासिक जिम्मेदारियों और विभिन्न राष्ट्रीय परिस्थितियों को स्वीकार करे।
पृष्ठभूमि
- जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक चुनौती है जिसके लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता है। संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) इस सहयोग का प्राथमिक मंच है।
- UNFCCC के तहत, सदस्य देश नियमित रूप से कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज (COP) में मिलते हैं ताकि जलवायु परिवर्तन से निपटने के उपायों पर चर्चा और निर्णय लिया जा सके।
- पेरिस समझौता (Paris Agreement), जो 2015 में COP21 में अपनाया गया था, एक ऐतिहासिक समझौता है जिसका उद्देश्य वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 2 डिग्री सेल्सियस से काफी नीचे रखना और 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के प्रयासों को जारी रखना है।
- समझौते के तहत, प्रत्येक देश अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) प्रस्तुत करता है, जो जलवायु कार्रवाई के लिए उनकी प्रतिबद्धताओं को दर्शाता है।
- विकासशील देशों के लिए जलवायु वित्त (Climate Finance), प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और क्षमता निर्माण महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, क्योंकि उन्हें जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने और कम कार्बन वाली अर्थव्यवस्थाओं में संक्रमण के लिए संसाधनों की आवश्यकता होती है।
- हानि और क्षति (Loss and Damage) की अवधारणा भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, जो उन देशों को मुआवजा देने से संबंधित है जो जलवायु परिवर्तन के अपरिहार्य प्रभावों से पीड़ित हैं।
UNFCCC COP (कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज) क्या है?
- UNFCCC COP संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन के सर्वोच्च निर्णय लेने वाले निकाय को संदर्भित करता है।
- यह कन्वेंशन के पक्षकारों की वार्षिक बैठक है, जहाँ वे जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए वैश्विक प्रयासों की समीक्षा और प्रगति करते हैं।
- COP का मुख्य उद्देश्य जलवायु परिवर्तन के खतरों का मुकाबला करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया का आकलन करना और उसे आगे बढ़ाना है।
- इन बैठकों में, देश जलवायु लक्ष्यों पर बातचीत करते हैं, नीतियों को अपनाते हैं और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और अनुकूलन के लिए रणनीतियों पर सहमत होते हैं।
- प्रत्येक COP एक विशिष्ट संख्या द्वारा पहचाना जाता है, जो कन्वेंशन के लागू होने के बाद से आयोजित बैठकों की संख्या को दर्शाता है।
- COP के दौरान, विभिन्न कार्य समूह, विशेषज्ञ निकाय और हितधारक भी जलवायु कार्रवाई से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करते हैं।
- यह वैश्विक जलवायु कूटनीति और नीति निर्माण के लिए एक महत्वपूर्ण मंच है, जहाँ राष्ट्र अपने दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं और आम सहमति बनाने का प्रयास करते हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| लचीलापन (Flexibility) | जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए विभिन्न देशों की विविध क्षमताओं और परिस्थितियों को स्वीकार करना। यह सभी पक्षों को अपनी राष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुरूप समाधान खोजने में मदद करता है। |
| व्यावहारिकता (Pragmatism) | यथार्थवादी और प्राप्त करने योग्य लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करना, जो वैज्ञानिक साक्ष्य और तकनीकी व्यवहार्यता पर आधारित हों। यह केवल महत्वाकांक्षी घोषणाओं के बजाय ठोस कार्रवाई को प्राथमिकता देता है। |
| आपसी सम्मान (Mutual Respect) | अंतर्राष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं में सभी देशों की संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों का सम्मान करना। यह विकासशील देशों की चिंताओं और ‘सामान्य लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों’ (Common But Differentiated Responsibilities – CBDR) के सिद्धांत को मान्यता देता है। |
| महत्वाकांक्षी परिणाम (Ambitious Outcomes) | जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों को रोकने के लिए वैश्विक तापमान वृद्धि को सीमित करने हेतु साहसिक लक्ष्य निर्धारित करना। |
