ISRO का GSLV-F18 मिशन: NVS-03 नेविगेशन सैटेलाइट का प्रक्षेपण आज रात

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ISRO का GSLV-F18 मिशन: NVS-03 नेविगेशन सैटेलाइट का प्रक्षेपण आज रात

NavIC उपग्रह प्रक्षेपण प्रक्रियाउद्देश्यस्वतंत्र नौवहन प्रणालीIRNSS स्वीकृति2006प्रथम पीढ़ी2013द्वितीय पीढ़ीनई क्षमताएँGSLV-F18प्रक्षेपणGTO स्थापनाकक्षा में
NavIC उपग्रह प्रक्षेपण प्रक्रिया

✎ NavIC भारत की स्वतंत्र क्षेत्रीय नौवहन प्रणाली है, जिसकी नागरिक सेवा SPS और एन्क्रिप्टेड अधिकृत सेवा RS है; NVS-03 में L1 संकेत जोड़ा गया है और यह GSLV-F18 से GTO में स्थापित होगा।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, प्रक्षेपण यान और उपग्रह आधारित नौवहन)  |  GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा (सुरक्षा-सम्बन्धी अंतरिक्ष अवसंरचना और एन्क्रिप्टेड सेवाओं की भूमिका)
  • Prelims: NavIC (Navigation with Indian Constellation) और इसका क्षेत्र-विस्तार (लगभग 1,500 किमी), GSLV (भू-समकालिक उपग्रह प्रक्षेपण यान) — तीन चरण और क्रायोजेनिक ऊपरी चरण, भू-समकालिक अंतरण कक्षा (GTO) और भू-स्थिर कक्षा में अंतर, सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC SHAR), श्रीहरिकोटा और द्वितीय प्रक्षेपण पैड (SLP), L1, L5 और S बैंड संकेत; L1 का अन्य वैश्विक प्रणालियों के साथ अंतर-संचालन, SPS (मानक स्थिति निर्धारण सेवा) बनाम RS (प्रतिबंधित सेवा), परमाणु घड़ी (Atomic Clock) — स्वदेशी और आयातित घड़ियों का उपयोग, IRNSS (भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली) और इसके सात उपग्रहों का मूल समूह
  • Essay: आत्मनिर्भरता और सामरिक स्वायत्तता: अंतरिक्ष आधारित नौवहन अवसंरचना का महत्व, नागरिक जीवन और शासन में उपग्रह नौवहन: अवसर, सीमाएँ और सुरक्षा के प्रश्न

त्वरित पुनरावृत्ति: NavIC भारत की स्वतंत्र क्षेत्रीय नौवहन प्रणाली है, जिसकी नागरिक सेवा SPS और एन्क्रिप्टेड अधिकृत सेवा RS है; NVS-03 में L1 संकेत जोड़ा गया है और यह GSLV-F18 से GTO में स्थापित होगा।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने घोषणा की कि GSLV-F18/NVS-03 मिशन 30 अक्टूबर 2026 को रात 23 बजकर 51 मिनट (IST) पर सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा से प्रक्षेपित किया जाएगा। इस मिशन में NVS-03 उपग्रह को भू-समकालिक अंतरण कक्षा (GTO) में स्थापित किया जाना है। यह द्वितीय पीढ़ी के NavIC उपग्रहों में तीसरा उपग्रह है, और GSLV की यह 20वीं उड़ान होगी। इस उपग्रह में L1 संकेत जोड़ा गया है, जो पहले से मौजूद L5 और S संकेतों के अतिरिक्त है। इसलिए यह प्रक्षेपण NavIC की सेवा-निरंतरता और क्षमता-विस्तार की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

पृष्ठभूमि

  • भारत ने अपनी स्वतंत्र क्षेत्रीय नौवहन प्रणाली के लिए IRNSS कार्यक्रम को वर्ष 2006 में स्वीकृति दी थी, ताकि देश के भू-भाग और उसके आसपास के क्षेत्र में स्वतंत्र स्थिति निर्धारण सुविधा उपलब्ध हो सके।
  • प्रथम IRNSS उपग्रह वर्ष 2013 में प्रक्षेपित किया गया, और मूल सात-उपग्रह समूह (IRNSS-1A से IRNSS-1G) का निर्माण पूरा हुआ। इसी समूह को अब NavIC के नाम से जाना जाता है।
  • द्वितीय पीढ़ी के उपग्रहों की योजना इसलिए बनी ताकि मौजूदा समूह की सेवाएँ निरंतर बनी रहें और उसमें नई संकेत-क्षमताएँ जुड़ें। ISRO ने इस क्रम में पाँच द्वितीय पीढ़ी के उपग्रहों की परिकल्पना की है।
  • द्वितीय पीढ़ी का पहला उपग्रह NVS-01 मई 2023 में GSLV-F12 द्वारा प्रक्षेपित हुआ था। इसी मिशन में पहली बार किसी भारतीय नौवहन उपग्रह में स्वदेशी परमाणु घड़ी को अंतरिक्ष में स्थापित किया गया।
  • NavIC दो प्रकार की सेवाएँ देता है: नागरिक उपयोग के लिए SPS और अधिकृत उपयोगकर्ताओं के लिए एन्क्रिप्टेड RS। इस कारण इसका रणनीतिक महत्व भी है।

