संयुक्त राष्ट्र में भारत ने अपने लोकतंत्र को बदनाम करने के प्रयासों का किया खंडन

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संयुक्त राष्ट्र में भारत ने अपने लोकतंत्र को बदनाम करने के प्रयासों का किया खंडन

भारत बनाम संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार तंत्रभारत का पक्षसंयुक्त राष्ट्र तंत्रमानवाधिकार हस्तक्षेपअस्वीकार्य हस्तक्षेपअंतरराष्ट्रीय तंत्रआंतरिक मामलेघरेलू अधिकार क्षेत्रसार्वभौमिक निगरानीप्रतिक्रिया प्रक्रियास्थापित माध्यमों से स्पष्टीकरणरिपोर्ट/आंकड़े आधारितभागीदारीसंवाद आधारित कूटनीतिनियमित समीक्षा (UPR)बलपूर्वक गायब करने संबंधी स्थिICPPED पक्षकार नहीं1980 में कार्य समूह स्थापना
भारत बनाम संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार तंत्र

✎ मानवाधिकार संवाद का आधार तथ्य-सत्यापन, अहस्तक्षेप और चयनरहित दृष्टि होनी चाहिए, क्योंकि विशेष प्रक्रियाओं के निष्कर्ष बाध्यकारी निर्णय नहीं, बल्कि सिफ़ारिशें और सूचना-आधारित प्रतिवेदन होते हैं।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — अंतरराष्ट्रीय संबंध (संयुक्त राष्ट्र, मानवाधिकार तंत्र, भारत की विदेश नीति)  |  GS Paper II — शासन एवं संविधान (मौलिक अधिकार, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग)
  • Prelims: संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति (Third Committee: सामाजिक, मानवीय एवं सांस्कृतिक मामले), मानवाधिकार परिषद (UN Human Rights Council), विशेष प्रक्रियाएँ (Special Procedures) और कार्य समूह (Working Groups), बलपूर्वक गायब किए जाने पर कार्य समूह (Working Group on Enforced or Involuntary Disappearances), मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR), संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(7) — घरेलू क्षेत्राधिकार, सार्वभौधिक आवधिक समीक्षा (UPR), मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC)
  • Essay: मानवाधिकार का वैश्विक संरक्षण बनाम राष्ट्रीय संप्रभुता: रचनात्मक संवाद कैसे संभव है?, तथ्य-सत्यापन और चयनात्मकता: अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विमर्श की विश्वसनीयता का प्रश्न

त्वरित पुनरावृत्ति: मानवाधिकार संवाद का आधार तथ्य-सत्यापन, अहस्तक्षेप और चयनरहित दृष्टि होनी चाहिए, क्योंकि विशेष प्रक्रियाओं के निष्कर्ष बाध्यकारी निर्णय नहीं, बल्कि सिफ़ारिशें और सूचना-आधारित प्रतिवेदन होते हैं।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति में ‘बलपूर्वक गायब किए जाने पर कार्य समूह’ से संबंधित एजेंडा मद पर अपना पक्ष रखा। भारतीय विदेश मंत्रालय की उप सचिव बरखा तमराकार ने कहा कि मानवाधिकारों का उपयोग राजनीतिक दबाव या देशों के चयनात्मक लक्ष्यीकरण के साधन के रूप में नहीं होना चाहिए। भारत ने सत्यापित न किए गए आरोपों, अपूर्ण आँकड़ों और ऐसी रिपोर्टों को, जिनमें भारत से संबंधित कोई देश-पर्यवेक्षण नहीं है, देश की ‘नकारात्मक छवि’ गढ़ने के प्रयास के रूप में चिह्नित किया। यह प्रतिक्रिया दिल्ली में हुए युवा-नेतृत्व वाले प्रदर्शनों के संबंध में जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र के 20 से अधिक मानवाधिकार विशेषज्ञों और मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय की चिंताओं के बाद आई है। भारत ने इन टिप्पणियों को ‘अनुचित’ और आंतरिक मामलों में ‘अस्वीकार्य हस्तक्षेप’ बताया है, जबकि साथ ही उसने पुष्ट मामलों को स्थापित माध्यमों से स्पष्ट करने की तैयारी भी जताई है।