| संतुलित परिणाम (Balanced Outcomes) | शमन (Mitigation), अनुकूलन (Adaptation), वित्त (Finance) और हानि एवं क्षति (Loss and Damage) जैसे सभी प्रमुख स्तंभों पर समान प्रगति सुनिश्चित करना, ताकि कोई भी क्षेत्र पीछे न छूटे। |
महत्व
पर्यावरण
- भारत का यह रुख वैश्विक जलवायु कार्रवाई को अधिक समावेशी और प्रभावी बनाने में मदद कर सकता है, जिससे जलवायु परिवर्तन के पर्यावरणीय प्रभावों को कम करने के लिए सामूहिक प्रयास मजबूत होंगे।
- यह विकसित और विकासशील देशों के बीच विश्वास निर्माण को बढ़ावा देता है, जो जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक है।
आर्थिक
- लचीलेपन और व्यावहारिकता पर जोर विकासशील देशों को अपनी आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) को बाधित किए बिना जलवायु प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए आवश्यक स्थान प्रदान करता है।
- संतुलित परिणाम सुनिश्चित करने से जलवायु वित्त (Climate Finance) और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (Technology Transfer) के माध्यम से विकासशील देशों को आर्थिक सहायता मिल सकती है, जिससे वे हरित अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण कर सकें।
सामरिक/अंतर्राष्ट्रीय संबंध
- भारत का यह आह्वान अंतर्राष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं में एक महत्वपूर्ण आवाज के रूप में उसकी स्थिति को मजबूत करता है, जो विकासशील देशों के हितों का प्रतिनिधित्व करता है।
- यह वैश्विक जलवायु शासन में अधिक न्यायसंगत और न्यायपूर्ण दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है, जो अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और बहुपक्षवाद (Multilateralism) के लिए महत्वपूर्ण है।
चुनौतियाँ
1. विकसित और विकासशील देशों के बीच मतभेद
- ऐतिहासिक उत्सर्जन और वर्तमान क्षमताओं को लेकर विकसित और विकासशील देशों के बीच लगातार मतभेद बने हुए हैं।
- जलवायु वित्त और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में विकसित देशों की अनिच्छा एक बड़ी चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: अंतर्राष्ट्रीय संबंध: अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ
2. महत्वाकांक्षा और व्यवहार्यता का संतुलन
- वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आवश्यक कठोर कदम अक्सर देशों की आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकताओं के साथ टकराते हैं।
- राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (Nationally Determined Contributions – NDCs) की अपर्याप्तता वैश्विक लक्ष्यों को प्राप्त करने में बाधा डालती है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण: जलवायु परिवर्तन
3. जलवायु वित्त की कमी
- विकासशील देशों को अनुकूलन और शमन प्रयासों के लिए पर्याप्त जलवायु वित्त उपलब्ध नहीं हो पा रहा है।
- विकसित देशों द्वारा 2020 तक प्रति वर्ष 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर प्रदान करने का वादा अभी तक पूरी तरह से पूरा नहीं हुआ है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: अंतर्राष्ट्रीय वित्त
4. हानि एवं क्षति तंत्र का कार्यान्वयन
- जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली अपरिवर्तनीय हानि और क्षति के लिए एक प्रभावी और न्यायसंगत तंत्र स्थापित करना जटिल है।
- इस तंत्र के लिए वित्तपोषण और परिचालन संबंधी विवरणों पर सहमति बनाना एक बड़ी चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण: आपदा प्रबंधन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| ऐतिहासिक उत्सर्जन की जिम्मेदारी | विकसित देश ऐतिहासिक रूप से अधिक उत्सर्जन के लिए अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करने में हिचकिचाते हैं, जबकि विकासशील देश इस पर जोर देते हैं। |
| जलवायु न्याय (Climate Justice) | जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले विकासशील देशों को पर्याप्त सहायता न मिलना, जबकि वे ऐतिहासिक रूप से कम जिम्मेदार हैं। |
| ऊर्जा संक्रमण की लागत | जीवाश्म ईंधन से नवीकरणीय ऊर्जा में संक्रमण की उच्च लागत विकासशील देशों के लिए एक बड़ी बाधा है। |
| प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में बाधाएँ | हरित प्रौद्योगिकियों तक पहुँच और उनके हस्तांतरण में पेटेंट और बौद्धिक संपदा अधिकार संबंधी मुद्दे चुनौतियाँ पैदा करते हैं। |
