बॉम्बे हाई कोर्ट: ‘क्या भारत धर्मनिरपेक्ष नहीं?’ दीया मिर्जा वीडियो पुनः अपलोड करें

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पटाखा-मुक्त दीपावली अभियाननिर्देशजागरूकता अभियानवीडियोकलाकारों के संदेशआपत्तिस्थानीय नेताओं द्वाराचिंताउच्च न्यायालय द्वारापुनः प्रसारितसंदेश का सुझाव
पटाखा-मुक्त दीपावली अभियान

✎ धर्मनिरपेक्षता भारत में राज्य की तटस्थता और सभी धर्मों के प्रति समान आदर है, जिसे अनुच्छेद 51A(ङ) के सद्भाव के कर्तव्य और अनुच्छेद 25–28 की धार्मिक स्वतंत्रता से बल मिलता है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — राजव्यवस्था (Polity): प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्षता, मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21, 25–28), मौलिक कर्तव्य (अनुच्छेद 51A), न्यायपालिका की भूमिका (स्वप्रेरित जनहित याचिका)  |  GS Paper II — शासन (Governance): शहरी स्थानीय निकाय, नगर निगम की भूमिका, जन-जागरूकता अभियानों में सार्वजनिक हस्तियों की सहभागिता  |  GS Paper III — पर्यावरण (Environment): वायु एवं ध्वनि प्रदूषण, पटाखों से होने वाला प्रदूषण, पर्यावरण विनियमन की विधिक संरचना
  • Prelims: धर्मनिरपेक्षता (Secularism) और प्रस्तावना में 42वाँ संशोधन, 1976, अनुच्छेद 51A(ङ) — सद्भाव और भाईचारे की भावना, अनुच्छेद 25–28 — धार्मिक स्वतंत्रता, अनुच्छेद 21 — स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार (न्यायिक व्याख्या), अनुच्छेद 48A — राज्य का पर्यावरण संरक्षण का नीति-निर्देशक तत्व, स्वप्रेरित जनहित याचिका (Suo Motu PIL) और अनुच्छेद 226, वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986, ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (जैसे MPCB) और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
  • Essay: बहुलवादी समाज में धर्मनिरपेक्षता: राज्य की तटस्थता और सामाजिक सौहार्द, पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक उत्सव: अधिकारों और कर्तव्यों के बीच संतुलन

त्वरित पुनरावृत्ति: धर्मनिरपेक्षता भारत में राज्य की तटस्थता और सभी धर्मों के प्रति समान आदर है, जिसे अनुच्छेद 51A(ङ) के सद्भाव के कर्तव्य और अनुच्छेद 25–28 की धार्मिक स्वतंत्रता से बल मिलता है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

बॉम्बे उच्च न्यायालय ने स्वप्रेरित जनहित याचिका की सुनवाई में बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) द्वारा पटाखा-मुक्त दीपावली अभियान के एक वीडियो को हटाए जाने पर चिंता व्यक्त की। यह वीडियो एक अभिनेत्री का था, जिसे कुछ स्थानीय राजनीतिक नेताओं की आपत्ति के बाद हटाया गया था। न्यायालय ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए सुझाव दिया कि ऐसे संदेश पुनः प्रसारित किए जाएँ, ताकि नागरिकों का संविधान में विश्वास बना रहे। न्यायालय ने यह भी कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार त्योहार सबके लिए हैं और किसी व्यक्ति को किसी त्योहार से अलग नहीं किया जा सकता। साथ ही, उसने पटाखे सार्वजनिक सड़कों पर फोड़ने पर पूर्ण प्रतिबंध को दोहराया। इस प्रकरण में धर्मनिरपेक्षता, सार्वजनिक संवाद में संयम, नगर निगम की स्वायत्तता और पर्यावरण नियमन, चारों पहलू एक साथ जुड़े हैं।