पृष्ठभूमि

  • संयुक्त राष्ट्र में बलपूर्वक गायब किए जाने पर कार्य समूह की स्थापना 1980 में तत्कालीन मानवाधिकार आयोग के अंतर्गत हुई थी। अब यह मानवाधिकार परिषद के विशेष प्रक्रिया तंत्र का हिस्सा है। इसके सदस्य स्वतंत्र विशेषज्ञ होते हैं, जो किसी सरकार के कर्मचारी नहीं होते।
  • संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1992 में बलपूर्वक गायब किए जाने से सभी व्यक्तियों के संरक्षण संबंधी घोषणा को अपनाया था। भारत इस संबंध की अंतरराष्ट्रीय अभिसमय (ICPPED) का पक्षकार नहीं है।
  • भारत की मानवाधिकार नीति का आधार संविधान के भाग III में निहित मौलिक अधिकार हैं, विशेषकर अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 22 (गिरफ़्तारी और निरोध से संरक्षण)। अनुच्छेद 51(ग) राज्य को अंतरराष्ट्रीय विधि और संधि-दायित्वों के सम्मान की दिशा में कार्य करने का निर्देश देता है।
  • सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा (UPR) भारत के लिए ऐसा मंच है, जहाँ सदस्य देश एक-दूसरे के मानवाधिकार रिकॉर्ड पर संवाद करते हैं। भारत इस प्रक्रिया में नियमित रूप से भाग लेता रहा है। इस संदर्भ में भारत का यह तर्क है कि संवाद परामर्श, सहयोग और पारदर्शिता पर आधारित होना चाहिए।
  • संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(7) संयुक्त राष्ट्र को उन मामलों में हस्तक्षेप करने से रोकता है, जो मूलतः किसी राज्य के घरेलू क्षेत्राधिकार में आते हैं। इसी सिद्धांत पर भारत ने अहस्तक्षेप का तर्क रखा है।

संयुक्त राष्ट्र का मानवाधिकार तंत्र क्या है और इसमें भारत का रुख किस आधार पर टिका है?

  • मानवाधिकार परिषद संयुक्त राष्ट्र का अंतर-सरकारी निकाय है, जो मानवाधिकारों के संवर्धन और संरक्षण पर चर्चा करता है। यह महासभा के अधीन कार्य करता है।
  • विशेष प्रक्रियाएँ (Special Procedures) स्वतंत्र विशेषज्ञों, विशेष प्रतिवेदकों (Special Rapporteurs) और कार्य समूहों का समूह हैं। ये किसी विशेष विषय या देश की स्थिति पर रिपोर्ट देते हैं, परंतु इनके निष्कर्ष बाध्यकारी निर्णय नहीं होते।
  • ‘मानवीय संचार’ (humanitarian communication) वह औपचारिक पत्राचार है, जिसके माध्यम से विशेषज्ञ किसी राज्य से किसी घटना पर सूचना या स्पष्टीकरण माँगते हैं। भारत का तर्क है कि ऐसे पत्राचार को ‘निर्णय’ के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।
  • तथ्य-सत्यापन का सिद्धांत यह माँगता है कि आरोप प्रमाणित साक्ष्य पर आधारित हों और रिपोर्ट में संबंधित देश की प्रतिक्रिया भी सम्मिलित हो। ‘देश-पर्यवेक्षण’ का अभाव इसी दृष्टि से उठाई गई आपत्ति है।
  • चयनात्मकता (Selectivity) का प्रश्न यह है कि क्या मानवाधिकार संबंधी जाँच सभी देशों पर समान मानदंडों से लागू होती है। भारत जैसे देश इसे विश्वसनीयता की शर्त मानते हैं।
  • घरेलू स्तर पर मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के अंतर्गत गठित राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) शिकायतों की जाँच करता है। अनुच्छेद 253 के अंतर्गत संसद अंतरराष्ट्रीय संधियों के क्रियान्वयन हेतु कानून बना सकती है।
  • सार्वभौमिकता और संप्रभुता के बीच संतुलन ही इस विमर्श का केंद्र है। मानवाधिकारों की सार्वभौमिक प्रकृति और राज्यों के आंतरिक मामलों में अहस्तक्षेप के सिद्धांत के बीच संवाद की प्रक्रिया ही इसका व्यावहारिक समाधान मानी जाती है।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
मानवाधिकार का राजनीतिक दबाव में प्रयोग न होना भारत का मत है कि मानवाधिकार को राजनीतिक दबाव या देशों के चयनात्मक लक्ष्यीकरण का साधन नहीं बनाया जाना चाहिए। इसके लिए संवाद, परामर्श, सहयोग, गैर-चयनात्मकता और पारदर्शिता को मार्गदर्शक सिद्धांत माना गया है।
UN महासभा की तृतीय समिति में भारत का औपचारिक बयान सामाजिक, मानवीय और सांस्कृतिक मामलों से जुड़ी इस समिति में जबरन गुमशुदगी (Enforced Disappearance) पर कार्य समूह की रिपोर्ट के संदर्भ में भारत की स्थिति दर्ज हुई। विदेश मंत्रालय (Ministry of External Affairs) की ओर से यह बयान दिया गया।
रिपोर्ट में ‘देश-अवलोकन’ का अभाव भारत ने कहा कि जिस रिपोर्ट में भारत से संबंधित कोई देश-अवलोकन (Country Observation) नहीं है, उसे भारत पर नकारात्मक निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है। यह तर्क तथ्य-आधारित मूल्यांकन की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
सत्यापित मामलों पर स्पष्टीकरण की पेशकश भारत ने कहा कि वह स्थापित माध्यमों से विशिष्ट और उचित रूप से प्रलेखित मामलों को स्पष्ट करने के लिए तैयार है। यह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार तंत्र के साथ जुड़ने की उसकी नीति का व्यावहारिक रूप है।
युवा-नेतृत्व वाले प्रदर्शनों पर UN विशेषज्ञों की चिंता नई दिल्ली के प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई पर 20 से अधिक UN मानवाधिकार विशेषज्ञों ने चिंता जताई। मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) ने बड़े पैमाने पर हिरासत की रिपोर्टों पर चिंता व्यक्त की। इससे अंतरराष्ट्रीय जांच-पड़ताल और घरेलू कानून-व्यवस्था के बीच संबंध का प्रश्न उठता है।