NavIC और NVS-03 क्या है?

  • NavIC भारत की स्वतंत्र क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली है, जो भारतीय भू-भाग और उसके लगभग 1,500 किमी बाहर तक के क्षेत्र में PVT (स्थिति, वेग और समय) सेवाएँ प्रदान करती है।
  • इसकी दो मुख्य सेवाएँ हैं: नागरिक उपयोग हेतु मानक स्थिति निर्धारण सेवा (SPS) और अधिकृत उपयोगकर्ताओं के लिए एन्क्रिप्टेड प्रतिबंधित सेवा (RS)।
  • NVS-03 द्वितीय पीढ़ी का तीसरा उपग्रह है। इसमें L1 संकेत जोड़ा गया है, जबकि L5 और S संकेत पहले से उपलब्ध हैं। L1 संकेत से नौवहन उपकरणों के लिए अन्य वैश्विक प्रणालियों के साथ अंतर-संचालन की संभावना बढ़ती है।
  • उपग्रह में स्वदेशी परमाणु घड़ी के साथ आयातित परमाणु घड़ियाँ भी लगी हैं। परमाणु घड़ी नौवहन में समय-मापन की सटीकता का आधार होती है, क्योंकि स्थिति का निर्धारण समय-संकेतों के अंतर पर आधारित होता है।
  • GSLV एक तीन-चरणीय प्रक्षेपण यान है, जिसमें तीसरा चरण क्रायोजेनिक इंजन वाला ऊपरी चरण होता है। इसका उपयोग भारी उपग्रहों को भू-समकालिक अंतरण कक्षा तक पहुँचाने में होता है।
  • भू-समकालिक अंतरण कक्षा एक दीर्घवृत्তाकार मध्यवर्ती कक्षा है, जिसके बाद उपग्रह अपने इंजन से ऊँचाई बढ़ाकर भू-स्थिर या भू-समकालिक कक्षा में स्थापित होता है।
  • श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC SHAR) भारत का प्रमुख प्रक्षेपण केंद्र है, जो आंध्र प्रदेश में स्थित है और बंगाल की खाड़ी के तट पर अवस्थित है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
प्रक्षेपण यान GSLV-F18, भू-समकालिक उपग्रह प्रक्षेपण यान (Geosynchronous Satellite Launch Vehicle, GSLV) की 20वीं उड़ान
उपग्रह NVS-03, दूसरी पीढ़ी की NavIC श्रृंखला (Navigation with Indian Constellation) का तीसरा उपग्रह
कक्षा भू-समकालिक अंतरण कक्षा (Geosynchronous Transfer Orbit, GTO) में स्थापना
प्रक्षेपण स्थल सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC SHAR), श्रीहरिकोटा का द्वितीय प्रक्षेपण पैड (Second Launch Pad)
संकेत संरचना L1 संकेत के साथ मौजूदा L5 और S संकेत, जिससे नौवहन क्षमता बढ़ेगी
परमाणु घड़ी स्वदेशी परमाणु घड़ी के साथ आयातित परमाणु घड़ियाँ, जो समय-निर्धारण की सटीकता बढ़ाती हैं

महत्व

रणनीतिक महत्व

  • NavIC एक स्वतंत्र क्षेत्रीय नौवहन प्रणाली है, जिससे भारत की नौवहन सेवाएँ किसी बाहरी वैश्विक प्रणाली पर पूर्णतः निर्भर नहीं रहतीं।
  • RS सेवा (Restricted Service) केवल अधिकृत उपयोगकर्ताओं के लिए एन्क्रिप्टेड है, इसलिए सुरक्षा बलों के लिए विश्वसनीय स्थिति-निर्धारण उपलब्ध रहता है।
  • भारतीय भू-भाग और लगभग 1500 किमी तक के क्षेत्र में आच्छादन होने से सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पड़ोसी क्षेत्र भी प्रणाली के दायरे में आते हैं।