पृष्ठभूमि

  • भारत का संविधान 42वें संशोधन (1976) द्वारा प्रस्तावना में “पंथनिरपेक्ष” और “समाजवादी” शब्द जोड़े गए। भारतीय धर्मनिरपेक्षता में राज्य सभी धर्मों से समान दूरी रखता है और सभी धर्मों के प्रति समान आदर का भाव अपनाता है।
  • अक्टूबर में उच्च न्यायालय ने बीएमसी को निर्देश दिया था कि वह पर्यावरण जागरूकता के लिए सार्वजनिक हस्तियों को निःशुल्क जोड़े। इसी के अंतर्गत कई हस्तियों के संदेश वाले वीडियो तैयार हुए।
  • वायु और ध्वनि प्रदूषण का सबसे तीव्र रूप दीपावली के आसपास दिखता है। पटाखों से होने वाला वायु प्रदूषण श्वसन रोगों को बढ़ाता है और ध्वनि प्रदूषण रात्रि की शांति को प्रभावित करता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने पटाखों के उत्पादन, बिक्री और उपयोग पर समय-समय पर नियंत्रण के निर्देश दिए हैं। न्यायालय का यह दृष्टिकोण रहा है कि पर्यावरण संरक्षण और नागरिकों के स्वास्थ्य के अधिकार के बीच संतुलन आवश्यक है।
  • जनहित याचिका के माध्यम से न्यायपालिका सार्वजनिक हित के मामलों में स्वप्रेरित संज्ञान ले सकती है, जिससे प्रशासनिक निर्णयों की संवैधानिक समीक्षा होती है।

धर्मनिरपेक्षता, स्वप्रेरित जनहित याचिका और पर्यावरण विनियमन क्या है?

  • भारतीय धर्मनिरपेक्षता का आधार राज्य की तटस्थता है। राज्य किसी धर्म को राजकीय धर्म नहीं बनाता, और प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म को मानने, प्रचार करने और आचरण करने की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) प्राप्त है।
  • अनुच्छेद 51A(ङ) नागरिकों से अपेक्षा करता है कि वे धार्मिक, भाषायी और क्षेत्रीय विविधताओं से ऊपर उठकर भारत के लोगों में सद्भाव और भाईचारे की भावना को बढ़ावा दें। यह मौलिक कर्तव्य सामाजिक सौहार्द का संवैधानिक आधार है।
  • स्वप्रेरित जनहित याचिका में न्यायालय किसी पीड़ित के आवेदन के बिना, सार्वजनिक महत्व के मुद्दे पर स्वयं संज्ञान लेता है। इसका उपयोग प्रशासनिक लापरवाही या सार्वजनिक हित से जुड़े प्रश्नों पर होता है।
  • पर्यावरण संरक्षण की विधिक संरचना में वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 तथा ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000 शामिल हैं। इनके क्रियान्वयन में राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका केंद्रीय है।
  • नगर निगम शहरी स्थानीय निकाय है, जिसे 74वें संविधान संशोधन (1992) द्वारा संवैधानिक दर्जा मिला। जन-जागरूकता जैसे कार्यक्रम नगर निगम के नियमित कार्यों के अंतर्गत आते हैं, और इनके संचालन में पेशेवर तटस्थता अपेक्षित है।
  • अनुच्छेद 19(1)(क) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, जिस पर अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत लोक व्यवस्था, शालीनता और सार्वजनिक हित के आधार पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लग सकते हैं।
  • अनुच्छेद 48A राज्य को पर्यावरण की रक्षा और संवर्धन का निर्देश देता है, जबकि अनुच्छेद 51A(छ) नागरिकों पर प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा का कर्तव्य डालता है। इसी कारण पर्यावरण से जुड़े जागरूकता अभियान संवैधानिक आधार पर खड़े होते हैं।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
स्वतःसंज्ञान जनहित याचिका (Suo Motu PIL) उच्च न्यायालय ने त्योहारों के दौरान ध्वनि और वायु प्रदूषण पर स्वयं संज्ञान लेकर सुनवाई की। इससे न्यायालय की सक्रिय भूमिका और सार्वजनिक हित के मामलों में उसकी पहल स्पष्ट होती है।
बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) का जागरूकता अभियान न्यायालय के 26 अक्टूबर के निर्देश पर BMC ने विभिन्न क्षेत्रों की नामी हस्तियों को निःशुल्क जोड़कर पटाखों के दुष्प्रभाव पर संदेश दिलाए। यह स्थानीय निकाय द्वारा जन-जागरूकता का उदाहरण है।
सामग्री हटाने का विवाद स्थानीय राजनीतिक नेताओं की आपत्ति के बाद एक कलाकार का संदेश BMC के सामाजिक माध्यम से हटाया गया। न्यायालय ने इसे प्रशासनिक निर्णय में बाहरी दबाव के संकेत के रूप में देखा।
पंथनिरपेक्षता (Secularism) और सामाजिक सौहार्द न्यायालय ने कहा कि त्योहार सबके लिए है और किसी व्यक्ति को किसी त्योहार से अलग नहीं किया जा सकता। यह संविधान की प्रस्तावना में निहित सर्वधर्म समभाव की भावना को पुष्ट करता है।
पटाखों पर सार्वजनिक सड़कों पर प्रतिबंध न्यायालय ने त्योहारों के दौरान सार्वजनिक सड़कों पर पटाखे जलाने पर ‘संपूर्ण प्रतिबंध’ को दोहराया। यह वायु प्रदूषण नियंत्रण के लिए प्रवर्तन की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

