13 Oct तमिलनाडु सरकार ने पल्लिकारनई दलदल क्षेत्र के लिए अंतरिम प्रभाव क्षेत्र को 36 सर्वेक्षण संख्याओं तक सीमित किया
✎ पल्लीकरनई आर्द्रभूमि के अंतरिम प्रभाव क्षेत्र का निर्धारण पर्यावरण संरक्षण और शहरी विकास के बीच संतुलन साधने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है, जो आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 के तहत राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण की भूमिका को…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — पर्यावरण और पारिस्थितिकी | GS Paper II — शासन, नीतियां और हस्तक्षेप
- Prelims: पल्लीकरनई आर्द्रभूमि, आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017, राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT), राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण, प्रभाव क्षेत्र (Zone of Influence), पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986
- Essay: पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन, भारत में आर्द्रभूमि का महत्व और उनके संरक्षण की चुनौतियाँ
त्वरित पुनरावृत्ति: पल्लीकरनई आर्द्रभूमि के अंतरिम प्रभाव क्षेत्र का निर्धारण पर्यावरण संरक्षण और शहरी विकास के बीच संतुलन साधने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है, जो आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 के तहत राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण की भूमिका को दर्शाता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
मद्रास उच्च न्यायालय में तमिलनाडु राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण (TNSWA) ने सूचित किया है कि पल्लीकरनई आर्द्रभूमि के आसपास के अंतरिम प्रभाव क्षेत्र (Zone of Influence – ZoI) को 36 सर्वेक्षण संख्या तक सीमित किया जा सकता है, जिसमें लगभग 128.19 हेक्टेयर भूमि शामिल है। यह कदम राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) द्वारा लगाए गए निर्माण प्रतिबंध से प्रभावित सैकड़ों संपत्ति मालिकों को बड़ी राहत प्रदान करेगा, जिन्होंने आर्द्रभूमि की सीमाओं के एक किलोमीटर के दायरे में निर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया था।
पृष्ठभूमि
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने चेन्नई में पल्लीकरनई आर्द्रभूमि के एक किलोमीटर के दायरे में निर्माण गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया था, जिससे बड़ी संख्या में संपत्ति मालिक प्रभावित हुए थे।
- इस प्रतिबंध को चुनौती देते हुए कई याचिकाकर्ताओं ने मद्रास उच्च न्यायालय का रुख किया, जिसमें रियल एस्टेट डेवलपर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CREDAI) की चेन्नई शाखा भी शामिल है।
- तमिलनाडु राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण (TNSWA) को एक अंतरिम प्रभाव क्षेत्र (ZoI) की पहचान करने का कार्य सौंपा गया था, जो निजी पट्टा भूमि को कम से कम प्रभावित करे।
- TNSWA ने 36 सर्वेक्षण संख्या में लगभग 128.19 हेक्टेयर भूमि की पहचान की है, जिसे अंतिम ZoI अधिसूचित होने तक अंतरिम ZoI घोषित किया जा सकता है।
- अदालत इस मामले में TNSWA की नवीनतम रिपोर्ट की समीक्षा करने के बाद उचित आदेश पारित करेगी।
आर्द्रभूमि और उनका संरक्षण
- आर्द्रभूमि (Wetlands) ऐसे क्षेत्र होते हैं जहाँ पानी पर्यावरण और संबंधित पौधों और जानवरों के जीवन को नियंत्रित करने वाला प्राथमिक कारक होता है। इनमें दलदल, मैंग्रोव, नदियाँ, झीलें, डेल्टा, बाढ़ के मैदान, चावल के खेत और प्रवाल भित्तियाँ शामिल हैं।