महत्व

कूटनीतिक (Diplomatic)

  • भारत ने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार तंत्र में भागीदारी को बनाए रखते हुए इसकी कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाया है, जो उसकी ‘संवाद आधारित’ कूटनीति को दर्शाता है।
  • तृतीय समिति में औपचारिक बयान से यह स्पष्ट हुआ कि भारत अपने आंतरिक मामलों पर बाहरी टिप्पणियों को किन शब्दों में देखता है।
  • सार्वभौमिक मंचों पर तथ्य और प्रक्रिया पर बल देना बहुपक्षीय कूटनीति में भारत की स्थिति को मज़बूत करने का एक साधन है।

मानवाधिकार शासन (Human Rights Governance)

  • मानवाधिकार संरक्षण का मूल दायित्व राष्ट्रीय व्यवस्था पर है। स्थापित घरेलू संस्थाएँ, जैसे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC), ऐसे आरोपों की जांच का प्रथम मंच हैं।
  • सत्यापित शिकायतों के लिए ‘स्थापित माध्यम’ पर बल देना कानून के शासन (Rule of Law) और प्रक्रियात्मक न्याय के सिद्धांत से मेल खाता है।

वैश्विक मानवाधिकार वास्तुकला (Global Human Rights Architecture)

  • संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के विशेष प्रक्रिया तंत्र, जिनमें विशेष प्रतिवेदक और कार्य समूह शामिल हैं, स्वतंत्र विशेषज्ञों के माध्यम से काम करते हैं। इनकी रिपोर्टों की वैधता और उपयोग पर बहस स्वाभाविक है।
  • ‘सूचना’ (communication) और ‘अंतिम निर्णय’ के अंतर को समझना इस विवाद का केंद्र है। विशेषज्ञों की मानवीय अपील को अदालती फैसले के समान नहीं माना जा सकता।

चुनौतियाँ

1. चयनात्मकता और दोहरे मानदंड का आरोप

  • भारत का तर्क है कि कुछ देशों के मामलों में चयनात्मक दृष्टिकोण से मानवाधिकार मुद्दों का उपयोग राजनीतिक दबाव के लिए हो सकता है।
  • सभी देशों पर समान मानदंड लागू करना और सार्वभौमिक समीक्षा प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखना अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की प्रमुख चुनौती है।