महत्व

सांविधानिक (Constitutional)

  • न्यायालय ने पंथनिरपेक्षता (Secularism) को भारत की संवैधानिक पहचान के रूप में रेखांकित किया, जो संविधान की प्रस्तावना में ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द से जुड़ी है।
  • न्यायालय ने कहा कि ऐसे निर्णयों से संविधान में लोगों का विश्वास बहाल होना चाहिए, क्योंकि संविधान सभी नागरिकों की समान गरिमा की गारंटी देता है।
  • सार्वजनिक संस्थाओं के निर्णयों में बाहरी या राजनीतिक दबाव की आशंका पर न्यायिक समीक्षा की भूमिका स्पष्ट होती है।

प्रशासनिक (Administrative)

  • स्थानीय निकाय द्वारा जन-जागरूकता अभियान में विभिन्न व्यक्तियों को समान अवसर देना प्रशासनिक निष्पक्षता का व्यावहारिक रूप है।
  • न्यायालय ने BMC, महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Maharashtra Pollution Control Board) और पुलिस प्राधिकरण के समन्वित प्रयासों की सराहना की।
  • सार्वजनिक संचार से जुड़े निर्णयों में संस्थागत मानदंड और स्पष्ट दिशानिर्देश होने चाहिए, ताकि व्यक्तिगत प्रतिक्रियाओं का प्रभाव कम हो।

पर्यावरणीय (Environmental)

  • वायु प्रदूषण (Air Pollution) नियंत्रण से जुड़े मामलों में वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 (Air (Prevention and Control of Pollution) Act, 1981) का ढांचा प्रासंगिक है।
  • त्योहारों के समय पटाखों से होने वाला वायु और ध्वनि प्रदूषण शहरी स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती है।

सामाजिक (Social)

  • न्यायालय ने एकजुटता और सामुदायिक भावना को महत्वपूर्ण माना, जो नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों में निहित सामाजिक सौहार्द के आदर्श से मेल खाती है।
  • मुंबई जैसे बहुसांस्कृतिक शहर में सामाजिक विश्वास को बनाए रखना नागरिक प्रशासन की जिम्मेदारी है।

चुनौतियाँ

1. सार्वजनिक संवाद में असहिष्णुता

  • सरकारी अभियानों में व्यक्तियों के चयन पर धार्मिक या राजनीतिक रंग चढ़ाने से सामाजिक सौहार्द प्रभावित हो सकता है।
  • छोटी-सी आपत्ति भी प्रशासनिक निर्णय को प्रभावित कर सकती है, जिससे जनता का भरोसा कमजोर होता है।

2. प्रशासनिक निष्पक्षता बनाम बाहरी दबाव

  • लोक प्रशासन में निर्णय तर्क और नियमों के आधार पर होने चाहिए, न कि व्यक्तिगत या राजनीतिक आपत्ति के आधार पर।
  • स्थानीय निकाय के अधिकारियों पर निर्णय बदलने का दबाव निष्पक्ष और निरंतर शासन को बाधित करता है।

3. वायु प्रदूषण नियंत्रण का प्रवर्तन

  • पटाखों पर प्रतिबंध के बावजूद सड़कों पर उनके प्रयोग को रोकना प्रवर्तन की क्षमता पर निर्भर है।
  • जागरूकता अभियान और कानूनी प्रतिबंध के बीच प्रभावी समन्वय आवश्यक है।