- पल्लीकरनई आर्द्रभूमि चेन्नई के सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक आर्द्रभूमियों में से एक है, जो जैव विविधता में समृद्ध है और शहर के लिए एक महत्वपूर्ण जल निकासी बेसिन के रूप में कार्य करती है।
- आर्द्रभूमि पारिस्थितिक तंत्र के लिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे जल शोधन, बाढ़ नियंत्रण, भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता संरक्षण और जलवायु परिवर्तन शमन जैसी कई पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएँ प्रदान करती हैं।
- भारत में आर्द्रभूमि के संरक्षण और प्रबंधन के लिए आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 (Wetlands (Conservation and Management) Rules, 2017) लागू हैं, जो आर्द्रभूमि के उपयोग और उनके आसपास की गतिविधियों को विनियमित करते हैं।
- इन नियमों के तहत, प्रत्येक राज्य में एक राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण (State Wetlands Authority) का गठन किया जाता है, जो आर्द्रभूमि की पहचान, अधिसूचना और संरक्षण योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए जिम्मेदार होता है।
- प्रभाव क्षेत्र (Zone of Influence) एक ऐसा क्षेत्र होता है जो किसी संरक्षित क्षेत्र, जैसे कि आर्द्रभूमि, के आसपास होता है और जहाँ की गतिविधियाँ संरक्षित क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर सकती हैं। इन क्षेत्रों में विकासात्मक गतिविधियों को विनियमित किया जाता है ताकि पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव को कम किया जा सके।
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) भारत में पर्यावरण संरक्षण और वनों तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित मामलों के प्रभावी और त्वरित निपटान के लिए स्थापित एक विशेष निकाय है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| पल्लीकरनई आर्द्रभूमि (Pallikaranai marshland) | चेन्नई में एक महत्वपूर्ण आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र, जो जैव विविधता और जल विनियमन के लिए महत्वपूर्ण है। |
| अंतरिम प्रभाव क्षेत्र (Interim Zone of Influence – ZoI) | आर्द्रभूमि के चारों ओर एक अस्थायी अधिसूचित क्षेत्र जहाँ निर्माण गतिविधियों को विनियमित किया जाता है ताकि पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा की जा सके। |
| राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal – NGT) | पर्यावरण संरक्षण और वनों तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित मामलों के प्रभावी और शीघ्र निपटान के लिए स्थापित एक विशेष निकाय। |
| तमिलनाडु राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण (Tamil Nadu State Wetlands Authority – TNSWA) | राज्य स्तर पर आर्द्रभूमि के संरक्षण, प्रबंधन और विनियमन के लिए जिम्मेदार प्राधिकरण। |
| सर्वेक्षण संख्याएँ (Survey Numbers) | भूमि के विशिष्ट पार्सल की पहचान करने के लिए उपयोग की जाने वाली संख्याएँ, जो किसी क्षेत्र के सटीक सीमांकन में मदद करती हैं। |
महत्व
पर्यावरण संरक्षण
- पल्लीकरनई आर्द्रभूमि चेन्नई के लिए एक महत्वपूर्ण ‘कार्बन सिंक’ और बाढ़ नियंत्रण तंत्र के रूप में कार्य करती है।
- यह कई स्थानिक और प्रवासी पक्षी प्रजातियों सहित विविध वनस्पतियों और जीवों का घर है, जो जैव विविधता संरक्षण के लिए आवश्यक है।
शहरी नियोजन और विकास
- प्रभाव क्षेत्र का निर्धारण शहरी विकास और पारिस्थितिक संतुलन के बीच संतुलन बनाने में मदद करता है।