आर्थिक एवं सेवा-आधारित महत्व

  • परिवहन, लॉजिस्टिक्स, कृषि और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में स्थिति, वेग और समय (Position, Velocity and Timing, PVT) सेवाओं की निरंतर उपलब्धता आवश्यक है।
  • SPS सेवा (Standard Positioning Service) नागरिक उपयोगकर्ताओं के लिए उपलब्ध है, जिससे स्थान-आधारित सेवाओं (location-based services) के विकास को आधार मिलता है।
  • उपग्रह-निर्भर सेवाओं में नागरिक उपयोगकर्ताओं की बढ़ती संख्या से स्थानीय तकनीकी उद्योग को भी अवसर मिलते हैं।

तकनीकी एवं वैज्ञानिक महत्व

  • NVS-01 के बाद यह भारत के उपग्रहों में परमाणु घड़ी के स्वदेशी उपयोग की दिशा में एक और चरण है।
  • L1 संकेत जोड़ने से NavIC अन्य वैश्विक नौवहन प्रणालियों के संकेत-आवृत्ति मानकों के अनुरूप होने की दिशा में आगे बढ़ता है, जिससे संयुक्त उपकरणों में उसका उपयोग सरल होता है।
  • दूसरी पीढ़ी की श्रृंखला के माध्यम से प्रणाली की तकनीकी क्षमता को क्रमिक रूप से उन्नत किया जा रहा है।

सेवा निरंतरता और शासन

  • ISRO ने पाँच दूसरी पीढ़ी के उपग्रहों की योजना बनाई है, ताकि मौजूदा NavIC संरचना में निरंतरता और उन्नत सुविधाएँ सुनिश्चित हों।
  • सार्वजनिक सेवाओं, जैसे आपदा-प्रतिक्रिया और परिवहन प्रबंधन, में विश्वसनीय स्थिति-सूचना की निरंतरता शासन की क्षमता को सुदृढ़ करती है।

चुनौतियाँ

1. बाहरी घटकों और तकनीक पर निर्भरता

  • परमाणु घड़ियों के कुछ घटक आयातित हैं, इसलिए पूर्ण आत्मनिर्भरता के लिए घटक-स्तर पर स्वदेशी क्षमता का विकास आवश्यक है।
  • उच्च-सटीकता वाले इलेक्ट्रॉनिक और अंतरिक्ष-ग्रेड घटकों की आपूर्ति श्रृंखला सीमित है।

2. उपयोगकर्ता अपनाने की चुनौती

  • NavIC के संकेत प्राप्त करने वाले उपकरणों (रिसीवर) की व्यापक उपलब्धता के बिना सेवा का उपयोग सीमित रहता है।
  • मोबाइल और वाहन निर्माताओं द्वारा मल्टी-बैंड और मल्टी-कॉन्स्टेलेशन रिसीवर अपनाने की गति धीमी हो सकती है।

3. नागरिक और अधिकृत सेवाओं के बीच संतुलन

  • SPS और RS सेवाओं के बीच स्पष्ट भेद बनाए रखना आवश्यक है, ताकि नागरिक पहुँच और सुरक्षा संबंधी आवश्यकताएँ दोनों पूरी हों।
  • एन्क्रिप्टेड RS सेवा तक पहुँच के नियम और अधिकृत उपयोगकर्ताओं की सूची की पारदर्शी प्रक्रिया शासन-संबंधी प्रश्न उठाती है।

4. सेवा की निरंतरता और उपग्रह जीवनकाल

  • उपग्रहों का कार्यकाल सीमित होता है, इसलिए पुराने उपग्रहों के समय पर प्रतिस्थापन के बिना सेवा में अंतराल का खतरा रहता है।
  • एक ही प्रक्षेपण या कक्षीय विफलता से पूरी श्रृंखला की सेवा प्रभावित हो सकती है।