4. न्यायिक निर्देश और कार्यपालिका के बीच संतुलन

  • न्यायालय ने निर्देश देने के बजाय BMC को ‘सर्वोत्तम प्रथाएं’ अपनाने के लिए छोड़ा, जो कार्यपालिका की स्वायत्तता का सम्मान है।
  • स्वतःसंज्ञान PIL में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा और शक्ति-पृथक्करण का प्रश्न बार-बार उठता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
सामग्री का हटाया जाना सार्वजनिक संदेश को बिना स्पष्ट तर्क के हटाने से प्रशासन की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठते हैं।
राजनीतिक रंग जनहित के अभियान को विभाजनकारी रूप देने से उसका मूल उद्देश्य, यानी प्रदूषण जागरूकता, कमजोर पड़ता है।
प्रवर्तन की कमी पटाखों पर प्रतिबंध का व्यवहार में पालन सुनिश्चित करना प्रशासनिक क्षमता की परीक्षा है।
संस्थागत स्वायत्तता अधिकारियों पर बाहरी दबाव से निर्णय प्रक्रिया की स्वतंत्रता और निष्पक्षता प्रभावित होती है।

आगे की राह

  • सार्वजनिक जागरूकता अभियानों में सामग्री चयन के स्पष्ट और लिखित मानदंड बनाए जाएं, ताकि निर्णय व्यक्तिगत आपत्तियों से प्रभावित न हों।
  • हटाए गए या विवादित संदेशों के लिए शिकायत और समीक्षा की एक औपचारिक प्रक्रिया स्थापित की जाए।
  • नगर निगम के अधिकारियों को सामाजिक सौहार्द और प्रशासनिक निष्पक्षता पर नियमित प्रशिक्षण दिया जाए।
  • वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 के अंतर्गत पटाखों से संबंधित प्रतिबंधों के प्रवर्तन के लिए पुलिस और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के बीच समन्वय सुदृढ़ किया जाए।
  • पटाखा-मुक्त त्योहार को लेकर समुदायों के साथ संवाद और स्थानीय स्तर पर वैकल्पिक उत्सव-पद्धतियों को बढ़ावा दिया जाए।
  • जागरूकता संदेशों में सभी नागरिकों की भागीदारी को सामान्य नीति के रूप में अपनाया जाए, ताकि अभियान किसी एक वर्ग की छवि न बनें।
  • न्यायालय के निर्देशों और कार्यपालिका की स्वायत्तता के बीच स्पष्ट भूमिका-विभाजन बनाए रखा जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

धर्मनिरपेक्षता · भारतीय संविधान · मौलिक अधिकार · न्यायिक सक्रियता · जनहित याचिका · राज्य नीति के निदेशक सिद्धांत · अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता · सामाजिक सद्भाव · पर्यावरण संरक्षण · स्थानीय स्वशासन

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 25: अंतःकरण और धर्म की स्वतंत्रता, त्योहार मनाने का अधिकार
  • अनुच्छेद 51क(ङ): समरसता और भाईचारे का मौलिक कर्तव्य
  • अनुच्छेद 19(1)(क): अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सार्वजनिक संदेश से संबंध
  • अनुच्छेद 226: उच्च न्यायालय की रिट शक्ति, स्वतःसंज्ञान PIL
  • अनुच्छेद 243W: नगरपालिकाओं को कार्य और शक्तियां सौंपना

अवधारणा प्रवाह

पटाखों से वायु और ध्वनि प्रदूषण बढ़ना और त्योहारों के दौरान जन-जागरूकता की आवश्यकता होना।  →  उच्च न्यायालय द्वारा स्वतःसंज्ञान PIL में 26 अक्टूबर को BMC को नामी व्यक्तियों को निःशुल्क जोड़कर जागरूकता अभियान चलाने का निर्देश देना।  →  BMC द्वारा कलाकारों के संदेश वाले वीडियो जारी करना।  →  स्थानीय राजनीतिक नेताओं की आपत्ति के बाद एक वीडियो हटाया जाना।  →  न्यायालय द्वारा इस कदम पर चिंता व्यक्त करना और इसे प्रशासनिक निष्पक्षता तथा सामाजिक सौहार्द के विरुद्ध मानना।  →  न्यायालय द्वारा सामग्री पुनः प्रसारित करने की सलाह देना, ताकि संविधान में लोगों का विश्वास बहाल हो और पटाखों पर प्रतिबंध का पालन सुनिश्चित हो।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया था।
2. भारत में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ राज्य द्वारा सभी धर्मों को समान सम्मान देना और किसी एक धर्म को प्राथमिकता न देना है।
3. सर्वोच्च न्यायालय ने एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ वाद में धर्मनिरपेक्षता को संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा घोषित किया।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा प्रस्तावना में जोड़ा गया था। कथन 2 सही है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता पश्चिमी मॉडल से भिन्न है, जहाँ राज्य सभी धर्मों से समान दूरी बनाए रखता है। भारत में राज्य सभी धर्मों को समान सम्मान देता है। कथन 3 सही है। एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने धर्मनिरपेक्षता को संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा घोषित किया था।