2. अप्रमाणित आरोप बनाम तथ्य-आधारित मूल्यांकन

  • ‘अप्रमाणित आरोप’ और ‘अपूर्ण आंकड़े’ पर आधारित निष्कर्ष किसी देश की छवि पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकते हैं।
  • दूसरी ओर, किसी घटना की जांच करने के लिए बाहरी संस्थाओं को सूचना देने का अधिकार भी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का हिस्सा है। दोनों के बीच संतुलन आवश्यक है।

3. शांतिपूर्ण प्रदर्शन और कानून-व्यवस्था का संतुलन

  • संविधान शांतिपूर्ण और निरायुध सभा का अधिकार देता है, परंतु इस पर युक्तियुक्त निर्बंधन भी लगाए जा सकते हैं।
  • प्रदर्शनों के दौरान बल प्रयोग की आनुपातिकता और उसके बाद की जांच पर अंतरराष्ट्रीय ध्यान इस संतुलन की परीक्षा बनता है।

4. हिरासत में प्रक्रियात्मक सुरक्षा का प्रश्न

  • OHCHR द्वारा बड़े पैमाने पर हिरासत की रिपोर्टों पर चिंता व्यक्त की गई है। ऐसे मामलों में गिरफ़्तारी के कारण बताने और न्यायिक समीक्षा की प्रक्रिया की पारदर्शिता महत्त्वपूर्ण है।
  • पत्रकारों, वकीलों और नागरिक समाज संगठनों से जुड़े आरोप विधि के शासन और स्वतंत्र अभिव्यक्ति की व्यवस्था पर प्रश्न उठाते हैं।

5. आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप की सीमा

  • भारत ने टिप्पणियों को ‘अनुचित’ और ‘आंतरिक मामलों में अस्वीकार्य हस्तक्षेप’ कहा है। संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायित्व के बीच संतुलन इसका केंद्रीय प्रश्न है।
  • अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दायित्व स्वीकार करने के बावजूद राष्ट्रीय नीति-निर्माण में स्वायत्तता बनी रहती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
चयनात्मक लक्ष्यीकरण यदि सभी देशों पर समान मानदंड लागू न हों, तो मानवाधिकार संवाद राजनीतिक दबाव का रूप ले सकता है और उसकी विश्वसनीयता घटती है।
अपूर्ण आंकड़े और अप्रमाणित रिपोर्टें सत्यापन के बिना निष्कर्ष निकालने से देश की छवि और द्विपक्षीय संबंधों पर गलत प्रभाव पड़ सकता है।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन में बल प्रयोग आनुपातिकता और जवाबदेही का अभाव मौलिक अधिकारों के हनन की धारणा को जन्म देता है, चाहे वास्तविक स्थिति कुछ भी हो।
बड़े पैमाने पर हिरासत प्रक्रियात्मक सुरक्षा और समय पर न्यायिक समीक्षा के अभाव में व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर गंभीर प्रश्न उठते हैं।
संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही का टकराव आंतरिक मामलों पर बाहरी टिप्पणी को हस्तक्षेप मानने और जवाबदेही की मांग के बीच संवाद का मार्ग संकीर्ण हो जाता है।

आगे की राह

  • प्रदर्शनों के दौरान बल प्रयोग और हिरासत से जुड़े आरोपों की स्वतंत्र, समयबद्ध और पारदर्शी जांच सुनिश्चित की जाए, ताकि तथ्य सार्वजनिक रूप से स्थापित हो सकें।
  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) और राज्य मानवाधिकार आयोगों की स्वतंत्रता तथा संसाधनों को सुदृढ़ किया जाए, ताकि वे घरेलू स्तर पर विश्वसनीय जांच कर सकें।
  • पुलिस के प्रशिक्षण में आनुपातिक बल प्रयोग, गैर-घातक नियंत्रण उपाय और मानवाधिकार-आधारित व्यवहार पर विशेष बल दिया जाए।
  • सत्यापित मामलों में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर स्थापित माध्यमों से तथ्यात्मक स्पष्टीकरण देने की व्यवस्था को नियमित और संस्थागत रूप दिया जाए।
  • अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार तंत्र के साथ संवाद में तथ्य, प्रक्रिया और गैर-चयनात्मकता के सिद्धांतों को सभी पक्षों द्वारा समान रूप से अपनाने पर जोर दिया जाए।
  • मीडिया, वकीलों और नागरिक समाज से जुड़े आरोपों की जांच में पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई जाए, ताकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विधि के शासन दोनों सुरक्षित रहें।
  • अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों और उनके प्रावधानों के बारे में जनता और नीति-निर्माताओं में जागरूकता बढ़ाई जाए, ताकि नीति-विमर्श तथ्य-आधारित हो सके।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