- यह रियल एस्टेट क्षेत्र को प्रभावित करता है, क्योंकि निर्माण प्रतिबंधों से संपत्ति मालिकों और डेवलपर्स के लिए चुनौतियाँ पैदा होती हैं।
न्यायिक हस्तक्षेप और शासन
- NGT और उच्च न्यायालय का हस्तक्षेप पर्यावरण नियमों के प्रवर्तन और उनके कार्यान्वयन की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) को दर्शाता है।
- राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण की भूमिका पर्यावरण शासन में राज्य-स्तरीय संस्थाओं के महत्व को रेखांकित करती है।
चुनौतियाँ
1. विकास बनाम संरक्षण
- शहरीकरण के दबाव और आर्द्रभूमि के पारिस्थितिक महत्व के बीच संतुलन बनाना एक चुनौती है।
- निर्माण प्रतिबंधों से संपत्ति मालिकों और डेवलपर्स के लिए आर्थिक नुकसान हो सकता है, जिससे विकास और संरक्षण के बीच संघर्ष पैदा होता है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण संरक्षण; सतत विकास
2. सीमांकन और प्रवर्तन
- आर्द्रभूमि के प्रभाव क्षेत्र का सटीक सीमांकन करना और यह सुनिश्चित करना कि नियमों का प्रभावी ढंग से पालन किया जाए, एक जटिल कार्य है।
- अवैध अतिक्रमण और अपशिष्ट डंपिंग जैसे मुद्दों को रोकने के लिए प्रवर्तन तंत्र को मजबूत करने की आवश्यकता है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण शासन; भूमि उपयोग योजना
3. हितधारकों का समन्वय
- स्थानीय समुदायों, संपत्ति मालिकों, डेवलपर्स, सरकारी एजेंसियों और पर्यावरणविदों सहित विभिन्न हितधारकों के हितों को संतुलित करना मुश्किल है।
- सभी पक्षों की चिंताओं को दूर करने के लिए एक समावेशी और सहभागी दृष्टिकोण आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: शासन; हितधारक प्रबंधन
4. वैज्ञानिक डेटा का उपयोग
- प्रभाव क्षेत्र के निर्धारण और विनियमन के लिए साइट-विशिष्ट वैज्ञानिक और हाइड्रोलॉजिकल विशेषताओं पर आधारित विश्वसनीय डेटा की आवश्यकता होती है।
- पर्याप्त वैज्ञानिक जानकारी के बिना निर्णय लेने से अप्रभावी या अनुचित प्रतिबंध हो सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण प्रभाव आकलन; डेटा आधारित नीति निर्माण
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| निर्माण प्रतिबंध | संपत्ति मालिकों और रियल एस्टेट डेवलपर्स के लिए आर्थिक प्रभाव और विकास की बाधाएँ। |
| अवैध अतिक्रमण | आर्द्रभूमि क्षेत्रों में अनधिकृत निर्माण और अतिक्रमण से पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान। |
| अपशिष्ट प्रबंधन | आर्द्रभूमि में ठोस और निर्माण अपशिष्ट के डंपिंग से प्रदूषण और जलमार्गों का अवरोधन। |
| हाइड्रोलॉजिकल व्यवधान | प्राकृतिक जल निकासी चैनलों और जलीय मार्गों को अवरुद्ध करने या मोड़ने से आर्द्रभूमि का क्षरण। |
| पर्याप्त निगरानी का अभाव | नियमों के अनुपालन और आर्द्रभूमि के स्वास्थ्य की निगरानी के लिए प्रभावी तंत्र की कमी। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 (Wetlands (Conservation and Management) Rules, 2017)
आगे की राह
- आर्द्रभूमि के अंतिम प्रभाव क्षेत्र को निर्धारित करने के लिए एक व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन किया जाना चाहिए, जिसमें हाइड्रोलॉजिकल और पारिस्थितिकीय कारकों पर विचार किया जाए।
- स्थानीय समुदायों और अन्य हितधारकों के साथ परामर्श और उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि समाधानों को अधिक स्वीकार्य बनाया जा सके।
- अवैध अतिक्रमण और अपशिष्ट डंपिंग को रोकने के लिए प्रभावी प्रवर्तन तंत्र और निगरानी प्रणालियों को मजबूत किया जाना चाहिए।
- आर्द्रभूमि के संरक्षण के महत्व के बारे में जन जागरूकता बढ़ाई जानी चाहिए ताकि सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा मिल सके।