Q2. अभिकथन (A): बॉम्बे उच्च न्यायालय ने प्रदूषण मुक्त दिवाली अभियान के वीडियो को हटाने पर अपनी ‘अशांति’ व्यक्त की और इसे बहाल करने का सुझाव दिया।
कारण (R): न्यायालय ने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और त्योहारों को सभी को मिलकर मनाना चाहिए, किसी को अलग नहीं किया जाना चाहिए।

  1. A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
  4. A असत्य है, लेकिन R सत्य है।

उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है, जैसा कि समाचार में बताया गया है कि बॉम्बे उच्च न्यायालय ने वीडियो हटाने पर ‘अशांति’ व्यक्त की। कारण (R) भी सही है, क्योंकि न्यायालय ने देश की धर्मनिरपेक्ष साख को रेखांकित करते हुए कहा कि त्योहार सभी के लिए हैं और किसी को अलग नहीं किया जाना चाहिए। कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या करता है, क्योंकि न्यायालय का यह रुख धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर आधारित था।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारतीय संविधान में निहित धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत की व्याख्या कीजिए। बॉम्बे उच्च न्यायालय के हालिया निर्णय के आलोक में, सामाजिक सद्भाव और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संदर्भ में इस सिद्धांत के महत्व का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** भारतीय धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा और इसकी पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता से भिन्नता का संक्षिप्त परिचय। संविधान की प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द के समावेश का उल्लेख।
2. **भारतीय धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत:**
* **सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता:** राज्य द्वारा सभी धर्मों को समान सम्मान (सर्वधर्म समभाव) और समर्थन।
* **अनुच्छेद 25-28:** धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार।
* **राज्य का हस्तक्षेप:** सामाजिक सुधारों के लिए धर्म में राज्य के हस्तक्षेप की अनुमति (जैसे अनुच्छेद 17, अनुच्छेद 25(2)(b))।
* **मूल ढाँचा:** एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ वाद (1994) में धर्मनिरपेक्षता को संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा घोषित करना।
3. **बॉम्बे उच्च न्यायालय के निर्णय का संदर्भ:**
* प्रदूषण मुक्त दिवाली अभियान और एक सेलिब्रिटी के वीडियो को हटाने का मामला।
* न्यायालय द्वारा देश की धर्मनिरपेक्ष साख और ‘सामुदायिक भावना’ पर जोर देना।
* संविधान में लोगों के विश्वास को बहाल करने की आवश्यकता पर बल।
4. **सामाजिक सद्भाव के संदर्भ में महत्व:**
* विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच सह-अस्तित्व और भाईचारे को बढ़ावा देना।
* धार्मिक भेदभाव और कट्टरता को रोकना।
* त्योहारों को साझा सांस्कृतिक विरासत के रूप में देखना।
5. **अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संदर्भ में महत्व:**
* अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।
* सार्वजनिक अभियानों में भागीदारी और विचारों की अभिव्यक्ति का अधिकार।
* राज्य द्वारा अनावश्यक प्रतिबंधों से सुरक्षा।
6. **समालोचनात्मक परीक्षण:**
* धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों को बनाए रखने में न्यायपालिका की भूमिका (न्यायिक सक्रियता)।
* राज्य और नागरिक समाज के बीच संतुलन की आवश्यकता।
* ‘छोटी मानसिकता’ या ‘गुटबाजी’ के खिलाफ न्यायालय की टिप्पणी का विश्लेषण।
* धर्मनिरपेक्षता के समक्ष चुनौतियाँ (सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, राजनीतिकरण)।
7. **निष्कर्ष:** भारतीय धर्मनिरपेक्षता की मजबूती और समावेशी समाज के निर्माण में इसकी निरंतर प्रासंगिकता पर बल। संविधान के मूल्यों को बनाए रखने में न्यायपालिका की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करना।

स्रोत: The Indian Express


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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