5. क्षेत्रीय आच्छादन की सीमा

  • NavIC का आच्छादन मुख्यतः भारतीय भू-भाग और उसके आसपास के लगभग 1500 किमी क्षेत्र तक सीमित है।
  • वैश्विक स्तर पर सेवा चाहने वाले उपयोगकर्ताओं के लिए यह प्रणाली पूरक भूमिका निभाती है, प्रतिस्थापन नहीं।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
आयातित परमाणु घड़ियाँ आत्मनिर्भरता के दावे के लिए घटक-स्तर पर स्वदेशी क्षमता आवश्यक
रिसीवर उपकरणों की उपलब्धता सेवा का व्यापक उपयोग उपकरण-बाजार पर निर्भर
SPS और RS का संतुलन नागरिक पहुँच और सुरक्षा आवश्यकताओं के बीच संतुलन
उपग्रह का जीवनकाल प्रतिस्थापन में देरी से सेवा-अंतराल का जोखिम
एकल प्रक्षेपण पर निर्भरता प्रक्षेपण विफलता से श्रृंखला की निरंतरता प्रभावित
क्षेत्रीय आच्छादन वैश्विक उपयोग के लिए पूरक प्रणालियों की आवश्यकता

आगे की राह

  • परमाणु घड़ी और उपग्रह-घटकों के लिए स्वदेशी निर्माण-श्रृंखला विकसित कर आयात पर निर्भरता क्रमशः कम की जाए।
  • पाँच दूसरी पीढ़ी के उपग्रहों की योजना को समयबद्ध रूप से पूरा कर सेवा की निरंतरता सुनिश्चित की जाए।
  • मोबाइल, वाहन और लॉजिस्टिक्स उपकरणों में NavIC संकेत-ग्रहण क्षमता को मानक बनाने हेतु उद्योग के साथ समन्वय किया जाए।
  • SPS सेवा के उपयोग को बढ़ाने के लिए नागरिक अनुप्रयोगों और स्थान-आधारित सेवाओं का विकास किया जाए।
  • RS सेवा तक अधिकृत पहुँच की स्पष्ट प्रक्रिया और निगरानी तंत्र सुनिश्चित किया जाए।
  • आपदा प्रबंधन और परिवहन जैसे सार्वजनिक क्षेत्रों में NavIC आधारित समाधानों के पायलट प्रयोग बढ़ाए जाएँ।
  • प्रक्षेपण और कक्षीय संचालन में जोखिम-प्रबंधन के लिए बैकअप योजना और परीक्षण प्रणाली सुदृढ़ की जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

नाविक प्रणाली · भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली · भू-तुल्यकालिक उपग्रह प्रक्षेपण यान · स्वदेशी परमाणु घड़ी · L1 संकेत · मानक स्थिति निर्धारण सेवा · प्रतिबंधित सेवा · अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी · आत्मनिर्भर भारत · भू-तुल्यकालिक स्थानांतरण कक्षा · उपग्रह नौवहन · दूसरी पीढ़ी के नाविक उपग्रह

अवधारणा प्रवाह

ISRO द्वारा GSLV-F18 के माध्यम से NVS-03 उपग्रह का प्रक्षेपण (श्रीहरिकोटा से)।  →  उपग्रह का भू-समकालिक अंतरण कक्षा (GTO) में स्थापन।  →  उपग्रह पर L1, L5 और S संकेतों का प्रसारण और परमाणु घड़ी द्वारा समय-निर्धारण।  →  NavIC प्रणाली में नई क्षमता जुड़ने से SPS और RS सेवाओं की सटीकता और निरंतरता बढ़ना।  →  भारतीय भू-भाग और आसपास के लगभग 1500 किमी क्षेत्र में विश्वसनीय PVT सेवाओं की उपलब्धता।  →  परिवहन, आपदा प्रबंधन और स्थान-आधारित सेवाओं में उपयोग से आर्थिक और शासकीय दक्षता में वृद्धि।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. नाविक (NavIC) प्रणाली के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. नाविक भारत की स्वतंत्र क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली है।
2. यह केवल नागरिक उपयोगकर्ताओं के लिए मानक स्थिति निर्धारण सेवा (SPS) प्रदान करती है।
3. दूसरी पीढ़ी के नाविक उपग्रहों में स्वदेशी परमाणु घड़ियों का उपयोग किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। नाविक भारत की स्वतंत्र क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली है। कथन 2 गलत है। नाविक दो प्रकार की सेवाएं प्रदान करता है: मानक स्थिति निर्धारण सेवा (SPS) नागरिक उपयोगकर्ताओं के लिए और प्रतिबंधित सेवा (RS) अधिकृत उपयोगकर्ताओं के लिए। कथन 3 सही है। दूसरी पीढ़ी के नाविक उपग्रहों में स्वदेशी परमाणु घड़ियों का उपयोग किया गया है, जो इस मिशन की एक महत्वपूर्ण विशेषता है।