| राष्ट्रीय हित बनाम वैश्विक लक्ष्य | प्रत्येक देश के अपने राष्ट्रीय आर्थिक और विकास संबंधी हित होते हैं, जो अक्सर वैश्विक जलवायु लक्ष्यों के साथ संघर्ष करते हैं। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (National Green Hydrogen Mission)
- राष्ट्रीय सौर मिशन (National Solar Mission)
- राष्ट्रीय पवन-सौर हाइब्रिड नीति (National Wind-Solar Hybrid Policy)
आगे की राह
- विकसित देशों को जलवायु वित्त और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के अपने वादों को पूरा करना चाहिए, विशेष रूप से अनुकूलन और हानि एवं क्षति के लिए।
- ‘सामान्य लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों और संबंधित क्षमताओं’ (CBDR-RC) के सिद्धांत को अंतर्राष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं के केंद्र में रखना चाहिए।
- सभी देशों को अपनी राष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुरूप महत्वाकांक्षी लेकिन यथार्थवादी जलवायु कार्य योजनाएँ विकसित करनी चाहिए।
- जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति संवेदनशील समुदायों और पारिस्थितिक तंत्रों के लिए अनुकूलन प्रयासों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
- नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के अनुसंधान और विकास में निवेश बढ़ाना चाहिए तथा उनके वैश्विक प्रसार को सुगम बनाना चाहिए।
- अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और बहुपक्षीय मंचों को मजबूत करना चाहिए ताकि जलवायु परिवर्तन के साझा खतरे से निपटने के लिए सामूहिक कार्रवाई को बढ़ावा मिल सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
जलवायु परिवर्तन · UNFCCC COP31 · राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) · जलवायु वित्त · अनुकूलन · शमन · सामान्य किंतु विभेदित उत्तरदायित्व (CBDR) · जलवायु न्याय · हरित प्रौद्योगिकी · विकासशील देश · विकसित देश · लचीलापन और व्यावहारिकता
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 51 (ग)’, ‘note’: ‘अंतर्राष्ट्रीय कानून और संधि दायित्वों का सम्मान’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 253’, ‘note’: ‘अंतर्राष्ट्रीय समझौतों को लागू करने की शक्ति’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 48A’, ‘note’: ‘पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन’}
अवधारणा प्रवाह
भारत UNFCCC COP31 में लचीलेपन, व्यावहारिकता और आपसी सम्मान का आह्वान करता है। → यह दृष्टिकोण विकसित और विकासशील देशों के बीच की खाई को पाटने का प्रयास करता है। → लक्ष्य महत्वाकांक्षी और संतुलित परिणाम प्राप्त करना है, जिसमें शमन, अनुकूलन, वित्त और हानि एवं क्षति शामिल हैं। → यह वैश्विक जलवायु कार्रवाई को अधिक न्यायसंगत और प्रभावी बनाता है। → परिणामस्वरूप, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और सतत विकास को बढ़ावा देने में मदद मिलती है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. UNFCCC का लक्ष्य वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता को स्थिर करना है ताकि जलवायु प्रणाली में खतरनाक मानवीय हस्तक्षेप को रोका जा सके।
2. क्योटो प्रोटोकॉल UNFCCC के तहत एक कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौता है जो विकसित देशों के लिए उत्सर्जन में कमी के लक्ष्य निर्धारित करता है।
3. पेरिस समझौता, क्योटो प्रोटोकॉल का स्थान लेता है और सभी देशों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) प्रस्तुत करना अनिवार्य बनाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। UNFCCC का मुख्य उद्देश्य ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता को एक ऐसे स्तर पर स्थिर करना है जो जलवायु प्रणाली के साथ खतरनाक मानवीय हस्तक्षेप को रोके। कथन 2 सही है। क्योटो प्रोटोकॉल एक कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौता है जो विकसित देशों के लिए विशिष्ट उत्सर्जन कमी लक्ष्य निर्धारित करता है। कथन 3 सही है। पेरिस समझौता क्योटो प्रोटोकॉल का स्थान लेता है और सभी हस्ताक्षरकर्ता देशों को अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) प्रस्तुत करने के लिए बाध्य करता है, जो उनके जलवायु लक्ष्यों को दर्शाते हैं।
Q2. जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में, ‘सामान्य किंतु विभेदित उत्तरदायित्व और संबंधित क्षमताएं’ (Common But Differentiated Responsibilities and Respective Capabilities – CBDR-RC) सिद्धांत का क्या अर्थ है?