- पर्यावरण संरक्षण और सतत शहरी विकास के बीच संतुलन साधने के लिए एक एकीकृत भूमि उपयोग योजना दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।
- आर्द्रभूमि के पारिस्थितिक स्वास्थ्य की नियमित निगरानी और मूल्यांकन के लिए एक मजबूत ढाँचा स्थापित किया जाना चाहिए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
आर्द्रभूमि संरक्षण · पर्यावरण संरक्षण अधिनियम · राष्ट्रीय हरित अधिकरण · राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण · पर्यावरण प्रभाव आकलन · सतत विकास · न्यायिक समीक्षा · संघवाद · पारिस्थितिक संतुलन · शहरी नियोजन
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 48क’, ‘note’: ‘पर्यावरण का संरक्षण और सुधार’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 51क (छ)’, ‘note’: ‘प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करना’}
अवधारणा प्रवाह
NGT ने पल्लीकरनई आर्द्रभूमि के चारों ओर निर्माण पर प्रतिबंध लगाया। → संपत्ति मालिकों और डेवलपर्स ने प्रतिबंध को चुनौती दी। → तमिलनाडु राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण ने अंतरिम प्रभाव क्षेत्र प्रस्तावित किया। → उच्च न्यायालय ने प्रस्तावित अंतरिम ZoI पर विचार किया। → यह निर्णय आर्द्रभूमि संरक्षण और शहरी विकास को संतुलित करेगा।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017, केंद्र सरकार को आर्द्रभूमियों के संरक्षण और प्रबंधन के लिए एक नियामक ढाँचा प्रदान करते हैं।
2. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal – NGT) पर्यावरण से संबंधित मामलों में त्वरित न्याय प्रदान करने के लिए स्थापित किया गया है।
3. भारत में आर्द्रभूमियों के ‘ज़ोन ऑफ इन्फ्लुएंस’ का निर्धारण केवल राज्य सरकारें ही कर सकती हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017, आर्द्रभूमियों के संरक्षण और प्रबंधन के लिए एक व्यापक ढाँचा प्रदान करते हैं। कथन 2 सही है। NGT की स्थापना पर्यावरण संरक्षण से संबंधित मामलों के प्रभावी और त्वरित निपटान के लिए की गई थी। कथन 3 गलत है। ‘ज़ोन ऑफ इन्फ्लुएंस’ का निर्धारण वैज्ञानिक अध्ययनों और विभिन्न हितधारकों के परामर्श से किया जाता है, जिसमें केंद्रीय और राज्य दोनों प्राधिकरणों की भूमिका होती है, और अक्सर न्यायिक हस्तक्षेप भी शामिल होता है।
Q2. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
कथन I (अभिकथन A): NGT को पर्यावरण से संबंधित कानूनी अधिकारों के प्रवर्तन और व्यक्तियों तथा संपत्ति को हुए नुकसान के लिए राहत एवं मुआवजा देने का अधिकार है।
कथन II (कारण R): NGT की स्थापना पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत की गई थी ताकि पर्यावरण संबंधी विवादों का त्वरित निपटान सुनिश्चित किया जा सके।
- A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सही है, लेकिन R गलत है।
- A गलत है, लेकिन R सही है।
उत्तर: A सही है, लेकिन R गलत है। — अभिकथन A सही है। NGT को पर्यावरण से संबंधित कानूनी अधिकारों को लागू करने और पीड़ितों को मुआवजा देने का अधिकार है। कारण R गलत है। NGT की स्थापना राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 (National Green Tribunal Act, 2010) के तहत की गई थी, न कि पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत।
Q3. आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 के तहत, निम्नलिखित में से कौन सी गतिविधियाँ आमतौर पर आर्द्रभूमि और उसके ‘ज़ोन ऑफ इन्फ्लुएंस’ में प्रतिबंधित हैं?