मानवाधिकार (Human Rights) · संप्रभुता (Sovereignty) · चयनात्मकता (Selectivity) · सार्वभौमिक आवर्ती समीक्षा (Universal Periodic Review) · मानवाधिकार परिषद (UN Human Rights Council) · विशेष प्रक्रियाएँ (Special Procedures) · प्रवर्तित गुमशुदगी (Enforced Disappearance) · राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission) · अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 22 · अनुच्छेद 51(ग) (Article 51(c)) · न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) · सार्वभौमिकता बनाम सांस्कृतिक सापेक्षवाद (Universalism vs Cultural Relativism)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 19: शांतिपूर्ण सभा और अभिव्यक्ति का अधिकार
  • अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण
  • अनुच्छेद 22: गिरफ़्तारी और हिरासत में सुरक्षा के उपाय
  • अनुच्छेद 51: अंतरराष्ट्रीय शांति और कानून के प्रति सम्मान

अवधारणा प्रवाह

UN विशेषज्ञों द्वारा प्रदर्शनों और हिरासत पर सूचना तथा चिंता व्यक्त करना  →  मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) द्वारा सार्वजनिक टिप्पणी जारी करना  →  भारत द्वारा आरोपों को अप्रमाणित और टिप्पणियों को अनुचित हस्तक्षेप बताकर खंडन करना  →  UN महासभा की तृतीय समिति में भारत का औपचारिक बयान और रिपोर्ट के उद्धरण पर आग्रह  →  भारत द्वारा सत्यापित और प्रलेखित मामलों पर स्थापित माध्यमों से स्पष्टीकरण की पेशकश  →  अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार तंत्र में संवाद, रिपोर्टिंग और तथ्य-सत्यापन के मानदंडों पर बहस

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संयुक्त राष्ट्र की सार्वभौमिक आवर्ती समीक्षा (Universal Periodic Review) में सभी संयुक्त राष्ट्र सदस्य देशों के मानवाधिकार रिकॉर्ड की समीक्षा होती है।
2. प्रवर्तित गुमशुदगी पर कार्यसमूह (Working Group on Enforced Disappearances) मानवाधिकार परिषद की विशेष प्रक्रियाओं (Special Procedures) का हिस्सा है।
3. भारत प्रवर्तित गुमशुदगी से सभी व्यक्तियों के संरक्षण संबंधी अंतरराष्ट्रीय अभिसमय (ICPPED) का पक्षकार है।

उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: UPR मानवाधिकार परिषद के अंतर्गत प्रत्येक सदस्य देश की समवर्ती (peer) समीक्षा की प्रक्रिया है। कथन 2 सही है: प्रवर्तित गुमशुदगी पर कार्यसमूह एक थीमैटिक विशेष प्रक्रिया है, जिसके विशेषज्ञ स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं। कथन 3 गलत है: भारत ने ICPPED पर न तो हस्ताक्षर किए हैं और न ही उसका पक्षकार है, इसलिए सही उत्तर ‘केवल दो’ है।

Q2. निम्नलिखित में से प्रत्येक में एक अभिकथन (A) और एक कारण (R) दिया गया है।

अभिकथन (A): भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 केवल भारतीय नागरिकों तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत में रहने वाले विदेशी व्यक्तियों पर भी लागू होता है।
कारण (R): अनुच्छेद 21 में ‘नागरिक’ शब्द के स्थान पर ‘व्यक्ति’ (person) शब्द का प्रयोग किया गया है।

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
  2. (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
  3. (A) सही है, किंतु (R) गलत है।
  4. (A) गलत है, किंतु (R) सही है।

उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — अनुच्छेद 21 के अंतर्गत ‘व्यक्ति’ शब्द प्रयुक्त है, इसलिए जीवन और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार विदेशियों को भी प्राप्त है। सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन बनाम अरुणाचल प्रदेश राज्य (1996) में इसकी पुष्टि की। अतः कारण अभिकथन की सही व्याख्या है।

Q3. निम्नलिखित सूचियों को सुमेलित कीजिए:

सूची-I (संस्था/तंत्र)
A. सार्वभौमिक आवर्ती समीक्षा (UPR)
B. प्रवर्तित गुमशुदगी पर कार्यसमूह
C. संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति
D. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (भारत)

सूची-II (कार्य/विशेषता)
1. सभी सदस्य देशों के मानवाधिकार रिकॉर्ड की समवर्ती समीक्षा
2. प्रवर्तित गुमशुदगी के मामलों की जाँच करने वाला थीमैटिक तंत्र
3. सामाजिक, मानवीय और सांस्कृतिक विषयों से संबंधित समिति
4. मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के अंतर्गत स्थापित वैधानिक निकाय

सही सुमेलन चुनिए:

  1. A-1, B-2, C-3, D-4
  2. A-2, B-1, C-3, D-4
  3. A-1, B-2, C-4, D-3
  4. A-3, B-2, C-1, D-4

उत्तर: A-1, B-2, C-3, D-4 — UPR सभी सदस्य देशों की समवर्ती समीक्षा है (A-1)। प्रवर्तित गुमशुदगी पर कार्यसमूह थीमैटिक विशेष प्रक्रिया है (B-2)। महासभा की तीसरी समिति सामाजिक, मानवीय और सांस्कृतिक मामलों को देखती है (C-3)। NHRC मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत गठित वैधानिक निकाय है (D-4)।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार तंत्रों में चयनात्मकता और राजनीतिक दबाव के आरोप मानवाधिकारों की सार्वभौमिकता तथा किसी राष्ट्र की संप्रभुता, दोनों को किस प्रकार प्रभावित करते हैं? समीक्षात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि घरेलू संस्थागत तंत्र, जैसे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और न्यायिक समीक्षा, अंतरराष्ट्रीय आलोचना के प्रति किस प्रकार संतुलित उत्तरदायित्व सुनिश्चित कर सकते हैं? (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल उत्तर संरचना:
1. भूमिका: संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 1(3) में मानवाधिकार संवर्धन का उद्देश्य; 1993 के विएना घोषणापत्र का कथन कि सभी मानवाधिकार सार्वभौमिक, अविभाज्य और परस्पर निर्भर हैं तथा राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं से परे हैं।
2. सार्वभौमिकता बनाम सांस्कृतिक सापेक्षवाद: जैक डोनली (Jack Donnelly) के ‘सापेक्षिक सार्वभौमिकता’ (relative universalism) का विचार; सांस्कृतिक सापेक्षवाद के तर्क और उसकी सीमाएँ।
3. संप्रभुता का पक्ष: चार्टर का अनुच्छेद 2(7) (घरेलू अधिकार क्षेत्र); वेस्टफेलियन संप्रभुता का सिद्धांत; चयनात्मकता से दोहरे मानदंड का आरोप; तथ्यों की जाँच और सत्यापन की आवश्यकता।
4. वैध अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायित्व का पक्ष: UPR, विशेष प्रक्रियाएँ, संधि निकाय; भारत द्वारा मानवाधिकार संधियों की पक्षकारिता तथा अनुच्छेद 51(ग) और अनुच्छेद 253 का संदर्भ।
5. घरेलू तंत्र: अनुच्छेद 21 और 22 के अंतर्गत गिरफ्तारी और हिरासत के संरक्षण; अनुच्छेद 32 और 226 के अंतर्गत न्यायिक उपचार; मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के अंतर्गत NHRC की भूमिका; D.K. Basu बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997) के गिरफ्तारी दिशानिर्देश; Prakash Singh (2006) के पुलिस सुधार निर्देश।
6. समीक्षा: दोनों पक्षों का संतुलन; सहयोग, संवाद और पारदर्शिता के सिद्धांतों पर आधारित सहभागिता का तर्क; निष्कर्ष में सुसंगत स्थिति।

स्रोत: orissapost.com


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