- सभी देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए समान रूप से जिम्मेदारी लेनी चाहिए।
- विकसित देशों को विकासशील देशों की तुलना में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अधिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए, क्योंकि उन्होंने ऐतिहासिक रूप से अधिक उत्सर्जन किया है और उनके पास अधिक क्षमताएं हैं।
- विकासशील देशों को विकसित देशों की तुलना में अधिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए क्योंकि वे भविष्य में अधिक उत्सर्जन करेंगे।
- जलवायु परिवर्तन से निपटने की जिम्मेदारी पूरी तरह से उन देशों पर है जो वर्तमान में सबसे अधिक उत्सर्जन कर रहे हैं।
उत्तर: विकसित देशों को विकासशील देशों की तुलना में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अधिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए, क्योंकि उन्होंने ऐतिहासिक रूप से अधिक उत्सर्जन किया है और उनके पास अधिक क्षमताएं हैं। — CBDR-RC सिद्धांत यह स्वीकार करता है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सभी देशों की सामान्य जिम्मेदारी है, लेकिन उनकी ऐतिहासिक भूमिका और वर्तमान क्षमताओं के कारण उनकी जिम्मेदारियों में अंतर है। यह सिद्धांत विकसित देशों पर अधिक बोझ डालता है क्योंकि उन्होंने औद्योगिक क्रांति के बाद से ग्रीनहाउस गैसों के संचय में अधिक योगदान दिया है और उनके पास तकनीकी और वित्तीय संसाधन अधिक हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) के तहत भारत के ‘लचीलेपन, व्यावहारिकता और आपसी सम्मान’ के आह्वान का विश्लेषण कीजिए। जलवायु परिवर्तन के शमन और अनुकूलन प्रयासों में विकासशील देशों के सामने आने वाली प्रमुख चुनौतियों पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** UNFCCC COP31 के संदर्भ में भारत के ‘लचीलेपन, व्यावहारिकता और आपसी सम्मान’ के आह्वान का संक्षिप्त परिचय।
2. **भारत के आह्वान का विश्लेषण:**
* **लचीलापन (Flexibility):** राष्ट्रीय परिस्थितियों और विकास प्राथमिकताओं के अनुरूप जलवायु कार्रवाई में भिन्नता की आवश्यकता। एक आकार-सभी के लिए उपयुक्त दृष्टिकोण से बचना।
* **व्यावहारिकता (Pragmatism):** यथार्थवादी और प्राप्त करने योग्य लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करना, केवल महत्वाकांक्षी लेकिन अव्यावहारिक वादों से बचना। प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और क्षमता निर्माण जैसे ठोस समाधानों पर जोर।
* **आपसी सम्मान (Mutual Respect):** विकसित और विकासशील देशों के बीच विश्वास और सहयोग को बढ़ावा देना। ‘सामान्य किंतु विभेदित उत्तरदायित्व’ (CBDR-RC) सिद्धांत का सम्मान।
* **संतुलित परिणाम (Balanced Outcomes):** शमन (Mitigation), अनुकूलन (Adaptation), हानि और क्षति (Loss and Damage) तथा जलवायु वित्त (Climate Finance) के बीच संतुलन स्थापित करना।
3. **विकासशील देशों के सामने चुनौतियाँ:**
* **जलवायु वित्त की कमी:** विकसित देशों द्वारा 100 अरब डॉलर के वादे को पूरा न करना, अनुकूलन के लिए अपर्याप्त वित्त।
* **प्रौद्योगिकी हस्तांतरण का अभाव:** हरित प्रौद्योगिकियों तक पहुंच और उनके हस्तांतरण में बाधाएं।
* **क्षमता निर्माण की कमी:** जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए आवश्यक संस्थागत और मानव क्षमता का अभाव।
* **ऐतिहासिक उत्तरदायित्व का बोझ:** विकसित देशों के ऐतिहासिक उत्सर्जन के कारण विकासशील देशों पर असमान बोझ।
* **विकास प्राथमिकताएं बनाम जलवायु कार्रवाई:** गरीबी उन्मूलन और आर्थिक विकास की तात्कालिक आवश्यकताओं और जलवायु कार्रवाई के बीच संतुलन बनाना।
* **जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभाव:** चरम मौसमी घटनाओं और समुद्र स्तर में वृद्धि के प्रति उच्च भेद्यता।
4. **निष्कर्ष:** एक न्यायसंगत और प्रभावी वैश्विक जलवायु कार्रवाई के लिए भारत के दृष्टिकोण का महत्व और विकासशील देशों की चुनौतियों का समाधान करने की आवश्यकता पर बल।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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