Q2. कथन (A): GSLV-F18/NVS-03 मिशन का उद्देश्य नाविक तारामंडल को मजबूत करना और नौवहन सेवाओं की निरंतरता सुनिश्चित करना है।
कारण (R): NVS-03 उपग्रह में मौजूदा L5 और S संकेतों के अतिरिक्त L1 नौवहन संकेत शामिल है, जो प्रणाली की नौवहन क्षमताओं को बढ़ाता है।

  1. कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं, और कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या करता है।
  2. कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं, लेकिन कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।
  3. कथन (A) सही है, लेकिन कारण (R) गलत है।
  4. कथन (A) गलत है, लेकिन कारण (R) सही है।

उत्तर: कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं, और कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या करता है। — कथन (A) सही है क्योंकि GSLV-F18/NVS-03 मिशन का मुख्य उद्देश्य नाविक तारामंडल को बढ़ाना है। कारण (R) भी सही है क्योंकि NVS-03 में L1 संकेत का समावेश वास्तव में नाविक की क्षमताओं को बढ़ाता है, जिससे यह कथन (A) की सही व्याख्या करता है।

Q3. निम्नलिखित में से कौन सा कथन भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली (NavIC) की विशेषताओं का सबसे अच्छा वर्णन करता है?

  1. यह एक वैश्विक नौवहन प्रणाली है जो पूरे विश्व को कवरेज प्रदान करती है।
  2. यह केवल सैन्य उद्देश्यों के लिए एन्क्रिप्टेड सेवाएं प्रदान करती है।
  3. यह भारत और भारतीय भूभाग से लगभग 1,500 किमी तक के क्षेत्र को स्थिति, वेग और समय (PVT) सेवाएं प्रदान करती है।
  4. यह पूरी तरह से विदेशी प्रौद्योगिकी पर आधारित है और इसमें कोई स्वदेशी घटक नहीं है।

उत्तर: यह भारत और भारतीय भूभाग से लगभग 1,500 किमी तक के क्षेत्र को स्थिति, वेग और समय (PVT) सेवाएं प्रदान करती है। — नाविक एक क्षेत्रीय नौवहन प्रणाली है, वैश्विक नहीं। यह नागरिक और अधिकृत दोनों उपयोगकर्ताओं के लिए सेवाएं प्रदान करती है। यह भारत और भारतीय भूभाग से लगभग 1,500 किमी तक के क्षेत्र को कवरेज प्रदान करती है। इसमें स्वदेशी परमाणु घड़ियों जैसे महत्वपूर्ण स्वदेशी घटक शामिल हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत की स्वतंत्र क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली (NavIC) के महत्व पर चर्चा कीजिए और इसकी दूसरी पीढ़ी के उपग्रहों की प्रमुख विशेषताओं का विश्लेषण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: नाविक (NavIC) का संक्षिप्त परिचय, इसकी आवश्यकता और भारत के लिए इसका रणनीतिक महत्व।
2. नाविक का महत्व:
क. रणनीतिक स्वायत्तता: विदेशी नौवहन प्रणालियों पर निर्भरता कम करना।
ख. नागरिक अनुप्रयोग: परिवहन, स्थान-आधारित सेवाएं, आपदा प्रबंधन आदि में उपयोग।
ग. सुरक्षा अनुप्रयोग: अधिकृत उपयोगकर्ताओं के लिए प्रतिबंधित सेवाएं।
घ. आर्थिक लाभ: स्वदेशी प्रौद्योगिकी विकास और संबंधित उद्योगों को बढ़ावा।
3. दूसरी पीढ़ी के नाविक उपग्रहों की प्रमुख विशेषताएँ (NVS-03 के संदर्भ में):
क. उन्नत संकेत: मौजूदा L5 और S संकेतों के अतिरिक्त L1 नौवहन संकेत का समावेश, जिससे सटीकता और विश्वसनीयता बढ़ती है।
ख. स्वदेशी परमाणु घड़ियाँ: पहली बार स्वदेशी रूप से विकसित रूबिडियम परमाणु घड़ियों का उपयोग, जो समय की सटीकता के लिए महत्वपूर्ण हैं और विदेशी निर्भरता कम करती हैं।
ग. तारामंडल का संवर्धन: मौजूदा नाविक तारामंडल को मजबूत करना और सेवाओं की निरंतरता सुनिश्चित करना।
घ. कवरेज क्षेत्र: भारत के भूभाग और भारतीय भू-राजनीतिक सीमा के आसपास 1,500 किमी तक के क्षेत्र में कवरेज।
4. निष्कर्ष: नाविक के भविष्य की संभावनाएँ और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में भारत की बढ़ती आत्मनिर्भरता पर जोर।

स्रोत: orissapost.com


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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