- केवल मछली पकड़ना और कृषि गतिविधियाँ
- केवल पर्यटन और मनोरंजन गतिविधियाँ
- ठोस अपशिष्ट डंप करना और औद्योगिक बहिःस्राव छोड़ना
- केवल वैज्ञानिक अनुसंधान और शिक्षा
उत्तर: ठोस अपशिष्ट डंप करना और औद्योगिक बहिःस्राव छोड़ना — आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 के तहत, आर्द्रभूमि के पारिस्थितिक चरित्र को बनाए रखने के लिए कई गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया गया है। इनमें ठोस अपशिष्ट डंप करना, औद्योगिक बहिःस्राव छोड़ना, और आर्द्रभूमि के हाइड्रोलॉजिकल चरित्र को बदलने वाली गतिविधियाँ शामिल हैं। मछली पकड़ना, कृषि, पर्यटन और वैज्ञानिक अनुसंधान जैसी कुछ गतिविधियाँ, यदि स्थायी रूप से की जाती हैं और नियमों के अनुरूप होती हैं, तो उन्हें विनियमित किया जा सकता है लेकिन पूरी तरह से प्रतिबंधित नहीं किया जाता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ आर्द्रभूमि संरक्षण में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। भारत में आर्द्रभूमि के ‘ज़ोन ऑफ इन्फ्लुएंस’ के निर्धारण से संबंधित चुनौतियों पर भी प्रकाश डालिए। (15 Marks)
रूपरेखा: परिचय: आर्द्रभूमि के महत्व और NGT की स्थापना का संक्षिप्त उल्लेख।
NGT की भूमिका: NGT अधिनियम, 2010 के तहत NGT की शक्तियों और कार्यों का वर्णन करें। पर्यावरण संबंधी मामलों में त्वरित न्याय, क्षतिपूर्ति प्रदान करना, और पर्यावरण कानूनों को लागू करने में इसकी भूमिका का उल्लेख करें। पल्लीकरनै दलदली भूमि जैसे विशिष्ट मामलों का संदर्भ दें जहां NGT ने हस्तक्षेप किया है।
आलोचनात्मक परीक्षण: NGT की प्रभावशीलता, न्यायिक सक्रियता, विशेषज्ञता की कमी के आरोप, और इसके निर्णयों के कार्यान्वयन से संबंधित चुनौतियों का विश्लेषण करें। इसके सकारात्मक प्रभावों (जैसे पर्यावरण जागरूकता बढ़ाना, प्रदूषण नियंत्रण) और सीमाओं (जैसे राज्यों के साथ समन्वय की कमी, अपील प्रक्रियाओं में देरी) पर चर्चा करें।
‘ज़ोन ऑफ इन्फ्लुएंस’ के निर्धारण से संबंधित चुनौतियाँ: ‘ज़ोन ऑफ इन्फ्लुएंस’ की अवधारणा को स्पष्ट करें। इसके निर्धारण में आने वाली चुनौतियों पर प्रकाश डालें, जैसे:
1. वैज्ञानिक डेटा की कमी और सीमांकन की जटिलता।
2. शहरीकरण और भूमि उपयोग परिवर्तन का दबाव।
3. निजी संपत्ति के अधिकारों और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना।
4. विभिन्न सरकारी विभागों और हितधारकों के बीच समन्वय का अभाव।
5. स्थानीय समुदायों और रियल एस्टेट डेवलपर्स जैसे हितधारकों के विरोध।
6. कानूनी और नियामक अस्पष्टताएँ।
निष्कर्ष: आर्द्रभूमि संरक्षण के लिए NGT की भूमिका के महत्व को रेखांकित करें और ‘ज़ोन ऑफ इन्फ्लुएंस’ के निर्धारण में एक संतुलित और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की आवश्यकता पर जोर दें, जिसमें सभी हितधारकों को शामिल किया जाए और सतत विकास को प्राथमिकता दी जाए।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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